Sunday, May 8, 2016

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित



















    र.नं.63166/78

प्रकाशन का छत्तीसवां वर्ष

  अर्धवार्षिक प्रकाशन
   

    कविता अंक


   समय से संवाद
 जनवरी- जून 2016

 अंशुल शर्मा की कविताओं
      पर केन्द्रित 

           केन्द्रित        कविता अंक 



जन्म... 21अप्रैल 1987
शिक्षा...स्नातकोŸार रसायन शास्त्र
अध्यापन
861,आदर्श बाल विद्या मन्दिर, दूनी
जनपद....टोंक
राजस्थान, 304802
मोबाइल...
09166048404 व 08764252548

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक 


अपनी बात
असुविधा का प्रस्तुत अंक युवा कवि अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित है, ये राजस्थान के रहने वाले हैं, सो इनकी कविताओं में बात कहने का तरीका व उसका आशय दोनों ही सपाट हैं, खरी खरी. कवि अंशुल शर्मा की कवितायें सादगी के साथ काव्य यात्रा करती हुई आलोचनात्मक वौद्धिकता के कवच से लापरवाह रहती हैं. उन कविताओं के लिए एक ही सूत्र है ‘चलना है तो चलते रहना है, यह जो चलना है, स्थगित नहीं करना है, चलने से ही बातें खुलेंगी, आलोचना का क्या, वो तो होती रहती है, लिखो तो भी न लिखो तो भी, कुछ लोग तो बिना लिखे ही जमे हुए हैं. वैसे आधुनिक कवितायें तो वौद्धिकता के जटिल तकनीकों व तथ्यों के साज सिंगार के साथ ही किसी काव्य यात्रा पर निकलती हैं, कथ्य तथा तथ्य खुले न खुले, कविता मित्रों द्वारा जमा दी जाती है.. ऐसी किस्मत सबकी नहीं. कवि अंशुल की कवितायें अपने कथन में आज के समय में भी सपाट हैं, बिना किसी बनावट तथा मिलावट के, इनसे सभी के सामने या अकेले भी दो चार हुआ जा सकता है और अपनी संवेदनायें साझा की जा सकती हैं.  
प्रस्तुत अंक की योजना भी अंशुल जी के कविताओं के अनुरूप अचानक व बिना किसी तैयारी के बन गयी...हुआ यह कि फेसबुक पर कुछ महीने पहले मैंने असुविधा के प्रकाशन के बारे में अनिश्चितता का जिक्र किया था, संभव है असुविधा का प्रकाशन बन्द करना पड़े... मुझे डिम्पू के न रहने के बाद लगने लगा है कि असुविधा का प्रकाशन न संभव हो सके, विवशतायें जिनकी कोई आकृति नहीं होती, उनका होना तो कुदरती हैं...चाहेे कोई उन्हें रचे न रचे. खेती किसानी की सीमा किसे नहीं मालूम, केवल दो जून की रोटी वह भी बमुश्किल तमाम...बहरहाल यह सब मेरा दर्द है, मुझे झेलना है, इससे दूसरों से क्या लेना देना पर दूसरा कौन है? साहित्य में तो कोई दूसरा होता नहीं. मुझे दूसरों के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए था, बाजार में तो केवल तीसरा होता है, और यह जो तीसरा है, वही बाजार को चलाता है, दुख सुख ही नहीं चेतना व अनुभूतियों तक को बाजार का उत्पाद बना डालता है...असुविधा को बिना बाजार की आज्ञा से कभी तीसरा नहीं मिल सकता, बाजार का अपना स्वतंत्र व निरंकुश तंत्र होता है, यह सब जानते तथा मानते हुए भी मैने अपने दर्द का जिक्र फेसबुक पर कर दिया था, शायद खुद को समझाने के लिए या अपना दुख कम करने के लिए, यही कारण रहा होगा. संभव है दुखियारे को तीसरे से दूसरे में तब्दील राम मिल जायें. मुझे अचरज लगा कि फेसबुक की दुनिया में असुविधा के लिए अंशुल शर्मा मिल गये एक दम अपरिचित... अंशुल शर्मा ने तत्काल असुविधा के खाते में दो हजार रूपया डलवा दिया. हालांकि मैं उन्हें असुविधा का खाता नंबर भेजना नहीं चाहता था पर जिद्द भी तो कोई चीज होती है...अंशुल जी की जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा उसी दौरान एक बात और हो गयी जिसका जिक्र न करना गलत होगा..मेरे लिए आदरणीय हैं विष्णु चन्द्र शर्मा जी, उनसे मेरा जुड़ाव बहुत पहले से है जुड़ाव का कारण है उनका बनारसी होना और खरा खरा बोलना, असुविधा ने बहुत पहले एक अंक उन पर भी केन्द्रित किया था. उन्हें मेरे पुत्र अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित अंक मिला और उन्होंने दो हजार रूपयों का चेक मेरे नाम से भेज दिया... चेक लेना है कि नहीं लेना है, इनकार करने का मुझे उन्होंने मौका भी नहीं दिया तो यह सब होता रहा असुविधा के साथ..असुविधा के लिए कम से कम दो लोग तो मिले जो सोचते है कि धन के अभाव के कारण असुविधा बन्द नहीं होनी चाहिए.. उन दोनों लोगों के सहयोग ने मुझे विवश कर दिया कि असुविधा का प्रकाशन बन्द नहीं होने देना है, आखिर खाना, पीना तो चल ही रहा है, मेरे घर के चूल्हे में आग जलती है, फिर असुविधा.क्यों न जले. जलेगी धुधुआती ही सही.... उन लोगों को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद...
