इस अंक का संपादन... अनवर सुहैल
र.नं.63166/78
प्रकाशन का पैंतीसवां वर्ष
अर्धवार्षिक प्रकाशन
Asuvidha ka smriti ANK
स्मृति अंकसमय पर समय की बात
जुलाई- दिसंबर 2015
अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित
स्मृति अंक
अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में
आविर्भाव.. 26 जनवरी 1977
निर्वाण....2 जून 2014
रचना क्रम.....
संपादकीय
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
‘सरोज-स्मृति’ 1935 ई. में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित लम्बी कविता और एक शोकगीत है। निराला ने यह कविता अपनी अठारह वर्षीय पुत्री सरोज के निधन के उपरांत लिखी थी।
इस कविता मंे उन्होंने शोक के साथ-साथ समाज के प्रति आक्रोश और व्यंग्य प्रकट किया है। यह कविता हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ शोकगीतों में से एक मानी जाती है। इस कविता की तुलना रामविलास शर्मा ने शेक्सपीयर की किंग लियर से करते हुए लिखा था--‘हिन्दी ही में नहीं अंग्रेजी में भी ऐसे शोकगीत दुर्लभ हैं।’
अग्रज रामनाथ शिवेन्द्र ने पुत्र-शोक में जो कविताएं और लेख-संस्मरणादि लिखे हैं उनसे गुज़रते हुए बरबस ही निराला की सरोज-स्मृति याद हो आती है। और उनकी विवशता का ये रूप भी दुखी कर जाता है--‘कुछ भी तेरे हित न कर सका!’
यह बाज़ारवाद में फंसे एक पिता की व्यथा-कथा है।
एकमात्र पुत्र डिम्पूजी के एक दुर्घटना के बाद लम्बे इलाज और फिर निधन ने शिवेन्द्र को बुरी तरह से तोड़ दिया। भारतीय समाज में सिर्फ खेती पर निर्भर रहकर ‘असुविधा’ जैसी लघुपत्रिका का विगत कई बरसों से सम्पादन-प्रकाशन, खुद का लेखन और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना एक कष्टसाध्य कार्य है। इसमें आए दिन सम्वेदनाएं आहत होती हैं, निराशा और हताशा बढ़ते क़दम रोकती रहती हैं। बैसाखी पर चलती आर्थिक दशा ऐसी बनी रहती है कि सर ढांपो तो पैर खुले। चादर की लम्बाई बढ़ाने का कोई जादू अब तक किसी अर्थशास्त्री ने नहीं किया....न ही किसी वित्त मंत्री के बजट से ऐसा कोई उपाय निकला कि गरीब की चादर का आकार बढ़ेे।
आजीविका का संकट और इज़्ज़त के साथ गुज़र-बसर करने की ज़िद ने शिवेन्द्र और उनकी धर्मंपत्नी शकुन्तला जी को कभी परिस्थिति से समझौता करने नहीं दिया। सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन के लिए दोनों के संयुक्त प्रयास से परिवार की गाड़ी सुचारू चलती रही है।
इसी सब के बीच शिवेन्द्र ने ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास लिखा जिसे देश के प्रतिष्ठित प्रकाशक राजकमल ने शा‘ये किया। बनारस, इलाहाबाद आदि के मित्रों ने उस उपन्यास को बखूबी नज़रअंदाज़ किया। घनघोर लिक्खाड़ हैं रामनाथ शिवेन्द्र। ए-4 कागज़ पर लिखते हैं तो लिखते चले जाते हैं। मैं उनके उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ को अपने देखे में पूरा होते पाया है। उसके कई अध्याय जब मैं सिंगरौली में कार्यरत था, तब मेरे क्वार्टर में लिखे गए हैं। मेरी पत्नी नाज़रा उनकी लेखन-क्षमता और एकाग्रता की गवाह हैं।
