लोक मूल्यबोध की जमीन पर जनप्रतिरोध की कथा
यह सच है कि कहानियां श्रव्य एवं पाठनप्रिय होती हैं। वे हमें प्रभावित करती हैं। कहानियां चाहे राम, कृष्ण और शिव जैसे देवत्व प्राप्त कथानायकों के विविध प्रसंगों के बाबत हों या लोकगीतों में गाये जाने वाले लोक के प्रतिनिधि लोरिक तथा आल्हा ऊदल जैसे लोकनायकों के बाबत ही क्यों न हों। इन दोनों कथारूपों की लोकग्राह्यता के समाजशास्त्रीय आकलन में समरूपता दीखती है। जहां देवत्व वाली कथाओं को आज भी भजनों के रूप में गाया, बजाया जाता है, वहीं लोकत्व वाली कथाओं को लोकगीतों में ढाल कर मनोरंजकता के साथ अपने पुरखों के वीरत्वबोध के साथ गाया, बजाया जाता है। मतलब साफ है कि दोनों कथारूपों की कथा चेतनायें आज भी लोक में व्याप्त हैं। कथायें तो आज भी रची जा रही हैं पर उनकी लोकव्याप्ति देवत्व या लोकत्व वाली कथाओं के समकक्ष नहीं खड़ी हो पा रही हैं, सोचना यही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कथाओं के भीतर प्रवाहित होने वाली मनोवैज्ञानिक धाराओं की चेतना को आज का रचनाकार खोल ही न पा रहा हो और भटक जा रहा हो मन के इतर के द्वन्दों को व्याख्यायित करने में, कुछ न कुछ तो है ही। वैसे भटकाव तो साफ दिख रहा है। देवत्व या लोकत्व वाली दोनों कथाओं में जो लोकसंघर्ष का तत्व है जिसके कारण वे कथायें आज भी स्वीकार्य हैं, उसे जनमन समझता तो है पर व्यावहारिक नहीं बना रहा। जनमन तो कथाओं के लोकसंघर्ष के मूल्यों की स्थापनाओं के लिए देवत्व तथा वीरत्व वाले गुणों का ही गान कर रहा है।
राम, कृष्ण तथा शिव की कथाओं का अध्ययन अगर हम करें तो पता चलेगा कि उन कथाओं के लोक से जुड़े प्रसंग जितने लोकश्रुति (भले ही व्यवहार में न हों) में हैं उतने अन्य प्रसंग नहीं। राम, कृष्ण तथा शिव के लोकसंघर्षों से जुड़े प्रसंगों के सामाजिक आख्यान ही उन्हें देवत्व प्रदान करते हैं, इसी लिए उन कथाओं की मृत्यु की संभावनायें दूर दूर तक नहीं हैं। मतलब साफ है जिन कथाप्रसंगों में लोक के लिए किया जाने वाला लोकसंघर्ष है, वही कथा अपने समय से आगे जाकर सामयिक होकर जीवित भी बची रहेगी। आज की कथाओं की तरह उनकी समकालीनता कभी भी धुन्ध में नहीं रहेगी। यह अलग बात है कि उन कथाओं के लोकसंघर्षों से जुड़े प्रसंगों को करिश्माई रूपों में भी वर्णित किया गया हो सकता है पर बहुत ही सावधानी के साथ, जिससे समय के साथ टकराने की लोकधर्मिता का क्षय न हो। यह सच है कि लोकसंघर्षों की समझ व उसके मूल्यों की कल्पना पाठकों के दिल दिमाग में पहले से ही संयोजित होती है, इसी लिए वे पाठकों को प्रिय भी लगती हैं।
कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं हो सकती जिसे अच्छे बुरे की पहचान न हो, सच क्या है, झूठ क्या है, इससे ही संबधित सवाल, जीवन क्या है? सभी जानते हैं चाहे इसके बारे में लिखी किताबें पढ़ी हों न पढ़ी हों, उनके बारे में जानते सभी हैं, ये विलोमार्थी शब्द सदैव विमर्श के विषय रहे है और आज भी हैं। चूंकि देवत्व प्रधान कथाओं में लोकसंघर्ष की व्याप्तियां होती है, वही व्याप्तियां ही आज के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समय में भी पाठकों को आकर्षित करती हैं, उन्हें लगता है कि वे कथाप्रसंग उनके जीवन के कथा प्रसंग हैं, जिनके वे अंश हैं। रामकथा की बात करें तो राम का वनगमन, सीता का अपहरण, लवकुश द्वारा अश्वमेध रथ को रोकना, इन कथा प्रसंगों का रचाव ऐसा है जो जनमन से जुड़ा हुआ है, जन में भी ऐसे प्रसंग घटित होते रहते हैं सो ये कथा प्रसंग जनमन को बहुत ही सहजता से प्रभावित कर जाते हैं। राम के वनगमन की कथा को ही लें तो राम के वनगमन का कथानक लोक के वनगमन का कथानक बन जाता है, जैसे राम को नहीं उन्हें ही घर के मुखिया द्वारा घर से निष्कासित कर दिया गया हो। यहां राजा तथा मुखिया के सŸााप्रबंधन में फर्क नहीं, दोनों सŸााधारी हैं। राजव्यवस्था के षडयंत्रकारी प्रबंधन के आदेश के अनुपालन में राम को वन जाना पड़ता है। द्वन्द है कि राजा दशरथ क्या चाहते हैं और सौतेली मॉ कैकेई क्या चाहती है? कैकेई और दशरथ दोनों सŸाा के केन्द्र हैं पर कैकेई सŸाा के केन्द्र पर पर हावी हो जाती है। राम के वनगमन के आदेश के पीछे दिमाग कैकेई का होता है, यानि कैकेई की इच्छा सत्ता की इच्छा बन जाती है। इसलिए राम का वनगमन सŸाा की निरंकुशता के बाबत एक बहस भी है। जनमन राम के सŸााच्युत होने के प्रसंग से उतना प्रभावित नहीं है जितना राम के साथ होने वाले अन्यायरूपी वनगमन के आदेश से। तो यह जो राम के साथ अन्याय का कथाप्रसंग है, वह जनमन का कथा प्रसंग बन कर जन के मन का हिस्सा बन चुका है। किसे नहीं पता अन्याय सभी के साथ हो रहा है, दिक्कत है कि राम भी स ता के आदेश की अवज्ञा नहीं कर पाते हैं और जनता है कि वह भी सŸाा की अवज्ञा नहीं कर पा रही है। तो यह है राम के वनगमन की कथा के समकालीन होने का कथामूल्य। एक तरह से देखा जाये तो उन कथाओं में आज के समय के समाजशास्त्रीय चिंतन के गुण-दोष हैं, उसके सकारात्मक व नकारात्मक पहलू हैं, सभी बहुत ही बारीकी से उनमें गुंथे हुए हैं। घर, परिवार, कमाई के तरीके तो उनमें हैं ही, समय की बिडंबनायें भी उनमें हैं, यानि घर, परिवार, कैसे चलेगा या कैसे चल रहा है, सामाजिक रिश्ते कैसे बन, बिगड़ रहे हैं, कौन सफल है, कौन असफल है, क्या नैतिक है, क्या अनैतिक है, क्या न्याय है, क्या अन्याय है, सुविधा क्या है, असुविधा क्या है, किसका शासन है या किसका होना चाहिए आदि आदि। ऐसे ही सवालों से हर सभ्यता लगातार टकराती रही है क्योंकि
पारिवारिक रिश्तों से लेकर सामाजिक रिश्तों तक के सारे कार्यव्यवहार किसी न किसी समाजप्रबंधन से चालित होते हैं। ऐसी स्थिति में ये व्यक्तिगत सवाल ऐसे जटिल सवाल बन जाते हैं कि इन्हें हल करते, कराते व्यक्ति खुद सवाल बन कर सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए अपने यथार्थवादी जीवनमूल्यों को बदल देने के लिए विवश हो जाता है। जाहिर है समाजप्रबंधन ही सŸााप्रबंधन का एक रूप होता है जिससे हताशायें व निराशायें भी उत्पादित होती रहती हैं। उसी बीच जीवन चलाते रहने की काल्पनिक उत्कंठायें भी होती हैं जिससे परिवार तथा समाज का ताना बाना बुना होता है। सो सामाजिक मन और चिŸा के रागों से गुंथित कथायें किसी भी कालखण्ड में अपनी अस्मिता बचाये रखने की शक्ति से ओतप्रोत हुआ करती हैं, उन्हें बचाये रखने के लिए प्रचारों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
