Friday, November 18, 2016

आलेख लोकमूल्य बोध

लोक मूल्यबोध की जमीन पर जनप्रतिरोध की कथा


यह सच है कि कहानियां श्रव्य एवं पाठनप्रिय होती हैं। वे हमें प्रभावित करती हैं। कहानियां चाहे राम, कृष्ण और शिव जैसे देवत्व प्राप्त कथानायकों के विविध प्रसंगों के बाबत हों या लोकगीतों में गाये जाने वाले लोक के प्रतिनिधि लोरिक तथा आल्हा ऊदल जैसे लोकनायकों के बाबत ही क्यों न हों। इन दोनों कथारूपों की लोकग्राह्यता के समाजशास्त्रीय आकलन में समरूपता दीखती है। जहां देवत्व वाली कथाओं को आज भी भजनों के रूप में गाया, बजाया जाता है, वहीं लोकत्व वाली कथाओं को लोकगीतों में ढाल कर मनोरंजकता के साथ अपने पुरखों के वीरत्वबोध के साथ गाया, बजाया जाता है। मतलब साफ है कि दोनों कथारूपों की कथा चेतनायें आज भी लोक में व्याप्त हैं। कथायें तो आज भी रची जा रही हैं पर उनकी लोकव्याप्ति देवत्व या लोकत्व वाली कथाओं के समकक्ष नहीं खड़ी हो पा रही हैं, सोचना यही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कथाओं के भीतर प्रवाहित होने वाली मनोवैज्ञानिक धाराओं की चेतना को आज का रचनाकार खोल ही न पा रहा हो और भटक जा रहा हो मन के इतर के द्वन्दों को व्याख्यायित करने में, कुछ न कुछ तो है ही। वैसे भटकाव तो साफ दिख रहा है। देवत्व या लोकत्व वाली दोनों कथाओं में जो लोकसंघर्ष का तत्व है जिसके कारण वे कथायें आज भी स्वीकार्य हैं, उसे जनमन समझता तो है पर व्यावहारिक नहीं बना रहा। जनमन तो कथाओं के लोकसंघर्ष के मूल्यों की स्थापनाओं के लिए देवत्व तथा वीरत्व वाले गुणों का ही गान कर रहा है। 
राम, कृष्ण तथा शिव की कथाओं का अध्ययन अगर हम करें तो पता चलेगा कि उन कथाओं के लोक से जुड़े प्रसंग जितने लोकश्रुति (भले ही व्यवहार में न हों) में हैं उतने अन्य प्रसंग नहीं। राम, कृष्ण तथा शिव के लोकसंघर्षों से जुड़े प्रसंगों के सामाजिक आख्यान ही उन्हें देवत्व प्रदान करते हैं, इसी लिए उन कथाओं की मृत्यु की संभावनायें दूर दूर तक नहीं हैं। मतलब साफ है जिन कथाप्रसंगों में लोक के लिए किया जाने वाला लोकसंघर्ष है, वही कथा अपने समय से आगे जाकर सामयिक होकर जीवित भी बची रहेगी। आज की कथाओं की तरह उनकी समकालीनता कभी भी धुन्ध में नहीं रहेगी। यह अलग बात है कि उन कथाओं के लोकसंघर्षों से जुड़े प्रसंगों को करिश्माई रूपों में भी वर्णित किया गया हो सकता है पर बहुत ही सावधानी के साथ, जिससे समय के साथ टकराने की लोकधर्मिता का क्षय न हो। यह सच है कि लोकसंघर्षों की समझ व उसके मूल्यों की कल्पना पाठकों के दिल दिमाग में पहले से ही संयोजित होती है, इसी लिए वे पाठकों को प्रिय भी लगती हैं। 
कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं हो सकती जिसे अच्छे बुरे की पहचान न हो, सच क्या है, झूठ क्या है, इससे ही संबधित सवाल, जीवन क्या है? सभी जानते हैं चाहे इसके बारे में लिखी किताबें पढ़ी हों न पढ़ी हों, उनके बारे में जानते सभी हैं, ये विलोमार्थी शब्द सदैव विमर्श के विषय रहे है और आज भी हैं। चूंकि देवत्व प्रधान कथाओं में लोकसंघर्ष की व्याप्तियां होती है, वही व्याप्तियां ही आज के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समय में भी पाठकों को आकर्षित करती हैं, उन्हें लगता है कि वे कथाप्रसंग उनके जीवन के कथा प्रसंग हैं, जिनके वे अंश हैं। रामकथा की बात करें तो राम का वनगमन, सीता का अपहरण, लवकुश द्वारा अश्वमेध रथ को रोकना, इन कथा प्रसंगों का रचाव ऐसा है जो जनमन से जुड़ा हुआ है, जन में भी ऐसे प्रसंग घटित होते रहते हैं सो ये कथा प्रसंग जनमन को बहुत ही सहजता से प्रभावित कर जाते हैं। राम के वनगमन की कथा को ही लें तो राम के वनगमन का कथानक लोक के वनगमन का कथानक बन जाता है, जैसे राम को नहीं उन्हें ही घर के मुखिया द्वारा घर से निष्कासित कर दिया गया हो। यहां राजा तथा मुखिया के सŸााप्रबंधन में फर्क नहीं, दोनों सŸााधारी हैं। राजव्यवस्था के षडयंत्रकारी प्रबंधन के आदेश के अनुपालन में राम को वन जाना पड़ता है। द्वन्द है कि राजा दशरथ क्या चाहते हैं और सौतेली मॉ कैकेई क्या चाहती है? कैकेई और दशरथ दोनों सŸाा के केन्द्र हैं पर कैकेई सŸाा के केन्द्र पर पर हावी हो जाती है। राम के वनगमन के आदेश के पीछे दिमाग कैकेई का होता है, यानि कैकेई की इच्छा सत्ता की इच्छा बन जाती है। इसलिए राम का वनगमन सŸाा की निरंकुशता के बाबत एक बहस भी है। जनमन राम के सŸााच्युत होने के प्रसंग से उतना प्रभावित नहीं है जितना राम के साथ होने वाले अन्यायरूपी वनगमन के आदेश से। तो यह जो राम के साथ अन्याय का कथाप्रसंग है, वह जनमन का कथा प्रसंग बन कर जन के मन का हिस्सा बन चुका है। किसे नहीं पता अन्याय सभी के साथ हो रहा है, दिक्कत है कि राम भी स ता  के आदेश की अवज्ञा नहीं कर पाते हैं और जनता है कि वह भी सŸाा की अवज्ञा नहीं कर पा रही है। तो यह है राम के वनगमन की कथा के समकालीन होने का कथामूल्य। एक तरह से देखा जाये तो उन कथाओं में आज के समय के समाजशास्त्रीय चिंतन के गुण-दोष हैं, उसके सकारात्मक व नकारात्मक पहलू हैं, सभी बहुत ही बारीकी से उनमें गुंथे हुए हैं। घर, परिवार, कमाई के तरीके तो उनमें हैं ही, समय की बिडंबनायें भी उनमें हैं, यानि घर, परिवार, कैसे चलेगा या कैसे चल रहा है, सामाजिक रिश्ते कैसे बन, बिगड़ रहे हैं, कौन सफल है, कौन असफल है, क्या नैतिक है, क्या अनैतिक है, क्या न्याय है, क्या अन्याय है, सुविधा क्या है, असुविधा क्या है, किसका शासन है या किसका होना चाहिए आदि आदि। ऐसे ही सवालों से हर सभ्यता लगातार टकराती रही है क्योंकि 

