कथा क्रम अंक अप्रैल जून में प्रकाशित कहानी
चलिए लौट चल्रें
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कहानी........
चलिए लिए लौट चलें
रामनाथ शिवेन्द्र
संभव है ऐसा भी हो जब सोचा हुआ परिवेश मिल जाये और कहीं गुलाब तो कहीं चांद दिखने लगे, फिर तो उस परिवेश को किसी उत्सव में तब्दील करने की कोशिश करना बेवकूफी नहीं.
जिन्दगी में ऐसा होता कहां है यदि हो जाये तो वाह वाह, तब तो बहादुरी, कुशलता, प्रतिभा जैसी तमाम चीजें पीठ पर चस्पा की जा सकती हैं और अपने चेहरे पर दूसरों के चेहरों की चमक खींचने वाली चमक का होना भी महसूस किया जा सकता है.
परिवेश और समय की बात करें तो वह वही समय और परिवेश था और मैं उस समय अपनी आंखों में चांद डुबोने तथा बहादुरी की गाथायें लिखने की कोशिश कर रहा था बिना परवाह किए कि मेरी उम्र मुझसे गुदगुदियों वाला रिश्ता नहीं रखती.
आॅखों में गहरी झील उगाये एक दिन मैं उसके साथ था यह सोचते हुए कि उसकी आॅखों में भी वही झील होगी, उनमें मछलियों का तैरना, गोते लगाना व किनारों से टकराना आदि देख सकूंगा और किनारे पर बैठ कर लहरों से मीठी छेड़ छाड़ भी. पास में बैठी वह तो मेरा साथ देगी ही, तथा मेरी आॅखों में अपना खोया हुआ चेहरा भी तलाशेगी पर...
वह तो कहीं और थी...नदी, नाले, आकाश, चाॅद, तारे सभी से बाहर, किसी अनजानी सी दुनिया में, अनजानी सी धरती पर, अनजाने रास्ते पर. सुबह का वक्त था, नरम धूप हमें सहला रही थी. आॅखों के सामने बड़े बड़े दरख्त थे, उनकी प्रजाति पहचानना मुश्किल सा काम था, जरूरत भी नहीं थी कि जाना जाये पेड़ों के बारे में तथा हिसाब लगाया जाये कि उन पेड़ों में से कितनी कुर्सियां, पलगें या इन्टीरियर डेकोरेशन के सामान बनाये जा सकते हैं?
जंगल की हरियाली, पेड़ों का झूमना, पŸिायों का सरसराना, जंगल के एकान्त की गुदगुदाहटों में मैं था और सोच रहा था कि गुदगुदाहट उसे भी हो रही होगी पर उससे पूछना कि कैसा लग रहा यहां? अभद्रता होती, वैसे भी जंगल किसे नहीं गुदगुदाता?
वह तटस्थ थी, प्रतिक्रयाहीन मैंने उसे गौर से देखा ताकि जान सकूं कि वह प्रकृति के मनोरमों व उसकी धड़कनों से किस सीमा तक अविचलित रह सकती है? कहीं भीतरी तलों की अकुलाहटों को रोकने में किसी अभिनेत्री की तरह माहिर तो नहीं, स्वीकार को अस्वीकार में तब्दील कर देने की कलाकार.
किस दिल में अदृश्य झील नहीं होती? कौन नहीं उतरना चाहता उसमें? उतर जाने के बाद लहरें खुद बखुद हिलोरने लगती हैं और निकलने लगतीहैं अतृप्त संासें.
लेकिन वह चंचल हिलोरों से बाहर थी, सामने वाली दिख रही करमनासा नदी की तरह, पूरब से पश्चिम की तरफ हरहराती हुई बहने वाली लेकिन बरसात के बाद पूरे छह सात महीने तक शान्त, स्थिर, कितना पाट है, कितनी रेत है, नदी में पानी है या पानी में ही नदी है, मालूम करना मुश्किल. उसमें उतर कर ही नहीं, समा जाने के बाद भी. इससे भी मुश्किल यह हिसाब लगाना कि नदी ने कितनी बरसात पिया या धूप सोखा.