अब अंशुल जी की कविताओं पर...
ये लोग/भूख प्यास/पानी बिजली/जैसी/छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्लाते हैं?/अरे/कोई इन्हें चुप कराओ/इनकी चीखें/गम्भीर मुद्दों से/ हमारा ध्यान हटाती हैं।........................
झूले/महŸवहीन/हो चले हैं/पेड़ों पर अब/किसानों की/लाशें झूलने लगी हैं/सबसे मजे की बात तो यह है कि/सबसे निर्मम हत्यारा/सबसे आगे खड़ा रहता है भीड़ में...बालकों के बचपन की लाश को/ पीछे छिपाए।
पसीने से तरबतर/मुँह लटकाए/फावड़ा कंधों पर टाँगे/शाम को घर लौटते मजदूर की पेन्टिंग/लाखों में बिक गयी/और उसके बच्चे.../आज भी भूखे सो गए।
लिखना एक कला है/किसी पर लिखना/कला की कला है/किसी के लिखे पर
लिखना/विशेष कला है/किसी के लिए लिखना/पुरस्कारणीय कला है/आपमें भी तो कोई कला होगी जनाब!
समय से बातें करती अंशुल की कवितायें हमें कुदरती काव्य परंपराओं की तरफ ले जाती हैं, जब कविताओं के सिंगार पटार नहीं किये जाते थे वे एक वाक्य भर होती थीं. धूमिल ने उस परंपरा का जोरदार ढंग से उपयोग किया हाल में विनय मिश्र ने ‘सूरज तो अपने हिसाब से निकलेगा’ तथा किरण अग्रवाल जी ने ‘धूप मेरे भीतर’ संकलन में किया है.
कवि अंशुल सीधे सवाल करते हैं आखिर लोग भूख, प्यास, पानी बिजली,जैसी छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्ला रहे हैं? इन्हें चुप कराओ, इनकी चीखें गम्भीर मुद्दों से हमारा ध्यान हटाती हैं. .ध्यान तो विचारकों चितकों, कैरियरिस्टों का तो हट ही रहा है... कौन कवि है जो नागार्जुन की तरह आन्दोलन का सहभागी बन रहा है? सभी तो अपना मुह पुरस्कारों की तरफ लगाये हुए हैं, मिले न मिले अलग बात है... आज का समय पुरस्कार लेने और लौटाने के बीच का है, दोनों की राजनीति है, ऐसी राजनीति करने वालों के लिए भूख,गरीबी,शोषण आदि के सवाल ध्यान हटाने वाले हुआ करते हैं. वे अक्षरों की अमरता के बहाने खुद को अमर बनाने की चिंता में हैं... अमर बनना इतिहास में होना है तथा इतिहास में कूट कलाकार ही जगह पा सकता है, और कोई नहीं...मेरे यहां के लक्ष्मण सिंह को अंग्रेजों ने मार दिया पर वे इतिहास में नहीं हैं.
कवि अंशुल शर्मा कविता की ठूंठ की तरह हैं और ऐसी ही कविताओं से संभावना भी है. किसे नहीं पता कि ठंूठ पेड़ की मजबूती का जीवित प्रमाण होता है, खुद को मिटाता हुआ.
खेत की मेड़/पर ये जो ठूँठ तुम देख रहे हो ना/ये ठूँठ नहीं हैं/ बरसात की आस में/आँखों को आसमान में टिकाए/खड़ी संभावना हैं.
प्रस्तुत कविता संकलन तमाम ऐसे कवियों के लिए संभावना है कि कवितायें नहीं मरा करतीं, सो लगातार काव्य यात्रा पर चलते रहना चाहिए, काव्य कर्म को निराश व हताश हो कर छोड़ नहीं देना चाहिए.. कवि अंशुल शर्मा साफ कहते हैं...
समय रथ/ अपने पहियों के नीचे/ वर्तमान को कुचलता हुआ/भविष्य होने जा रहा है/तुम इसकी गति को पहचानो/अन्यथा यह वर्तमान का/ अपहरण कर/
छोड़ जाएगा पीछे/ वर्तमान का भूत/और उस रथ/ की धूल से सना/ तुम्हारा चेहरा/किसी को पहचान न आएगा/समय की/ धूल ने बड़े बड़े/ चेहरों को/ धूमिल कर दिया है।
समय की धूल ने बड़े बड़े चेहरों को धूमिल कर दिया है, सो सावधान रहने की जरूरत है कि चेहरा धूमिल न होने पाये और ऐसा तभी होगा जब वर्तमान की चुनौतियों से टकराते रहा जाये. मुझे खुशी है कि कवि अंशुल शर्मा के जेहन में वर्तमान का खुरदुरापन मौजूद है तथा उससे टकराने की क्षमता भी. आशा है कि अंशुल शर्मा जी की कवितायें समय की चुनौतियों से टकराने वालों को स्वीकार्य होंगी, निकट भविष्य में प्रस्तुत संकलन से इतर उनकी और धारदार कवितायें हमें पढ़ने के लिए मिलेंगी.