इतनी प्रतिकूलताओं को झेलते हुए भी शिवेन्द्र लगातार लिखते रहे हैं। असुविधा के कई अंक उन्होंने सोनभद्र अंचल के गुमनाम साहित्यकारों को प्रकाश में लाने के लिए निकाले हैं। अक्सर मैं उन्हेें समझाया करता कि हिन्दी का संसार बहुत बड़ा है। हज़ारों लेखक हैं, कईयों का कोई नामलेवा नहीं है। आलोचक अपनी तरफ से खोज कर नहीं पढ़ते। शिक्षण-संस्थाएं जाने किन विषयों पर शोध आयोजित करती हैं लेकिन जनपदीय लेखन पर बहुत कम शोध हो पाया है। सोनभद्र अंचल का इंसाइक्लोपीडिया हैं शिवेन्द्र। डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद से प्रभावित, वकालत का जमा-जमाया पेशा छोड़कर सिर्फ खेती के ज़रिए परिवार चलाने को कृत-संकल्पित शिवेन्द्र को कोई नहीं समझा सकता कि--
हम एक उम्र से वाकिफ हैं येे न समझाओ,
कि जुल्म क्या मिरी जान और सितम क्या है...’ --फै़ज़
सन् चौरानबे की बात होगी जब राबर्टसगंज बस-स्टेंड में मैैंने असुविधा की एक प्रति खरीदी। दुबली-पतली अनाकर्षक लघुपत्रिका। तब उस ज़मानेे में जब अंक ट्रेडिल पर छपा करते थे साधनहीन पत्रिकाएं इसी तरह अनाकर्षक हुआ करती थीं। मैंने पत्रिका पढ़कर शिवेंद्र को एक पोस्टकार्ड लिखा जो उन्हें लगभग छः माह बाद मिला। उस पोस्टकार्ड में दर्ज पते का पीछा करते एक दिन शिवेंद्र बीना प्रोजेक्ट के मेरे क्वाटर में आ पहुंचे। फिर हमने मिलकर असुविधा के कई अंक निकाले। कई लेखक मित्रों ने सहयोग दिया। हंस के पत्रिका-चर्चा कॉलम मंे असुविधा के अंकों की चर्चाएं हुईं।
उस ज़माने में भी मुझे बहुत आश्चर्य होता था कि सिर्फ किसानी करके लघुपत्रिका निकालने जैसा घर-फूंक काम कोई कैसे करता है? इस बीच शिवेन्द्र के घर जाना हुआ और आदरणीय भाभीजी की आत्मीयता और आतिथ्य ने जैसे अवाक् कर दिया मुझे। वाकई संसार में जहां धन है वहां अहंकार है और कृपणता है। जहां गरीबी है वहां आत्मीयता की दौलत छलक-छलक पड़ती है।
यह सब मुझे क्यों बताना पड़ रहा है, मैं बता नहीं सकता हूं। बस निराला की सरोज-स्मृति की वेदना और असुविधा के इस अंक में शिवेन्द्र की कविताओं में दुःख की सघनता बार-बार विचलित कर रही है।
एक कवि-लेखक और किस तरीके से अपनों को याद कर सकता है। ये शब्द ही तो हैं, जिन शब्दों से जमाने की व्यथा आज तक लेखक दर्ज करता रहा है क्या उसे इतना भी हक नहीं कि अपनी व्यथा कोे भी समाज तक पहुंचाए।
फिर निराला की सरोज-स्मृति के अंश खलल डाल रहे हैंः
अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
अजीब व्यथा है, एक साधनहीन पिता की और यही व्यथा हम शिवेन्द्र की लेखनी में भी पाते हैं, जब पुत्र के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अचानक उन्हें अपनी बेबसी पर तरस आता है। वाकई कितनी महंगी है चिकित्सा..जिसे नेह-नाते से कोई सरोकार नहीं। सिर्फ और सिर्फ रूपया और रूपया के इर्द गिर्द खड़ी होती है प्राचीरें, आलीशान अस्पतालों की। और ये रूपया जहां है वहां बहुतायत में है और जहां नहीं है वहां एकदम नहीं है। चाहे अपना वजूूद गिरवी रख दिया जाए, वह रूपया में नहीं बदल सकता अपने समूचे वजूूद को। गांव खड़ुई से राबर्टसगंज से बनारस तक बेटे के इलाज के लिए दौड़ते दौड़ते शिवेन्द्र जी हताश तो होते थे लेकिन निराश नहीं होते थे। लेकिन पुत्र डिम्पूूजी ठीक नहीं हो पाए और शिवेन्द्र के अस्तित्व में एक ऐेेसा खालीपन भर गए कि इस व्यथा से शायद ही कभी उबर पाएं।
समय और समाज की सम्वेदनहीनता और प्रकृति के क्रूर निर्णय के आगे निढाल क्या निराला भी नहीं थेः
मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज, जो नहीं कही!
