साखी अंक 35 में प्रकाशित समीक्षा
उपन्यास अंतर्गाथा
प्रकाशक--शिल्पायन, दिल्ली
रामनाथ शिवेंद्र
’
स्वाती सिंह
missswatisingh115@gmail.co
उपन्यास अंतर्गाथा
प्रकाशक--शिल्पायन, दिल्ली
रामनाथ शिवेंद्र
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स्वाती सिंह
missswatisingh115@gmail.co
'व्यष्टि से समस्टि तक की यात्रा'
रामनाथ शिवेन्द्र सोनभद्र की मिट्टी में जन्मा वह साहित्यिक नाम है जो चन्दौली, बनारस समेत समस्त पूर्वांचल की सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों को रचनात्मक कलेवर प्रदान करता है। उच्च शिक्षा बनारस में होने के कारण बनारसी संस्कृति एवं मिजाज उनके भाषात्मक गढ़न से मिलकर अपने समय से मजबूत अंतर्क्रियात्मक सम्बन्ध स्थापित करते हैं। सन् 2015 में प्रकाशित उनके उपन्यास 'अंतर्गाथा' की बात करें तो यह उपन्यास अपने शीर्षक के अनुरूप ही अनेक गाथाओं का समुच्चय बनकर उभरता है जिसमें ये गायाएं एक-दूसरे के भीतर से निकलती, उनका विभेद करती और पुनः उसी में समायी हुई सी जान पड़ती हैं। ये गाथाएं समाज के सामान्य जन-जीवन के बीच से ही निकलकर साधारण चरित्रों की रोजमर्रा के आश्रय में आकार लेती हैं। उपन्यास का कलेवर काफी विस्तृत है जो बनारस की मुख्य कथाभूमि से निकलकर लखनऊ और बम्बई तक की सैर कराता है। महानगरीय संस्कृति की धमक और जनसाधारण पर इसका प्रभाव सभी यहाँ उभर कर आये हैं। काशी में ऐतिहासिक अस्सी घाट के सुप्रसिद्ध पप्पू चाय की दुकान अपने सर्वविदित मन-मिजाज के अनुरूप ही विश्वविद्यालयी एवं शहरी गतिविधियों समेत देश-विदेश के मुद्दों पर संसदीय बहसों का सक्रिय केन्द्र है। यूनिवर्सिटी के मानिन्द प्रोफेसर प्रवासीनाथ, कवि विलोचन, कामरेड एल. आर.,जगेसर, अमरेन्दर आदि इसके सक्रिय ग्राहक हैं। उपन्यास में विश्वविद्यालयी गतिविधियाँ हैं, साहित्यिक जन-जीवन है, बौद्धिक परिवेश के बीच नारकीय ढंग का प्रेम सम्बन्ध भी है। झूठ, फरेब, धोखा, आक्रोश, धरना, हत्या, आत्महत्या, अनैतिक सम्बन्ध, ओछी गलाकाट राजनीति सब कुछ है लेकिन इन सबसे निकलकर बाहर आती सहयोग की भूमिका और हर परिस्थिति में अपने-अपनों को उबार लेने की सिद्दत महत्वपूर्ण है।
उपन्यास की कहानी सुशीला, अमरेन्दर और प्रवासीनाथ के त्रिकोण से प्रारम्भ होती है जहाँ सुशीला और अमरेन्दर प्रवासीनाथ के शोध छात्र है। प्रवासीनाय यूनिवर्सिटी के सक्रिय लेखक एवं साहित्यकार हैं। उनके बौद्धिक मिजाज के भीतर एक जादुई व्यक्तित्व छिपा है जो किसी भी उम्र के स्त्री मन को आकर्षित करने में सिद्धहस्त है। इनके इस रंगीन मिजाज की छाया पूरे उपन्यास में शुरू से आखिर तक है जो अंततः उन्हें मानसिक विक्षिप्तता की ओर ले जाती है। इनके संस्मरणों की चर्चाएँ पप्पू चाय की दुकान की एक जरूरी चीज है, जहाँ वेरोक-टोक के लोग अपने भीतर के समस्त आवेगों को निर्लिप्त भाव से साझा करते हैं। बनारसीपन इन चर्चाओं में खूब उभरकर आया है।
उपन्यास कामरेडों और बुद्धजीवियों की जमात का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ विशेष चरित्रों के साथ ही अपनी पूरी कथा यात्रा तय करता है और उनके बीच से निकलकर सुशीला के व्यक्तित्व के भीतर ही अपना वजूद तलाशता है। लेखक ने सुशीला के व्यक्तित्व को उपन्यास के केन्द्रीय तत्व के रूप में रखा है जहाँ उसका व्यक्तित्वांतरण महत्वपूर्ण है। एक तरह से देखें तो यह रूपांतरण 'देह से देहातीत' होने की यात्रा है या यूँ कहें सम्भोग से समाधि' तक की यात्रा देह के आवेगों में उलझकर अपने आत्म से विरक्त हो प्रवासीनाथ कवि विलोचन, गीतकार, अमरेन्दर, जाने कितने ही नामों से होते हुए देहशास्त्र की जटिल संरचना से बाहर निकल आना और अपने आत्म को स्वीकारना यहाँ एक बड़ी चुनौती के रूप में साकार हुआ है।