पौ,पाठशाला
और पंक्तियाँ


पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
मीठे-मीठे सपने
देखा करती हैं
पौ फटते ही,
जबकि माँयें अपने बच्चों की
मनुहार करती हैं
चाय दूध पीने की।

पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
तैयार होने की
तैयारी कर रही होती हैं।

पौ फटते ही,
वे रवाना हो जाती हैं
अपने बस्तों का बोझ लिए।

देखते हैं उनके मवेशी
गीली आँखों से,
कि रस लेते जाओ
हमारे घी दूध का।

रास्ते के बबूल
हिल जाते हैं जोर से,
सुखाने के लिए
उनका पसीना।

समय से तेज दौड़ने की
कोशिश में,
कभी कभी खा जाती हैं ठोकरें,
और दोष देती हैं
सड़क को।

सड़क भी सहेली हैं उनकी
कान पकड़ लेती हैं
और सहला देती हैं
उनके पैरों को।

भागती,दौड़ती,
सिर से एड़ी तक
पसीने में तरबतर।

खुश हो जाती हैं प्रार्थना में
अपनी सहेलियों के साथ
पंक्तिबद्ध होकर।

मगर कभी कभी जब
समय उनसे
आगे निकल जाता है
दौड़ में,
अनजाना अपराध बोध लिए
खड़ी रहती हैं वो
अलग पंक्ति में।

शिक्षक देखते हैं उनको,
कमर पर दोनों हाथ
रखे हुए।

मैं कहता हूँ
आओ कभी
सात हजार मीटर से
दौड़ते भागते
गिरते उठते
उस पर लगो, अलग पंक्ति में
अपराध बोध लिए
उस अपराध का
जो तुमसे हो जाता है
ना चाहते हुए भी।