असुविधा ही तो वह मंच है जिस पर शिवेन्द्र का अधिकार है। आज तक असुविधा के अंक जाने कितने लेखकों कोे छापते रहे। सामाजिक राजनीतिक मुद्दे उठाते रहे और पुत्र-वियोग से उपजी व्यथा के लिए असुविधा से बढ़कर कौन जगह होगी।
घर में राशन हो या न हो, असुविधा का अंक बनारस छपने चला ही जाता। कभी कागज़ वाले को तो कभी प्रेस वाले को उधारी लगाकर अंक छपवा ही लेते शिवेन्द्र। फिर बनारस से पत्रिका का पैकेट ढोकर ग्राम खड़ुई तक पहंुचाते शिवेन्द्र। एक एक प्रति में स्वयं ही पता लिखना फिर डाक-टिकट लगाना और फिर अंक को डाकखाने के हवाले करना।
बहुधा लेखक /पाठक अंक की पावती नहीं देते हैं। कोई बात नहीं। यदि वार्षिक ग्राहकों की सूची बनाई जाए तो एक पन्ना भी कापी का न भर पाए। वो भी यदि किसी ने सन् 2000 में वार्षिक सदस्यता ली थी फिर कभी नवीनीकरण नहीं कराया फिर भी शिवेन्द्र ऐसे पाठक को आजीवन सदस्य मान लेते हैं कि जिन्दगी में कभी उस व्यक्ति ने असुविधा की सहयोग राशि दी थी। वरना हिन्दी में खरीदकर पढ़ने वाले लोग ही कितने हैं?
तो असुविधा के इस अंक को विद्वतजन इस दृष्टि से देखें कि ये एक ऐसी व्यथा कथा है जिसे शिवेन्द्र नहीं लिखते तो कोई भी नहीं लिखता।
किंचित तब्दीली केेे साथ एक शे’रः
हम ही न कह सके अगर किस्सा-ए-गम, कहेगा कौन?’
मुझे आशा है कि असुविधा के इस अंक के ज़रिए शिवेन्द्र के लेखन को, उनकी भाव-भूमि को समझने में मदद मिलेगी।
अनवर सुहैल
मृत नहीं थे अक्षर
चले गये तुम...
शायद जाना ही था तुम्हें,
संभव है तुमने भी सोचा व गुना हो
जाने के बारे में,
पर नहीं, तुम्हारे पास समय ही कहां था
सोचने व गुनने के लिए,
खुद को जाने के बारे में.
संभव है सोचा हो, जाते हुए कुछ.
जाना और न जाना वैसे भी,
होता है अचानक और आकस्मिक.
सो तुम कैसे जान सकते थे..
जैविक क्रिया के बारे में,
कि क्या होने वाला है?
और चले गये हो...
हर उन चीजों व बातों की तरह
जिन्हें किसी न किसी दिन जाना ही होता है.
पर हमें तो कुछ भी पता नहीं था कि.
क्या होता है जाना और नहीं जाना..
मुझे तो यह भी नहीं पता था कि
क्या फर्क होता है जाने न जाने के बीच.
अब समझने लगा हूं कि
सब कुछ चला जाता है
जाने वाले के साथ.
कुछ भी नहीं रह जाता शेष.
केवल बचा रहता है आकाश,
बची रहती है पृथ्वी,
तारे भी घूमते रहते हैं अपने कक्ष में,
हर ओर छितराई रहती है हवा..
फिर भी दुनिया फसी रहती है
जाने न जाने के चक्कर में.
जाने को जान लेना और
जानने को जान लेना....
कुछ न कुछ तो फर्क होगा उनमें
जो जाना हुआ है या
//6//
जो अजाना है, वही है सब कुछ.
