Sunday, September 2, 2018

तीसरा रास्ता



  नन्द किशोर नीलम

एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो-आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्री) का काम खेत की रखवाली करना होता है, पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘तीसरा रास्ता’ में यही संशय उमड़ता-घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.ओ. का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्ति, जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं, शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के, समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है...वह कहता है...
‘क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ’  वह आगे कहता है...‘बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’  पृ..21इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई न कोई स्त्री हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है, जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति, बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बी. की सहायक मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्री की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा, अस्मिता, नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्री पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्री जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्री पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।यह उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्यशोषितों, पीड़ितों, दलितों, दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निष्क्रिय और उदासीन है, लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी-विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.ओ. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें...‘आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्र की हत्या कर दी है’ पृ..224‘एन.जी.ओ.वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं....आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं पृ..198समाज बदलने के व्यापक उद्दश्यों को छोड़कर...‘ये एन.जी.ओ. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ..198इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता है, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जल, जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जनसहभागिता से बनवाये जा रहे  बंधी निर्माण से खुश नहीं है, उसके धन व वर्चस्व का सारा खेल बड़े बांध खड़े होने में है।वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिस? नेता, और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधा, विजयकीर्ति भाई, निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाए? लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सŸारवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में ‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ..222। यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डर, हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।इस उपन्यास का शीर्षक ‘तीसरा रास्ता’ देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह  उपन्यासकार भी एक ‘तीसरा रास्ता’ बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सŸाा और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंाड तीसरा रास्ता में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवाना, हत्या की राजनीति का पैरोकार होना, बाद में एन.जी.ओ. चलाना और अपने भ्रष्ट व्यभिचारी चरित्र को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ‘तीसरा विकल्प’ या ‘तीसरा रास्ता’ बचा है? क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? क्या सघंर्ष और प्रतिरोधी चेतना पर ‘धन’ और ‘आध्यात्म’ ने आधिपत्य कायम कर लिया है? क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्र फलीभूत हो चुका है? ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की ‘जय’ है या ‘पराजय’ तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।डी.बी. का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों, संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ‘तीसरा रास्ता’ तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया है? बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए ‘तीसरे रास्ते’ का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता है, जहां न तर्क चलता है न कानून। यहां तमाम धार्मिक व कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारे और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव व ऊभ-चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है, यही इस उपन्यास की सफलता है।उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत न होगा।...‘हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ..33‘अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह खूनी क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ..35‘डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ..39‘तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.ओ. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ..64‘वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है। पृृ..106‘सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116‘बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगा... यदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्र व प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरशाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।’‘प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं...। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193‘आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ.....224‘यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्र में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227 हंस कथा मासिक...फरवरी..2010 पृ....84-85
समीक्ष्य कृति... तीसरा रास्ता
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड
वाराणसी, 221010
मूल्य...225.00 फोन...(91-542)2314060



सोनभद्र प्राचीन


इतिहास...
सोनभद्र के अतीत का ऐतिहासिक अध्ययन.....

 ‘सोनभद्र प्राचीन’

इतिहास के साथ चलते  हुए

वे सभ्य हेैं,इसलिए हमारे यहां आयेंगे
सभ्य से सभ्यतर बन जायें इसलिए
हमे उजाड़ देंगे
मैने पूछा था विजयगढ़ किले की
खंडहराती दीवारों से 
पार्टनर तुम उजड़ क्यों गये
तुम पुरातत्व ही नहीं इतिहास भी हो
इतिहास उजड़ता नहीं 
कुछ पागलों को छोड़ो
वे कहते है इतिहास उजड़ चुका है
हँसते हुए दीवारों ने बताया था
यह मुझसे नहीं वर्तमान से पूछो
जो मुंह फुलाये बैठा है
अतीत बनने के लिए
अतीत देखिए पर अपनी आँख से

अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य केरूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है 
तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के 
अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के    पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे  मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था।
पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त करते हुए वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। 
पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने जन-प्रतिनिधियों का चयन करना होगा जिससे कि सरकारें जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हों। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से  किया गया ह ैकि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? किसी भी सरकार का मुख्य कार्य होता है कानून व्यवस्था का जनहितकारी प्रबंधन, वह सरकार चाहे जिस काल की हो, काल का कोई फर्क नहीं पड़ता। कानून व्यवस्था के प्रबंधन के आधार पर ही सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने का प्रयास किया जाना चाहिए, ऐसा ही प्रयास करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल?
प्रकाशक: असुविधा, अक्षर घर, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र 231216 उ. प्र. संस्करण: प्रथम 2017, मूल्य: 150 रूपये.




shivendra

हरियल की लकड़ी


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सीमांत की संघर्ष-गाथा ‘हरियल की लकड़ी’