हाँ, इस साकार में सुशीला बहुत बार टूटी है, कुठित हुई है, निराश हो अनिर्णय की स्थिति तक गई है लेकिन अंततः वह अमरेन्दर के प्रकरण में कहती है, "मैं किसी भी पुरुष को अपने तन और मन का मालिक नहीं बना सकती... अब में तन और मन दोनों से मुक्त होना चाहती हूँ।" इस मुक्ति प्रसंग में वह विलोचन, प्रवासीनाथ, गीतकार और अमरेन्दर के छद्म प्रेम से निकलकर प्रेम की असल जगह तलाशती है। अब उसे पूरा जवार प्रेम करता है, गुलाविया प्रेम करती है, उसका परिवार प्रेम करता है, स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे प्रेम करते हैं। अमरेन्दर के विवाह प्रस्ताव पर वह बेलोस कहती है, "मैं न कुण्ठित हूँ, न निराश। केवल यह है कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिये, न धन, न मान, न ही दूसरी सुखानुभूतिया मैं समझती हूँ इन सुखानुभूतियों के लिये विवाह सरस और विश्वसनीय माध्यम है जबकि मुझे सुखानुभूतियो से कुछ लेना-देना नहीं में देह की क्रिया-प्रतिक्रिया के लिये अपने दिमाग को निष्क्रिय नहीं बना सकती।"
सुशीला की इस नकार में निश्चित रूप में शिवेन्द्र जी उस निर्मित को खारिज करते हैं जहाँ पुंसवादी प्रेम के खांचों में स्त्री देहरूप में अपनी उपादेयता सिद्ध करती चली आयी है। सुशीला को यह उपादेयता अमरेन्दर के संदर्भ में सबसे अधिक आहत करती है क्योंकि अपने प्रेमी में वह प्रेम के जिस विस्तार को पाना चाहती है वह उसे अमरेन्दर में नहीं दिखता। सुशीला को लेकर वह कन्फ्यूज्ड है। वह प्रेम के केन्द्रीय अक्ष पर नहीं वरन परिधि पर दिखाई देता है, अभी तक तन को ही मन समझता है। यहाँ सविता सिंह की यह लाइन विचारणीय है,
"किसे चाहिये स्त्री प्रेम के लिये, जहाँ साझा करना पड़ता है तन से ज्यादा मन का।"
शिवेन्द्र इस प्रेमहीनता की टोह लेते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ जीवन में अवश्य ही प्रेम की नैतिक या पवित्र से ज्यादा मानवीय और असली जगह खोजने की एक जद्दोजहद है। इस जद्दोजहद में वह इन सारे आवर्जनों ने निकलकर जीवन की एक सकारात्मक गति रचते हैं। विधायक के खिलाफ चुनाव लड़ने के फैसले में निश्चित रूप से एक ठहरे हुए जीवन की नकार है। यह नदी का वह प्रवाह है जो अविछिन्न है, अबाध है, तमाम तरह के गंदले विसर्जनों के बावजूद नितांत निर्मल है।
उपन्यास सुशीला की इस यात्रा के अलावा व्यक्ति जीवन के छोटे-बड़े तमाम समीकरणों को सामने रखता है जो समाज की चाल में अपना महत्वपूर्ण हस्तक्षेप रखते हैं। व्यक्ति की रोजमर्रा से निकलकर उपन्यास क्षेत्र समेत पूरे प्रदेश की राजनीतिक संरचना में आवाजाही करता हुआ दिखाई देता है। उपन्यास कुछ समय के लिये फ्लैश बैक में भी जाता है। जहाँ सन् 1960 में बंगाल में चारू मजूमदार के नेतृत्व में चल रही नक्सली गतिविधि और उससे जुड़ी स्मृति, उस दौर की याद को ताजा करने के साथ ही प्रवासीनाथ के एक और चेहरे को सामने रखता है जो जगेसर के पागलपन का गुनाहगार है। जगेसर एक अदना सा व्यक्ति है जो कामरेडियत के नशे में बंगाल जा चुका है और आजादी के इंतजार में दो-दो बार पागल हो चुका है लेकिन अभी अपनी पान की