वह मेरे साथ भलुआ पहाड़ी की अधिकतम ऊंचाई पर थी और वहां हिम नहीं थी फिर भी हम ठंडे थे, पहड़ी की शिखर ऊंची थी और जिस चट्टान पर हम बैठे थे वह उŸाुंग नहीं आयताकार थी तथा चिकनी भी. वहां से जंगल का झूमना ही नहीं धरती की हरियाली भी साफ साफ दिख रही थी फिर भी ऐसा जान पड़ रहा था कि जंगल कुछ कुछ हमसे छिपा रहा है जिसे देखना और महसूसना अद्भुत होता, मिलान करने में सुविधा होती कि हमारे भीतर का जंगल अपने रहवास के लिए कितना मचल रहा है?
वैसे मेरे भीतर किसी जंगल का दखल नहीं, नही कहीं घाट, पहाड़, नही नदी नाले. हां हसते खिलते फूलों का दबदबा सदैव रहा है शायद इसीलिए मैं जीवन जीते रहने के बाबत हमेशा सकारात्मक हूं तथा उसकी भीनी भीनी गंध महसूसता रहा हूं. उस समय भी मैं भीनी भीनी गंध में था पर उसमें निश्क्रिय मादकता थी, सिकुड़ी, सिमटी जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था, चाहिए तो यह था कि जंगल के एकान्त में मुझे उस नौजवान और आकर्षक लड़की के साथ तूफानी बाढ़ बन जाना चाहिए था और तमाम तटबन्धों को तोड़कर धरती की गंध और जंगल के एकान्त में डूब जाना चाहिए था.
लेकिन जो होता है या जो हो रहा था वैसा सोचे हुए के भीतर ही नहीं होता, उससे अलग भी होता है बहुत कुछ. मैं काल्पनिक संभावनाओं की मौज मस्ती में था और संभावनायें थीं कि उसकी ज्योति का एक टुकड़ा भी कहीं नहीं दिख रहा था. हम विचारों से विकलांग भी न थे, नही हमारी मुक्ततायें अपहृत हुई थीं, हम सचेतन थे, एक दूसरे को आकर्षित करने की कलायें भी हमारे पास थीं फिर भी हम तटस्थ थे और अपनी अपनी दृढ़ताओं में जकड़े हुए थे.
हमने गूंगापन तोड़ा. दुनिया के साहित्य को कभी बांए से तो कभी दांए से हिलाया डुलाया तथा झकझोरा भी. हमें ऐसा
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करने में जो दिक्कतें आईं वे हिन्दी साहित्य के बाबत थीं कि इसमें जो जम गया या जमा दिया गया उसे सदियां हिला नहीं सकतीं, कविता का क्षेत्र हो या कहानी का पुरखों का जमा होना पारंपरिक परिघटना है. कविता की बातें करते करते हम आज की कहानियों में फस गये. अन्त में कहानियों ने हमारी सारी तार्किक ऊर्जा ही छीन ली, हम थके हारे से बैठे रह गये कहानी के उन पात्रों की तरह जो दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते. आत्महत्या करने के लिए विवश किसानों या विस्थापितों से आंखें मिला पाना अपशकुन होता, हमारी भद्रताएं प्रभावित होतीं वैसे भी जंगल में होने के हमारे सरोकार स्पष्ट थे जिस पर हमें कदम दर कदम बढ़ना था, तय भी सिर्फ यह था कि जंगल की तरफ चला जाए एक दिन.
जंगल में होना हम दोनों का साझा लक्ष्य था कि विज्ञान का रंगीन पोस्टर बने रापटगंज से एक दिन बाहर निकला जाए जहां एकान्त की गुदगुदियां हों और आलोचनाविहीन वातावरण.
इसी साझे लक्ष्य के तहत जंगल का चुनाव किया गया था कि वहां प्रकृति से सीखने का अवसर मिलेगा. प्रकृति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है मसलन शान्ति की अतल गहराई में उतरना, फिर भीतरी तलों को खंगालना, इस मुद्दे पर वैचारिक योद्धाओं में भी मतभेद नहीं. हममें भी मतभेद नहीं थे पर हम मौन थे पर कहीं गहरे में उद्वेलित भी. हमने साहित्य पर की गईं बातों को अपने से जोड़ा और आगे.... अचानक लड़की ने मुझे याद दिलाया..
