Sunday, September 2, 2018

सोनभद्र प्राचीन


इतिहास...
सोनभद्र के अतीत का ऐतिहासिक अध्ययन.....

 ‘सोनभद्र प्राचीन’

इतिहास के साथ चलते  हुए

वे सभ्य हेैं,इसलिए हमारे यहां आयेंगे
सभ्य से सभ्यतर बन जायें इसलिए
हमे उजाड़ देंगे
मैने पूछा था विजयगढ़ किले की
खंडहराती दीवारों से 
पार्टनर तुम उजड़ क्यों गये
तुम पुरातत्व ही नहीं इतिहास भी हो
इतिहास उजड़ता नहीं 
कुछ पागलों को छोड़ो
वे कहते है इतिहास उजड़ चुका है
हँसते हुए दीवारों ने बताया था
यह मुझसे नहीं वर्तमान से पूछो
जो मुंह फुलाये बैठा है
अतीत बनने के लिए
अतीत देखिए पर अपनी आँख से

अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य केरूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है 
तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के 
अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के    पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे  मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था।
पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त करते हुए वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। 
पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने जन-प्रतिनिधियों का चयन करना होगा जिससे कि सरकारें जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हों। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से  किया गया ह ैकि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? किसी भी सरकार का मुख्य कार्य होता है कानून व्यवस्था का जनहितकारी प्रबंधन, वह सरकार चाहे जिस काल की हो, काल का कोई फर्क नहीं पड़ता। कानून व्यवस्था के प्रबंधन के आधार पर ही सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने का प्रयास किया जाना चाहिए, ऐसा ही प्रयास करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल?
प्रकाशक: असुविधा, अक्षर घर, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र 231216 उ. प्र. संस्करण: प्रथम 2017, मूल्य: 150 रूपये.




shivendra

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