घर, परिवार है तो बिडंबनायें भी हैं, उनके होने के कारणों को सामाजिक संरचना के व्यावहारिक दोषों के आधार पर विश्लेषण करने के बाद ही उनसे टकराया जा सकता है, नहीं तो नहीं। अब यह क्या है कि विडंबनाओं का दैवीकरण कर दिया जाये, मान लिया जाये कि परमात्मा जैसा चाहता है वैसा ही होता है। कथा के ऐसे दैवीकरण में तो तर्क के लिए जगह कैसे बचेगी? यानि कि कथा के पात्र जो व्यक्ति होते हैं, वे खुद कुछ नहीं कर सकते, यह जो व्यक्ति की क्षमता व सामर्थ्य के निराशात्मक पहलू हैं, वे आदिकालीन हैं जिनके जुड़ाव सीधे भाग्यफलों से जोड़े गये होते हैं। ऐसी कथाओं का किसी भी काल में आदर नहीं किया गया और न ही कभी किया जायेगा। वही हालत आज भी जस के तस बनी हुई है। वैसे भाग्यवादी निष्कर्षों वाली कहानियांे की जड़ें काफी गहरे तक अतीत से वर्तमान तक धंसी हुई हैं। कथाओं का प्रारंभ तो सामाजिक विडंबनाओं से होता है पर उसका अन्त भाग्य के कौतुकों में कर दिया जाता है। तो ऐसी कथाओं के बचे रहने की आशा कैसे की जा सकती है? यही समकालीन कथाओं की आलोचना है कि उनमें समय से टकराने वाले समाधानों को उठाया नहीं जा रहा, समाधान वही उठाये जा रहे जिसे पूजीमूल्य बोधों ने पहले से ही गढ़ा हुआ है। पूंजीमूल्य बोधों से टकराने के लिए लोकमूल्य बोधों तक जाना होगा।
कथा के लिए खतरा दोनों से है भाग्यवादी होने से भी तथा भाववादी होने से भी। भाग्यवादी ही नहीं भाववादी कथाओं की जड़ों की ताकत की बात करें तो वही जड़ें हमें आज के बाजारू समय में भी बांध कर चल रही हैं, और हम अपने भाग्यफलों व भाववाद से बाहर नहीं सोच पा रहे हैं। यानि आज भी जो कुछ हमारे सामने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक यथार्थ के रूप में मौजूद है वह सब सŸााप्रबंधन के पूंजीमूल्य बोधों द्वारा रचित या सृजित किया गया होता है ऐसा न स्वीकार कर हम उनका कारण दैवीय मान रहे हैं। समय को हम आज भी आदिम तरीके से जांच, परख रहे हैं। समय को परखने के इस आदिम तरीके ने हमारी रचनात्मक सोच को ही बौना बना दिया है और हम उन्हीं दैवी परिणामों व निष्कर्षों को जीवनमूल्य (कथामूल्य) मानने लगे हैं जिनके खिलाफ हमें लड़ना था और लड़ना भी है।