दुकान चलाता है और बहुतों को चूना लगाता है। शिवेन्द्र जी ने अंतर्गाथा में चाय-पान और ऐसे सार्वजनिक उपयोग के नुक्कड़नुमा जगहों का बखूबी उपयोग किया है जहाँ से कथा के छोटे-छोटे सूत्रों का संचालन होता है। उपन्यास का हर चरित्र किसी न किसी रूप में इन जगहों से संचालित दिखाई देता है। प्रवासीनाय कवि विलोचन, जद्दोभाई, एल. आर., अमरेन्दर, बंगाली बाबू की बिटिया आदि सभी मुख्य पात्रों की यहाँ आवाजाही है। इन सभी चरित्रों की अपनी कथा और अंतरकथा है, जिनका अंतगुंफन उपन्यास की महाकाव्यात्मक छवि को गढ़ता है। ये सभी चरित्र उपन्यास के आखिर तक अपने असर में दिखाई दिये हैं।
एल. आर. उर्फ लोटन राम उपन्यास का सबसे दिलचस्प और दिलेर चरित्र है। कामरेडियत का जामा पहनते ही लोटन राम एल. आर. में तब्दील हो गया। एम.एससी. पास एल. आर. को भी कामरेडियत के भूत ने बंगाल भगा दिया और वहाँ से लौटा तो जांबाजी और दबंगई लेकर एल. आर. की विशेषता यह है कि यह बेरोजगार है फिर भी अच्छे-अच्छों के काम चलाता है। कभी-कभी कोई पत्रिका निकाल देता है जिसमें कामरेडियत की चर्चा होती है। अमरेन्दर ने एल. आर. के खर्चे पर ही बनारस में रहकर पी.एचडी. की। एल. आर. फक्कड़ है मगर तार्किक व निष्पक्ष है और उपन्यास के हर घटित से जुड़ा है। सहयोग की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी है, लेकिन प्रेत बनकर पूरी दुनिया पर राज करने वाले एल. आर. के जीवन की विडम्बना यह है कि किसी लड़की ने उसे विवाह के योग्य नहीं समझा। उसके जीवन का यह असंतुलन उसके फक्कड़पन को और गाढ़ा करता है जिसे भांप कर ही प्रवासीनाथ जैसे लोग उसे निकम्मा समझते हैं। आधी उम्र बीत जाने के बाद एल. आर. का बंगाली बाबू की बिटिया के बारे में सोचना कि क्या उसके साथ जीवन बिताया जा सकता है...? और इस प्रश्न के सकारात्मक उत्तर में एल. आर. उसकी दुनियादारी, उसके अस्त-व्यस्त, बेतरतीब रखे किताबों ने जीवन को कहीं न कहीं करीने से संवारने की इच्छा का प्रस्फुटन ही है।
कुछ ऐसी ही नियति बंगाली बाबू की बिटिया उर्फ सीमा की भी है। उपन्यास के उत्तरार्ध में केवल एक बार उसके नाम (सीमा) का ज़िक्र आया है। सीमा समाज के छलावे की वह उपज है जो देह के आवेगों की स्वाभाविकता और इसकी नियति को कलंक नहीं मानती। इसके कइयों से जिस्माना संबंध है, प्रवासीनाथ उन्हीं में से एक हैं। सीमा और सुशीला दोनों ही में लेखक ने सक्रिय स्त्री का निहितार्थ रचा है। ये देह की परिधि के भीतर जकड़ी कुंद स्त्रियों का उदाहरण नहीं बनती बल्कि समाज की गतिकी में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करती हैं। लेखक द्वारा यहाँ देह सुचिता की नकार सर्वोपरि जाकर की गई है।
उपन्यास में सुशीला ओर सीमा के अतिरिक्त पूसी, जगेसर और जदो भाई की पत्नी के रूप में परम्परावादी स्त्रियाँ भी हैं जो अक्सर गाँव-जवार या परिवार में अपने पत्नीत्व का बखान बतियाते मिल जाती हैं। पत्नीत्व को गहने की तरह देह पर सजाये अपने पति के हित-साधन में जुटी ये औरतें अक्सर ही पूसी के रूप में लम्पट पति की चौकीदारी करते हुए सदमें में जीती हैं। फिर भी प्रवासीनाथ जैसे लोग नजरें बचाकर रासलीला रचाने से बाज नहीं आते क्योंकि उन्हें पता है कि पूसी जैसी औरतें मर्यादा की लाज ढोने के लिये ही बनी हैं। वह रोयेगी, चिल्लायेगी, रौद्रकाली बन जायेंगी लेकिन किसी भी स्थिति में उनसे तलाक नहीं लेगी।