‘आपने कभी कहा था कि इस जंगल के आसपास कहीं एक नदी है जो समतल मैदान को चीरकर निकली है, कितनी दूर होगी, वैसे भी जंगल है तो नदी भी होनी ही चाहिए जो जंगल को आड़े तिरछे किसी भी तरह चीरती होगी, भले ही समतल से न निकली हो, चलिए उस तरफ चला जायेे पर समतल पर नदी की अंगड़ाई, यह तो अचरज जैसा होगा.’
‘बहुत दूर तो नहीं जाना होगा’ पूछते हुए लड़की खड़ी हो गई...
इधर तो समतल चीरने वाली कोई नदी नहीं, एक बेलन है जो काफी दूर है, पास में करमनासा नाम की एक नदी है, यही कोई तीन चार किलामीटर दूर, उसे वैदिक नदी के रूप में भी जाना व माना जाता है पर वह समतल से नहीं निकली है. मैने लड़की को बताया..
‘कहीं त्रिशंकु वाली तो नहीं’ कहते हुए वह चैंकी फिर गंभीर हो कर बोली...
‘वही त्रिशंकु तो नहीं स्वर्ग और नर्क के बीच लटका हुआ एक सŸााप्रभु, विश्वमित्र के याज्ञिक प्रयोगों का एक उपकरण, अपने ढंग का स्वर्ग बनाने वाला महत्वाकांक्षी.’
हां वही त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षाकर्मियों ने स्वर्ग में घुसने से रोक दिया किसी तरह नर्क से बाहर निकल आया था, बेचारा कथित स्वर्ग और नर्क के बीच लटका हुआ इतना रोया कि उसके आॅसुओं, खखारों एवं लारों से धरती पर यह नदी बह निकली किसी शोक कविता की तरह’
उस नदी को देखना अद्भुत होगा हम भी तो त्रिशंकु की तरह ही तो लटके हुए लोग हैं, चलिए उस तरफ चलते हैं’ लड़की ने स्पष्ट किया..
करमनासा के तट पर हम शीघ्र ही पहुंच गये. वहां तक मोटरसाइकिल ले जाने में दिक्कत नहीं हुई, थोड़ी परेशानी तो हुई ही, वह भी कच्चे रास्ते के कारण, रास्ता जंगली व पठारी था फिर भी आराम देह. कटीली झाडि़यों के बीच से गुजरना भला था जो देखने में अद्भुत था, झाडि़यों की सघनताओं के बीच होठों के खिलखिलाने व मुस्कराने माफिक.
थोड़ी देर में हम नदी के किनारे पर थे. नदी काफी गहरी थी, कोई पचास साठ फीट से ऊपर, नदी की तलहटी में विभिन्न आकारों प्रकारों के पत्थरों का प्रायोजित जैसा जमघट था, गोल गोल चिकने चिकने. इन्हीं पत्थरों को चूमता चाटता नदी का पानी बह रहा था, पानी और नदी की तलहटी की एकात्मकता देखने लायक थी तभी तो छोटे छोटे पत्थर भी उसके बहाव को ठहराव में बदले हुए थे.
नदी के किनारे से नदी में उतरने का रास्ता नहीं था जिससे साबित था कि पास में कहीं बस्ती नहीं. हम किसी तरह नदी में उतरे, उतरना तो था ही. नदी के सपाट किनारे ने हमें सामान्य नहीं रहने दिया, पैर टिकाने की भी जगह नहीं थी फिर भी हम नदी में उतरे, बिना चोटिल हुए जबकि उसकी संभावना पूरी थी.
लड़की ने पत्थरों के बीच फसे हुए पानी को पैरों से हिलाया फिर बोली...