हमें पता है कि अपनी जमीनदारी (संपŸिा) बचाये रखना और गरीबों के घर में चूल्हा जलाने की कामना करना, दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं, फिर भी हम ऐसा ही कर रहे हैं। एक तरफ तो हम सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सŸाा की कुर्सियों व तिजोरियों से आर्थिक व राजनीतिक समझौते कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हम विस्थापितों, प्रताड़ितों, शोषितों के झुर्रियों वाले चेहरों, किकुड़ियाये पेटों, सिकुड़ी हुई ऑतों पर पुरस्कृत हो सकने वाली किताबें लिख रहे हैं। दर्द यही है कि ऐसा ही हो रहा है। हालांकि आज का समय काफी बदल चुका है। हम जानते हैं कि आज हम बाजार की एक वस्तु भर हैं, हमारे दिमाग और देह दोनों को उत्पादक वस्तु के रूप में तब्दील कर दिया गया है, इससे अधिक हमारा कुछ भी अस्तित्व नहीं। हमारे दिमाग और देह दोनों पर बाजार का कब्जा है, बाजार ही उन्हें अपने अनुसार बेच और खरीद रहा है। और यह जो बाजार है वह न केवल हमारी वैयक्तिकता को लील रहा है वरन् हमारी सामाजिकता को भी लील रहा है। कहने को तो हम कह सकते हैं कि हम एक व्यक्ति हैं और हमारी पहचान औरों से अलग है (सच यही है) पर अलग कैसे हैं इसे प्रमाणित करने के मामलों में हमारे अपने औजार नहीं हैं। लड़ाई यही है कि एक व्यक्ति के नाते हम खुद के होने को कैसे प्रमाणित करें कि हम उन लोगों से अलग हैं जो समाज बदल के विरोधी हैं, जो शोषक हैं, चुनाव के नाम पर जो जनता को धोखा दे रहे हैं। सŸाा के शीर्ष पर बैठ कर आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार का कारण बन रहे हैं। सवाल है हमारे पास ऐसे चिन्हित लोगों से टकराने के तरीके क्या हैं? क्या आज की समाजिक स्थिति में उनसे टकराने की क्षमताओं का विकास संभव है? खासतौर से हमारे सामने आज के समय का जो कथा संसार है उसमें हम ऐसे कथानायकों को सिरज सकते हैं जो कुदरती तरीकों से कथाभूमि को उर्वर बना कर समय से टकरा सकें। सोचना यही है कि क्या हम ऐसे कथानायकों को सिरज पा रहे हैं जो अपने दिमाग तथा देह को बाजार में न बेचें तथा खुद को एक उत्पादक वस्तु बनने देने से बचा सकें।
इन सवालों के बाबत हम अगर आज के समय की कहानियों का संदर्भ लें तो हमें पता चलेगा कि कथा की दुनिया में कुछ जरूरी परिवर्तन जैसा हम कुछ नहीं कर पाये हैं, जैसे यह जो परिवार है, उससे उत्पादित उŸाराधिकार है, यह जो संपŸिा का मामला है, ये सारे के सारे सामंती सामाजिक यथार्थ आज की कहानियों में पहले की ही तरह मजबूती के साथ स्थान बनाये हुए हैं। परिवार का एक आवश्यक पहलू है विवाह, इसी से जुड़ा हुआ है उŸाराधिकार..पूंजीवादी सŸााप्रबंधन के लिए विवाह तथा उŸाराधिकार दोनों बातें बहुत ही आवश्यक हैं। पूंजी मूल्यबोध कभी भी परिवार तथा उŸाराधिकार के पंूजीमूलक यथार्थ बोध को बदलने नहीं देगा। इससे अलग वह एक अलग तरह का यथार्थ सृजित कर
देगा। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की तरफ बढ़ने का मामला पूंजीवाद द्वारा गढ़ा हुआ एक अलग तरह का पूंजीबोध वाला यथार्थ है। पूंजी की सुविधावादी इच्छाओं ने एकल परिवार के यथार्थ को एक ऐसा यथार्थ बना दिया है जो पूरी तरह प्राकृतिक यथार्थ जान पड़ने लगा है। जिसे तोड़ पाना असंभव है। तो यह है पूंजी द्वारा सिरजा गया नये तरह का एकल परिवार के सृजन का मूल्यबोध। एकल परिवार के रचाव के अलावा तमाम ऐसे संदर्भ हैं जिसे पूंजीमूलक बोध हमारे समाज की चेतना के विकास को बाधित करता है। खासतौर से निजता वाले मूल्यबोध जिसे पूंजीवाद खुली प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा के तौर पर प्रचारित करता है। हम इस कथित प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा के पूंजीमूलक मूल्यबोध को समझे बिना उसे अपने चिंतन का विषय बना लेते हैं और उसी के अनुरूप कथाओं को सिरज लेते हैं। ऐसी कथायें पूंजीमूलक बोध का सिर्फ और सिर्फ प्रचार ही कर सकती हैं और कुछ नहीं। सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने वाले समाज का एक संभावित जुझारू व्यक्ति खुली प्रतियोगिता के द्वारा पूंजीबोध वाली सatta का नागरिक बना लिया जाता है यानि उसे समाज से छीन कर पूंजी के संस्कारों से संस्कारित कर दिया जाता है। सattaप्रबंधन द्वारा तमाम ऐसी प्रतिभाओं को समाज से छीन कर सatta का अंश बना लिया जा चुका है और हमेशा बनाया जाता रहेगा। जिनके घरों में चूल्हा नहीं जला करता था, जिन्हें विस्थापित किया जा चुका है, किसी तरह से उस घर के किसी व्यक्ति ने प्रतिभा हासिल कर लिया है, उस प्रतिभा उसके घर या गांव में क्यों रहने दिया जायेगा। उसे पूंजीमूल्य बोध वाली सatta किसी न किसी तरह से छीन कर सatta का अंश (पार्ट) बना दिया करती है। दूसरी तरफ यह जो कथाओं की दुनिया है इसमें भी ऐसा ही हो रहा है। दलित, शोषित, उत्पीड़ित, दमित परिवार के प्रतिभाशाली व्यक्ति को कथा में शोषक वर्ग का प्रतिनिधि कलक्टर या मंत्री बनाया जाना प्रगतिशीलता माना जाता है। अरे भाई! यह कैसी प्रगतिशीलता है? किसी शोषक पद पर विराज कर यानि सatta का अंश बन कर क्या वह अपने समुदाय या वर्ग के दमन को रोक पायेगा, उसके पास दमन रोकने या उनसे प्रतिरोध करने के अवसर रहेंगे, क्या वह शोषकों के समूहों से टकरा सकेगा? उसे तो उसके समुदाय का दमन करने के लिए ही सatta का हिस्सा बनाया जा रहा है, तो यह है पूंजीमूल्य बोध वाली सatta का खेल। इस खेल को गहरे से समझने की आवश्यकता है। ऐसे दमित या शोषित समूह की प्रतिभा को सामंती यथार्थ वाले शोषक के रूप में बदल देना यह पूंजीमूल्य बोध द्वारा रचा हुआ यथार्थ, सattaवादी यथार्थ है। सattaप्रबंधन प्रतियोगिता व प्रतिस्पर्धा वाले निजता बोध के द्वारा ऐसे पूंजीमूलक बोध को खुलेआम स्थापित करता रहता है, यही तो सattaप्रबंधन का गुण धर्म है। उसका काम है सामाजिक बदल वाली कुदरती वौद्धिक चेतना को सुविधावादी इच्छाओं की जालों में फसा कर किसी भी तरह से (प्रतियोगिता या प्रतिसपर्धा के द्वारा) समाज से छीन कर सatta प्रबंधन से जोड़ लेना, ऐसे कामों में उसे महारथ हासिल होती है। पूंजीमूल्य बोध वाली ताकतें चिंतन का ऐसा वैचारिक प्रबंधन करती हैं कि वे सुविधावादी इच्छाओं की गंगा में नहा कर पवित्रता बोध से गद्गद् हो जायें और अपनी पीठ ठोंकने लगें। पूंजीमूलक सामाजिक संरंचना का यही बहुत बड़ा द्वन्द है, खुद की निजता बोध वाली चेतना का विकास या समाज की सहयोगी व सहभागिता वाली चेतना का विकास। इन दोनों में से निजता बोध वाली चेतना का विकास काफी लोकप्रिय है और सामाजिक बोध वाली चेतना का आज के समय में कहीं कोई मूल्य ही नहीं, इसीलिए समाज आज हासिए पर है।