               हरियल की लकड़ी
                                             अरविन्द चतुर्वेद

दुनिया के जिस ‘सबसे बड़े लोकतंत्रा’ में हम रहते हैं, आज़ादी के अठ्ठावन साल बाद आज भी सीमांत पर कई ऐसी जिन्दगियां हैं जिन्हें आज़ादी की रोशनी मयस्सर नहीं, उलटे तंत्रा के शिकंजे में वे छटपटा रही हैं। विकास की संजीवनी तो खैर उन्हें क्या मिले, विडंबना ही है कि विकास की मार ने उनका जीना दूभर कर रखा है। ये सीमांत के दूर-दराज के जंगली गॉव भी हो सकते हैं और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियां या फुटपाथी जिन्दगी भी।
कथाकार रामनाथ शिवेन्द्र के हाल ही में आये उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में जिस तरह से सीमांत की जीवन गाथा उपस्थित हुई है वह भौगोलिक रूप से भी उत्तर-प्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी सीमांत है। सोनभद्र जनपद के रूप में वही सीमांत है जो कोयला, सीमेन्ट, अल्युमिनियम की बदौलत औद्योगिक अंचल और बिजली कारखानों के चलते ऊर्जा राजधानी जैसे चमकदार जुमले से संबोधित किया जाता है तो दूसरी ओर इसी सीमांत पर विकास की मारी, विस्थापन से धकियाई हुई वह ग्रामीण जंगली बस्तियां हैं जो अपने अ-विकास में अचल हैं और प्रशासनिक अंधेरगर्दी, लूट,खसोट तथा बहुस्तरीय दैहिक-मानसिक शोषण की स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं। छब्बीस उपशीर्षकों में विन्यस्त उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में इसी ग्रामीण आदिवासी ज़िन्दगी की संघर्ष गाथा को उसकी अनेक गूंज-अनुगूंज के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहना न होगा कि बहुत हद तक इसमें उपन्यासकार को सफलता मिली है। वैश्वीकरण के जिस अभियान में विकास की दंुदुभी बजाई जा रही है उसकी असलियत जाननी हो तो सीमांत के परिवेश का जायजा लेने से उसका खोखलापन अपने आप उजागर हो जाता है। इस उपन्यास में आये गॉव का जीवन परिवेश देखिए....
‘सदी का गुज़रना इस गॉव से गायब था। यहां परंपरायें थीं, उनका दबाव था। दूसरी कोई चीज थी तो वह था जंगल, नदी नाले पहाड़। जंगल में महुआ, करवन, बेर, हर्रा, बहेरा जैसे कुछ जंगली फल-फूल थे। जिन्हें अपने उपयोग के लिए प्रयोग में लाना कानून प्रतिबंधित और दण्डित करता था। गॉव हजारों साल की परंपराओं में वह गॉव कुछ इस तरह ढंका था कि नई सदी का वहां कहीं अता-पता न चलता था। एक तरफ धॉगरी बोलते हुए करम देवता खड़े थे तो दूसरी ओर मैदानी इलाके में राम, कृष्ण, शंकर जैसे देवता भी पुजहाई करवाने में कम न थे। हाल के सालों में कुछ नेताओं, परेताओं के नाम भी गॉव में घुस चुके हैं। (पृ.68)
उपन्यास की मुख्य कथा तो बस इतनी ही है कि चेरो जाति की आदिवासी युवती बसमतिया का पति जगदा पॉच साल पहले गॉव छोड़कर कहीं चला गया है। न वह लौटा, न उसने इस बीच अपनी कोई खबर दी। लेकिन बसमतिया है कि अपनी बूढ़ी विधवा सास के साथ रह कर मेहनत मजूरी करते हुए ज़िन्दगी बसर किये जा रही है। वह जवान है, आकर्षक है, मेहनती है, और चाहे तो अपने जाति समाज के मुताबिक किसी दूसरे युवक के साथ ‘सलट’ कर ज़िन्दगी की नई पारी भी शुरू कर सकती है। लेकिन वह जगदा के लौटने का इन्तजार करती है। जगदा वापस आ जाये इसके लिए ‘छठ’ का ब्रत रखती है, ‘करम’ देवता से मनौती करती है। वह जगदा और उसकी स्मृतियों को ‘हारिल की लकड़ी’ की तरह थामेे हुई है, जकड़े हुई है।
सीमांत की ज़िन्दगी का अर्थिक संघर्ष कितना गहरा है उपन्यास में आया विवरण द्रष्टव्य है-कृ
‘चेरवान के परिवारों की संख्या चालीस थी तथा धॉगर कुल पैंतालिस परिवार थे, अहीर जो लगभग भूमिहीन थे उनकी संख्या चार परिवार की थी। भूमिहीन व गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले इन परिवारों के बच्चे स्कूल न जाते थे। बहुतायत लोगों के पास बंधी में ली गई जमीनों के एवज में चौदह-चौदह बिस्वों के दिए गये छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थे। गॉव के भूमिहीन जंगल विभाग के कामों पर सब्बल, गैंता, फावड़ा चलाते और औरतें टोकरियॉ ढोतीं। कभी जंगल में उन्हें वृक्षारोपण का काम भी मिल जाता।’
लेकिन जिस बसमतिया की जिन्दगी दागों वाली दुनिया की न थी, वह जल की तरह चमकदार थी और पारदर्शी भी।’ पृ..54
उसकी स्थिति दूसरों से इस मायने में भिन्न है कि आर्थिक अभाव के साथ ही उसका जीवन भवनात्मक अभाव से भी ग्रसित है। इसलिए यह बहुत ही स्वाभाविक है कि... 
‘बसमतिया वर्तमान में जीने वाली औरत थी। उसके पास न तो अतीत की आनददायक स्मृतियॉ थीं और न ही भविष्य का मनोरम सपना था’ पृ.127
तो क्या बसमतिया के अन्दर इच्छा-आकांक्षा न थी, राग-अनुराग न था, या वह 
हाड़-मांस की नहीं बनी थी? रात के एकांत में अपनी मायके में भउजाई के साथ 
सोई बसमतिया कहती है...
‘भउजी जबसे तुम्हारा घर से ननदोई भागा है तबसे जाने क्या हुआ कि मेरी देह 
भी उसके साथ चली गई है। समझ में नहीं आता कि देह कैसे चली गई, मेरी 
खुशियां लेकर, मुई देह भी गुसिया गई है मुझ पर’पृ.52
यानि एक तरह से पति-परित्यक्ता, युवा बसमतिया जिस तरह की परिस्थितियों का शिकार है, उसमें किसी भी तरह उसकी ज़िन्दगी निरापद नहीं है। वह जिस मालिक के काम पर जाती है, एक मौका पाकर वह उसे दबोच लेता है। संघर्ष करके बसमतिया उसके चंगुल से निकल भागती है, और दुबारा फिर उसके काम पर नहीं जाती। बसमतिया के जेठ की भी उस पर बुरी निगाह है। अव्वल तो वह चाहता है कि बसमतिया किसी के साथ ‘सलट’ कर दफा हो जाये तो जगदा के हिस्से की जरा सी जमीन उसे मिल जाये या फिर बसमतिया उसके अवैध संरक्षण में रहने लगे। लेकिन बसमतिया कठिन जिन्दगी जीते हुए भी टूटती नहीं। यथा संभव न्यूनतम जरूरतों और शर्तों पर जिन्दगी जीती है, लेकिन जेठ तथा मालिक जैसे बदनीयत लोगों के लिए वह सर्वथा अलभ्य बनी रहती है।