पारिवारिक रिश्तों से लेकर सामाजिक रिश्तों तक के सारे कार्यव्यवहार किसी न किसी समाजप्रबंधन से चालित होते हैं। ऐसी स्थिति में ये व्यक्तिगत सवाल ऐसे जटिल सवाल बन जाते हैं कि इन्हें हल करते, कराते व्यक्ति खुद सवाल बन कर सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए अपने यथार्थवादी जीवनमूल्यों को बदल देने के लिए विवश हो जाता है। जाहिर है समाजप्रबंधन ही सŸााप्रबंधन का एक रूप होता है जिससे हताशायें व निराशायें भी उत्पादित होती रहती हैं। उसी बीच जीवन चलाते रहने की काल्पनिक उत्कंठायें भी होती हैं जिससे परिवार तथा समाज का ताना बाना बुना होता है। सो सामाजिक मन और चिŸा के रागों से गुंथित कथायें किसी भी कालखण्ड में अपनी अस्मिता बचाये रखने की शक्ति से ओतप्रोत हुआ करती हैं, उन्हें बचाये रखने के लिए प्रचारों की आवश्यकता नहीं पड़ती। 
घर, परिवार है तो बिडंबनायें भी हैं, उनके होने के कारणों को सामाजिक संरचना के व्यावहारिक दोषों के आधार पर विश्लेषण करने के बाद ही उनसे टकराया जा सकता है, नहीं तो नहीं। अब यह क्या है कि विडंबनाओं का दैवीकरण कर दिया जाये, मान लिया जाये कि परमात्मा जैसा चाहता है वैसा ही होता है। कथा के ऐसे दैवीकरण में तो तर्क के लिए जगह कैसे बचेगी? यानि कि कथा के पात्र जो व्यक्ति होते हैं, वे खुद कुछ नहीं कर सकते, यह जो व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के निराशात्मक पहलू हैं, वे आदिकालीन हैं जिनके जुड़ाव सीधे भाग्यफलों से जोड़े गये होते हैं। ऐसी कथाओं का किसी भी काल में आदर नहीं किया गया और न ही कभी किया जायेगा। वही हालत आज भी जस के तस बनी हुई है। वैसे भाग्यवादी निष्कर्षों वाली कहानियांे की जड़ें काफी गहरे तक अतीत से वर्तमान तक धंसी हुई हैं। कथाओं का प्रारंभ तो सामाजिक विडंबनाओं से होता है पर उसका अन्त भाग्य के कौतुकों में कर दिया जाता है। तो ऐसी कथाओं के बचे रहने की आशा कैसे की जा सकती है? यही समकालीन कथाओं की आलोचना है कि उनमें समय से टकराने वाले समाधानों को उठाया नहीं जा रहा, समाधान वही उठाये जा रहे जिसे पूजीमूल्य बोधों ने पहले से ही गढ़ा हुआ है। पूंजीमूल्य बोधों से टकराने के लिए लोकमूल्य बोधों तक जाना होगा। 
कथा के लिए खतरा दोनों से है भाग्यवादी होने से भी तथा भाववादी होने से भी। भाग्यवादी ही नहीं भाववादी कथाओं की जड़ों की ताकत की बात करें तो वही जड़ें हमें आज के बाजारू समय में भी बांध कर चल रही हैं, और हम अपने भाग्यफलों व भाववाद से बाहर नहीं सोच पा रहे हैं। यानि आज भी जो कुछ हमारे सामने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक यथार्थ के रूप में मौजूद है वह सब सŸााप्रबंधन के पूंजीमूल्य बोधों द्वारा रचित या सृजित किया गया होता है ऐसा न स्वीकार कर हम उनका कारण दैवीय मान रहे हैं। समय को हम आज भी आदिम तरीके से जांच, परख रहे हैं। समय को परखने के इस आदिम तरीके ने हमारी रचनात्मक सोच को ही बौना बना दिया है और हम उन्हीं दैवी परिणामों व निष्कर्षों को जीवनमूल्य (कथामूल्य) मानने लगे हैं जिनके खिलाफ हमें लड़ना था और लड़ना भी है। 
हमें पता है कि अपनी जमीनदारी (संपŸिा) बचाये रखना और गरीबों के घर में चूल्हा जलाने की कामना करना, दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं, फिर भी हम ऐसा ही कर रहे हैं। एक तरफ तो हम सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सŸाा की कुर्सियों व तिजोरियों से आर्थिक व राजनीतिक समझौते कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हम विस्थापितों, प्रताड़ितों, शोषितों के झुर्रियों वाले चेहरों, किकुड़ियाये पेटों, सिकुड़ी हुई ऑतों पर पुरस्कृत हो सकने वाली किताबें लिख रहे हैं। दर्द यही है कि ऐसा ही हो रहा है। हालांकि आज का समय काफी बदल चुका है। हम जानते हैं कि आज हम बाजार की एक वस्तु भर हैं, हमारे दिमाग और देह दोनों को उत्पादक वस्तु के रूप में तब्दील कर दिया गया है, इससे अधिक हमारा कुछ भी अस्तित्व नहीं। हमारे दिमाग और देह दोनों पर बाजार का कब्जा है, बाजार ही उन्हें अपने अनुसार बेच और खरीद रहा है। और यह जो बाजार है वह न केवल हमारी वैयक्तिकता को लील रहा है वरन् हमारी सामाजिकता को भी लील रहा है। कहने को तो हम कह सकते हैं कि हम एक व्यक्ति हैं और हमारी पहचान औरों से अलग है (सच यही है) पर अलग कैसे हैं इसे प्रमाणित करने के मामलों में हमारे अपने औजार नहीं हैं। लड़ाई यही है कि एक व्यक्ति के नाते हम खुद के होने को कैसे प्रमाणित करें कि हम उन लोगों से अलग हैं जो समाज बदल के विरोधी हैं, जो शोषक हैं, चुनाव के नाम पर जो जनता को धोखा दे रहे हैं। सŸाा के शीर्ष पर बैठ कर आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार का कारण बन रहे हैं। सवाल है हमारे पास ऐसे चिन्हित लोगों से टकराने के तरीके क्या हैं? क्या आज की समाजिक स्थिति में उनसे टकराने की क्षमताओं का विकास संभव है? खासतौर से हमारे सामने आज के समय का जो कथा संसार है उसमें हम ऐसे कथानायकों को सिरज सकते हैं जो कुदरती तरीकों से कथाभूमि को उर्वर बना कर समय से टकरा सकें। सोचना यही है कि क्या हम ऐसे कथानायकों को सिरज पा रहे हैं जो अपने दिमाग तथा देह को बाजार में न बेचें तथा खुद को एक उत्पादक वस्तु बनने देने से बचा सकें। 
इन सवालों के बाबत हम अगर आज के समय की कहानियों का संदर्भ लें तो हमें पता चलेगा कि कथा की दुनिया में कुछ जरूरी परिवर्तन जैसा हम कुछ नहीं कर पाये हैं, जैसे यह जो परिवार है, उससे उत्पादित उŸाराधिकार है, यह जो संपŸिा का मामला है, ये सारे के सारे सामंती सामाजिक यथार्थ आज की कहानियों में पहले की ही तरह मजबूती के साथ स्थान बनाये हुए हैं। परिवार का एक आवश्यक पहलू है विवाह, इसी से जुड़ा हुआ है उŸाराधिकार..पूंजीवादी सŸााप्रबंधन के लिए विवाह तथा उŸाराधिकार दोनों बातें बहुत ही आवश्यक हैं। पूंजी मूल्यबोध कभी भी परिवार तथा उŸाराधिकार के पंूजीमूलक यथार्थ बोध को बदलने नहीं देगा। इससे अलग वह एक अलग तरह का यथार्थ सृजित कर 

देगा। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की तरफ बढ़ने का मामला पूंजीवाद द्वारा गढ़ा हुआ एक अलग तरह का पूंजीबोध वाला यथार्थ है। पूंजी की सुविधावादी इच्छाओं ने एकल परिवार के यथार्थ को एक ऐसा यथार्थ बना दिया है जो पूरी तरह प्राकृतिक यथार्थ जान पड़ने लगा है। जिसे तोड़ पाना असंभव है। तो यह है पूंजी द्वारा सिरजा गया नये तरह का एकल परिवार के सृजन का मूल्यबोध। एकल परिवार के रचाव के अलावा तमाम ऐसे संदर्भ हैं जिसे पूंजीमूलक बोध हमारे समाज की चेतना के विकास को बाधित करता है। खासतौर से निजता वाले मूल्यबोध जिसे पूंजीवाद खुली प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा के तौर पर प्रचारित करता है। हम इस कथित प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा के पूंजीमूलक मूल्यबोध को समझे बिना उसे अपने चिंतन का विषय बना लेते हैं और उसी के अनुरूप कथाओं को सिरज लेते हैं। ऐसी कथायें पूंजीमूलक बोध का सिर्फ और सिर्फ प्रचार ही कर सकती हैं और कुछ नहीं। सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने वाले समाज का एक संभावित जुझारू व्यक्ति खुली प्रतियोगिता के द्वारा पूंजीबोध वाली सatta का नागरिक बना लिया जाता है यानि उसे समाज से छीन कर पूंजी के संस्कारों से संस्कारित कर दिया जाता है। सattaप्रबंधन द्वारा तमाम ऐसी प्रतिभाओं को समाज से छीन कर सatta का अंश बना लिया जा चुका है और हमेशा बनाया जाता रहेगा। जिनके घरों में चूल्हा नहीं जला करता था, जिन्हें विस्थापित किया जा चुका है, किसी तरह से उस घर के किसी व्यक्ति ने प्रतिभा हासिल कर लिया है, उस प्रतिभा उसके घर या गांव में क्यों रहने दिया जायेगा। उसे पूंजीमूल्य बोध वाली सatta  किसी न किसी तरह से छीन कर सatta का अंश (पार्ट) बना दिया करती है। दूसरी तरफ यह जो कथाओं की दुनिया है इसमें भी ऐसा ही हो रहा है। दलित, शोषित, उत्पीड़ित, दमित परिवार के प्रतिभाशाली व्यक्ति को कथा में शोषक वर्ग का प्रतिनिधि कलक्टर या मंत्री बनाया जाना प्रगतिशीलता माना जाता है। अरे भाई! यह कैसी प्रगतिशीलता है? किसी शोषक पद पर विराज कर यानि सatta का अंश बन कर क्या वह अपने समुदाय या वर्ग के दमन को रोक पायेगा, उसके पास दमन रोकने या उनसे प्रतिरोध करने के अवसर रहेंगे, क्या वह शोषकों के समूहों से टकरा सकेगा? उसे तो उसके समुदाय का दमन करने के लिए ही सatta का हिस्सा बनाया जा रहा है, तो यह है पूंजीमूल्य बोध वाली सatta का खेल। इस खेल को गहरे से समझने की आवश्यकता है। ऐसे दमित या शोषित समूह की प्रतिभा को सामंती यथार्थ वाले शोषक के रूप में बदल देना यह पूंजीमूल्य बोध द्वारा रचा हुआ यथार्थ, सattaवादी यथार्थ है। सattaप्रबंधन प्रतियोगिता व प्रतिस्पर्धा वाले निजता बोध के द्वारा ऐसे पूंजीमूलक बोध को खुलेआम स्थापित करता रहता है, यही तो सattaप्रबंधन का गुण धर्म है। उसका काम है सामाजिक बदल वाली कुदरती वौद्धिक चेतना को सुविधावादी इच्छाओं की जालों में फसा कर किसी भी तरह से (प्रतियोगिता या प्रतिसपर्धा के द्वारा) समाज से छीन कर सatta प्रबंधन से जोड़ लेना, ऐसे कामों में उसे महारथ हासिल होती है। पूंजीमूल्य बोध वाली ताकतें चिंतन का ऐसा वैचारिक प्रबंधन करती हैं कि वे सुविधावादी इच्छाओं की गंगा में नहा कर पवित्रता बोध से गद्गद् हो जायें और अपनी पीठ ठोंकने लगें। पूंजीमूलक सामाजिक संरंचना का यही बहुत बड़ा द्वन्द है, खुद की निजता बोध वाली चेतना का विकास या समाज की सहयोगी व सहभागिता वाली चेतना का विकास। इन दोनों में से निजता बोध वाली चेतना का विकास काफी लोकप्रिय है और सामाजिक बोध वाली चेतना का आज के समय में कहीं कोई मूल्य ही नहीं, इसीलिए समाज आज हासिए पर है। 
जाहिर है निजता मूलक चेतना, पूंजी मूलक चेतना से गठजोड़ कर समाज की सहयोगी व सहभागी कुदरती चेतना के विकास को बाधित कर देती है। मजा यह कि ऐसे षडयत्रों से वाकिफ लोग भी सatta की कुर्सियों व तिजोरियों से चिपक कर सामाजिक बदलाव के सपनों में गोते लगाने का प्रदर्शन करते हुए सेमिनारों में प्रवचन दे रहे हैं। तो यह है हमारा पूंजीमूल्य बोध वाला समय जो सेमिनारों, एकेडेमिक बहसों आदि तक को अपने मूल्यों में रंग दे रहा है और हमें लगातार विकल्पहीन बना रहा है। ज्योंही चेतना के स्तर पर हम पंूजी से टकराने के बाबत सोचते हैं, जैसे संपtti  के मामलों के बाबत तो यह जो संपtti  का खेल है वह हमें संपtti  के सवामित्व के संभावित विकल्पों के बारे में सोचने ही नहीं देता। उसी तरह शिक्षा का भी सवाल है। क्या हम मौजूदा समय की शिक्षा पद्धति के बारे में पंूजीमूल्यबोध वाले चिंतनों से अलग हटकर कुछ सोच पा रहे हैं? अगर ऐसा होता और हमने आज की शिक्षा के कुदरती मूल्यों को पूजी के बनावटी व आरोपित मूल्यों से अलग कर लिया होता तो अनिवार्य शिक्षा तथा निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था के बारे में हम सोच चुके होते पर हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। पंूजी का गुण है, समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक चेतना के स्तर पर असमानता बनाये रखना सो भला पूंजी कैसे समान व अनिवार्य शिक्षा के विकल्पों के बारे में निर्णय ले सकती है। समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय के संकल्प वाले मूल्य किसी शास्त्र द्वारा भले ही अनुमोदित न हों पर सामाजिक चिntan और चेतन की कुदरती विचार श्रृंखलाओं में इनके मूल्य ही समाज को समाज बनाते हैं वरना समाज केवल एक नाम भर बनकर रह जाता। समाज से राज्य तक की परिकल्पना में समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय की अवधारणायें इसी लिए पहले से ही स्थापित हैं, यह अलग बात है कि उन मूल्यों का सatta  द्वारा अनादर किया जा रहा है तथा विभेदकारी घृणित चेतनाओं को आदरित किया जा रहा है। पर यह सच है कि समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय के कुदरती मूल्यों का अनादरित करने वाली सatta जन की सatta होने का सम्मान कभी भी नहीं प्राप्त कर सकती। चेतना के इन्हीं मूल्यों की स्थापना के लिए किये जाने वाले सामाजिक, राजनीतिक हस्तक्षेप ही इतिहास के चुनिन्दा विषयों में स्थान पाते हैं। राम का वन गमन भी इसी लिए कथा के रूप में ऐतिहासिक हो जाता है। जो आज भी अपनी प्रभावोत्पादकता में कहीं से कमजोर नहीं है।
उन कथाओं से अलग प्रेमसंबधों पर आधारित कथाओं की कथाप्रसंगों की भी स्थिति वही है। प्रेमसंबधों पर आधारित वही कथायें जीवित बची रह सकती हैं जो पूंजीबोध वाली चेतना द्वारा आरोपित यथार्थों के विपरीत कुदरती जनचेता बोध वाले लोकचेतना के यथार्थो द्वारा रची व सिरजी गई होती हैं। राधा-कृष्ण की प्रेम कथा जैसी दुनिया में कोई ऐसी प्रेम कथा नहीं, जो लोकमन को गहरे तक प्रभावित कर सकने की क्षमता वाली हो। एक ऐसी प्रेमकथा जिसमें पता ही नहीं चलता कि राधा कौन हैं और कृष्ण कौन हैं? दोनों में फर्क क्या है ? कथा में नर, नारी के चिŸा और चेतना दोनों का विलयन अद्भुत है। कथा में स्त्रैण तथा पुरुष चितत  दोनों किसी यौगिक की तरह ऐसे विलयित हैं जैसे वे कभी अलग ही न रहे हों। नर का पुरुष चिनतन  तथा नारी का स्त्रैण चिŸा, एक तरफ पुरुष का पुरुषत्व, वीरत्व, कर्ता बोध तो दूसरी तरफ नारी की सुकुमारता, स्त्रैणता, ममत्व का बोध, दोनों में गहरे तक एका, एक दूसरे में होते हुए एक दूसरे से अलग भी.. तो यह है लोकचेतना के यथार्थो द्वारा सिरजी गई कुदरती कथा, तथा पूंजीमूल्य बोध वाली चेतना द्वारा आरोपित यथार्थ का कुदरती अस्वीकार, पूरी तरह से लिंगभेद का समापन। 
नर, नारी के ऐसे संबध वाले कथारूप तो हर काल में जीवित रहेंगे ही। सखी, सखा वाले संबन्ध में अलगाव नहीं है, अलग तो बंधन का होता है, जो बंधे हों, वहां तो बंधन है ही नहीं, वहां सखी, सखा वाला समझदारी पर टिका समान रिश्तों का संबन्ध है, उसे कहां अलग होना। नर, नारी के रिश्तों में सखी, सखा का भाव कुदरती भाव है, जैसे कि मॉ तथा बेटे वाला रिश्ता कुदरती है, बिना मिलावट व बनावट वाला, इसे पति,पत्नी वाले भाव की तरह गढ़ा नहीं जा सकता। सखी, सखा वाले भाव में नर, नारी के एक दूसरे के प्रति कुदरती आकर्षण में मजबूती ही नहीं दिव्यता भी है। सखी, सखा वाला कुदरती संबध, पूजीमूल्य बोध वाले विवाह जैसे पारंपरिक रीति, रिवाजों के विरोध की लोकचेतना का प्रतीक है। इस लोकचेतना के लिए किसी मनुस्मृति की आवश्यकता नहीं पड़ती। तो यह है कथा की स्वस्फूर्तता का अमिश्रित तथा निष्काम फैलाव। सखी, सखा वाला रिश्ता कहीं से भी आरोपित नहीं होता, वह तो नर व नारी दोनों को अपना चुनाव होता है यानि पूरी तरह से एक दूसरे को चुनने की कुदरती आजादी, एकदम प्राकृतिक वरना विवाह तो बंधन की तरह होता है। अगर नर, नारी में सखी, सखा वला संबध होता तो ये जो जातियों का फैलाव व आधिपत्य है, नर, नारी, दोनों पर, विवाह जैसे उपक्रमों के माध्यम से यह कब का टूट चुका होता। जाति की सारी जकड़बन्दी इसी विवाह संस्था के द्वारा रची जाती है, विवाह करो तो जाति में ही, जाति के बाहर विवाह की कल्पना ही नहीं, जाति से बाहर शादी करना सामाजिक अपराध बना दिया गया है यानि नर, नारी के रिश्तों से सखी, सखा वाले लोकचेतना वाले कुदरती मूल्य को छीन लिया गया है। जाति की अवधारणा पूंजीमूल्य बोध वाली चेतना द्वारा आरोपित चेतना है, यह कुदरती मूल्य बोध वाली चेतना नहीं है। नर, नारी के रिश्तों में अगर कुदरती मूल्य बोध वाली चेतना का सम्मान किया जाता तो उनमें सखी, सखा वाले संबध ही होते फिर तो जातियों की जड़ता को टूटना ही था जिसे तोड़ने के लिए लोहिया तथा अम्बेदकर जैसे विचारक राजनीतिक एवं सामाजिक दोनों स्तरों पर आजीवन संघर्ष करते रहे थे।
हालांकि कथाओं की दुनिया में जाति की जकड़बन्दी नहीं देखी जा रही, जिस तरह राजनीति में देखी जा रही है फिर भी जाति की जकड़बन्दी तोड़ने के लिए लेखन के स्तर पर कुछ विशेष नहीं किया जा रहा। एक तरह से देखा जाय तो जाति की जकड़बन्दी तोड़ने वाली जरूरी कथायें नहीं लिखी जा रही हैं। सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में राजनीति के लिए जाति बहुत जरूरी मुद्दा बन गई है। जाति के गठबंधनों द्वारा सरकारें बनायी बिगाड़ी जा रही हैं। लोकतांत्रिक सप्रबंधन में तो जातियों की जकड़बन्दी के खिलाफ खुल कर कथाप्रतिरोध होने चाहिए थे, पर नहीं हो रहे हैं। राजनीतिज्ञ जाति की जकड़बन्दी का लाभ उठाने के लिए अभिनव किस्म की तिकड़में कर रहे हैं। जाति की अवधारणा भी पूंजीमूल्य बोध चेतना द्वारा रचा गया यथार्थ है, यह अनायास की अवधारणा नहीं है। कर्म के अनुसार जाति या जन्म के अनुसार जाति दोनों स्थापनाओं में षडयंत्र है। जरूरत पड़ी तो कर्म के अनुसार जाति बना दिया नहीं तो जन्म के अनुसार जाति बना दिया गया। कर्म तथा जन्म दोनों को ही जाति निर्माण का आधार बना लिया गया है। जाति की अवधारणा तो अब खतरनाक स्थिति तक प्रभावकारी होती जा रही है। अब यह क्या है कि आज की तकनीकी तथा विज्ञान आधारित दुनिया में भी जाति बीमा कंपनी की तरह काम कर रही हैै। विवाह तथा मृत्यु दोनों संस्कार जाति के भीतर ही निपटाये जाने की विवशता रच दी गई है। विवाह हो तो जाति के भीतर ही, हमारा समाज जाति के बाहर विवाह करने के अवसरों को नही प्रदान कर रहा। जाति के बाहर विवाह करने के सारे अवसरों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। जाति के भीतर ही विवाह करने की आरोपित पुरानी जड़ताओं को तोड़ने के लिए प्रयास नहीं किये जा रहे। आखिर ऐसा क्यों, यह कौन सी कुदरती चेतना है? रोटी, बेटी के संबध ही सामाजिक समरसता को बचाये रख सकते हैं और ये जो जातियां हैं, रोटी तथा बेटी के दोनों संबधों को जाति के बाहर पसरने नहीं देतीं। रोटी का संबध मतलब जाति के बाहर खान, पान, बेटी का मतलब जाति के बाहर विवाह, जब तक हमारे समाज में प्रचलित नहीं होगा तब तक जातियां प्रभावी बनी रहेंगी, उनकी जकड़बन्दी को तोड़ा नहीं जा सकेगा। रोटी तथा बेटी के संबध को जाति से बाहर निकालना ही समय की मांग है। ऐसे जटिल समय में पूंजीमूल्यबोध वाली चेतना के प्रतिरोध में हम कथा की दुनिया में भी कुछ उल्लेखनीय नहीं कर पा रहे हैं फलस्वरूप आज भी हम जाति, स्त्री, यौनि की शुचिता तथा संपत्ति के सवालों पर खामोश हैं पहले की तरह जैसा कि पूंजीमूल्य बोध चेतना द्वारा प्रस्तावित है। आदमी और आदमी के बीच मानवीय समीपता तभी स्थापित हो सकती है जब लिंगभेदी, जातिभेदी, धर्मभदी, संपटी  भेदी पूंजीमूल्य बोध वाली चेतनाओं से टकराते हुए लोकमूल्य बोधी चेतनाओं की जमीन पर ही कथाओं में जनप्रतिरोध को सृजित किया जाये तभी कथायें लोककथायें बन पायेंगी, नहीं तो नहीं।   


                                                       4 नवम्बर 2016        












Sunday, May 8, 2016

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित



















    र.नं.63166/78

प्रकाशन का छत्तीसवां वर्ष

  अर्धवार्षिक प्रकाशन
   

    कविता अंक


   समय से संवाद
 जनवरी- जून 2016

 अंशुल शर्मा की कविताओं
      पर केन्द्रित 

           केन्द्रित        कविता अंक 



जन्म... 21अप्रैल 1987
शिक्षा...स्नातकोŸार रसायन शास्त्र
अध्यापन
861,आदर्श बाल विद्या मन्दिर, दूनी
जनपद....टोंक
राजस्थान, 304802
मोबाइल...
09166048404 व 08764252548

