दूसरी आजादी
रामनाथ शिवेंद्र
रामनाथ शिवेंद्र
कुछ अपनी बातें
दूसरी आजादी का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे है। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे। आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र मीरजापुर जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजो के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून लागु थे जो यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अबतो सोनभद्र एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैऊँची ऊँची चिमनियां है तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी है ं तथा बाकिया ें के परिजन भी है. उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वहीदूसरी आजादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के ५७ प्रतिशत भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और प्रति व्यक्ति भूमिधारिता एक बीघे के कुछ भाग तक सीमित है। खाद्यान्न की उपलब्धता पांच सौ ग्राम से भी कम है। वन विभाग की जमीन्दाराना गतिविधियो ं के दंश और प्रताडना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ठुर हो जाये तो अचरज की बात नही ।
सोनभद्र मे आपात काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मै गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मै ंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सु मिरिनी जिस तरह से राज व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात काल के दौर में जब दलित साहित्य का कही ं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन प्रबन्धन के खिलाफ स ंघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास की नायिका है उसके स घर्षो को भी उल्लिखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन स े टकराती है फलस्वरूप प्रबन्धन उसे जेल भिजवा दिया जाता है।
मै आभारी ह ूं पिलग्रिम्स प्रकाशन का तथा भाई गो पाल ठाकुर एवं स ुरेश जायसवाल जी का जिनके सहयो ग से २००८ मे ं ‘डफली बजाये जा’ कहानी स ंग्रह प्रकाशित हुआ तथा ‘तीसरा रास्ता’ उपन्यास भी।
‘तीसरा रास्त’ा उपन्यास के माध्यम स े देश मे ं जड़ जमाये एन. जी. ओ. की कार्य संस्कृति और परणति को देखने समझने का प्रयास किया गया है। दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें ता े कम स े कम आजाद और जनतांत्रिक भारत मे ं वर्ण, स्त्री और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल है ं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे है । हालांकि यह सच है कि इन सवालो से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्ट जो खुद को साबित कर सकें उन लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलो च्य विषय है तो पाठ्य विषय भी। वे ही अख डित है ं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दू सरा पाठ रचते है तो दू सरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी है ं। वे साहित्य का द्वन्द है तो अन्तर्द्वन्द भी। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि
हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक है ं, ब्रह्म है ं तथा साहित्य के प्रजनन श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका रूप स ंसद की तरह है, उसमें हासिए पर पडा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शा ेषित, यातनाग्रस्त, प्रताडित वर्ग समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग स े। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना हा ेगी और वह यथार्थ कल्पना का यथार्थ होगा शिल्प और भाषा स े सजा-स ंवरा चू मने चाटने लायक।
वैस े आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति , वैश्वीकरण, अणुबम स ंस्ति सामाजिक वानिकी को चाह े जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप स े प्रकट हुई है वह है अपनी पीठ ठा ेंकन े की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध है ं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरा ें की तलाश म ें है। एक बार फिर याद दिलाना चाहूंगा कि हम वर्ण 1⁄4धर्म, जाति, गोत्र1⁄2 सम्पत्ति व ी के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सा ेच रहे है ं और खुद को परिवर्तित हा ेने स े बचा रहे है ं। यदि कुछ कर भी रहे है ं तो आ ंख मारन े जैसा ही। मै ं साफ तौर स े कहना चाहू ंगा कि उपन्यास और कहानियो ं के लिए विषय का चुनाव मेरे लिए जटिल मामला है, कदाचित यह जटिल न भी होता, यदि मै ं नागर समाज का होता। गंवई आदमी होन े के नाते म ेरी सोच भी गंवई है। फलस्वरूप मै ं सोच नहीं पाता कि एक सक्रिय स्त्री प्रजनन के नैसर्गिक गुण स े अपन े को मुक्त कर लें। दैहिक सम्बन्धो ं के लिय े मित्रतापूर्ण सम्बन्धो ं को धोखा ें और वादाखिलाफी से गढ़ े। सम्पत्ति, वर्ण और अपनी अस्मिता के लिए स ंघर्षरत नारी मुझ े प्रभावित करती है और ए ेसी नारियां ही कथा पात्री है ं। मेरे लिए अपने मित्रतापूर्ण सम्बन्धो ं का निर्वाह करते हुए उसके स ुखों, दुखा ें को भोगत े हुए तथा अपन े सहभागिता पूर्ण सम्बन्धों को प्रमाणित करते हुए कि व े वादा खिलाफ और धोखेबाज नहीं है। देह उनक े लिए सगुण समाधि है, न कि निर्गु ण मोक्ष। सम्पत्ति के सवाल पर मै ं आज भी भूमि प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हा ें, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। हरियल की लकड़ी, सहपुरवा, तीसरा रास्ता और मेरा यह चौथा उपन्यास द ूसरी आजादी धोख े पूर्ण भूमि-प्रबन्धन पर सवाल उठाते है ं।
मै ं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आजादी में कुछ इसी तरह की बहस स े आप रूबरू हा ेंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा,
दूसरी आजादी उपन्यास की सगुण या निर्गु ण आलो चना के लिए आपकी प्रतिक्षा में-
2009 रामनाथ शिवेन्द्र
मकर स ंक्राति अक्षर घर, हर्ष नगर, पूरब मोंहाल,, रार्बट्सगंज 1⁄4सोनभद्र1⁄2 231216
मो..7376900866


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