बसमतिया का पति भगोड़ा निकला जरूर लकिन बसमतिया परिस्थितियों के अंधड़ में सूखे पत्तों की तरह उड़ जाने वाली स्त्राी नहीं है। उसका जीवन रिक्त है और उसकी मन‘स्थिति को बड़ी बारीकी से उकेरने में लेखक ने पर्याप्त दक्षता का परिचय दिया है पर असल चीज है बसमतिया का जीवट, वह चट्टानी दृढ़ता, जो हर तरह के आर्थिक, मानसिक हरहराते अभावों के आगे पराभूत होना नहीं जानती। इसी ने बसमतिया के व्यक्तित्व को चमकदार बनाया है। लेकिन यहां यह कहना भी जरूरी है कि ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास को स्त्राी विमर्श के खाते में डालकर ‘रिड्यूस’ नहीं किया जा सकता। दरअसल यह उपन्यास सीमांत की जिन्दगी जी रहे लोगों के संघर्ष और जिजीविशा की बिडंबनापूर्ण दास्तान तो है ही, साथ ही बचे-खुचे सामंती अवशेषो, पूंजीवाद के हमलावर चरित्रा और जनतंत्रा को अप्रासंगिक बनाने पर आमादा भष्ट, क्रूर प्रशासनिक व्यवस्था तथा विकास की इकहरी प्रक्रिया के दुःपरिणामों को उजागर करता एक खौलता कथा-दस्तावेज भी है।
बसमतिया उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा तो है लेकिन एक ऐसा पुल भी है जिस पर से होकर उसके मायके और ससुराल की ग्रामीण जिन्दगी की सीमांत चुनौतियां और संघर्ष अनेक रूपों में आवाजाही करते हैं। उसके बाप ने कभी सरकारी सहायता के तहत भैंस ली थी जिसके एवज में देय बैंक का कर्ज दो हजार से बढ़कर आठ हजार रुपये हो जाता है। यह कर्ज भी एक नेता की कागजी   धोखा-धड़ी की देन है जिसका शिकार उसका अनपढ़ बाप बनता है। बाप को जेल न जाना पड़े और किसी तरह कर्ज से छुटकारा मिले इसके लिए गॉव के सीधे-सादे दूसरे कर्जदारों के साथ बसमतिया को बैंक और कचहरी का चक्कर लगाना पड़ता है। बसमतिया की गॉव की सहेली ननकी का दूर का एक रिष्तेदार देवनाथ डूबते को तिनके का सहारा जैसा वकील मिल जाता है और हालांकि बसमतिया का बाप जेल जाने से बच जाता है, उपभोक्ता फोरम के माध्यम से मुकदमा जीतने के कारण उसे कर्ज से मुक्ति भी मिल जाती है। फिर भी रोज कमाने खाने वालों के लिए बैंक-कचहरी का चक्कर अपने आप में कितना बड़ा संघर्ष है, यह वकील देवनाथ से बसमतिया की इस जिज्ञासा व चिन्ता से समझा जा सकता है..
‘फैसला कब तक हो जाएगा वकील साहब! यहां आओ तो सत्तर अस्सी रुपया खरच हो जाता है, दो दिन का नुकसान अलग से। रोज कमाओ खाओ नहीं तो फांका’   पृ.159।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लूटतंत्रा का शिकार होकर सरकारी अनुदान, सहायता और बैंक कर्ज आदि के जरिए सीमांत की जिन्दगियां जहां जाल में फंसकर छटपटाती हैं, वहीं औद्योगिकरण और इकहरे विकास की प्रवंचना भी उन्हीं के हिस्से आती है/
‘गॉव के आकाश का सूरज, गॉव के हिस्से की जमीन, धूप हवा, जंगल, पहाड़ सभी कुछ गॉव में होते हुए भी गॉव से बाहर थे उन पर दूसरों का कब्जा था। नदी का पानी दूर जाकर नहर में गिरता था जिससे गॉव का रिश्ता नहीं। गॉव का पहाड़ टूट-टूट कर ढोंका, पटिया, चूना, सीमेन्ट, अल्युमिनियम बनता था, जंगल कटकर पलंग, कुर्सी,मेज, किवाड़ वगैरह में ढलता था पर बसमतिया का मायकाकृबिना नहर वाला, बिना कुर्सी वाला, बिना सीमेन्ट वाला था जो आज भी है। इतिहास की बनती बिगड़ती स्थितियों ने कभी भी इस गॉव का भला नहीं किया’ पृ..73-74।
उपन्यास का अंत सचमुच विचलित कर देने वाला है। गॉव के पंडितों के मन मुताबिक ग्रामसभा का काम न होने के कारण वे भूमिहीनों और मजदूर तबके के लोगों का साथ देने वाले ग्रामप्रधान के खिलाफ हैं। अंततः गॉव के भूमिपति यानि पंडित वन विभाग के रंेजर के साथ मिलकर प्रधान व भूमिहीन ग्रामीणों के खिलाफ साजिश रचते हैं। रेजर की अगुवाई में वन विभाग वाले जंगल की जमीन पर कब्जा का बहाना बना कर उनकी झोपड़ियां उजाड़ते हैं, आग लगा देते हैं, विरोध करने वालों को खदेड़कर पकड़ ले जाते हैं। रेंजर आफिस पर खुद लकड़ी के गोदाम में आग लगवाकर रेजर, गॉव वालों को आरोपी बनाता है। यह सारी कार्यवाई रात में होती है। बसमतिया और रज्जो के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। इस बर्बर दमनात्मक कार्यवाई के बाद प्रधान समेत पकड़े गये ग्रामीणों को गिरफ्तार कराके जेल भेज दिया जाता है। पक्ष विपक्ष में खबरे छपती हैं, चूंकि वकील देवनाथ भी ग्रामीणों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार होता है इसलिए वकीलों की हड़ताल और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के धरना प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक बार फिर मामला जॉच और कचहरी की पेचीदा गलियों में चला जाता है। विचलित कर देने वाले दमन और षडयंत्रा के गर्भ में जिस तरह के विस्फोट के मुहाने पर जाकर उपन्यास खत्म होता है, वहां हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और इसकी उपलब्धियों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह स्वयमेव खड़ा हो जाता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के गाए जा रहे भारतीय सोहर के सामने यह उपन्यास एक ऐसा शोकगीत है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता। 