‘कितना साफ पानी है, पारदर्शी भी, इसमें मछलियां भी तो होंगी, भले ही बड़ी न हों छोटी ही सही. मछलियों का तैरना जब भी मैं देखती हूं लगता है अपनी सांसों में तैर रही हूं, जीवित उम्मीदों एवं संभावनाओं को सहला रही हूं. बहुत अच्छा लगता है, क्षण भर के लिए ही सही, जड़तायें टूटती हैं और खुद को विश्लेषित करने का आनन्द दायक अवसर भी मिलता है पर कभी कभी तो.. बुरा और भयानक, चीख निकल जाती है’
लड़की किसी कविता सरीखा संवाद बोलकर चुप हो गई. कुछ देर बाद बोली.. बोली क्या मुझसे पूछा उसने ...
‘आप भी तो सांसों में तैरते होंगे, किसी मछली की तरह, भीतरी तलों को छू छू कर लौटने के लिए फिर आगे तैर कर छूए हुए को दुबारा, तिबारा छूने के लिए, छुअन तो कला का ही रूप है, ऐसा करने में आप अपनी प्रतिभा का अधिकतम उपयोग करते ही होंगे... लड़की ने मुझसे सीधे पूछा
‘कैसा सांसों में तैरना तथा कैसी छुअन?’ क्या पूछ रही यह लड़की किसी दार्शनिक की तरह. मैं उसका उŸार दे पाता कि अचानक मैंने कहा बिना कुछ सोचे हुए ही, कुछ कुछ स्वस्फूर्त ढंग से....
‘शशि मैं भावुक नहीं, वर्तमान ने मुझे खुरदुरा बना दिया है कि मैं बहुत आगे या पीछे की सोच ही नहीं सकता और कोई भूत भी हमारा सहयात्री नहीं रहा है. मैं वर्तमान में ही जीता रहा हूं जिसे कुशलतापूर्वक जीने के लिए पूर्वाग्रहहीन संबधों का निर्वाह ही तो चाहिए बस इससे अधिक कुछ भी नही, हम मनुष्य हैं, हमारे भीतर वारिश रोकने की जगह नही, हमारी चमडि़यां धूप तो सोखने की आदी हैं पर लहरें नहीं झेल सकतीं, वैसे भी मछलियों को तैरने के लिए पानी की जरूरत होती है, पानी सब जगह तो होता नहीं. मुझे नहीं मालूम प्रतिभा किसे कहते हैं फिर उसके अधिकतम उपयोग का सवाल ही नहीं.
मेरा प्रति उŸार सुनकर शशि हसने लगी जैसे उसने नदी का हसना भी छीन लिया हो, थोड़ा रूक कर बोली...पूरी तरह उपेक्षात्मक...
‘कैसा पूर्वाग्रह हीन संबन्धों का निर्वाह? किस बात का निर्वाह, निर्वाह एक आयामी तो नहीं. मैं निर्वाह ही तो कर रही हूं, पहले अकेली थी, फिर साथ मिला, माॅ बाप ने मुझे ससुराल विदा किया. पांच साल गुजर गये, तीन साल तक ससुराल में ससुराल वालों के साथ रही, दो साल से अकेली हूं बिना तलाक के यह मान कर कि तलाक का कोई अर्थ नहीं, समझ बढ़ सकती है स्थितियों के समझने के बाबत फिर टूटे हुए दिल मिल सकते हैं, प्रतीक्षा करना आवश्यक है. संबन्ध बहाल होने की संभावनायें तो रहती ही हैं पर क्या मैं अकेली संभावनाओं को सफल बना सकती हूं?’
अपना बीता बताकर शशि मौन हो गई, आगे बताना भी क्या था. कोई कहानी कितना दूर जा सकती है आखिर? लड़की से पत्नी बनने और तलाक होने तक खत्म, कहानी की आगे की यात्रा तो कई अन्तों वाली हो जाएगी, पति, पत्नी जैसे संबन्धों के बहु विकल्पों व बहु लक्ष्यों वाली.