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक 


अपनी बात
असुविधा का प्रस्तुत अंक युवा कवि अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित है, ये राजस्थान के रहने वाले हैं, सो इनकी कविताओं में बात कहने का तरीका व उसका आशय दोनों ही सपाट हैं, खरी खरी. कवि अंशुल शर्मा की कवितायें सादगी के साथ काव्य यात्रा करती हुई आलोचनात्मक वौद्धिकता के कवच से लापरवाह रहती हैं. उन कविताओं के लिए एक ही सूत्र है ‘चलना है तो चलते रहना है, यह जो चलना है, स्थगित नहीं करना है, चलने से ही बातें खुलेंगी, आलोचना का क्या, वो तो होती रहती है, लिखो तो भी न लिखो तो भी, कुछ लोग तो बिना लिखे ही जमे हुए हैं. वैसे आधुनिक कवितायें तो वौद्धिकता के जटिल तकनीकों व तथ्यों के साज सिंगार के साथ ही किसी काव्य यात्रा पर निकलती हैं, कथ्य तथा तथ्य खुले न खुले, कविता मित्रों द्वारा जमा दी जाती है.. ऐसी किस्मत सबकी नहीं. कवि अंशुल की कवितायें अपने कथन में आज के समय में भी सपाट हैं, बिना किसी बनावट तथा मिलावट के, इनसे सभी के सामने या अकेले भी दो चार हुआ जा सकता है और अपनी संवेदनायें साझा की जा सकती हैं.  
प्रस्तुत अंक की योजना भी अंशुल जी के कविताओं के अनुरूप अचानक व बिना किसी तैयारी के बन गयी...हुआ यह कि फेसबुक पर कुछ महीने पहले मैंने असुविधा के प्रकाशन के बारे में अनिश्चितता का जिक्र किया था, संभव है असुविधा का प्रकाशन बन्द करना पड़े... मुझे डिम्पू के न रहने के बाद लगने लगा है कि असुविधा का प्रकाशन न संभव हो सके, विवशतायें जिनकी कोई आकृति नहीं होती, उनका होना तो कुदरती हैं...चाहेे कोई उन्हें रचे न रचे. खेती किसानी की सीमा किसे नहीं मालूम, केवल दो जून की रोटी वह भी बमुश्किल तमाम...बहरहाल यह सब मेरा दर्द है, मुझे झेलना है, इससे दूसरों से क्या लेना देना पर दूसरा कौन है? साहित्य में तो कोई दूसरा होता नहीं. मुझे दूसरों के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए था, बाजार में तो केवल तीसरा होता है, और यह जो तीसरा है, वही बाजार को चलाता है, दुख सुख ही नहीं चेतना व अनुभूतियों तक को बाजार का उत्पाद बना डालता है...असुविधा को बिना बाजार की आज्ञा से कभी तीसरा नहीं मिल सकता, बाजार का अपना स्वतंत्र व निरंकुश तंत्र होता है, यह सब जानते तथा मानते हुए भी मैने अपने दर्द का जिक्र फेसबुक पर कर दिया था, शायद खुद को समझाने के लिए या अपना दुख कम करने के लिए, यही कारण रहा होगा. संभव है दुखियारे को तीसरे से दूसरे में तब्दील राम मिल जायें. मुझे अचरज लगा कि फेसबुक की दुनिया में असुविधा के लिए अंशुल शर्मा मिल गये एक दम अपरिचित... अंशुल शर्मा ने तत्काल असुविधा के खाते में दो हजार रूपया डलवा दिया. हालांकि मैं उन्हें असुविधा का खाता नंबर भेजना नहीं चाहता था पर जिद्द भी तो कोई चीज होती है...अंशुल जी की जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा उसी दौरान एक बात और हो गयी जिसका जिक्र न करना गलत होगा..मेरे लिए आदरणीय हैं विष्णु चन्द्र शर्मा जी, उनसे मेरा जुड़ाव बहुत पहले से है जुड़ाव का कारण है उनका बनारसी होना और खरा खरा बोलना, असुविधा ने बहुत पहले एक अंक उन पर भी केन्द्रित किया था. उन्हें मेरे पुत्र अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित अंक मिला और उन्होंने दो हजार रूपयों का चेक मेरे नाम से भेज दिया... चेक लेना है कि नहीं लेना है, इनकार करने का मुझे उन्होंने मौका भी नहीं दिया तो यह सब होता रहा असुविधा के साथ..असुविधा के लिए कम से कम दो लोग तो मिले जो सोचते है कि धन के अभाव के कारण असुविधा बन्द नहीं होनी चाहिए.. उन दोनों लोगों के सहयोग ने मुझे विवश कर दिया कि असुविधा का प्रकाशन बन्द नहीं होने देना है, आखिर खाना, पीना तो चल ही रहा है, मेरे घर के चूल्हे में आग जलती है, फिर असुविधा.क्यों न जले. जलेगी धुधुआती ही सही.... उन लोगों को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद...
अब अंशुल जी की कविताओं पर...
ये लोग/भूख प्यास/पानी बिजली/जैसी/छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्लाते हैं?/अरे/कोई इन्हें चुप कराओ/इनकी चीखें/गम्भीर मुद्दों से/ हमारा ध्यान हटाती हैं।........................
झूले/महŸवहीन/हो चले हैं/पेड़ों पर अब/किसानों की/लाशें झूलने लगी हैं/सबसे मजे की बात तो यह है कि/सबसे निर्मम हत्यारा/सबसे आगे खड़ा रहता है भीड़ में...बालकों के बचपन की लाश को/ पीछे छिपाए।
पसीने से तरबतर/मुँह लटकाए/फावड़ा कंधों पर टाँगे/शाम को घर लौटते मजदूर की पेन्टिंग/लाखों में बिक गयी/और उसके बच्चे.../आज भी भूखे सो गए।
लिखना एक कला है/किसी पर लिखना/कला की कला है/किसी के लिखे पर
लिखना/विशेष कला है/किसी के लिए लिखना/पुरस्कारणीय कला है/आपमें भी तो कोई कला होगी जनाब!
समय से बातें करती अंशुल की कवितायें हमें कुदरती काव्य परंपराओं की तरफ ले जाती हैं, जब कविताओं के सिंगार पटार नहीं किये जाते थे वे एक वाक्य भर होती थीं. धूमिल ने उस परंपरा का जोरदार ढंग से उपयोग किया हाल में विनय मिश्र ने ‘सूरज तो अपने हिसाब से निकलेगा’ तथा किरण अग्रवाल जी ने ‘धूप मेरे भीतर’ संकलन में किया है.
कवि अंशुल सीधे सवाल करते हैं आखिर लोग भूख, प्यास, पानी बिजली,जैसी छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्ला रहे हैं? इन्हें चुप कराओ, इनकी चीखें गम्भीर मुद्दों से हमारा ध्यान हटाती हैं. .ध्यान तो विचारकों चितकों, कैरियरिस्टों का तो हट ही रहा है... कौन कवि है जो नागार्जुन की तरह आन्दोलन का सहभागी बन रहा है? सभी तो अपना मुह पुरस्कारों की तरफ लगाये हुए हैं, मिले न मिले अलग बात है... आज का समय पुरस्कार लेने और लौटाने के बीच का है, दोनों की राजनीति है, ऐसी राजनीति करने वालों के लिए भूख,गरीबी,शोषण आदि के सवाल ध्यान हटाने वाले हुआ करते हैं. वे अक्षरों की अमरता के बहाने खुद को अमर बनाने की चिंता में हैं... अमर बनना इतिहास में होना है तथा इतिहास में कूट कलाकार ही जगह पा सकता है, और कोई नहीं...मेरे यहां के लक्ष्मण सिंह को अंग्रेजों ने मार दिया पर वे इतिहास में नहीं हैं.
कवि अंशुल शर्मा कविता की ठूंठ की तरह हैं और ऐसी ही कविताओं से संभावना भी है. किसे नहीं पता कि ठंूठ पेड़ की मजबूती का जीवित प्रमाण होता है, खुद को मिटाता हुआ.
खेत की मेड़/पर ये जो ठूँठ तुम देख रहे हो ना/ये ठूँठ नहीं हैं/ बरसात की आस में/आँखों को आसमान में टिकाए/खड़ी संभावना हैं.
प्रस्तुत कविता संकलन तमाम ऐसे कवियों के लिए संभावना है कि कवितायें नहीं मरा करतीं, सो लगातार काव्य यात्रा पर चलते रहना चाहिए, काव्य कर्म को निराश व हताश हो कर छोड़ नहीं देना चाहिए.. कवि अंशुल शर्मा साफ कहते हैं...
समय रथ/ अपने पहियों के नीचे/ वर्तमान को कुचलता हुआ/भविष्य होने जा रहा है/तुम इसकी गति को पहचानो/अन्यथा यह वर्तमान का/ अपहरण कर/
छोड़ जाएगा पीछे/ वर्तमान का भूत/और उस रथ/ की धूल से सना/ तुम्हारा चेहरा/किसी को पहचान न आएगा/समय की/ धूल ने बड़े बड़े/ चेहरों को/ धूमिल कर दिया है।
समय की धूल ने बड़े बड़े चेहरों को धूमिल कर दिया है, सो सावधान रहने की जरूरत है कि चेहरा धूमिल न होने पाये और ऐसा तभी होगा जब वर्तमान की चुनौतियों से टकराते रहा जाये. मुझे खुशी है कि कवि अंशुल शर्मा के जेहन में वर्तमान का खुरदुरापन मौजूद है तथा उससे टकराने की क्षमता भी. आशा है कि अंशुल शर्मा जी की कवितायें समय की चुनौतियों से टकराने वालों को स्वीकार्य होंगी, निकट भविष्य में प्रस्तुत संकलन से इतर उनकी और धारदार कवितायें हमें पढ़ने के लिए मिलेंगी.













पौ,पाठशाला
और पंक्तियाँ


पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
मीठे-मीठे सपने
देखा करती हैं
पौ फटते ही,
जबकि माँयें अपने बच्चों की
मनुहार करती हैं
चाय दूध पीने की।

पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
तैयार होने की
तैयारी कर रही होती हैं।

पौ फटते ही,
वे रवाना हो जाती हैं
अपने बस्तों का बोझ लिए।

देखते हैं उनके मवेशी
गीली आँखों से,
कि रस लेते जाओ
हमारे घी दूध का।

रास्ते के बबूल
हिल जाते हैं जोर से,
सुखाने के लिए
उनका पसीना।

समय से तेज दौड़ने की
कोशिश में,
कभी कभी खा जाती हैं ठोकरें,
और दोष देती हैं
सड़क को।

सड़क भी सहेली हैं उनकी
कान पकड़ लेती हैं
और सहला देती हैं
उनके पैरों को।

भागती,दौड़ती,
सिर से एड़ी तक
पसीने में तरबतर।

खुश हो जाती हैं प्रार्थना में
अपनी सहेलियों के साथ
पंक्तिबद्ध होकर।

मगर कभी कभी जब
समय उनसे
आगे निकल जाता है
दौड़ में,
अनजाना अपराध बोध लिए
खड़ी रहती हैं वो
अलग पंक्ति में।

शिक्षक देखते हैं उनको,
कमर पर दोनों हाथ
रखे हुए।

मैं कहता हूँ
आओ कभी
सात हजार मीटर से
दौड़ते भागते
गिरते उठते
उस पर लगो, अलग पंक्ति में
अपराध बोध लिए
उस अपराध का
जो तुमसे हो जाता है
ना चाहते हुए भी।

टाँगें फड़कने लगेगीं
तुम्हारी,
शरीर जकड़ने लगेगा,
पेशियाँ फैलने
और सिकुड़ने लगेंगी,
बहुत तेज रफ्तार से
और दिमाग की
ओर जाने वाला
सारा खून इकट्ठा हो जाएगा
तुम्हारी आँखों में,
सुन्न होते होते दिमाग के।

तब अहसास होगा तुम्हें
देर हो जाना
कितना खलता है
और पौ फटने से पहले
घर से
निकलना भी।

बड़ा प्रसिद्ध आदमी

कुछ आदमी,
बड़े प्रसिद्ध होते हैं,
कुछ आदमी बड़े होते हैं,
प्रसिद्ध नहीं होते।
कुछ आदमी प्रसिद्ध होते हैं,
बड़े नहीं होते।
कुछ आदमी ना बड़े होते हैं,
ना प्रसिद्ध होते हैं,
वहीं कुछ बडे़ और प्रसिद्ध
दोनों होते हैं
मगर
‘आदमी’ नहीं होते