जाहिर है निजता मूलक चेतना, पूंजी मूलक चेतना से गठजोड़ कर समाज की सहयोगी व सहभागी कुदरती चेतना के विकास को बाधित कर देती है। मजा यह कि ऐसे षडयत्रों से वाकिफ लोग भी सatta की कुर्सियों व तिजोरियों से चिपक कर सामाजिक बदलाव के सपनों में गोते लगाने का प्रदर्शन करते हुए सेमिनारों में प्रवचन दे रहे हैं। तो यह है हमारा पूंजीमूल्य बोध वाला समय जो सेमिनारों, एकेडेमिक बहसों आदि तक को अपने मूल्यों में रंग दे रहा है और हमें लगातार विकल्पहीन बना रहा है। ज्योंही चेतना के स्तर पर हम पंूजी से टकराने के बाबत सोचते हैं, जैसे संपtti के मामलों के बाबत तो यह जो संपtti का खेल है वह हमें संपtti के सवामित्व के संभावित विकल्पों के बारे में सोचने ही नहीं देता। उसी तरह शिक्षा का भी सवाल है। क्या हम मौजूदा समय की शिक्षा पद्धति के बारे में पंूजीमूल्यबोध वाले चिंतनों से अलग हटकर कुछ सोच पा रहे हैं? अगर ऐसा होता और हमने आज की शिक्षा के कुदरती मूल्यों को पूजी के बनावटी व आरोपित मूल्यों से अलग कर लिया होता तो अनिवार्य शिक्षा तथा निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था के बारे में हम सोच चुके होते पर हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। पंूजी का गुण है, समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक चेतना के स्तर पर असमानता बनाये रखना सो भला पूंजी कैसे समान व अनिवार्य शिक्षा के विकल्पों के बारे में निर्णय ले सकती है। समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय के संकल्प वाले मूल्य किसी शास्त्र द्वारा भले ही अनुमोदित न हों पर सामाजिक चिntan और चेतन की कुदरती विचार श्रृंखलाओं में इनके मूल्य ही समाज को समाज बनाते हैं वरना समाज केवल एक नाम भर बनकर रह जाता। समाज से राज्य तक की परिकल्पना में समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय की अवधारणायें इसी लिए पहले से ही स्थापित हैं, यह अलग बात है कि उन मूल्यों का सatta द्वारा अनादर किया जा रहा है तथा विभेदकारी घृणित चेतनाओं को आदरित किया जा रहा है। पर यह सच है कि समान शिक्षा, समान कानून, समान न्याय के कुदरती मूल्यों का अनादरित करने वाली सatta जन की सatta होने का सम्मान कभी भी नहीं प्राप्त कर सकती। चेतना के इन्हीं मूल्यों की स्थापना के लिए किये जाने वाले सामाजिक, राजनीतिक हस्तक्षेप ही इतिहास के चुनिन्दा विषयों में स्थान पाते हैं। राम का वन गमन भी इसी लिए कथा के रूप में ऐतिहासिक हो जाता है। जो आज भी अपनी प्रभावोत्पादकता में कहीं से कमजोर नहीं है।