शशि पति पत्नी के रिश्तों के अलावा प्रचलित दूसरे विकल्पों से घिन करने वाली एक पारंपरिक लड़की मुझे जान पड़ी, देह दाह को शुचिता के आग्रहों से संवारने सजाने वाली. बहुत गहरे से शशि को मैंने देखा और सहम गया मुझे जान पड़ा कि वह देह से पार है, देह में होते हुए भी देह को तपाकर रखने वाली.
मैं शशि को साल भर से जानता हूं. पहली बार उसे एक एन.जी.ओ. के लीगल एवेयरनेस प्रोग्राम में देखा था. मुझे भी प्रशिक्षुओं को लीगल जानकारी देने के लिए उस प्रोग्राम में आमंत्रित किया गया था तब मैंने देखा था कि उसकी आॅखों में देह के बाबत तनाव पूर्ण संतुलन है ही नहीं. आस है तो प्यास रहेगी ही पर भूखी नहीं, भात भात चिल्लाने वाली. उस प्रोग्राम के बाद तो हम अक्सर मिलने लगे थे.
उस एन.जी.ओ. की तरफ से भी उसे निर्देश था कि वह मुझे हर उस कार्यक्रम में आमंत्रित करे जो जन समस्याओं से जुड़े हुए हों, वह उस एन.जी.ओ. के लिए जनपद प्रभारी का काम करती थी. निश्चितरूप से शशि मेरा सहयोग लेना कभी नहीं भूलती थी. वह साल के भीतर ही मुझसे ऐसा घुलमिल गई जैसे हम सालों से घुले मिले हुए हों.
नदी की तलहटी में इधर उधर घूम लेने के बाद हम एक समतल और चैकोर पत्थर पर बैठ गये. वहां कहू के पेड़ की सघन छाया थी जो किसी अशक्त जैसा हिलता डुलता नदी के किनारे खड़ा था, अब गिरा तब गिरा पर ऐसा नहीं था, कहू की जड़ें काफी गहरे तक जाती हैं और काफी मजबूत भी होती हैं, जानने वाले जानते हैं कि कहू के पेड़ों तथा नदियों की अन्तरंगता अटूट होती है, नदी है तो कहू के पेड़ हैं, कहू के पेड़ नहीं तो नदी नहीं. वहां बैठे बैठे मैं नर नारी के रिश्तों को विश्लेषित कर रहा था
काश! नर नारी के रिश्ते भी नदी और कहू के पेड़ की तरह होते, उस समय हम जंगल में थे जंगल का मनोरम भी हमारे साथ था पर जाने क्या हुआ शशि की कहानी सुन कर कि मुझे सारे मनोरम चिढ़ाते से जान पड़ने लगे, कहीं कुछ है ही नहीं, सारा कुछ जलते हुए शून्य में घिरा हुआ है. शशि मुझे किसी परछाईं सी दिखी, दृश्य भी अदृश्य भी, हवा में लटकी हुई त्रिशंकु की तरह मैंने सोचा...
जाने किस स्वर्ग की प्रतीक्षा कर रही? उसे पाने के लिए अपना अमूल्य वर्तमान क्यों अपाहिज बना रही? मैंने एक बार फिर शशि को गौर से देखा कि उसके चेहरे पर क्या है? उसके मन के भीतर भी उतरना चाहा, वहां कुछ भी नहीं था या कुछ रहा भी हो तो मेरी समझ में नहीं आया कि वहां कुछ है भी क्योंकि किसी के मन के भीतर उतरने की कला मुझे नहीं आती.वैसे भी एक छोटी सी और अस्पष्ट तथा अंखुआती कहानी के सहारे किसी के मन में उतरा भी तो नहीं जा सकता.
फिर भी मैं शशि की कहानी में था कि काहे के लिए हरामजादों ने इसे परित्यक्ता बना दिया? आखिर क्या दोष हैं इसमंे?
शशि तब तक खामोश थी, उसने मौन तोड़ा...
‘पानी पी लिया जाय बिस्कुट है मेरे पास, प्यास लगी है, प्यास तो आपको भी लगी होगी, प्यास बुझाने के लिए नदी से अच्छी कोई जगह नहीं, साफ और बहता पानी, कहीं ठहराव नहीं’
मुझे भी प्यास लगी थी मैने हां कहा और उससे पूछा..