किसे नहीं पता कि..
जाने वाला चला जाता है...
रह जाती हैं उससे जुड़ी यादें.
अब जो चाहे उसमें गोते लगाये या डूब जाये.
बन जाये कोई कविता या कहानी.
एक ऐसी कहानी जिसका न कोई अंत हो
और नही प्रारंभ.
पर क्या यादों को किया जा सकता है याद?
यादें तो बस यादें होती हैं,
जो जुड़ी होती हैं, संवेदनों से,
दिल की धड़कनों से,
यादें धर सकती है पटकथा का रूप,
और कुरेद सकती हैं दिल के संवेदनों को..
रूला सकती हैं तो हसा भी सकती हैं.
मेरे पास तो बचे हुए, वे स्वर भी नहीं जो
होते हैं नश्वर...
स्वर होंगे भी तो क्या हो जायेगा?
वे खुद तो बोलेंगे नही...ं
स्वर कभी नहीं बोलते,
नही किसी को तोलते हैं.
वे डोलते रहते हैं मन के भीतर.
मन भी तो कोई चीज है,
उसकी झील में होते हैं जो खनिज
उनमें नहीं होती सहभागिता
सहकार तो कŸाई नहीं.
जाने किन किन रसायनों से
बना होता है मन,
कैसे करता है काम.
कैसे बांध देता है मन की गांठें
खोल देता है स्मृतियों के सारे दरवाजे,
जिससे आ सके ताजी बयार,
सहला सके तन को.
यही तो मन का खेल है,
तन के खेलों से एकदम अलग.
कविता के बहाने,
मैं याद करना चाह रहा हूं तुम्हें,
//7//
याद करना चाह रहा हूं तुम्हें,
उन शब्दों के सहारे,
जिसे गढ़ती हैं संवेदनायें,
संवेदनायें ही तो
बनाती हैं कविता को कविता,
कवि नहीं होती कोई कविता,
पर कविता होती है कवि,
कवि में छिपी होती है कविता,
कविता में ही कवि
लगा रहा होता है गोते.
देखा जा सकता है
कविता में कवि को.
उसके जीवन के क,ख,ग को
उसकी किकुड़ियायी छातियों को,
झुर्रियों वाले गालों को
तथा उन हाथों को भी,
जिनसे बनती हैं मुठ्ठियां..
जिन्हें लहराया जाता है खुले आकाश में..
फिर कंठ से निकली हुई आवाज..
खुद ब खुद बदल जाती है इन्कलाब में...
यह जो इन्कलाब है...
नहीं निकलता किसी झील में से
कवि खोदता रहे कोई झील..
झील में तो फसी होती हैं संवेदनायें..
कवि उसी झील में ढंूढता है खुद को,
पूछता है झील के किनारों से,
उसकी तलहटी से,
‘मैं कहां हूं’
तुम्हारे जाने को मैं जाना अगर मान भी लूं..
फिर तुझे कैसे ढूढूंगा यादों में?
यादों में नहीं मिलोगे तूं..
यादें तो वैसे भी बीती हुई बातें होती हैं.
समय की पर्तेंं चढ़ी होती हैं उस पर..
समय की पर्तों को छीलना या
हटाना आसान नहीं.
यादों के संग पर्तें जैविक हो जाती हैं,
यादों को फिर से सृजित करना..
//8//
उसे रचना, गढ़ना और फिर
उसे ताजा बना देना..
संभव भी नहीं जान पड़ता..
मेरी कविता में तुम्हारे शब्द चित्र
बन पायंगे कि नहीं, मैं नहीं जानता.
कविता के बहाने बनना चाहता हूं,
मैं तुम्हारे माफिक
तुम्हारे छोड़े गये स्वरों को चाहता हूं
गुनगुनाना, गूंथना चाहता हूं
उन्हें एक लड़ी में,
पर तुम तो नहीं जानते थे गुनगुनाना,
सीधी राह के मुसाफिर थे तुम..
अक्षरों से बहुत दूर..
हकीकतों के आस पास..
तुम्हारे पास नहीं थी, अक्षरों की दुनिया
फिर भी मृत नहीं थे अक्षर.
वे जीवित थे तुम्हारे पास..