उन कथाओं से अलग प्रेमसंबधों पर आधारित कथाओं की कथाप्रसंगों की भी स्थिति वही है। प्रेमसंबधों पर आधारित वही कथायें जीवित बची रह सकती हैं जो पूंजीबोध वाली चेतना द्वारा आरोपित यथार्थों के विपरीत कुदरती जनचेता बोध वाले लोकचेतना के यथार्थो द्वारा रची व सिरजी गई होती हैं। राधा-कृष्ण की प्रेम कथा जैसी दुनिया में कोई ऐसी प्रेम कथा नहीं, जो लोकमन को गहरे तक प्रभावित कर सकने की क्षमता वाली हो। एक ऐसी प्रेमकथा जिसमें पता ही नहीं चलता कि राधा कौन हैं और कृष्ण कौन हैं? दोनों में फर्क क्या है ? कथा में नर, नारी के चिŸा और चेतना दोनों का विलयन अद्भुत है। कथा में स्त्रैण तथा पुरुष चितत दोनों किसी यौगिक की तरह ऐसे विलयित हैं जैसे वे कभी अलग ही न रहे हों। नर का पुरुष चिनतन तथा नारी का स्त्रैण चिŸा, एक तरफ पुरुष का पुरुषत्व, वीरत्व, कर्ता बोध तो दूसरी तरफ नारी की सुकुमारता, स्त्रैणता, ममत्व का बोध, दोनों में गहरे तक एका, एक दूसरे में होते हुए एक दूसरे से अलग भी.. तो यह है लोकचेतना के यथार्थो द्वारा सिरजी गई कुदरती कथा, तथा पूंजीमूल्य बोध वाली चेतना द्वारा आरोपित यथार्थ का कुदरती अस्वीकार, पूरी तरह से लिंगभेद का समापन।
नर, नारी के ऐसे संबध वाले कथारूप तो हर काल में जीवित रहेंगे ही। सखी, सखा वाले संबन्ध में अलगाव नहीं है, अलग तो बंधन का होता है, जो बंधे हों, वहां तो बंधन है ही नहीं, वहां सखी, सखा वाला समझदारी पर टिका समान रिश्तों का संबन्ध है, उसे कहां अलग होना। नर, नारी के रिश्तों में सखी, सखा का भाव कुदरती भाव है, जैसे कि मॉ तथा बेटे वाला रिश्ता कुदरती है, बिना मिलावट व बनावट वाला, इसे पति,पत्नी वाले भाव की तरह गढ़ा नहीं जा सकता। सखी, सखा वाले भाव में नर, नारी के एक दूसरे के प्रति कुदरती आकर्षण में मजबूती ही नहीं दिव्यता भी है। सखी, सखा वाला कुदरती संबध, पूजीमूल्य बोध वाले विवाह जैसे पारंपरिक रीति, रिवाजों के विरोध की लोकचेतना का प्रतीक है। इस लोकचेतना के लिए किसी मनुस्मृति की आवश्यकता नहीं पड़ती। तो यह है कथा की स्वस्फूर्तता का अमिश्रित तथा निष्काम फैलाव। सखी, सखा वाला रिश्ता कहीं से भी आरोपित नहीं होता, वह तो नर व नारी दोनों को अपना चुनाव होता है यानि पूरी तरह से एक दूसरे को चुनने की कुदरती आजादी, एकदम प्राकृतिक वरना विवाह तो बंधन की तरह होता है। अगर नर, नारी में सखी, सखा वला संबध होता तो ये जो जातियों का फैलाव व आधिपत्य है, नर, नारी, दोनों पर, विवाह जैसे उपक्रमों के माध्यम से यह कब का टूट चुका होता। जाति की सारी जकड़बन्दी इसी विवाह संस्था के द्वारा रची जाती है, विवाह करो तो जाति में ही, जाति के बाहर विवाह की कल्पना ही नहीं, जाति से बाहर शादी करना सामाजिक अपराध बना दिया गया है यानि नर, नारी के रिश्तों से सखी, सखा वाले लोकचेतना वाले कुदरती मूल्य को छीन लिया गया है। जाति की अवधारणा पूंजीमूल्य बोध वाली चेतना द्वारा आरोपित चेतना है, यह कुदरती मूल्य बोध वाली चेतना नहीं है। नर, नारी के रिश्तों में अगर कुदरती मूल्य बोध वाली चेतना का सम्मान किया जाता तो उनमें सखी, सखा वाले संबध ही होते फिर तो जातियों की जड़ता को टूटना ही था जिसे तोड़ने के लिए लोहिया तथा अम्बेदकर जैसे विचारक राजनीतिक एवं सामाजिक दोनों स्तरों पर आजीवन संघर्ष करते रहे थे।