परिचय (साहित्यिक पत्रिकाक) 
अंक 06 पृ...107-110
हंस मासिक पत्रिका
समीक्ष्य कृति- हरियल की लकड़ी’ (उपन्यास)
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन,
नेता जी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली, 110002
मूल्य-195.00 सन्- 2006


          
                  


          







दूसरी परम्परा


                                                                mobile....07376900866
 ग्राम्य जीवन का कथात्मक रूपान्तरण-
               
                 दूसरी परंपरा (कहानी संग्रह)

कथा साहित्य की शास्त्राीय आलोचना, समीक्षा, तथा विधा के बारे में बातें करना बहुत सहज नहीं इस संदर्भ में केवल इतना ही कहा जा सकता हे कि प्रस्तुत संकलन में आये प्रमुख या गौड़ कथा पात्रों से सीधे संवाद किया जा सकता है लंकिन ये कथा पात्रा शहरों, महा नगरों के नहीं हैं न ही प्रस्तुत संकलन में आपको कहीं दिखेंगे। प्रस्तुत कथा संग्रह के कथा पात्रों से मिलने तथा संवाद करने के लिए आपको गॉवों की तरफ जाना पड़ेगा, पहीं जाकर उनसे संवाद करने की तकलीफ आपको उठनी पड़ेगी। अगर ऐसा मन है आपका तो आप गॉव जा सकते हैं या समय का अभाव हो तो संग्रह की कथाओं को पड़ कर भा आभास हो सकता है कि आप गॉव में किसी पनघट, पोखर या तालाब के पास।
प्रस्तुत संग्रह में ‘दूसरी परंपरा, नोरा व कोरा, कोस्र की किताबें, आपद धर्म ,कागज पर मकान,, रक्त संबध, यह जो शिवलाल है, नामांतरण, उपकरण,, श्रद्धांजलि, गढ़, तथा  ड्राइंग डिक्लेरेशन जैसी कुल तेरह कहानियॉ संग्रहीत हैं। कहानियों के पात्रा अपने समय तथा समाज से संवाद करते हैं। सवाल यह भी है कि सभ्य समाज बनाने वाले सपने गॉवों की मेड़ों तक पहुंच रहे हैं कि नहीे, कैसा है लोकतंत्रा, कैसा है कल्याणकारी राज्य, इस लोक राज्य में आपसी सहभ्ीाागिता कितनी है और नहीं है तो कारण क्या हैं? कारण साफ है कि हमारा लोक ही आपस में बटा हुआ है। कानून और व्यवस्था की स्थापना के लिए लोक को कई कई संस्तरों पर बांटा जा रहा, जाति, धर्म, गोत्रा जैसे तत्वों को आगे करके उसे महत्वपूर्ण नहीं बनाया जा रहा। इन सभी विषयों पर आपको  नये तेवर का विमर्श संग्रह में मिलेगा।आज हमारी संहनशीलतायें व दृढ़तायें टूट रही हैं जिसे नहीं टूटनी चाहिए हर हाल में मानवीय समीपतायें बची रहनी चाहिए तभी आदमी बचेगा तथा हमारा लोकतंत्रा भी। संग्रह की सारी कहानियॉ मनुष्यता के पक्ष में खड़ी हो कर खुद से सवाल करती हुई आगे विस्तारित होती हैं।
पिलग्रिम्स प्रकाशन (प्रकाशन...2010)
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्डवाराणसी, 221010  मूल्य....150.00






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दूसरी आजादी


दूसरी आजादी 
रामनाथ शिवेंद्र 

कुछ अपनी बातें 

दूसरी आजादी का कथानक उन हसीन सपनों से  उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर  १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते  रहे है। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को  काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे  जमीन पर उतरे। आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र मीरजापुर जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे  कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजो  के समय यह हिस्सा अनुसूचित  हिस्सा था, जहां केवल  फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून लागु थे जो  यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते  ही यहां के पारम्परिक कानूनों को  समाप्त कर दिया गया। अबतो सोनभद्र  एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैऊँची ऊँची  चिमनियां है तो लाखों की संख्या  में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम  सेनानी  भी है ं तथा बाकिया ें के परिजन भी है. उनसे  मिल कर आजादी की जो  तस्वीर उभरती है तथा दूसरी  आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वहीदूसरी  आजादी उपन्यास का कथानक है। वैसे  यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के ५७ प्रतिशत भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और प्रति व्यक्ति भूमिधारिता एक बीघे के  कुछ भाग तक सीमित है। खाद्यान्न की उपलब्धता पांच सौ ग्राम से भी कम है। वन विभाग की जमीन्दाराना गतिविधियो ं के दंश और प्रताडना को देख कर कोई  भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के  प्रति निष्ठुर हो जाये तो अचरज की बात नही ।
सोनभद्र मे  आपात काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मै  गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मै ंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि वितरण के  सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सु मिरिनी जिस तरह से  राज व्यवस्था व सवर्ण समाज से  मुठभेड़ करती है और वह भी आपात काल के दौर में जब दलित साहित्य का कही ं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन प्रबन्धन के खिलाफ स ंघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास की नायिका है उसके स घर्षो  को भी उल्लिखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन स े टकराती है फलस्वरूप प्रबन्धन उसे जेल  भिजवा दिया जाता है।
मै आभारी ह ूं पिलग्रिम्स प्रकाशन का तथा भाई गो पाल ठाकुर एवं स ुरेश जायसवाल जी का जिनके सहयो ग से २००८ मे ं ‘डफली बजाये जा’ कहानी स ंग्रह प्रकाशित हुआ तथा ‘तीसरा रास्ता’ उपन्यास भी।
‘तीसरा रास्त’ा उपन्यास के माध्यम स े देश मे ं जड़ जमाये एन. जी. ओ. की कार्य संस्कृति  और परणति को देखने समझने का प्रयास किया गया है। दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें ता े कम स े कम आजाद और जनतांत्रिक भारत मे ं वर्ण, स्त्री और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल है ं, जिनसे  साहित्यकर्मी लगातार टकराते  रहे है । हालांकि यह सच है कि इन सवालो से  टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्ट जो खुद को साबित कर सकें उन  लोगों  के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलो च्य विषय है तो पाठ्य विषय भी। वे ही अख डित है ं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दू सरा पाठ रचते है तो दू सरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी है ं। वे साहित्य का द्वन्द है तो अन्तर्द्वन्द भी। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि
हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक है ं, ब्रह्म है ं तथा साहित्य के प्रजनन श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे  कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका रूप स ंसद की तरह है, उसमें हासिए पर पडा  कोई अदना कैसे  दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शा ेषित, यातनाग्रस्त, प्रताडित वर्ग समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग स े। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना हा ेगी और वह यथार्थ कल्पना का यथार्थ होगा शिल्प और भाषा स े सजा-स ंवरा चू मने चाटने लायक।
वैस े आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति , वैश्वीकरण, अणुबम स ंस्ति सामाजिक वानिकी को चाह े जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप स े प्रकट हुई है वह है अपनी पीठ ठा ेंकन े की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध है ं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरा ें की तलाश म ें है। एक बार फिर याद दिलाना चाहूंगा कि हम वर्ण 1⁄4धर्म, जाति, गोत्र1⁄2 सम्पत्ति व ी के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सा ेच रहे है ं और खुद को परिवर्तित हा ेने स े बचा रहे है ं। यदि कुछ कर भी रहे है ं तो आ ंख मारन े जैसा ही। मै ं साफ तौर स े कहना चाहू ंगा कि उपन्यास और कहानियो ं के लिए विषय का चुनाव मेरे लिए जटिल मामला है, कदाचित यह जटिल न भी होता, यदि मै ं नागर समाज का होता। गंवई आदमी होन े के नाते म ेरी सोच भी गंवई है। फलस्वरूप मै ं सोच नहीं पाता कि एक सक्रिय स्त्री प्रजनन के नैसर्गिक गुण स े अपन े को मुक्त कर लें। दैहिक सम्बन्धो ं के लिय े मित्रतापूर्ण सम्बन्धो ं को धोखा ें और वादाखिलाफी से गढ़ े। सम्पत्ति, वर्ण और अपनी अस्मिता के लिए स ंघर्षरत नारी मुझ े प्रभावित करती है और ए ेसी नारियां ही कथा पात्री है ं। मेरे लिए अपने मित्रतापूर्ण सम्बन्धो ं का निर्वाह करते हुए उसके स ुखों, दुखा ें को भोगत े हुए तथा अपन े सहभागिता पूर्ण सम्बन्धों को प्रमाणित करते हुए कि व े वादा खिलाफ और धोखेबाज नहीं है। देह उनक े लिए सगुण समाधि है, न कि निर्गु ण मोक्ष। सम्पत्ति के सवाल पर मै ं आज भी भूमि प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हा ें, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। हरियल की लकड़ी, सहपुरवा, तीसरा रास्ता और मेरा यह चौथा उपन्यास द ूसरी आजादी धोख े पूर्ण भूमि-प्रबन्धन पर सवाल उठाते है ं।
मै ं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आजादी में कुछ इसी तरह की बहस स े आप रूबरू हा ेंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा,
दूसरी आजादी उपन्यास की सगुण या निर्गु ण आलो चना के लिए आपकी प्रतिक्षा में-
2009 रामनाथ शिवेन्द्र
मकर स ंक्राति अक्षर घर, हर्ष नगर, पूरब मोंहाल,, रार्बट्सगंज 1⁄4सोनभद्र1⁄2 231216
मो..7376900866




