Thursday, July 20, 2023

मेरे उपन्यास,कहानी संग्रह तथा अन्य रचनाएँ

  मेरे   उपन्यास,कहानी संग्रह  तथा अन्य  रचनाएँ 

उपन्यास, 











 

















                                                                कहानी संग्रह






                                                                  
                                                alochna 

                                                                         

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Saturday, July 15, 2023

कथा का समाजशास्त्र (कहानी के तत्त्व )







 अपनी बात

कथा  का समाजशास्त्र  पुस्तिका साहित्य की अनिवार्य पत्रिकाओं में पहले से ही प्रकाशित हो चुके आलेखों का संकलन हैं। असुविधा के माध्यम से उन आलेखों को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित करने का कारण कुछ मित्रों का आग्रह है, जिन्हें ठुकरा पाना मेरे लिए संभव नहीं था। मुझे लगता है कि मेरे मित्रों को यह पता है कि मेरे जैसे अदना रचनाकार के प्रकाशित आलेखों को कोई भी प्रकाशक पुस्तकाकार नहीं छापेगा। सो उन मित्रों ने पुस्तिका के रूप में प्रकाशित करने के लिए प्रस्तावित किया होगा। मुझे याद है कि कुछ बड़े लोगों ने मुझ पर 2013 में आरोप लगाया था कि शिवेन्द्र ने अपनी कविताओं पर ही असुविधा का एक अंक प्रकाशित किया है (काश! लोगों ने मेरी कविताओं की आलोचना की होती) खैर आरोप जो लगे, लगे, पर असुविधा ने तो अपने सात आठ साल के सारे अंकों को जनपद सोनभद्र के अप्रकाशित रचनाकारों पर भी केन्द्रित किया था, उस पर तो वे कुछ नहीं बोले, मुझे पता है कि वे नहीं बोलेंगे। वे साहित्य की दूसरी दुनिया के लोग हैं जो प्रकाशन को बतौर जागीर स्थापित कराये हुए हैं। बहरहाल इस पर मुझे कुछ नहीं कहना, मेरा मानना है कि असुविधा को जो करना है वह करेगी चाहे जैसे आरोप लगें। अगर असुविधा का ऐसा करना प्रकाशन की दादागिरी से पीड़ित साहित्यिक मित्रों को भी बुरा लगता है तो सुझायें। क्या मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए?

एक कथाकार के नाते मुझे बार बार महसूस होता रहा है कि हमें आज के खुरदुरे तथा जटिल समय में किस तरह की कथाओं का सृजन करना चाहिए, कथाओं के सृजन में मुझे एक सवाल परेशान करता रहा है कि हम जो कथायें रच रहे हैं क्या उन कथाओं में पूंजीमूल्यवोधी चेतना से अलग हटकर लोकमूल्यवोधी चेतना के विकल्पों को दे पा रहे हैं या हम उन्हीं विकल्पों में गोते लगा रहे हैं जो पूंजीमूल्यवोधी चेतना द्वारा उत्पादित किये जा रहे हैं? अगर हम वैसा ही कर रहे हैं फिर तो कथाओं को सिरजने का क्या मतलब? मैं समझता हूं कि सचेतन कथाकार के लिए यह सवाल काफी दिक्कत भरा तथा चिन्ताजनक है। इसी चिन्ता के कारण मैंने कथाओं की रचना के बारे में आने वाली दिक्कतों तथा कथातत्वों की विकल्पहीनता पर विचार करते हुए आलेखों को लिखने का प्रयास किया है।

हमें पता है कि आज के समय में साहित्य का भी मुकम्मिल बाजार है, इसमें किसिम किसिम के खिलाड़ी हैं, दिक्कत यहां नहीं है, दिक्कत यह है कि ये जो साहित्य की खिलाड़ी हैं, वे कर क्या रहे हैं, किधर जा रहे हैं, साहित्य के लिए आजादी की लड़ाई के समय जो प्रस्तावित था क्या उस तरफ जा रहे हैं? यह जो बाजार की लुकाठी है, या यह जो ‘अन्धे, अन्धा ठेलिया’ वाला मामला है, कहीं यही तो सच नहीं। साहित्य समाज का दर्पण है, तथा अहा ग्राम्य जीवन को प्रमाणित करने वाली रचनायें आखिर हम क्यों नहीं दे पा रहे? अहा ग्राम्य जीवन तो बकवास के अलावा अब कुछ नहीं रह गया है, गॉव है पर गॉव में लोग नहीं हैं, गांव में तो वही लोग रहवास कर रहे हैं जो तहसील की हवालात में चौदह दिनों तक बन्द रखे जाने की योग्यता वाले हैं, या बहुत हुआ तो किसी के नाम पर वोट देने वाले। ऐसे लोगों को न तो सŸााप्रबंधन महत्व देता है और न तो उनके  घर वाले लोग ही जो सŸाा की विविध सुविधाओं पर कुडली मारकर अपनी प्रतिभा का जश्न मना रहे होते हैं। तो यह तस्वीर है गॉव की। दूसरी तस्वीर है उन प्रतिभाशाली लोगों की जो गांव के लिए कुछ कर सकते हैं, बदल सकते हैं गॉवों को, वे तो गांव छोड़कर सŸाा की सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सŸाा की मुलायम कुर्सियों से चिपके हुए हैं। आज के समय में ऐसे लोग ही साहित्य हैं और समाज भी। अब तो ये ग्लोबल विलेज की अवधारणा को पीते हुए गॉव वाले भी बन रहे हैं। फिर वह गॉव जो अहा ग्राम्य जीवन वाला था कैसे दिखेगा? तो यह जो लोकराग है, लोकमन, लोकचिŸा है, लोकचेतना है, इसका क्या हुआ? प्रस्तावित तो साहित्य की हर विधा के लिए यही था नऽ।

तो यह जो आज के साहित्य में पूंजी की सुविधावादी चेतना का खेल चल रहा है आखिर इससे हम कैसे टकरायेंगे? अगर नहीं टकरायेंगे तो हमारी कथायें जिनकी शुरुआत जमीन, स्त्री, संपŸिा तथा मानव निर्मित जनविरोधी विधिक प्राविधानों के खिलाफ आसमान में पत्थर उठाने की थी, उसका क्या होगा? अगर हम वैसा नहीं कर सकते फिर तो हमें रीतिकाल की चेतनाओं को पीठ पर लाद कर पुस्तकों के हसीन पार्क में घूमना चाहिए। क्या हम वैसा नहीं कर रहे?

इन आलेखों के माध्यम से मैंने आज के समय की जरूरी कथा रचना के बारे में समझने का प्रयास किया है, किसी को समझाने के लिए नहीं। क्या कथासाहित्य के द्वारा कुदरती सवालों को खोलने का प्रयास किया जा सकता है? अगर किया जा सकता है फिर किया क्यों नहीं जा रहा?

तो यह है कथा समय का सच, मेरा मानना है कि साहित्य की हर विधा के सृजनकर्मियों को लोकमूल्य वोधी चेतनाओं के द्वारा पूंजीमूल्य वोधी क्रूर चेतनाओं से टकराने की जरूरत है तभी हम साहित्य के प्रस्तावित कार्यभारों को पूरा कर सकेंगे जिसका प्रारंभ हमारे पुरखों ने किया था। इस पुस्तिका के अधिकांश आलेखों को ‘कथाक्रम’ में प्रकाशित करने के लिए शैलेन्द्र जी का आभारी हूं। प्रस्तुत पुस्तिका आपको कैसी लगी कृपया बतायेंगे।

दिनांक-22 जनवरी/2017

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