टाँगें फड़कने लगेगीं
तुम्हारी,
शरीर जकड़ने लगेगा,
पेशियाँ फैलने
और सिकुड़ने लगेंगी,
बहुत तेज रफ्तार से
और दिमाग की
ओर जाने वाला
सारा खून इकट्ठा हो जाएगा
तुम्हारी आँखों में,
सुन्न होते होते दिमाग के।

तब अहसास होगा तुम्हें
देर हो जाना
कितना खलता है
और पौ फटने से पहले
घर से
निकलना भी।

बड़ा प्रसिद्ध आदमी

कुछ आदमी,
बड़े प्रसिद्ध होते हैं,
कुछ आदमी बड़े होते हैं,
प्रसिद्ध नहीं होते।
कुछ आदमी प्रसिद्ध होते हैं,
बड़े नहीं होते।
कुछ आदमी ना बड़े होते हैं,
ना प्रसिद्ध होते हैं,
वहीं कुछ बडे़ और प्रसिद्ध
दोनों होते हैं
मगर
‘आदमी’ नहीं होते

स्मृतियाँ  (एक)


स्मृतियाँ
मरने कहाँ देती हैं
किसी को,
स्मृतियाँ
अमरत्व का दूसरा नाम हैं।

स्मृतियाँ (दो)


स्मृतियाँ
कभी खोती नहीं हैं
छिप जाती हैं,
सिर्फ
कुछ घटनाओं के बीच,
दब जाती हैं
जैसे
पुस्तकों के ढेर के बीच
दब जाता है कोई
पुराना पत्र।

स्मृतियाँ (तीन)


तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
डूबते चले जाना है,
 अन्तहीन गहराई में।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
चढते चले जाना है,
पर्वतों के अमापित
शिखरों पर।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
उजड़े हुए गुलिस्तां में
गुलों की महक
महसूस करना है।

स्मृतियों की
इन
गहराइयों, ऊँचाइयों
और खुशबूओं में,
तुम्हें पा लेना
किसी उपलब्धि से कम नहीं।

स्मृतियॉ (4)


नीम का वो बूढ़ा पेड़,
उसके कई साथी परिन्दों का
पुश्तैनी मकान रहा था।
डर था कि कभी भी
कटवाया जा सकता है
(जैसा कि हर वृद्ध के
साथ होता है)
सो...
कटवा दिया गया
गृहस्वामी द्वारा।
रहना तो था ही कहीं
पालना था अपने भविष्य को,
जल्दी ही उन सबने
एक नया बसेरा तलाश लिया।

मगर एक तोता
अभी भी वहाँ आकर
बैठ जाता है।

बसेरे छूट जाया करते हैं
मगर,
उनसे जुड़ी स्मृतियाँ
नहीं छूटती हैं।

  प्रेम


मैं ‘तुम’ हूँ,
‘तुम’, ‘मैं’ हो,
मैं, मैं नहीं,
तुम, तुम नहीं।

होना और ना होना,
होकर ना होना
ना होकर होना
ही तो
प्रेम है।

 उलझन


जिसे याद रखना
जरूरी है
वह भूल, भूल जाता है,
जिसे भुलाना जरूरी है,
वह रह रह कर
याद आता है।

अजीब गुत्थी है
इस मन की भी
सुलझाने लगता हँू
और
उलझ जाता हूॅ।

परिभ्रमण


तुम तो घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो यथास्थिति
पर
तुम्हारे इस घूमने फिरने से
जो
दिन रात
साल महीने
बनते हैं
वे
नहीं सिरजते ‘यथास्थिति’
तुम्हारी तरह।

कभी कभी
किसी पल को
रोक लेना चाहता हूँ,
मगर
तुम रुको तो
वो पल रुकें।
तुम्हारा क्या है?
तुम तो
घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो
यथास्थिति।
शामें और आवाजें

पहले शाम के वक्त
सुनाई पड़ता था
चहचहा रही हैं
घर लौटती
चिड़ियाएँ,

पुकार रहे हैं बछड़े
अपनी माँओं को,
तैयारी हो रही है
पास के मन्दिर में
आरती की,
शोर मचाते बच्चों के
झुण्ड पर
चिल्ला रही हैं
उनकी माँयें
कि.....
‘अब तो घर आ जाओ।’