स्मृतियाँ  (एक)


स्मृतियाँ
मरने कहाँ देती हैं
किसी को,
स्मृतियाँ
अमरत्व का दूसरा नाम हैं।

स्मृतियाँ (दो)


स्मृतियाँ
कभी खोती नहीं हैं
छिप जाती हैं,
सिर्फ
कुछ घटनाओं के बीच,
दब जाती हैं
जैसे
पुस्तकों के ढेर के बीच
दब जाता है कोई
पुराना पत्र।

स्मृतियाँ (तीन)


तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
डूबते चले जाना है,
 अन्तहीन गहराई में।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
चढते चले जाना है,
पर्वतों के अमापित
शिखरों पर।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
उजड़े हुए गुलिस्तां में
गुलों की महक
महसूस करना है।

स्मृतियों की
इन
गहराइयों, ऊँचाइयों
और खुशबूओं में,
तुम्हें पा लेना
किसी उपलब्धि से कम नहीं।

स्मृतियॉ (4)


नीम का वो बूढ़ा पेड़,
उसके कई साथी परिन्दों का
पुश्तैनी मकान रहा था।
डर था कि कभी भी
कटवाया जा सकता है
(जैसा कि हर वृद्ध के
साथ होता है)
सो...
कटवा दिया गया
गृहस्वामी द्वारा।
रहना तो था ही कहीं
पालना था अपने भविष्य को,
जल्दी ही उन सबने
एक नया बसेरा तलाश लिया।

मगर एक तोता
अभी भी वहाँ आकर
बैठ जाता है।

बसेरे छूट जाया करते हैं
मगर,
उनसे जुड़ी स्मृतियाँ
नहीं छूटती हैं।

  प्रेम


मैं ‘तुम’ हूँ,
‘तुम’, ‘मैं’ हो,
मैं, मैं नहीं,
तुम, तुम नहीं।

होना और ना होना,
होकर ना होना
ना होकर होना
ही तो
प्रेम है।

 उलझन


जिसे याद रखना
जरूरी है
वह भूल, भूल जाता है,
जिसे भुलाना जरूरी है,
वह रह रह कर
याद आता है।

अजीब गुत्थी है
इस मन की भी
सुलझाने लगता हँू
और
उलझ जाता हूॅ।

परिभ्रमण


तुम तो घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो यथास्थिति
पर
तुम्हारे इस घूमने फिरने से
जो
दिन रात
साल महीने
बनते हैं
वे
नहीं सिरजते ‘यथास्थिति’
तुम्हारी तरह।

कभी कभी
किसी पल को
रोक लेना चाहता हूँ,
मगर
तुम रुको तो
वो पल रुकें।
तुम्हारा क्या है?
तुम तो
घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो
यथास्थिति।
शामें और आवाजें

पहले शाम के वक्त
सुनाई पड़ता था
चहचहा रही हैं
घर लौटती
चिड़ियाएँ,

पुकार रहे हैं बछड़े
अपनी माँओं को,
तैयारी हो रही है
पास के मन्दिर में
आरती की,
शोर मचाते बच्चों के
झुण्ड पर
चिल्ला रही हैं
उनकी माँयें
कि.....
‘अब तो घर आ जाओ।’

अब वे कुदरती आवाजें
सुनाई नहीं पड़तीं,
अभी सुनाई दे रही है...
पास के मोबाइल
टावर से
घरघराते जेनरेटर
की आवाज,
कहीं दूर तेज आवाज में
बज रहा है डी.जे.,
तेजी से गुजरती बाइक्स
जिनके साइलेंसर
अपने नाम के विपरीत
मचाते हैं शोर।
हालाँकि
शामें भी है,
बच्चे भी हैं,
मॉयें भी हैं,
गॅायें भी हैं
मगर
वो
आवाजें अब
नहीं हैं।

झूठ


झूठ
बर्दाश्त होते हैं।
प्यारे झूठ!
अच्छा है
तुम हो।
वाकईं सच नाकाबिले।


दीवारें


इश्तिहारों
के इस जंगल में
‘यहाँ विज्ञापन
चिपकाना सख्त मना है’

लिखी दीवारों को
घोषित किया
जाना चाहिए
संरक्षित।
समस्याएँ

वोट,

दलबदल,
बहुमत,
गठबन्धन,
कुर्सी जैसी
गम्भीर समस्याओं
के बीच,
ये लोग
भूख प्यास
पानी, बिजली
जैसी
छोटी-मोटी
बातों के लिए
क्यों चिल्लाते हैं?

अरे !
कोई इन्हें चुप कराओ!
इनकी चीखें...
गम्भीर मुद्दों से,
हमारा
ध्यान हटाती हैं।
     

झूले


झूले
महŸवहीन
हो चले हैं।

पेड़ों
पर अब
किसानों की
लाशें
झूलने लगी हैं।

मजदूर


पसीने से तरबतर,
मुँह लटकाए,

फावड़ा कंधों पर टाँगे
शाम को घर लौटते
मजदूर की
पेन्टिंग

लाखों में बिक गयी
और
उसके बच्चे...

आज भी
भूखे सो गए।

लेखन एक कला


लिखना
एक कला है।

किसी पर लिखना
कला की कला है।

किसी के लिखे पर
लिखना
विशेष कला है।

किसी के लिए लिखना
पुरस्कारणीय कला है।

आपमें भी तो
कोई कला होगी जनाब!

 सवाल


किसान
दिखाया जाता है,
विज्ञापनों में हँसता हुआ।

या तो
वे विज्ञापन
फर्जी हैं,
या
हँसते हुए
वे किसान।

क्या आप बता सकते हैं
कौन फर्जी है

प्रकृति और मैं


मैंने
कल रात
एक स्वप्न देखा
कि
मैं
अपनी
सुविधाओं
के लिए
प्रकृति का गला
घोंट रहा हूँ।

जागा
तो
मेरे दोनों हाथ
अपनी ही
गर्दन को जकड़े हुए थे।


सिकुड़न


सूचनाओं
के इस तंत्र ने
दुनिया को छोटा
और
पडा़ेस को बड़ा
बना दिया है।

पूरी दुनिया की
खबरों से
हरदम अपडेट
रहने वालों को...

 कई बार

पड़ोसियों के घर
खाली करने
और
नए लोगों के बसने की
खबर तक नहीं लगती।

रोगी का कमरा


क्या कभी
रोगी का कमरा
आपने देखा है ध्यान से?

तरह तरह की
दवाइयों
की
कड़वाहट और गंध से भरा।

वो
गंध उस कमरे की
दीवारों में...
इतनी गहराई
तक घुस चुकी
होती है कि
शुभचिन्तकों द्वारा
भेजे गए खुशबूदार
गुलदस्ते
हो जाते हैं
गंधहीन

रोगी का कमरा
जिसमें प्रवेश करते ही
झूठी संवेदनाओं
की
गुरुत्वीय शक्ति से
शुभचिन्तकों के
चिकित्सकीय ज्ञान के
छिछले सागर
में ज्वार उठने लगता है।

रोगी के कानों में
ये सुझाव
असंख्य
घण्टों, घड़ियालों
का
शोर पैदा करते हैं।

वो झुँझलाता है,
रोगी को ऐसा
लगता है
जैसे
कमरे की दीवारें
धीरे धीरे
उसके पलंग की ओर
सरकने लगी हैं
उसे दबा डालने के लिए।

वो
डर जाता है।
अगर
इस दुनिया में
सबसे
भयावह कोई जगह है
तो
वह है
‘रोगी का कमरा।’

रिंगमास्टर


वह नहीं बोलता था,
उसकी आँखें बोलती थीं।

उसकी आँखों के घूमते ही
घूम जाते थे वे भी
भय से।

आलम यह था कि
उसकी पुतलियाँ
फैलते ही
फैल जाता था,
सन्नाटा चारों ओर।

फिर एक दिन
गजब हो गया,
उसकी पुतलियाँ फेलीं,
जितनी फैल सकती थी,ं
पर उस दिन
सन्नाटा नहीं फैला।

सामने चुप्पी नहीं थी,
भय भी नहीं,
थी बस खुसर पुसर।

वह खुद को नजरों में
गिरता न देख सका
और
उसने डण्डा उठा लिया।

तभी
एक आवाज आई..
‘एक दिन खत्म हो जाएगा
 इस डण्डे का भी भय’
जैसे खत्म हुआ आँखों का
फिर क्या करेगा?

वह चौंका
जैसे
जगा दिया हो
किसी ने नींद से।

समझ आ गया उसे
कि
वह
‘मास्टर’
है
‘रिंगमास्टर’
नहीं।

अनुशासन


पंक्ति में लगे
बालकों को देखकर
कितना
आनन्द आता है।

आनन्द
पंक्तिबद्धता से नहीं,
हमारे
निर्देशों की अनुपालना
को
देखकर आता है।

अनुपालना
हमारी “गुरुता” को
संतृप्त करती हैं।
          //22//

छंद और जीवन


माना
कठिन है,
छन्दबद्ध
कविता की रचना,
परन्तु
असंभव है
स्त्री जीवन की पीड़ा को
छन्दबद्ध
कर पाना भी।

प्रश्न


वे
कहते हैं
‘प्रश्न करना अपराध है’

प्रश्न करके
तुम
हमारी
गुरुता और शुचिता
को
चोट पहँुचा रहे हो।

वे
प्रश्नों को
अपराध घोषित कर
पतली गली से
निकल लेते हैं
क्योंकि
उनके पास

तुम्हारे प्रश्नों के
उŸार नहीं हैं।
उŸार होगे भी कैसे?

ऋण बटा ऋण

काँटे से काँटा
निकालने
और
जहर से जहर कटने
की
बात को सच मानकर,
उसकी
पुश्तें
कर्ज चुका चुका कर
मर गई हैं।

मगर
साहूकार का
कर्ज है कि
कटने का नाम ही
नहीं लेता
कर्ज से।

अकवि 


ये कौन है?
जो कछुए की तरह
अपनी खोल में सिमटा
बैठा है,
श्रीमान!

ये
कविवर कच्छप हैं!
ये
अपने
हाथ-पाँव और
पेट का ध्यान रखते हुए
कविता लिखते हैं।

ये
पुरस्कार लेते समय ही
अपनी खोल
से बाहर निकलते हैं।

हत्या


हमने
बालपन
की
हत्या
कर दी।
और
आरोप
यंत्रों
पर गढ दिया।

(वैसे भी
अपना अपराध
दूसरों पर थोप देने में
हम उस्ताद हैं)

सबसे
मजे की बात तो
यह है कि
सबसे निर्मम हत्यारा
सबसे
आगे खड़ा रहता है
भीड़ में,

बालकों के
बचपन की लाश को
पीछे छिपाए।

समाचार 


आज
समाचार,
विचार,
सदाचार,
शिष्टाचार
और
ऐसे
जितने भी
चार हैं,
सब
’अचार’ के भाव
बिक रहे हैं।



समाचार (2)


समाचार चैनल
वारदातें,
सनसनियाँ,
और
रहस्य

 परोसने में लगे हैं।
तर्क वितर्क
के नाम पर....
आयोजित बहसें
बदल जाती हैं,
व्यक्तिगत छींटाकशी में।

सास बहू से लेकर
अलौकिक शक्तियों
पर चर्चा करते
ये चैनल
अपने मूल उद्देश्यों को
विस्मृत कर चुके होते हैं?