उपन्यासकार ने 'अंतर्गाथा' में कुछ जरूरी चरित्रों को लेकर ही सम्पूर्ण कथा का वितान खड़ा किया है जिसमें बनारस का खिलंदड़ी व्यक्तित्व और सहयोगी प्रवृत्ति महत्त्वपूर्ण है। यहाँ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद सभी एक दूसरे के सहयोगी बनकर उभरते हैं। प्रकरण चाहे सुमित्रा हत्याकांड का हो, दलित बस्ती जलाये जाने का हो, प्रवासीनाथ के खिलाफ हुए एफ.आई.आर. का हो अथवा सुशीला के गाँव में उपजी विवादास्पद स्थिति एवं छात्र आन्दोलन का हो, सभी अपनी-अपनी तरफ से एड़ी-चोटी का जोर लगाने से नहीं चूकते।
उपन्यास का कुछ हिस्सा बम्बई में फिल्म निर्माण को लेकर एक अलग तरह की चकाचौंध से घनीभूत है। पूरे उपन्यास में मायानगरी और यहाँ बन रही सुशीला की फिल्म को लेकर लोलुप चर्चाएं हैं। साधारण जन से लेकर प्रवासीनाय जैसे बुद्धजीवी लोग भी इसके प्रभाव में हैं। फिल्म निर्माण से जुड़ा यह प्रकरण जहाँ एक ओर छोटे शहरों में बड़े शहरों के प्रभाव को दर्शाता है वहीं ये भी दिखाता है कि किसी कविता अथवा सुभाषित के किसी फिल्मी गीत में रूपांतरित हो जाने पर उसका कद कितना बढ़ जाता है। कवि विलोचन के मानसिक उहापोह में इस वस्तुस्थिति की वास्तविकता को देखा जा सकता है। उपन्यास में बम्बई प्रकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सुशीला के चरित्र का विकास बम्बई प्रकरण से ही निखर कर आया है जब वह गीतकार से मिलती है और उसके साथ बम्बई चली जाती है। बम्बई में वह फिल्म निर्माण से जुड़ती है जो उसके अब तक के जीवन से बिल्कुल अलग तरह का कार्यक्षेत्र है। इसी बीच गीतकार की आत्महत्या व पिता की मृत्यु से सुशीला का मोहभंग प्रारम्भ होता है। लेखक ने इन विपरीत स्थितियों का इस्तेमाल सुशीला के व्यक्तित्व को तराशने में किया है।
जहाँ सुशीला अपने भीतर के शून्य में बाहर निकलने के लिये अपनी जमीन, अपनी मिट्टी को तलाशती है और अपने गाँव को विकास की नयी योजनाओं से जोड़ती है। सुशीला का यह व्यक्तित्वांतरण उसके नायकत्व को अपूर्व दीप्ति प्रदान करता है जिसके समक्ष दलित और सवर्ण का भाव तिरोहित होता दिखाई दिया है। आचार्य सुदर्शन और गाँव के अन्य सवर्णों का निम्न जातीय सुशीला के परिवार के साथ बैठकर चाय पीना और गर्वान्वित महसूस करना यहाँ जाति भेद से निकलकर समतामूलक समाज के नैसर्गिक विकास का स्वीकार्य है।
सामाजिक गतिविधियों के साथ ही उपन्यास में तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य अपनी विश्वसनीयता के साथ अंकित है। विभिन्न पार्टियों के बीच की उठापटक विकृत राजनीतिक जोड़-तोड़, वोट बैंक की घृणित राजनीति और इन सबमें पिस रही मासूम जनता, दलित बस्ती के अनगिनत मजलूम जदो भाई ऐसे ही असहायों और दलितों की आवाज उनकी हिम्मत बनकर आते हैं जो नगर पालिका की जमीन पर अवैध रूप से बसे दलितों की जमीन के लिये उनके पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। एल. आर. के बाद जोभाई ही वह चरित्र है जो उपन्यास के अंत तक अपने आत्म के साथ बना रहता है। इस चरित्र में सादगी, भाईचारा, कर्मनिष्ठा, कौटिल्य बुद्धि और दबंगई सब कुछ है, साथ ही चरित्र की विशालता जो उन्हें सबसे अलग करती है। उपन्यास में उनका उम्दा राजनीतिक व्यक्तित्व प्रभावित करता है, जहाँ दलितों की लड़ाई की अगुवाई और उसके बाद हुई आगजनी में उन्हें जेल जाना पड़ता है। और वे जेल से ही चुनाव लड़ते हैं।