इस लिए कि पुरखों को सम्हालने व
अक्षरों को बचाये रखने की,
कला थी तुम्हारे पास.
बीते दिनों में
लौटना चाह रहा हूं मैं,
उन दिनों में, उन समयों में
जिसे जिया था मैंने तुम्हारे साथ.
मैं चाहता हूं उस समय पर कुछ लिखना,
पर कैसे लिखूंगा उस पर.
//9//
समय कागज तो होता नहीं,
जिस पर उड़ेला जा सके अक्षर ज्ञान.
किसे नही पता कि
पत्थर नहीं होता समय.
जिस पर छेनियों से भी लिखा जा सके कुछ,
पहले की तरह.
जब नहीं थी लिपियां..
तब लिखा जाता था शैल खण्डों पर..
गढ़ी जाती थीं किसिम की आकृतियां ..
आकृतियां ही होती थीं लिपियां,
वे संवाद करती थीं.
बताती थीं समय के बारे में.
कागज पर टांके गये अक्षरों की तरह,
उस पर उतारा जाता था समय को.
कागज को तो जलाया जा सकता है,
फाड़ा जा सकता है,
पर पत्थरों पर खुदे अक्षर,
नहीं मिटाये जा सकते.
दिक्कत यह नहीं है कि
कितनी दूरी है कागज और पत्थर के बीच,
दिक्कत है कि लिखा जाये तो..
क्या लिखा जाय?
सभी लिखा हुआ खिलखिलाता नहीं,
बाहें नहीं फुलाता,
नही रोता है,
उसे तो नहीं बोला जा सकता शोक गाथा भी,
वैसे वह होता है कुछ न कुछ,
पर ऐसा भी नहीं होता कि
उसे बाजार उठा ले अपनी गोदी में.
चूमने चाटने लगे उसे.
बाजार बिछ जाये उसके कदमों पर,
जैसे अंधेरों से निकली कोई रौशनी हो...
जगमगा जाये जिससे सारी दुनिया.
या दुनिया का कोई हिस्सा ही.
वह हिस्सा डूबा हुआ हो भूख में,
विस्थापन में और कानून के मकड़ जालों में.
जहां समानता ढकी हुई हो,
//10//
बारूद की पर्तों में और मनुष्यता...
मनुष्यता तो जैसे
आग में पैदा होने वाली कोई चीज हो.
तुम्हारे जाने के बाद लगता है मुझे कि
नहीं लौटा जा सकता उन समयों में...
जिसे जिया था हम दोनों ने एक साथ
बाप बेटे की तरह,
दोस्त व हितैषी की तरह
भाई की तरह...
अस्पताल का पहला दिन
डूब जाते हैं हम तारीखों के खेल में,
तारीखों से जुड़े सŸाा कौतुकों में.
उन कौतुकों में भी जो हमें बना देते हैं,
अभ्यर्थी और ढकेल देते हैं व्यवस्था की गुफा में.
जिसमें थिरक रहा होता है विज्ञान का कौतुक..
गुफायें तो पहले हुआ करती थीं,
जिनमें रहा करते थे हमारे पुरखे.
वैसे हम आज भी किसी न किसी
गुफा के ही रहवासी हैं.
गुफा किसी भी आकार और प्रकार की हो सकती है.
कानूनी गुफाओं में रहना और निवसना तो हम
सीख चुके हैं अंग्रेजों के जमाने से.
इससे इतर हमें रास आता है,
धर्म की गुफाओं में बैठ कर माला फेरना,
और शंखध्वनि पर मंत्रोच्चार करना.
घर में भी होती हैं गुफायें..
//11//
घर में घर की तरह,
ऐसी ही गुफाओं में,
हम ढंूढ रहे हैं चावल के दानों को.
मॉज रहे हैं करियायी डेकचियां.
पोत रहे हैं गोबर और माटी से,
जले हुए चूल्हे.
लगा था मुझे अस्पताल भी किसी गुफा की तरह..
उसमें फड़ फडाते नोट डरा रहे थे मुझे..
मुझे याद है इमरजेन्सी का वह कक्ष..
भला कैसे भूल सकता हूं उस कक्ष को मैं..