क्या
लोकतंत्र का
पाँचवा स्तम्भ,
इतना कमजोर हो गया?
कि
उसे खड़ा रहने के लिए
इनका सहारा लेना पड़ेगा?

दूसरों को कटघरे में
खड़ा करने वालों
जरा अपनी गिरेबाँ में भी
झाँक कर तो देख लो।


प्रेम गीत


अगर कविताएँ
प्रेमालाप ही
करती रहेंगी
तो
     
समाज के रुदन,
समाज की पीड़ा,
समाज की विसंगतियों
पर प्रकाश कौन डालेगा?

अगर शब्द
गलबहियाँ डाले
बैठे रहेंगे
तो
समाज को नींद से
कौन जगाएगा ?

कविता ने
बादलों की सैर
खूब कर ली है,
खूब चाँद तारे
तोड़ लिए हैं,

अब
जमीन पर उतरकर
काँटों पर नगे पाँव
चलना होगा,
जनमानस के दर्द को
महसूस करना होगा
और चीख चीख कर
बयाँ भी करना होगा

क्योंकि
कान
प्रेमालापों को सुनने के
आदी हो गए हैं।



बचपन


ध्यान से देखो
इनका
बचपन
इन्हीं किताबों के
पन्नों
के बीच कहीं
दबा होगा।

आर्थ्रोपोड


जिस तरह से
तुम
छोटी छोटी
समस्याओं से घबराकर
झुक जाते हो।

मुझे डर है
तुम्हारी आने वाली नस्लें
बिना रीढ के
सबसे बड़े संघ में
शामिल ना हो जाएँ।

(आर्थ्रोपोडा यानि कीड़े
मकोड़े जन्तु जगत के
सबसे बड़े संघ का निर्माण करते है।)

मजदूर


दुनिया भर के
मजदूरो!
समय आ गया है,
 इकट्ठे हो जाओ!
जब भी
ऐसा
शोर सुनाई दे,
वो समय होता है
चुनावों का
या
मजदूर दिवस का।

गृह प्रवेश


नव-गृह प्रवेश
वास्तव में
एक घर से निकासी
होती है।

निकासी और प्रवेश
दो
समानान्तर प्रक्रियाएँ हैं।

ठूँठ


खेत की मेड़
पर
ये जो
ठूँठ तुम
देख रहे हो ना!
ये ठूँठ नहीं हैं,
बरसात की आस में
आँखों को
आसमान में टिकाए
खड़ी संभावना हैं।
जिसने अपने पैर
अभी भी
मजबूती से
जमीन में गाड़े हुए हैं।

सूने पड़े इस खेत में
ये ठूँठ
आशा का दूसरा नाम हैं।

आल इज वेल

पड़ोसी के लुटते
घर को
पूरा मोहल्ला
अपनी काँच लगी
खिड़कियों से
देखता रहा।

काँच ऐसे थे कि
जिनमें
अन्दर से बाहर तो
सब कुछ दिखाई देता था
पर बाहर वाले को
कुछ नज़र नहीं
आता भीतर।

(वहीं पडोसियों की
आँखें ऐसी थी कि
उन्हें अन्दर से बाहर का
कुछ नज़र नहीं आता था)

उन्होंने काँचों के साथ साथ
अपने कानों को भी
बन्द कर लिया था।
उधर लुटेरे फिर मिलेंगे का
वादा कर अपने पीछे
खबर छोड़ गए,
जिसे पूरा गाँव कल
चाय के साथ
पीने वाला था।

समय


समय रथ
अपने पहियों के नीचे
वर्तमान को
कुचलता हुआ
भविष्य होने जा रहा है।

तुम
इसकी गति को पहचानो
अन्यथा
यह वर्तमान का
अपहरण कर
छोड़ जाएगा पीछे
वर्तमान का भूत।

और उस रथ
की धूल से सना
तुम्हारा चेहरा
किसी को
पहचान न आएगा।

समय की
धूल ने बड़े बड़े
चेहरों को
धूमिल कर दिया है।


     

Thursday, April 14, 2016

अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में



इस अंक का संपादन... अनवर सुहैल


    र.नं.63166/78

प्रकाशन का पैंतीसवां वर्ष
  अर्धवार्षिक प्रकाशन
    

Asuvidha ka smriti ANK

    स्मृति अंक

समय पर समय की बात
 जुलाई- दिसंबर 2015

 अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित 





स्मृति अंक

अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में


आविर्भाव.. 26 जनवरी 1977
निर्वाण....2 जून 2014

रचना क्रम.....


     संपादकीय

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
‘सरोज-स्मृति’ 1935 ई. में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित लम्बी कविता और एक शोकगीत है। निराला ने यह कविता अपनी अठारह वर्षीय पुत्री सरोज के निधन के उपरांत लिखी थी।
इस कविता मंे उन्होंने शोक के साथ-साथ समाज के प्रति आक्रोश और व्यंग्य प्रकट किया है। यह कविता हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ शोकगीतों में से एक मानी जाती है। इस कविता की तुलना रामविलास शर्मा ने शेक्सपीयर की किंग लियर से करते हुए लिखा था--‘हिन्दी ही में नहीं अंग्रेजी में भी ऐसे शोकगीत दुर्लभ हैं।’ 
अग्रज रामनाथ शिवेन्द्र ने पुत्र-शोक में जो कविताएं और लेख-संस्मरणादि लिखे हैं उनसे गुज़रते हुए बरबस ही निराला की सरोज-स्मृति याद हो आती है। और उनकी विवशता का ये रूप भी दुखी कर जाता है--‘कुछ भी तेरे हित न कर सका!’
यह बाज़ारवाद में फंसे एक पिता की व्यथा-कथा है। 
एकमात्र पुत्र डिम्पूजी के एक दुर्घटना के बाद लम्बे इलाज और फिर निधन ने शिवेन्द्र को बुरी तरह से तोड़ दिया। भारतीय समाज में सिर्फ खेती पर निर्भर रहकर ‘असुविधा’ जैसी लघुपत्रिका का विगत कई बरसों से सम्पादन-प्रकाशन, खुद का लेखन और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना एक कष्टसाध्य कार्य है। इसमें आए दिन सम्वेदनाएं आहत होती हैं, निराशा और हताशा बढ़ते क़दम रोकती रहती हैं। बैसाखी पर चलती आर्थिक दशा ऐसी बनी रहती है कि सर ढांपो तो पैर खुले। चादर की लम्बाई बढ़ाने का कोई जादू अब तक किसी अर्थशास्त्री ने नहीं किया....न ही किसी वित्त मंत्री के बजट से ऐसा कोई उपाय निकला कि गरीब की चादर का आकार बढ़ेे। 
आजीविका का संकट और इज़्ज़त के साथ गुज़र-बसर करने की ज़िद ने शिवेन्द्र और उनकी धर्मंपत्नी शकुन्तला जी को कभी परिस्थिति से समझौता करने नहीं दिया। सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन के लिए दोनों के संयुक्त प्रयास से परिवार की गाड़ी सुचारू चलती रही है। 
इसी सब के बीच शिवेन्द्र ने ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास लिखा जिसे देश के प्रतिष्ठित प्रकाशक राजकमल ने शा‘ये किया। बनारस, इलाहाबाद आदि के मित्रों ने उस उपन्यास को बखूबी नज़रअंदाज़ किया। घनघोर लिक्खाड़ हैं रामनाथ शिवेन्द्र। ए-4 कागज़ पर लिखते हैं तो लिखते चले जाते हैं। मैं उनके उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ को अपने देखे में पूरा होते पाया है। उसके कई अध्याय जब मैं सिंगरौली में कार्यरत था, तब मेरे क्वार्टर में लिखे गए हैं। मेरी पत्नी नाज़रा उनकी लेखन-क्षमता और एकाग्रता की गवाह हैं। 
इतनी प्रतिकूलताओं को झेलते हुए भी शिवेन्द्र लगातार लिखते रहे हैं। असुविधा के कई अंक उन्होंने सोनभद्र अंचल के गुमनाम साहित्यकारों को प्रकाश में लाने के लिए निकाले हैं। अक्सर मैं उन्हेें समझाया करता कि हिन्दी का संसार बहुत बड़ा है। हज़ारों लेखक हैं, कईयों का कोई नामलेवा नहीं है। आलोचक अपनी तरफ से खोज कर नहीं पढ़ते। शिक्षण-संस्थाएं जाने किन विषयों पर शोध आयोजित करती हैं लेकिन जनपदीय लेखन पर बहुत कम शोध हो पाया है। सोनभद्र अंचल का इंसाइक्लोपीडिया हैं शिवेन्द्र। डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद से प्रभावित, वकालत का जमा-जमाया पेशा छोड़कर सिर्फ खेती के ज़रिए परिवार चलाने को कृत-संकल्पित शिवेन्द्र को कोई नहीं समझा सकता कि--
हम एक उम्र से वाकिफ हैं येे न समझाओ,
कि जुल्म क्या मिरी जान और सितम क्या है...’  --फै़ज़
सन् चौरानबे की बात होगी जब राबर्टसगंज बस-स्टेंड में मैैंने असुविधा की एक प्रति खरीदी। दुबली-पतली अनाकर्षक लघुपत्रिका। तब उस ज़मानेे में जब अंक ट्रेडिल पर छपा करते थे साधनहीन पत्रिकाएं इसी तरह अनाकर्षक हुआ करती थीं। मैंने पत्रिका पढ़कर शिवेंद्र को एक पोस्टकार्ड लिखा जो उन्हें लगभग छः माह बाद मिला। उस पोस्टकार्ड में दर्ज पते का पीछा करते एक दिन शिवेंद्र बीना प्रोजेक्ट के मेरे क्वाटर में आ पहुंचे। फिर हमने मिलकर असुविधा के कई अंक निकाले। कई लेखक मित्रों ने सहयोग दिया। हंस के पत्रिका-चर्चा कॉलम मंे असुविधा के अंकों की चर्चाएं हुईं। 
उस ज़माने में भी मुझे बहुत आश्चर्य होता था कि सिर्फ किसानी करके लघुपत्रिका निकालने जैसा घर-फूंक काम कोई कैसे करता है? इस बीच शिवेन्द्र के घर जाना हुआ और आदरणीय भाभीजी की आत्मीयता और आतिथ्य ने जैसे अवाक् कर दिया मुझे। वाकई संसार में जहां धन है वहां अहंकार है और कृपणता है। जहां गरीबी है वहां आत्मीयता की दौलत छलक-छलक पड़ती है। 
यह सब मुझे क्यों बताना पड़ रहा है, मैं बता नहीं सकता हूं। बस निराला की सरोज-स्मृति की वेदना और असुविधा के इस अंक में शिवेन्द्र की कविताओं में दुःख की सघनता बार-बार विचलित कर रही है। 
एक कवि-लेखक और किस तरीके से अपनों को याद कर सकता है। ये शब्द ही तो हैं, जिन शब्दों से जमाने की व्यथा आज तक लेखक दर्ज करता रहा है क्या उसे इतना भी हक नहीं कि अपनी व्यथा कोे भी समाज तक पहुंचाए।
फिर निराला की सरोज-स्मृति के अंश खलल डाल रहे हैंः
अस्तु  मैं  उपार्जन  को  अक्षम
कर  नहीं  सका  पोषण उत्तम
अजीब व्यथा है, एक साधनहीन पिता की और यही व्यथा हम शिवेन्द्र की लेखनी में भी पाते हैं, जब पुत्र के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अचानक उन्हें अपनी बेबसी पर तरस आता है। वाकई कितनी महंगी है चिकित्सा..जिसे नेह-नाते से कोई सरोकार नहीं। सिर्फ और सिर्फ रूपया और रूपया के इर्द गिर्द खड़ी होती है प्राचीरें, आलीशान अस्पतालों की। और ये रूपया जहां है वहां बहुतायत में है और जहां नहीं है वहां एकदम नहीं है। चाहे अपना वजूूद गिरवी रख दिया जाए, वह रूपया में नहीं बदल सकता अपने समूचे वजूूद को। गांव खड़ुई से राबर्टसगंज से बनारस तक बेटे के इलाज के लिए दौड़ते दौड़ते शिवेन्द्र जी हताश तो होते थे लेकिन निराश नहीं होते थे। लेकिन पुत्र डिम्पूूजी ठीक नहीं हो पाए और शिवेन्द्र के अस्तित्व में एक ऐेेसा खालीपन भर गए कि इस व्यथा से शायद ही कभी उबर पाएं।
समय और समाज की सम्वेदनहीनता और प्रकृति के क्रूर निर्णय के आगे निढाल क्या निराला भी नहीं थेः
मुझ  भाग्यहीन  की  तू  सम्बल 
युग  वर्ष  बाद जब हुई  विकल
दुख  ही  जीवन की कथा  रही
क्या कहूं आज, जो नहीं कही!
असुविधा ही तो वह मंच है जिस पर शिवेन्द्र का अधिकार है। आज तक असुविधा के अंक जाने कितने लेखकों कोे छापते रहे। सामाजिक राजनीतिक मुद्दे उठाते रहे और पुत्र-वियोग से उपजी व्यथा के लिए असुविधा से बढ़कर कौन जगह होगी। 
घर में राशन हो या न हो, असुविधा का अंक बनारस छपने चला ही जाता। कभी कागज़ वाले को तो कभी प्रेस वाले को उधारी लगाकर अंक छपवा ही लेते शिवेन्द्र। फिर बनारस से पत्रिका का पैकेट ढोकर ग्राम खड़ुई तक पहंुचाते शिवेन्द्र। एक एक प्रति में स्वयं ही पता लिखना फिर डाक-टिकट लगाना और फिर अंक को डाकखाने के हवाले करना। 
बहुधा लेखक /पाठक अंक की पावती नहीं देते हैं। कोई बात नहीं। यदि वार्षिक ग्राहकों की सूची बनाई जाए तो एक पन्ना भी कापी का न भर पाए। वो भी यदि किसी ने सन् 2000 में वार्षिक सदस्यता ली थी फिर कभी नवीनीकरण नहीं कराया फिर भी शिवेन्द्र ऐसे पाठक को आजीवन सदस्य मान लेते हैं कि जिन्दगी में कभी उस व्यक्ति ने असुविधा की सहयोग राशि दी थी। वरना हिन्दी में खरीदकर पढ़ने वाले लोग ही कितने हैं? 
तो असुविधा के इस अंक को विद्वतजन इस दृष्टि से देखें कि ये एक ऐसी व्यथा कथा है जिसे शिवेन्द्र नहीं लिखते तो कोई भी नहीं लिखता।
किंचित तब्दीली केेे साथ एक शे’रः
हम ही न कह सके अगर किस्सा-ए-गम, कहेगा कौन?’
मुझे आशा है कि असुविधा के इस अंक के ज़रिए शिवेन्द्र के लेखन को, उनकी भाव-भूमि को समझने में मदद मिलेगी।
                                            अनवर सुहैल  