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डफली बजाए जा


                                                                 mobile...7376900866

मानवीय समीपताओं की तलाश करती कहानियॉ-

       ‘डफली बजाये जा’ कहानी संग्रह

‘डफली बजाये जा’ संग्रह की सभी कहानियॉ डफली की थाप से निकलने वाली सुरम्य आवाज़ एक तरफ निराशा के दमघोंटू कुहांसे से मुक्त होने का सन्देश देती हैं तो दूसरी तरफ संवेदनाओं के सात्विक भाव से मानवता को पुष्पित पल्लवित कर करने की पूरी कोशिश करती हैै। आज जीवन के हर पक्ष पर अंधकार का संक्रमण है। ‘डफली बजाये जा’ कहानी संग्रह की ये कहानियां हिन्दी साहित्य पर छा रहे कुहासे में एक अदत चिराग जलाने की भूमिका अदा करने के साथ ही वैचारिक द्वन्द के पश्चात सार्थक राह सुझाने में समर्थ हैं। संग्रह की कहानियॉ ग्रामीण जीवन के यथार्थ को नये शिल्प व शैली में प्रस्तुत करती है। संग्रह में कुल बारह कहानियॉ ‘डफली बजाये जा’ हम तुम्हें खोना नहीं चाहते कामरेड,वापसी लिफाफा, मैं उगती नहीं पार्टनर, दोस्त की चन्द्रकांता, साले बन्द कर किस्सा कहानी, समृति दंश, इस शहर में कभी रहते थे हबीब भाई, स्मृति दंश, जागरण, अजीब है दिल्ली, आखिर क्या है निशा का पक्ष जैसी कहानियॉ संग्रहीत है जो समय से संवाद करती हुई हैं तो समय के साथ संघर्ष भी करती हैं। प्रस्तुत कहानियॉ सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक मानवीय संबधों का लेखा जोखा प्रस्तुत करने के साथ साथ हर हाल में मानवीय समीपतायें बनाये रखने के लिए सार्थक व परिणामकारी परिवेश का निर्माण भी करती चलती हैं। 
इन कहालियों के विषय वस्तु पूरी तरह से ग्रामीण हैं, उन विषयों में लोक-संस्कृति तथा लोक मन का काव्यात्मक भाषा में वर्णन प्रभावित करता है जिसे पढ़ते हुए तथा उन्हें आत्म सात करते हुए किसी खास लम्बी कविता का आभास होता है। कथा संग्रह अनिवार्य रूप से पड़ा जाना चाहिए। 
प्रकाशक- पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी, 221010  मूल्य....150.00



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अंतर गाथा



साखी अंक 35 में प्रकाशित समीक्षा
उपन्यास अंतर्गाथा
प्रकाशक--शिल्पायन, दिल्ली
रामनाथ शिवेंद्र