हालांकि कथाओं की दुनिया में जाति की जकड़बन्दी नहीं देखी जा रही, जिस तरह राजनीति में देखी जा रही है फिर भी जाति की जकड़बन्दी तोड़ने के लिए लेखन के स्तर पर कुछ विशेष नहीं किया जा रहा। एक तरह से देखा जाय तो जाति की जकड़बन्दी तोड़ने वाली जरूरी कथायें नहीं लिखी जा रही हैं। सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में राजनीति के लिए जाति बहुत जरूरी मुद्दा बन गई है। जाति के गठबंधनों द्वारा सरकारें बनायी बिगाड़ी जा रही हैं। लोकतांत्रिक सप्रबंधन में तो जातियों की जकड़बन्दी के खिलाफ खुल कर कथाप्रतिरोध होने चाहिए थे, पर नहीं हो रहे हैं। राजनीतिज्ञ जाति की जकड़बन्दी का लाभ उठाने के लिए अभिनव किस्म की तिकड़में कर रहे हैं। जाति की अवधारणा भी पूंजीमूल्य बोध चेतना द्वारा रचा गया यथार्थ है, यह अनायास की अवधारणा नहीं है। कर्म के अनुसार जाति या जन्म के अनुसार जाति दोनों स्थापनाओं में षडयंत्र है। जरूरत पड़ी तो कर्म के अनुसार जाति बना दिया नहीं तो जन्म के अनुसार जाति बना दिया गया। कर्म तथा जन्म दोनों को ही जाति निर्माण का आधार बना लिया गया है। जाति की अवधारणा तो अब खतरनाक स्थिति तक प्रभावकारी होती जा रही है। अब यह क्या है कि आज की तकनीकी तथा विज्ञान आधारित दुनिया में भी जाति बीमा कंपनी की तरह काम कर रही हैै। विवाह तथा मृत्यु दोनों संस्कार जाति के भीतर ही निपटाये जाने की विवशता रच दी गई है। विवाह हो तो जाति के भीतर ही, हमारा समाज जाति के बाहर विवाह करने के अवसरों को नही प्रदान कर रहा। जाति के बाहर विवाह करने के सारे अवसरों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। जाति के भीतर ही विवाह करने की आरोपित पुरानी जड़ताओं को तोड़ने के लिए प्रयास नहीं किये जा रहे। आखिर ऐसा क्यों, यह कौन सी कुदरती चेतना है? रोटी, बेटी के संबध ही सामाजिक समरसता को बचाये रख सकते हैं और ये जो जातियां हैं, रोटी तथा बेटी के दोनों संबधों को जाति के बाहर पसरने नहीं देतीं। रोटी का संबध मतलब जाति के बाहर खान, पान, बेटी का मतलब जाति के बाहर विवाह, जब तक हमारे समाज में प्रचलित नहीं होगा तब तक जातियां प्रभावी बनी रहेंगी, उनकी जकड़बन्दी को तोड़ा नहीं जा सकेगा। रोटी तथा बेटी के संबध को जाति से बाहर निकालना ही समय की मांग है। ऐसे जटिल समय में पूंजीमूल्यबोध वाली चेतना के प्रतिरोध में हम कथा की दुनिया में भी कुछ उल्लेखनीय नहीं कर पा रहे हैं फलस्वरूप आज भी हम जाति, स्त्री, यौनि की शुचिता तथा संपत्ति के सवालों पर खामोश हैं पहले की तरह जैसा कि पूंजीमूल्य बोध चेतना द्वारा प्रस्तावित है। आदमी और आदमी के बीच मानवीय समीपता तभी स्थापित हो सकती है जब लिंगभेदी, जातिभेदी, धर्मभदी, संपटी भेदी पूंजीमूल्य बोध वाली चेतनाओं से टकराते हुए लोकमूल्य बोधी चेतनाओं की जमीन पर ही कथाओं में जनप्रतिरोध को सृजित किया जाये तभी कथायें लोककथायें बन पायेंगी, नहीं तो नहीं।