मृत नहीं थे अक्षर

चले गये तुम...
शायद जाना ही था तुम्हें,
संभव है तुमने भी सोचा व गुना हो 
जाने के बारे में, 
पर नहीं, तुम्हारे पास समय ही कहां था
सोचने व गुनने के लिए, 
खुद को जाने के बारे में.
संभव है सोचा हो, जाते हुए कुछ.
जाना और न जाना वैसे भी,
होता है अचानक और आकस्मिक.
सो तुम कैसे जान सकते थे..
जैविक क्रिया के बारे में, 
कि क्या होने वाला है?
और चले गये हो... 
हर उन चीजों व बातों की तरह
जिन्हें किसी न किसी दिन जाना ही होता है.
पर हमें तो कुछ भी पता नहीं था कि. 
क्या होता है जाना और नहीं जाना..
मुझे तो यह भी नहीं पता था कि
क्या फर्क होता है जाने न जाने के बीच.
अब समझने लगा हूं कि
सब कुछ चला जाता है 
जाने वाले के साथ. 
कुछ भी नहीं रह जाता शेष.
केवल बचा रहता है आकाश,
बची रहती है पृथ्वी,
तारे भी घूमते रहते हैं अपने कक्ष में,
हर ओर छितराई रहती है हवा..
फिर भी दुनिया फसी रहती है 
जाने न जाने के चक्कर में.
जाने को जान लेना और 
जानने को जान लेना.... 
कुछ न कुछ तो फर्क होगा उनमें
जो जाना हुआ है या 
//6//
जो अजाना है, वही है सब कुछ.
किसे नहीं पता कि.. 
जाने वाला चला जाता है...
रह जाती हैं उससे जुड़ी यादें.
अब जो चाहे उसमें गोते लगाये या डूब जाये.
बन जाये कोई कविता या कहानी.
एक ऐसी कहानी जिसका न कोई अंत हो
और नही प्रारंभ.
पर क्या यादों को किया जा सकता है याद?
यादें तो बस यादें होती हैं,
जो जुड़ी होती हैं, संवेदनों से,
दिल की धड़कनों से,
यादें धर सकती है पटकथा का रूप,
और कुरेद सकती हैं दिल के संवेदनों को..
रूला सकती हैं तो हसा भी सकती हैं.
मेरे पास तो बचे हुए, वे स्वर भी नहीं जो
होते हैं नश्वर...
स्वर होंगे भी तो क्या हो जायेगा?
वे खुद तो बोलेंगे नही...ं
स्वर कभी नहीं बोलते, 
नही किसी को तोलते हैं.
वे डोलते रहते हैं मन के भीतर.
मन भी तो कोई चीज है,
उसकी झील में होते हैं जो खनिज 
उनमें नहीं होती सहभागिता
सहकार तो कŸाई नहीं.
जाने किन किन रसायनों से 
बना होता है मन,
कैसे करता है काम.
कैसे बांध देता है मन की गांठें
खोल देता है स्मृतियों के सारे दरवाजे,
जिससे आ सके ताजी बयार,
सहला सके तन को.
यही तो मन का खेल है,  
तन के खेलों से एकदम अलग.
कविता के बहाने, 
मैं याद करना चाह रहा हूं तुम्हें,
//7//
याद करना चाह रहा हूं तुम्हें, 
उन शब्दों के सहारे,
जिसे गढ़ती हैं संवेदनायें,
संवेदनायें ही तो 
बनाती हैं कविता को कविता, 
कवि नहीं होती कोई कविता,
पर कविता होती है कवि,
कवि में छिपी होती है कविता, 
कविता में ही कवि 
लगा रहा होता है गोते.
देखा जा सकता है 
कविता में कवि को.
उसके जीवन के क,ख,ग को
उसकी किकुड़ियायी छातियों को,
झुर्रियों वाले गालों को 
तथा उन हाथों को भी,
जिनसे बनती हैं मुठ्ठियां..
जिन्हें लहराया जाता है खुले आकाश में..
फिर कंठ से निकली हुई आवाज..
खुद ब खुद बदल जाती है इन्कलाब में...
यह जो इन्कलाब है... 
नहीं निकलता किसी झील में से
कवि खोदता रहे कोई झील..
झील में तो फसी होती हैं संवेदनायें..
कवि उसी झील में ढंूढता है खुद को,
पूछता है झील के किनारों से,
उसकी तलहटी से,
‘मैं कहां हूं’
तुम्हारे जाने को मैं जाना अगर मान भी लूं..
फिर तुझे कैसे ढूढूंगा यादों में?
यादों में नहीं मिलोगे तूं..
यादें तो वैसे भी बीती हुई बातें होती हैं.
समय की पर्तेंं चढ़ी होती हैं उस पर..
समय की पर्तों को छीलना या 
हटाना आसान नहीं.
यादों के संग पर्तें जैविक हो जाती हैं,
यादों को फिर से सृजित करना..
//8//
उसे रचना, गढ़ना और फिर 
उसे ताजा बना देना..
संभव भी नहीं जान पड़ता..
मेरी कविता में तुम्हारे शब्द चित्र 
बन पायंगे कि नहीं, मैं नहीं जानता.
कविता के बहाने बनना चाहता हूं, 
मैं तुम्हारे माफिक
तुम्हारे छोड़े गये स्वरों को चाहता हूं 
गुनगुनाना, गूंथना चाहता हूं
उन्हें एक लड़ी में,
पर तुम तो नहीं जानते थे गुनगुनाना,
सीधी राह के मुसाफिर थे तुम..
अक्षरों से बहुत दूर..
हकीकतों के आस पास..
तुम्हारे पास नहीं थी, अक्षरों की दुनिया
फिर भी मृत नहीं थे अक्षर.
वे जीवित थे तुम्हारे पास..
इस लिए कि पुरखों को सम्हालने व 
अक्षरों को बचाये रखने की,
कला थी तुम्हारे पास.