स्वाती सिंह
missswatisingh115@gmail.co
'व्यष्टि से समस्टि तक की यात्रा'
रामनाथ शिवेन्द्र सोनभद्र की मिट्टी में जन्मा वह साहित्यिक नाम है जो चन्दौली, बनारस समेत समस्त पूर्वांचल की सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों को रचनात्मक कलेवर प्रदान करता है। उच्च शिक्षा बनारस में होने के कारण बनारसी संस्कृति एवं मिजाज उनके भाषात्मक गढ़न से मिलकर अपने समय से मजबूत अंतर्क्रियात्मक सम्बन्ध स्थापित करते हैं। सन् 2015 में प्रकाशित उनके उपन्यास 'अंतर्गाथा' की बात करें तो यह उपन्यास अपने शीर्षक के अनुरूप ही अनेक गाथाओं का समुच्चय बनकर उभरता है जिसमें ये गायाएं एक-दूसरे के भीतर से निकलती, उनका विभेद करती और पुनः उसी में समायी हुई सी जान पड़ती हैं। ये गाथाएं समाज के सामान्य जन-जीवन के बीच से ही निकलकर साधारण चरित्रों की रोजमर्रा के आश्रय में आकार लेती हैं। उपन्यास का कलेवर काफी विस्तृत है जो बनारस की मुख्य कथाभूमि से निकलकर लखनऊ और बम्बई तक की सैर कराता है। महानगरीय संस्कृति की धमक और जनसाधारण पर इसका प्रभाव सभी यहाँ उभर कर आये हैं। काशी में ऐतिहासिक अस्सी घाट के सुप्रसिद्ध पप्पू चाय की दुकान अपने सर्वविदित मन-मिजाज के अनुरूप ही विश्वविद्यालयी एवं शहरी गतिविधियों समेत देश-विदेश के मुद्दों पर संसदीय बहसों का सक्रिय केन्द्र है। यूनिवर्सिटी के मानिन्द प्रोफेसर प्रवासीनाथ, कवि विलोचन, कामरेड एल. आर.,जगेसर, अमरेन्दर आदि इसके सक्रिय ग्राहक हैं। उपन्यास में विश्वविद्यालयी गतिविधियाँ हैं, साहित्यिक जन-जीवन है, बौद्धिक परिवेश के बीच नारकीय ढंग का प्रेम सम्बन्ध भी है। झूठ, फरेब, धोखा, आक्रोश, धरना, हत्या, आत्महत्या, अनैतिक सम्बन्ध, ओछी गलाकाट राजनीति सब कुछ है लेकिन इन सबसे निकलकर बाहर आती सहयोग की भूमिका और हर परिस्थिति में अपने-अपनों को उबार लेने की सिद्दत महत्वपूर्ण है।
उपन्यास की कहानी सुशीला, अमरेन्दर और प्रवासीनाथ के त्रिकोण से प्रारम्भ होती है जहाँ सुशीला और अमरेन्दर प्रवासीनाथ के शोध छात्र है। प्रवासीनाय यूनिवर्सिटी के सक्रिय लेखक एवं साहित्यकार हैं। उनके बौद्धिक मिजाज के भीतर एक जादुई व्यक्तित्व छिपा है जो किसी भी उम्र के स्त्री मन को आकर्षित करने में सिद्धहस्त है। इनके इस रंगीन मिजाज की छाया पूरे उपन्यास में शुरू से आखिर तक है जो अंततः उन्हें मानसिक विक्षिप्तता की ओर ले जाती है। इनके संस्मरणों की चर्चाएँ पप्पू चाय की दुकान की एक जरूरी चीज है, जहाँ वेरोक-टोक के लोग अपने भीतर के समस्त आवेगों को निर्लिप्त भाव से साझा करते हैं। बनारसीपन इन चर्चाओं में खूब उभरकर आया है।
उपन्यास कामरेडों और बुद्धजीवियों की जमात का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ विशेष चरित्रों के साथ ही अपनी पूरी कथा यात्रा तय करता है और उनके बीच से निकलकर सुशीला के व्यक्तित्व के भीतर ही अपना वजूद तलाशता है। लेखक ने सुशीला के व्यक्तित्व को उपन्यास के केन्द्रीय तत्व के रूप में रखा है जहाँ उसका व्यक्तित्वांतरण महत्वपूर्ण है। एक तरह से देखें तो यह रूपांतरण 'देह से देहातीत' होने की यात्रा है या यूँ कहें सम्भोग से समाधि' तक की यात्रा देह के आवेगों में उलझकर अपने आत्म से विरक्त हो प्रवासीनाथ कवि विलोचन, गीतकार, अमरेन्दर, जाने कितने ही नामों से होते हुए देहशास्त्र की जटिल संरचना से बाहर निकल आना और अपने आत्म को स्वीकारना यहाँ एक बड़ी चुनौती के रूप में साकार हुआ है।
हाँ, इस साकार में सुशीला बहुत बार टूटी है, कुठित हुई है, निराश हो अनिर्णय की स्थिति तक गई है लेकिन अंततः वह अमरेन्दर के प्रकरण में कहती है, "मैं किसी भी पुरुष को अपने तन और मन का मालिक नहीं बना सकती... अब में तन और मन दोनों से मुक्त होना चाहती हूँ।" इस मुक्ति प्रसंग में वह विलोचन, प्रवासीनाथ, गीतकार और अमरेन्दर के छद्म प्रेम से निकलकर प्रेम की असल जगह तलाशती है। अब उसे पूरा जवार प्रेम करता है, गुलाविया प्रेम करती है, उसका परिवार प्रेम करता है, स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे प्रेम करते हैं। अमरेन्दर के विवाह प्रस्ताव पर वह बेलोस कहती है, "मैं न कुण्ठित हूँ, न निराश। केवल यह है कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिये, न धन, न मान, न ही दूसरी सुखानुभूतिया  मैं समझती हूँ इन सुखानुभूतियों के लिये विवाह सरस और विश्वसनीय माध्यम है जबकि मुझे सुखानुभूतियो से कुछ लेना-देना नहीं में देह की क्रिया-प्रतिक्रिया के लिये अपने दिमाग को निष्क्रिय नहीं बना सकती।"
सुशीला की इस नकार में निश्चित रूप में शिवेन्द्र जी उस निर्मित को खारिज करते हैं जहाँ पुंसवादी प्रेम के खांचों में स्त्री देहरूप में अपनी उपादेयता सिद्ध करती चली आयी है। सुशीला को यह उपादेयता अमरेन्दर के संदर्भ में सबसे अधिक आहत करती है क्योंकि अपने प्रेमी में वह प्रेम के जिस विस्तार को पाना चाहती है वह उसे अमरेन्दर में नहीं दिखता। सुशीला को लेकर वह कन्फ्यूज्ड है। वह प्रेम के केन्द्रीय अक्ष पर नहीं वरन परिधि पर दिखाई देता है, अभी तक तन को ही मन समझता है। यहाँ सविता सिंह की यह लाइन विचारणीय है,
"किसे चाहिये स्त्री प्रेम के लिये, जहाँ साझा करना पड़ता है तन से ज्यादा मन का।"
शिवेन्द्र इस प्रेमहीनता की टोह लेते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ जीवन में अवश्य ही प्रेम की नैतिक या पवित्र से ज्यादा मानवीय और असली जगह खोजने की एक जद्दोजहद है। इस जद्दोजहद में वह इन सारे आवर्जनों ने निकलकर जीवन की एक सकारात्मक गति रचते हैं। विधायक के खिलाफ चुनाव लड़ने के फैसले में निश्चित रूप से एक ठहरे हुए जीवन की नकार है। यह नदी का वह प्रवाह है जो अविछिन्न है, अबाध है, तमाम तरह के गंदले विसर्जनों के बावजूद नितांत निर्मल है।