बिस्कुट लेकर चली थी, मुझे तो आने की जल्दी में ख्याल ही नही रहा कि क्या क्या लेकर चलना हैै? हम दोनांे बिस्कुट खाये और बहता पानी पिये, पानी मीठा था, पहाड़ी जैसा नहीं वैसे भी वारिश का मौसम पार हो चुका था.
पानी पी चुकने के बाद शशि से मैंने पूछा..
‘कुछ और देखना है यहां वीराने में, जंगल के एकान्त में, जंगल में होना तो बहुत अच्छी बात है पर बाहर निकलो तो निकलना मुश्किल, पीछे पीछे जंगल पीछा करता दीखता है,’ किसी प्रायाजित साक्षी की तरह. शशि ने बिना देर किए स्वस्फूर्त उŸार दिया..
‘लौटना चाहिए अब, दिन ढलान पर है कई मील जंगल पार करना है, अब कुछ भी नहीं देखना, इससे अधिक कुछ देखा भी तो नहीं जा सकता, अधिक देखने की लालच से बचना ही सर्वोŸाम बचाव है क्योंकि फिर जंगल हमें देखने लगेगा. आप तो जानते ही हैं जब प्रकृति दिल के गहरे में उतर कर किसी को भी देखने, परखने लगती है फिर तो दृढ़ताएं टूट जाती हैं. दृढ़ताएं टूट जाने पर जंगल हम पर हसने लगेगा तथा उपहास उड़ाएगा, वैसे हसियां न तो मुझे उŸोजित कर सकती हैं न डरा सकती हैं फिर भी..
जंगल से बाहर हमें निकलना ही था सो जंगल का अवांक्षित उपहास लेकर निकलना ठीक नहीं, चलिए लौट चलें’
अन्धेरा गाढ़ा होते होते तक आधुनिकता में तब्दील होते कस्बे में हम लौट आए किसी विज्ञापन में तब्दील होने के लिए. हम भी तो विज्ञापन की तरह ही शाश्वत एकान्त पीने के लिए जंगल में पहुंचे थे पर वहां तो कोलाहल था, हमें क्या पता कि जंगल तभी कुछ देता है जब उसका मान किया जाए नहीं तो सारा कुछ लील लेता है.
जब से जेल में बन्द हूं शशि लगातार याद आ रही है, उसी के कारण मुझे जेल में बन्द किया गया है कि मैं शशि का साथी हूं. पुलिस का मानना है कि शशि उग्रवादी है फिर भी मुझे यकीन नहीं आ रहा कि शशि का वाम उग्रवाद से दूर दूर तक का भी नाता रहा होगा. जेल में बन्द रहते हुए भी मुझे बीते हुए समय का सारा कुछ साफ साफ दीख रहा है और मैं समझ सकता हूं कि बीते हुए दिनों में बहुत कुछ ऐसा रहा है जो मेरे दिल दिमाग से कभी भी बाहर नहीं निकल सकता, हालांकि वह बीत चुका है, गुजर चुका है पर उसकी महक आज भी बासी नहीं हुई है, तभी तो मुझे सारा कुछ ख्याल आ रहा है कि क्या हुआ था तब जब शशि मेरे कस्बे में आई थी मेहमान की तरह और मेरी स्मृति में किसी कहानी की तरह छाई हुई है. मुझे शशि के साथ बिताए दिन सोने नहीं दे रहे हैं, एक एक पल ताजे दिख रहे हैं और मैं वहीं हूं शशि के साथ, उसके साथ बिताए दिनों के साथ. स्मृतियों में डूबा हुआ, स्मृतियों में डूबने और तैरने के लिए जेल से अच्छी दूसरी जगह नहीं. मेरी आंखों में आज भी शशि किसी मछली की तरह तैर रही है और मैं समझ नहीं परा रहा हूं कि क्या शशि वामअतिवादी हो सकती है.
रामनाथ शिवेन्द्र
अक्षर घर, पूरब मोहाल, हर्ष नगर
रावर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 231216
मो...07376900866