अब वे कुदरती आवाजें
सुनाई नहीं पड़तीं,
अभी सुनाई दे रही है...
पास के मोबाइल
टावर से
घरघराते जेनरेटर
की आवाज,
कहीं दूर तेज आवाज में
बज रहा है डी.जे.,
तेजी से गुजरती बाइक्स
जिनके साइलेंसर
अपने नाम के विपरीत
मचाते हैं शोर।
हालाँकि
शामें भी है,
बच्चे भी हैं,
मॉयें भी हैं,
गॅायें भी हैं
मगर
वो
आवाजें अब
नहीं हैं।

झूठ


झूठ
बर्दाश्त होते हैं।
प्यारे झूठ!
अच्छा है
तुम हो।
वाकईं सच नाकाबिले।


दीवारें


इश्तिहारों
के इस जंगल में
‘यहाँ विज्ञापन
चिपकाना सख्त मना है’

लिखी दीवारों को
घोषित किया
जाना चाहिए
संरक्षित।
समस्याएँ

वोट,

दलबदल,
बहुमत,
गठबन्धन,
कुर्सी जैसी
गम्भीर समस्याओं
के बीच,
ये लोग
भूख प्यास
पानी, बिजली
जैसी
छोटी-मोटी
बातों के लिए
क्यों चिल्लाते हैं?

अरे !
कोई इन्हें चुप कराओ!
इनकी चीखें...
गम्भीर मुद्दों से,
हमारा
ध्यान हटाती हैं।
     

झूले


झूले
महŸवहीन
हो चले हैं।

पेड़ों
पर अब
किसानों की
लाशें
झूलने लगी हैं।

मजदूर


पसीने से तरबतर,
मुँह लटकाए,

फावड़ा कंधों पर टाँगे
शाम को घर लौटते
मजदूर की
पेन्टिंग

लाखों में बिक गयी
और
उसके बच्चे...

आज भी
भूखे सो गए।

लेखन एक कला


लिखना
एक कला है।

किसी पर लिखना
कला की कला है।

किसी के लिखे पर
लिखना
विशेष कला है।

किसी के लिए लिखना
पुरस्कारणीय कला है।

आपमें भी तो
कोई कला होगी जनाब!

 सवाल


किसान
दिखाया जाता है,
विज्ञापनों में हँसता हुआ।

या तो
वे विज्ञापन
फर्जी हैं,
या
हँसते हुए
वे किसान।

क्या आप बता सकते हैं
कौन फर्जी है

प्रकृति और मैं


मैंने
कल रात
एक स्वप्न देखा
कि
मैं
अपनी
सुविधाओं
के लिए
प्रकृति का गला
घोंट रहा हूँ।

जागा
तो
मेरे दोनों हाथ
अपनी ही
गर्दन को जकड़े हुए थे।


सिकुड़न


सूचनाओं
के इस तंत्र ने
दुनिया को छोटा
और
पडा़ेस को बड़ा
बना दिया है।

पूरी दुनिया की
खबरों से
हरदम अपडेट
रहने वालों को...

 कई बार

पड़ोसियों के घर
खाली करने
और
नए लोगों के बसने की
खबर तक नहीं लगती।

रोगी का कमरा


क्या कभी
रोगी का कमरा
आपने देखा है ध्यान से?

तरह तरह की
दवाइयों
की
कड़वाहट और गंध से भरा।

वो
गंध उस कमरे की
दीवारों में...
इतनी गहराई
तक घुस चुकी
होती है कि
शुभचिन्तकों द्वारा
भेजे गए खुशबूदार
गुलदस्ते
हो जाते हैं
गंधहीन

रोगी का कमरा
जिसमें प्रवेश करते ही
झूठी संवेदनाओं
की
गुरुत्वीय शक्ति से
शुभचिन्तकों के
चिकित्सकीय ज्ञान के
छिछले सागर
में ज्वार उठने लगता है।

रोगी के कानों में
ये सुझाव
असंख्य
घण्टों, घड़ियालों
का
शोर पैदा करते हैं।

वो झुँझलाता है,
रोगी को ऐसा
लगता है
जैसे
कमरे की दीवारें
धीरे धीरे
उसके पलंग की ओर
सरकने लगी हैं
उसे दबा डालने के लिए।