उपन्यास सुशीला की इस यात्रा के अलावा व्यक्ति जीवन के छोटे-बड़े तमाम समीकरणों को सामने रखता है जो समाज की चाल में अपना महत्वपूर्ण हस्तक्षेप रखते हैं। व्यक्ति की रोजमर्रा से निकलकर उपन्यास क्षेत्र समेत पूरे प्रदेश की राजनीतिक संरचना में आवाजाही करता हुआ दिखाई देता है। उपन्यास कुछ समय के लिये फ्लैश बैक में भी जाता है। जहाँ सन् 1960 में बंगाल में चारू मजूमदार के नेतृत्व में चल रही नक्सली गतिविधि और उससे जुड़ी स्मृति, उस दौर की याद को ताजा करने के साथ ही प्रवासीनाथ के एक और चेहरे को सामने रखता है जो जगेसर के पागलपन का गुनाहगार है। जगेसर एक अदना सा व्यक्ति है जो कामरेडियत के नशे में बंगाल जा चुका है और आजादी के इंतजार में दो-दो बार पागल हो चुका है लेकिन अभी अपनी पान की दुकान चलाता है और बहुतों को चूना लगाता है। शिवेन्द्र जी ने अंतर्गाथा में चाय-पान और ऐसे सार्वजनिक उपयोग के नुक्कड़नुमा जगहों का बखूबी उपयोग किया है जहाँ से कथा के छोटे-छोटे सूत्रों का संचालन होता है। उपन्यास का हर चरित्र किसी न किसी रूप में इन जगहों से संचालित दिखाई देता है। प्रवासीनाय कवि विलोचन, जद्दोभाई, एल. आर., अमरेन्दर, बंगाली बाबू की बिटिया आदि सभी मुख्य पात्रों की यहाँ आवाजाही है। इन सभी चरित्रों की अपनी कथा और अंतरकथा है, जिनका अंतगुंफन उपन्यास की महाकाव्यात्मक छवि को गढ़ता है। ये सभी चरित्र उपन्यास के आखिर तक अपने असर में दिखाई दिये हैं।
एल. आर. उर्फ लोटन राम उपन्यास का सबसे दिलचस्प और दिलेर चरित्र है। कामरेडियत का जामा पहनते ही लोटन राम एल. आर. में तब्दील हो गया। एम.एससी. पास एल. आर. को भी कामरेडियत के भूत ने बंगाल भगा दिया और वहाँ से लौटा तो जांबाजी और दबंगई लेकर एल. आर. की विशेषता यह है कि यह बेरोजगार है फिर भी अच्छे-अच्छों के काम चलाता है। कभी-कभी कोई पत्रिका निकाल देता है जिसमें कामरेडियत की चर्चा होती है। अमरेन्दर ने एल. आर. के खर्चे पर ही बनारस में रहकर पी.एचडी. की। एल. आर. फक्कड़ है मगर तार्किक व निष्पक्ष है और उपन्यास के हर घटित से जुड़ा है। सहयोग की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी है, लेकिन प्रेत बनकर पूरी दुनिया पर राज करने वाले एल. आर. के जीवन की विडम्बना यह है कि किसी लड़की ने उसे विवाह के योग्य नहीं समझा। उसके जीवन का यह असंतुलन उसके फक्कड़पन को और गाढ़ा करता है जिसे भांप कर ही प्रवासीनाथ जैसे लोग उसे निकम्मा समझते हैं। आधी उम्र बीत जाने के बाद एल. आर. का बंगाली बाबू की बिटिया के बारे में सोचना कि क्या उसके साथ जीवन बिताया जा सकता है...? और इस प्रश्न के सकारात्मक उत्तर में एल. आर. उसकी दुनियादारी, उसके अस्त-व्यस्त, बेतरतीब रखे किताबों ने जीवन को कहीं न कहीं करीने से संवारने की इच्छा का प्रस्फुटन ही है।
कुछ ऐसी ही नियति बंगाली बाबू की बिटिया उर्फ सीमा की भी है। उपन्यास के उत्तरार्ध में केवल एक बार उसके नाम (सीमा) का ज़िक्र आया है। सीमा समाज के छलावे की वह उपज है जो देह के आवेगों की स्वाभाविकता और इसकी नियति को कलंक नहीं मानती। इसके कइयों से जिस्माना संबंध है, प्रवासीनाथ उन्हीं में से एक हैं। सीमा और सुशीला दोनों ही में लेखक ने सक्रिय स्त्री का निहितार्थ रचा है। ये देह की परिधि के भीतर जकड़ी कुंद स्त्रियों का उदाहरण नहीं बनती बल्कि समाज की गतिकी में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करती हैं। लेखक द्वारा यहाँ देह सुचिता की नकार सर्वोपरि जाकर की गई है।
उपन्यास में सुशीला ओर सीमा के अतिरिक्त पूसी, जगेसर और जदो भाई की पत्नी के रूप में परम्परावादी स्त्रियाँ भी हैं जो अक्सर गाँव-जवार या परिवार में अपने पत्नीत्व का बखान बतियाते मिल जाती हैं। पत्नीत्व को गहने की तरह देह पर सजाये अपने पति के हित-साधन में जुटी ये औरतें अक्सर ही पूसी के रूप में लम्पट पति की चौकीदारी करते हुए सदमें में जीती हैं। फिर भी प्रवासीनाथ जैसे लोग नजरें बचाकर रासलीला रचाने से बाज नहीं आते क्योंकि उन्हें पता है कि पूसी जैसी औरतें मर्यादा की लाज ढोने के लिये ही बनी हैं। वह रोयेगी, चिल्लायेगी, रौद्रकाली बन जायेंगी लेकिन किसी भी स्थिति में उनसे तलाक नहीं लेगी।
उपन्यासकार ने 'अंतर्गाथा' में कुछ जरूरी चरित्रों को लेकर ही सम्पूर्ण कथा का वितान खड़ा किया है जिसमें बनारस का खिलंदड़ी व्यक्तित्व और सहयोगी प्रवृत्ति महत्त्वपूर्ण है। यहाँ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद सभी एक दूसरे के सहयोगी बनकर उभरते हैं। प्रकरण चाहे सुमित्रा हत्याकांड का हो, दलित बस्ती जलाये जाने का हो, प्रवासीनाथ के खिलाफ हुए एफ.आई.आर. का हो अथवा सुशीला के गाँव में उपजी विवादास्पद स्थिति एवं छात्र आन्दोलन का हो, सभी अपनी-अपनी तरफ से एड़ी-चोटी का जोर लगाने से नहीं चूकते।
उपन्यास का कुछ हिस्सा बम्बई में फिल्म निर्माण को लेकर एक अलग तरह की चकाचौंध से घनीभूत है। पूरे उपन्यास में मायानगरी और यहाँ बन रही सुशीला की फिल्म को लेकर लोलुप चर्चाएं हैं। साधारण जन से लेकर प्रवासीनाय जैसे बुद्धजीवी लोग भी इसके प्रभाव में हैं। फिल्म निर्माण से जुड़ा यह प्रकरण जहाँ एक ओर छोटे शहरों में बड़े शहरों के प्रभाव को दर्शाता है वहीं ये भी दिखाता है कि किसी कविता अथवा सुभाषित के किसी फिल्मी गीत में रूपांतरित हो जाने पर उसका कद कितना बढ़ जाता है। कवि विलोचन के मानसिक उहापोह में इस वस्तुस्थिति की वास्तविकता को देखा जा सकता है। उपन्यास में बम्बई प्रकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सुशीला के चरित्र का विकास बम्बई प्रकरण से ही निखर कर आया है जब वह गीतकार से मिलती है और उसके साथ बम्बई चली जाती है। बम्बई में वह फिल्म निर्माण से जुड़ती है जो उसके अब तक के जीवन से बिल्कुल अलग तरह का कार्यक्षेत्र है। इसी बीच गीतकार की आत्महत्या व पिता की मृत्यु से सुशीला का मोहभंग प्रारम्भ होता है। लेखक ने इन विपरीत स्थितियों का इस्तेमाल सुशीला के व्यक्तित्व को तराशने में किया है।