उपन्यास में शिवेन्द्र जी उग्र राजनीतिक परिवेश के भीतर छात्र आन्दोलन की अराजक स्थिति का विस्तृत चित्रांकन करते हुए यह भी दिखाते हैं कि कैसे राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे आन्दोलनों का अपने हित साधन के रूप में प्रयोग करती आई हैं। दलित वस्ती जलाये जाने पर जदो भाई के नेतृत्व में दलितों के हक की लड़ाई के रूप में आयोजित धरने का छात्रों के हाथ में जाकर पूर्णतः अनियंत्रित हो जाना और मनमाने ढंग से चलना बस्ती के मामले का प्रवासीनाथ का मामला बन जाना और उग्र परिवेश में लाठी, डंडे ओर गोलियों की बरसात होना। एल. आर. और जदो भाई के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज होना और अंततः मुख्यमंत्री द्वारा आगामी चुनाव में जदो भाई, एल. आर. और प्रवासीनाथ के मामले को चुनावी मुद्दा बनाना, यह सब कुछ इस छद्म राजनीति के घटक के रूप में सामने आता है। उपन्यास में धर्म की राजनीति और उसे साधने की कला का भी उधेड़ है। आचार्य सुदर्शन द्वारा मंदिर गिराया जाना इसी साधना की एक कड़ी मात्र है।
उपन्यास का उत्तरार्द्ध प्रभावशाली है। यहाँ हर चरित्र की उपादेयता अपने निहितार्थ को सिद्ध करने में लगी दिखाई देती है। यहाँ दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई बाहुबली विधायक और सुशीला के कॉलेज का मैनेजमेन्ट देखने वाले आचार्य सुदर्शन समर्थित एल. आर. के बीच पूरी तल्खी के साथ चित्रित हुई है। छात्र आन्दोलन यहाँ भी अपने उग्र एवं चिर प्रचलित तेवर के साथ दिखाई दिया है जो बाहुबली विधायक की गिरफ्तारी को लेकर सरकार पर हमलावर है। मौजूदा राजनीति यहाँ अपने यथार्थरूप में चित्रित है जहाँ सुशीला के आत्मसमर्पण, समूची
जनता के विद्रोह एवं हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद बाहुबली और माफिया टाइप नेता कानूनी न्याय की पकड़ के बाहर हैं।
उपन्यास के निहितार्थ की बात करें तो यह अपने समय और समाज के वास्तविक छवियों को गढ़ने में सफल रहा है। कल्पना की उड़ान को अपने समय के साथ साधते हुए तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों का यथार्थ उपन्यास के प्रभाव को गाढ़ा करता है। इन सारी स्थितियों-परिस्थितियों के बीच उपन्यासकार ने सुशीला के रूप में एक शक्तिपुंज को स्थापित किया है जो स्त्री संदर्भ में पुरूष समर्थित समाज की सोच को बदलने में सक्षम है। उपन्यास का सबसे बड़ा निहितार्थ तो यही है कि जो प्रवासीनाथ स्त्री को अब तक देह रूप में देखते चले आने के आदती थे वे अपने दिल और दिमाग के गहरे में उतरकर एक स्त्री को उसकी बौद्धिक गुणवत्ता के साथ उसकी निजता में स्वीकार करते हैं कि,
“अपने नये उपन्यास को वह सुशीला पर केन्द्रित करेंगे जहाँ वह एक ऐसी स्त्री का प्रतिनिधित्व करेगी जिसका अपना दिल, दिमाग और देह हो, स्त्री होने की पूरी विशेषताओं के साथ।"
प्रेम की बात करें तो आधुनिकतावादी संस्कृति में जीवन की जद्दोजहद और तनाव के बीच प्रेम को लेखक ने सेक्स और समझौते के बीच में ही रचा है। प्रेम स्वस्थ कहीं नहीं दिखता। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पूरी जमात के बीच भी प्रेम के अस्तित्व को तलाशना मुश्किल है। प्रेम की स्वस्थ परिणति केवल सुशीला की अनुभूति में ही अनुभूत की जा सकती है जहाँ वह व्यष्टि से निकलकर समष्टि में आत्मसात हो चुका है। सुशीला का यह रूपान्तरण ही इस उपन्यास की नवीन सम्भावनाओं का विस्तार है, इसकी महाकाव्यात्मक छवि का सूत्र है।


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