वो
डर जाता है।
अगर
इस दुनिया में
सबसे
भयावह कोई जगह है
तो
वह है
‘रोगी का कमरा।’

रिंगमास्टर


वह नहीं बोलता था,
उसकी आँखें बोलती थीं।

उसकी आँखों के घूमते ही
घूम जाते थे वे भी
भय से।

आलम यह था कि
उसकी पुतलियाँ
फैलते ही
फैल जाता था,
सन्नाटा चारों ओर।

फिर एक दिन
गजब हो गया,
उसकी पुतलियाँ फेलीं,
जितनी फैल सकती थी,ं
पर उस दिन
सन्नाटा नहीं फैला।

सामने चुप्पी नहीं थी,
भय भी नहीं,
थी बस खुसर पुसर।

वह खुद को नजरों में
गिरता न देख सका
और
उसने डण्डा उठा लिया।

तभी
एक आवाज आई..
‘एक दिन खत्म हो जाएगा
 इस डण्डे का भी भय’
जैसे खत्म हुआ आँखों का
फिर क्या करेगा?

वह चौंका
जैसे
जगा दिया हो
किसी ने नींद से।

समझ आ गया उसे
कि
वह
‘मास्टर’
है
‘रिंगमास्टर’
नहीं।

अनुशासन


पंक्ति में लगे
बालकों को देखकर
कितना
आनन्द आता है।

आनन्द
पंक्तिबद्धता से नहीं,
हमारे
निर्देशों की अनुपालना
को
देखकर आता है।

अनुपालना
हमारी “गुरुता” को
संतृप्त करती हैं।
          //22//

छंद और जीवन


माना
कठिन है,
छन्दबद्ध
कविता की रचना,
परन्तु
असंभव है
स्त्री जीवन की पीड़ा को
छन्दबद्ध
कर पाना भी।

प्रश्न


वे
कहते हैं
‘प्रश्न करना अपराध है’

प्रश्न करके
तुम
हमारी
गुरुता और शुचिता
को
चोट पहँुचा रहे हो।

वे
प्रश्नों को
अपराध घोषित कर
पतली गली से
निकल लेते हैं
क्योंकि
उनके पास

तुम्हारे प्रश्नों के
उŸार नहीं हैं।
उŸार होगे भी कैसे?

ऋण बटा ऋण

काँटे से काँटा
निकालने
और
जहर से जहर कटने
की
बात को सच मानकर,
उसकी
पुश्तें
कर्ज चुका चुका कर
मर गई हैं।

मगर
साहूकार का
कर्ज है कि
कटने का नाम ही
नहीं लेता
कर्ज से।

अकवि 


ये कौन है?
जो कछुए की तरह
अपनी खोल में सिमटा
बैठा है,
श्रीमान!

ये
कविवर कच्छप हैं!
ये
अपने
हाथ-पाँव और
पेट का ध्यान रखते हुए
कविता लिखते हैं।

ये
पुरस्कार लेते समय ही
अपनी खोल
से बाहर निकलते हैं।

हत्या


हमने
बालपन
की
हत्या
कर दी।
और
आरोप
यंत्रों
पर गढ दिया।

(वैसे भी
अपना अपराध
दूसरों पर थोप देने में
हम उस्ताद हैं)

सबसे
मजे की बात तो
यह है कि
सबसे निर्मम हत्यारा
सबसे
आगे खड़ा रहता है
भीड़ में,

बालकों के
बचपन की लाश को
पीछे छिपाए।

समाचार 


आज
समाचार,
विचार,
सदाचार,
शिष्टाचार
और
ऐसे
जितने भी
चार हैं,
सब
’अचार’ के भाव
बिक रहे हैं।



समाचार (2)


समाचार चैनल
वारदातें,
सनसनियाँ,
और
रहस्य

 परोसने में लगे हैं।
तर्क वितर्क
के नाम पर....
आयोजित बहसें
बदल जाती हैं,
व्यक्तिगत छींटाकशी में।

सास बहू से लेकर
अलौकिक शक्तियों
पर चर्चा करते
ये चैनल
अपने मूल उद्देश्यों को
विस्मृत कर चुके होते हैं?