जहाँ सुशीला अपने भीतर के शून्य में बाहर निकलने के लिये अपनी जमीन, अपनी मिट्टी को तलाशती है और अपने गाँव को विकास की नयी योजनाओं से जोड़ती है। सुशीला का यह व्यक्तित्वांतरण उसके नायकत्व को अपूर्व दीप्ति प्रदान करता है जिसके समक्ष दलित और सवर्ण का भाव तिरोहित होता दिखाई दिया है। आचार्य सुदर्शन और गाँव के अन्य सवर्णों का निम्न जातीय सुशीला के परिवार के साथ बैठकर चाय पीना और गर्वान्वित महसूस करना यहाँ जाति भेद से निकलकर समतामूलक समाज के नैसर्गिक विकास का स्वीकार्य है।
सामाजिक गतिविधियों के साथ ही उपन्यास में तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य अपनी विश्वसनीयता के साथ अंकित है। विभिन्न पार्टियों के बीच की उठापटक विकृत राजनीतिक जोड़-तोड़, वोट बैंक की घृणित राजनीति और इन सबमें पिस रही मासूम जनता, दलित बस्ती के अनगिनत मजलूम जदो भाई ऐसे ही असहायों और दलितों की आवाज उनकी हिम्मत बनकर आते हैं जो नगर पालिका की जमीन पर अवैध रूप से बसे दलितों की जमीन के लिये उनके पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। एल. आर. के बाद जोभाई ही वह चरित्र है जो उपन्यास के अंत तक अपने आत्म के साथ बना रहता है। इस चरित्र में सादगी, भाईचारा, कर्मनिष्ठा, कौटिल्य बुद्धि और दबंगई सब कुछ है, साथ ही चरित्र की विशालता जो उन्हें सबसे अलग करती है। उपन्यास में उनका उम्दा राजनीतिक व्यक्तित्व प्रभावित करता है, जहाँ दलितों की लड़ाई की अगुवाई और उसके बाद हुई आगजनी में उन्हें जेल जाना पड़ता है। और वे जेल से ही चुनाव लड़ते हैं।
उपन्यास में शिवेन्द्र जी उग्र राजनीतिक परिवेश के भीतर छात्र आन्दोलन की अराजक स्थिति का विस्तृत चित्रांकन करते हुए यह भी दिखाते हैं कि कैसे राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे आन्दोलनों का अपने हित साधन के रूप में प्रयोग करती आई हैं। दलित वस्ती जलाये जाने पर जदो भाई के नेतृत्व में दलितों के हक की लड़ाई के रूप में आयोजित धरने का छात्रों के हाथ में जाकर पूर्णतः अनियंत्रित हो जाना और मनमाने ढंग से चलना बस्ती के मामले का प्रवासीनाथ का मामला बन जाना और उग्र परिवेश में लाठी, डंडे ओर गोलियों की बरसात होना। एल. आर. और जदो भाई के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज होना और अंततः मुख्यमंत्री द्वारा आगामी चुनाव में जदो भाई, एल. आर. और प्रवासीनाथ के मामले को चुनावी मुद्दा बनाना, यह सब कुछ इस छद्म राजनीति के घटक के रूप में सामने आता है। उपन्यास में धर्म की राजनीति और उसे साधने की कला का भी उधेड़ है। आचार्य सुदर्शन द्वारा मंदिर गिराया जाना इसी साधना की एक कड़ी मात्र है।
उपन्यास का उत्तरार्द्ध प्रभावशाली है। यहाँ हर चरित्र की उपादेयता अपने निहितार्थ को सिद्ध करने में लगी दिखाई देती है। यहाँ दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई बाहुबली विधायक और सुशीला के कॉलेज का मैनेजमेन्ट देखने वाले आचार्य सुदर्शन समर्थित एल. आर. के बीच पूरी तल्खी के साथ चित्रित हुई है। छात्र आन्दोलन यहाँ भी अपने उग्र एवं चिर प्रचलित तेवर के साथ दिखाई दिया है जो बाहुबली विधायक की गिरफ्तारी को लेकर सरकार पर हमलावर है। मौजूदा राजनीति यहाँ अपने यथार्थरूप में चित्रित है जहाँ सुशीला के आत्मसमर्पण, समूची
जनता के विद्रोह एवं हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद बाहुबली और माफिया टाइप नेता कानूनी न्याय की पकड़ के बाहर हैं।
उपन्यास के निहितार्थ की बात करें तो यह अपने समय और समाज के वास्तविक छवियों को गढ़ने में सफल रहा है। कल्पना की उड़ान को अपने समय के साथ साधते हुए तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों का यथार्थ उपन्यास के प्रभाव को गाढ़ा करता है। इन सारी स्थितियों-परिस्थितियों के बीच उपन्यासकार ने सुशीला के रूप में एक शक्तिपुंज को स्थापित किया है जो स्त्री संदर्भ में पुरूष समर्थित समाज की सोच को बदलने में सक्षम है। उपन्यास का सबसे बड़ा निहितार्थ तो यही है कि जो प्रवासीनाथ स्त्री को अब तक देह रूप में देखते चले आने के आदती थे वे अपने दिल और दिमाग के गहरे में उतरकर एक स्त्री को उसकी बौद्धिक गुणवत्ता के साथ उसकी निजता में स्वीकार करते हैं कि,
“अपने नये उपन्यास को वह सुशीला पर केन्द्रित करेंगे जहाँ वह एक ऐसी स्त्री का प्रतिनिधित्व करेगी जिसका अपना दिल, दिमाग और देह हो, स्त्री होने की पूरी विशेषताओं के साथ।"
प्रेम की बात करें तो आधुनिकतावादी संस्कृति में जीवन की जद्दोजहद और तनाव के बीच प्रेम को लेखक ने सेक्स और समझौते के बीच में ही रचा है। प्रेम स्वस्थ कहीं नहीं दिखता। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पूरी जमात के बीच भी प्रेम के अस्तित्व को तलाशना मुश्किल है। प्रेम की स्वस्थ परिणति केवल सुशीला की अनुभूति में ही अनुभूत की जा सकती है जहाँ वह व्यष्टि से निकलकर समष्टि में आत्मसात हो चुका है। सुशीला का यह रूपान्तरण ही इस उपन्यास की नवीन सम्भावनाओं का विस्तार है, इसकी महाकाव्यात्मक छवि का सूत्र है।