   बीते दिनों में

लौटना चाह रहा हूं मैं,
उन दिनों में, उन समयों में
जिसे जिया था मैंने तुम्हारे साथ.
मैं चाहता हूं उस समय पर कुछ लिखना,
पर कैसे लिखूंगा उस पर.
 //9//
समय कागज तो होता नहीं,
जिस पर उड़ेला जा सके अक्षर ज्ञान.
किसे नही पता कि 
पत्थर नहीं होता समय.
जिस पर छेनियों से भी लिखा जा सके कुछ,
पहले की तरह.
जब नहीं थी लिपियां.. 
तब लिखा जाता था शैल खण्डों पर..
गढ़ी जाती थीं किसिम की आकृतियां ..
आकृतियां ही होती थीं लिपियां,
वे संवाद करती थीं.
बताती थीं समय के बारे में.
कागज पर टांके गये अक्षरों की तरह,
उस पर उतारा जाता था समय को. 
कागज को तो जलाया जा सकता है,
फाड़ा जा सकता है,
पर पत्थरों पर खुदे अक्षर,  
नहीं मिटाये जा सकते.
दिक्कत यह नहीं है कि
कितनी दूरी है कागज और पत्थर के बीच,
दिक्कत है कि लिखा जाये तो.. 
क्या लिखा जाय?
सभी लिखा हुआ खिलखिलाता नहीं,
बाहें नहीं फुलाता,
नही रोता है,
उसे तो नहीं बोला जा सकता शोक गाथा भी,
वैसे वह होता है कुछ न कुछ,
पर ऐसा भी नहीं होता कि
उसे बाजार उठा ले अपनी गोदी में.
चूमने चाटने लगे उसे.
बाजार बिछ जाये उसके कदमों पर,
जैसे अंधेरों से निकली कोई रौशनी हो...
जगमगा जाये जिससे सारी दुनिया.
या दुनिया का कोई हिस्सा ही.
वह हिस्सा डूबा हुआ हो भूख में,
विस्थापन में और कानून के मकड़ जालों में.
जहां समानता ढकी हुई हो,
//10//
बारूद की पर्तों में और मनुष्यता...
मनुष्यता तो जैसे 
आग में पैदा होने वाली कोई चीज हो.
तुम्हारे जाने के बाद लगता है मुझे कि
नहीं लौटा जा सकता उन समयों में...
जिसे जिया था हम दोनों ने एक साथ
बाप बेटे की तरह, 
दोस्त व हितैषी की तरह
भाई की तरह... 









अस्पताल का पहला दिन

डूब जाते हैं हम तारीखों के खेल में,
तारीखों से जुड़े सŸाा कौतुकों में.
उन कौतुकों में भी जो हमें बना देते हैं,
अभ्यर्थी और ढकेल देते हैं व्यवस्था की गुफा में.
जिसमें थिरक रहा होता है विज्ञान का कौतुक..
गुफायें तो पहले हुआ करती थीं,
जिनमें रहा करते थे हमारे पुरखे.
वैसे हम आज भी किसी न किसी 
गुफा के ही रहवासी हैं.
गुफा किसी भी आकार और प्रकार की हो सकती है.
कानूनी गुफाओं में रहना और निवसना तो हम
सीख चुके हैं अंग्रेजों के जमाने से.
इससे इतर हमें रास आता है,
धर्म की गुफाओं में बैठ कर माला फेरना,
और शंखध्वनि पर मंत्रोच्चार करना.
घर में भी होती हैं गुफायें..
//11//
घर में घर की तरह,
ऐसी ही गुफाओं में, 
हम ढंूढ रहे हैं चावल के दानों को.
मॉज रहे हैं करियायी डेकचियां.
पोत रहे हैं गोबर और माटी से,
जले हुए चूल्हे.
लगा था मुझे अस्पताल भी किसी गुफा की तरह..
उसमें फड़ फडाते नोट डरा रहे थे मुझे.. 
मुझे याद है इमरजेन्सी का वह कक्ष..
भला कैसे भूल सकता हूं उस कक्ष को मैं..
उन डाक्टरों को जो लगातार पूछे जा रहे थे...
चोट लगी तो कैसे?
क्या मोटर साइकिल से गिरने पर.. 
टूट सकती है रीढ़ की हड्डी?
वह भी मोटर साइकिल स्टार्ट करते समय
क्या तमाशा है?
अस्पताल की वह गुफा चीख पड़ी थी..
गुफा के जानकार गुम थे अपने अस्पताली ज्ञान में.
इमरजेन्सी का वह कक्ष अचानक तब्दील हो गया था
डरावनी बाजारू गुफा में..
जहां ढूढे जा रहे थे विज्ञान के सूत्र..
सूत्र तो वहां नहीं दिख रहे थे.. 
दिख रहे थे डाक्टर.,,
उनके चेहरे, जो स्थिर और शान्त थे.
और कक्ष अपने आप गरमाया हुआ था,
पर्ची लिखी जा रही थी,
उस पर उड़ेला जा रहा था विज्ञान का ज्ञान..
और वह मरीज जो मेरा उŸाराधिकारी था..
जो मेरा पुत्र था.. 
जो मेरे होने न होने का..
प्रमाण था..
चोट से कराह रहा था...
हिल नहीं सकता था वह .. 
नही फैला सकता था अपनी टांगे
सिर्फ देख व सुन सकता था..
और वह देख रहा था कि 
वह अस्पताल में है..
//12//
उसे पता नहीं था कि 
उसके पैर क्यों नहीं कर रहे काम?
दिमाग तो कर रहा था काम फिर 
पैरों को क्या हुआ..
दिमाग ही तो चलाता है पूरी देह को
पैर भी तो देह का हिस्सा है
डाक्टरों को पता था कि 
जांच से ही पता चला सकता है
कारणों के बारे में..
मैं देख रहा था कि डिम्पू 
तब्दील हो चुका था दवा कंपनियों की प्रयोगशाला में
किसिम किसिम की दवाइयां.. 
उसके पेट में डाली जायंगी
जांचें भी होगी.
खून की, पाखाने की, पेशाब की,
प्रयोग दर प्रयोग..
मैं क्या कर सकता हूं ऐसे में,
मेरा उŸाराधिकारी अस्पताल के बेड पर था.
कराहता हांफता..
मैं फसा हुआ था.. 
क्या होगा और क्या नहीं के वृŸा में..
जिसमें नहीं थी कोई त्रिज्या..
जीवा तो कŸाई नहीं.
रात गुजर रही थी.
डिम्पू का दर्द कम होने लगा था..
फिर भी उसकी ऑखों में तैरने वाले सपने गायब थे.
उनमें खालीपन था, ऑसुओं में तैरता हुआ
ऑसुओं में छिपी बातें तो वैसे भी नहीं दिखतीं,
वहां दिखता है, घुप्प अंधेरा..
मैं अंधरों में फसा हुआ.. 
इधर से उधर डोल रहा था..
भला कैसे भूल सकता हूं ईमरजेन्सी का वह वार्ड
जहां हर ओर कराह रहे थे मरीज..
उनके अगल बगल मडरा रहे थे..
उन्हें संभालने वाले..
वैसे भी अस्पताल अस्पताल होता है
उसके अपने रिवाज होते हैं..
//13//
डाक्टरों की पसरी होती है गंभीरतायें..
उनकी गंभीरताओं में छलकता है ज्ञान
एक भयानक किस्म की खामोशी..
हम भी उसी खामोशी के साथ
डिम्पू के अगल बगल डोल रहे थे.
देख रहे थे, समय
उसकी चाल देखते हुए
बन गये थे समय..
समय तो समय होता है
वहां नहीं होता असमय.. 
होता है सिर्फ समय का चक्र
चक्र के भीतर होती हैं खाइयां..  
और हम धंसते जा रहे थे भयानक खाइयों में.
खाइयों में किसिम किसिम की, 
पसरी होती है सूचनायें.
वह भी अस्पष्ट और भ्रामक..
अपठनीय और कुरूप..
जाने क्या होगा डिम्पू का?
क्या वह भी बन गया है
समय, समय के भीतर
हम लोगों की तरह
हो सकेगा खड़ा और चल सकेगा दो कदम.
अपने पैरों के सहारे..
समय के साथ रोते या मुस्कुराते हुए..
किसे नहीं पता कि समय के साथ चलने के लिए
पैरों को मजबूती से जमाना होता है धरती पर..
हवा में ही नही, समय पर भी तानना होता है घूंसे
क्या डिम्पू तान सकेगा घंूसे समय की पीठ पर?
पर समय को तो पीठ होती ही नहीं,
वह अभिशप्त होता है अतीत बनने के लिए..
और अतीत तो सिर्फ व्यतीत का
हिस्सा होता है विभाजित और खंडित.
किस्सा होता है अनगढ़ कथानकों का..
जिनमें कथा तो होती है पर नहीं होते,
समय के साथ टकरा सकने वाले कथा पात्र.
घटनायें भी औंघी पड़ी होती हैं, चोटें खा कर
पर रहती हैं जीवित.
//14//
यादों व स्मृतियों के सहारे,
और स्मृतियां तो
स्मरण और मरण की उत्पाद होती है.  

समय से मुठभेड़ 

सिकुड़ता जा रहा था मैं
अस्पताल में लगातार.
अस्पताल नहीं सिकुड़ता,
वह किकुड़ियाता भी नहीं,
लगातार बढ़ता है और बढ़ता जाता है,
विज्ञान के बाजारू फैलावों के साथ.
अस्पताल के रूतबे के हिसाब से 
डिम्पू की दवाइयां भी बढ़ रही थीं.
उन्हें बढ़ना ही था.... 
पर कुछ चीजें वहां भी ऐसी थीं 
जो सिकुड़ रही थीं मेरी तरह.
सिकुड़ रही थीं मरीजों की इच्छायें.
उनके जीने की कामनायें,
और वह उत्साह भी सिकुड़ रहा था, 
जिसके लिए जाना जाना जाता है आदमी.
आदमी तो महज आदमी होता है पर....
अस्पताल में हो जाता है बहुत कुछ,
उसे वहां हो जाना होता है,
दवाइयां, दवाइयों की बोतलें और डाक्टरों की पर्चीं..
इसके अलावा भी उसे होना होता है..
रुपया, तब्दील होना होता है उसे,
दवाइयों के दाम में,
बन जाना होता है कंपनियों का वफादार,
जो बनाती हैं किसिम किसिम की दवाइयां.
बनना होता है उसे बाजार का हिस्सा,
जिस बाजार से करता है वह नफरत.
बाजार ही क्यों..
उसे तो उन चेहरों की भी सूची बनानी होती है,
जो आ सकते हैं उसके काम,
उसकी पीठ पर छाप सकते हैं,
//15//
रुपयों की कार्बन लिपि या 
उसे ही बना सकते हैं मुद्रा. 
जिसमें छिपी होती है खरीदने की ताकत.
क्या करेगा कोई जब समय ही बन जाये शत्रु.
समय से टकराने के लिए
अपना मित्र तो बनाना होगा ही उन लोगों को.
जो लतियाते रहते हैं खुद को गढ़ने के लिए सभी को.
राजनीति हो या समाजनीति, 
जो होते है माहिर समय को मित्र बनाने में, 
समय करता है उन्हें सलाम..
जो लतिया सकते हैं समय को.
पर मेरे लिए समय तो.. 
किसी ड्रेगन की तरह था
जो हर क्षण नोच रहा था, ताने मार रहा था..
जब समय को मित्र बनाना था.
तब तो तूने बना लिया शत्रु उसे.
कुछ निर्जीव सुभाषितों के जरिए,
तूने काट लिए खुद के हाथ पैर.
‘यह करना है,’ ‘यह नहीं करना है’,
बद्जात व्यवस्था से लड़ना है...
तो लड़ते क्यों नहीं व्यवस्था से 
अस्पताल भी तो व्यवस्था है...
तूने क्या सोचा था अरस्तू मूरख था
जिसने रुपये को उतारा बाजार में..
क्या समय से टकराया जा सकता है इमानदारी से, 
चला जा सकता है दो कदम धरती पर
क्या इलाज करा सकते हो अपनों का, 
या पढा़ सकते हो वंशजों को..... 
आखिर क्या सोचा था तूंने?