क्या
लोकतंत्र का
पाँचवा स्तम्भ,
इतना कमजोर हो गया?
कि
उसे खड़ा रहने के लिए
इनका सहारा लेना पड़ेगा?

दूसरों को कटघरे में
खड़ा करने वालों
जरा अपनी गिरेबाँ में भी
झाँक कर तो देख लो।


प्रेम गीत


अगर कविताएँ
प्रेमालाप ही
करती रहेंगी
तो
     
समाज के रुदन,
समाज की पीड़ा,
समाज की विसंगतियों
पर प्रकाश कौन डालेगा?

अगर शब्द
गलबहियाँ डाले
बैठे रहेंगे
तो
समाज को नींद से
कौन जगाएगा ?

कविता ने
बादलों की सैर
खूब कर ली है,
खूब चाँद तारे
तोड़ लिए हैं,

अब
जमीन पर उतरकर
काँटों पर नगे पाँव
चलना होगा,
जनमानस के दर्द को
महसूस करना होगा
और चीख चीख कर
बयाँ भी करना होगा

क्योंकि
कान
प्रेमालापों को सुनने के
आदी हो गए हैं।



बचपन


ध्यान से देखो
इनका
बचपन
इन्हीं किताबों के
पन्नों
के बीच कहीं
दबा होगा।

आर्थ्रोपोड


जिस तरह से
तुम
छोटी छोटी
समस्याओं से घबराकर
झुक जाते हो।

मुझे डर है
तुम्हारी आने वाली नस्लें
बिना रीढ के
सबसे बड़े संघ में
शामिल ना हो जाएँ।

(आर्थ्रोपोडा यानि कीड़े
मकोड़े जन्तु जगत के
सबसे बड़े संघ का निर्माण करते है।)

मजदूर


दुनिया भर के
मजदूरो!
समय आ गया है,
 इकट्ठे हो जाओ!
जब भी
ऐसा
शोर सुनाई दे,
वो समय होता है
चुनावों का
या
मजदूर दिवस का।

गृह प्रवेश


नव-गृह प्रवेश
वास्तव में
एक घर से निकासी
होती है।

निकासी और प्रवेश
दो
समानान्तर प्रक्रियाएँ हैं।

ठूँठ


खेत की मेड़
पर
ये जो
ठूँठ तुम
देख रहे हो ना!
ये ठूँठ नहीं हैं,
बरसात की आस में
आँखों को
आसमान में टिकाए
खड़ी संभावना हैं।
जिसने अपने पैर
अभी भी
मजबूती से
जमीन में गाड़े हुए हैं।

सूने पड़े इस खेत में
ये ठूँठ
आशा का दूसरा नाम हैं।

आल इज वेल

पड़ोसी के लुटते
घर को
पूरा मोहल्ला
अपनी काँच लगी
खिड़कियों से
देखता रहा।

काँच ऐसे थे कि
जिनमें
अन्दर से बाहर तो
सब कुछ दिखाई देता था
पर बाहर वाले को
कुछ नज़र नहीं
आता भीतर।

(वहीं पडोसियों की
आँखें ऐसी थी कि
उन्हें अन्दर से बाहर का
कुछ नज़र नहीं आता था)

उन्होंने काँचों के साथ साथ
अपने कानों को भी
बन्द कर लिया था।
उधर लुटेरे फिर मिलेंगे का
वादा कर अपने पीछे
खबर छोड़ गए,
जिसे पूरा गाँव कल
चाय के साथ
पीने वाला था।

समय


समय रथ
अपने पहियों के नीचे
वर्तमान को
कुचलता हुआ
भविष्य होने जा रहा है।

तुम
इसकी गति को पहचानो
अन्यथा
यह वर्तमान का
अपहरण कर
छोड़ जाएगा पीछे
वर्तमान का भूत।

और उस रथ
की धूल से सना
तुम्हारा चेहरा
किसी को
पहचान न आएगा।

समय की
धूल ने बड़े बड़े
चेहरों को
धूमिल कर दिया है।