उन डाक्टरों को जो लगातार पूछे जा रहे थे...
चोट लगी तो कैसे?
क्या मोटर साइकिल से गिरने पर..
टूट सकती है रीढ़ की हड्डी?
वह भी मोटर साइकिल स्टार्ट करते समय
क्या तमाशा है?
अस्पताल की वह गुफा चीख पड़ी थी..
गुफा के जानकार गुम थे अपने अस्पताली ज्ञान में.
इमरजेन्सी का वह कक्ष अचानक तब्दील हो गया था
डरावनी बाजारू गुफा में..
जहां ढूढे जा रहे थे विज्ञान के सूत्र..
सूत्र तो वहां नहीं दिख रहे थे..
दिख रहे थे डाक्टर.,,
उनके चेहरे, जो स्थिर और शान्त थे.
और कक्ष अपने आप गरमाया हुआ था,
पर्ची लिखी जा रही थी,
उस पर उड़ेला जा रहा था विज्ञान का ज्ञान..
और वह मरीज जो मेरा उŸाराधिकारी था..
जो मेरा पुत्र था..
जो मेरे होने न होने का..
प्रमाण था..
चोट से कराह रहा था...
हिल नहीं सकता था वह ..
नही फैला सकता था अपनी टांगे
सिर्फ देख व सुन सकता था..
और वह देख रहा था कि
वह अस्पताल में है..
//12//
उसे पता नहीं था कि
उसके पैर क्यों नहीं कर रहे काम?
दिमाग तो कर रहा था काम फिर
पैरों को क्या हुआ..
दिमाग ही तो चलाता है पूरी देह को
पैर भी तो देह का हिस्सा है
डाक्टरों को पता था कि
जांच से ही पता चला सकता है
कारणों के बारे में..
मैं देख रहा था कि डिम्पू
तब्दील हो चुका था दवा कंपनियों की प्रयोगशाला में
किसिम किसिम की दवाइयां..
उसके पेट में डाली जायंगी
जांचें भी होगी.
खून की, पाखाने की, पेशाब की,
प्रयोग दर प्रयोग..
मैं क्या कर सकता हूं ऐसे में,
मेरा उŸाराधिकारी अस्पताल के बेड पर था.
कराहता हांफता..
मैं फसा हुआ था..
क्या होगा और क्या नहीं के वृŸा में..
जिसमें नहीं थी कोई त्रिज्या..
जीवा तो कŸाई नहीं.
रात गुजर रही थी.
डिम्पू का दर्द कम होने लगा था..
फिर भी उसकी ऑखों में तैरने वाले सपने गायब थे.
उनमें खालीपन था, ऑसुओं में तैरता हुआ
ऑसुओं में छिपी बातें तो वैसे भी नहीं दिखतीं,
वहां दिखता है, घुप्प अंधेरा..
मैं अंधरों में फसा हुआ..
इधर से उधर डोल रहा था..
भला कैसे भूल सकता हूं ईमरजेन्सी का वह वार्ड
जहां हर ओर कराह रहे थे मरीज..
उनके अगल बगल मडरा रहे थे..
उन्हें संभालने वाले..
वैसे भी अस्पताल अस्पताल होता है
उसके अपने रिवाज होते हैं..
//13//
डाक्टरों की पसरी होती है गंभीरतायें..
उनकी गंभीरताओं में छलकता है ज्ञान
एक भयानक किस्म की खामोशी..
हम भी उसी खामोशी के साथ
डिम्पू के अगल बगल डोल रहे थे.
देख रहे थे, समय
उसकी चाल देखते हुए
बन गये थे समय..
समय तो समय होता है
वहां नहीं होता असमय..
होता है सिर्फ समय का चक्र
चक्र के भीतर होती हैं खाइयां..
और हम धंसते जा रहे थे भयानक खाइयों में.
खाइयों में किसिम किसिम की,
पसरी होती है सूचनायें.
वह भी अस्पष्ट और भ्रामक..
अपठनीय और कुरूप..
जाने क्या होगा डिम्पू का?
क्या वह भी बन गया है
समय, समय के भीतर
हम लोगों की तरह
हो सकेगा खड़ा और चल सकेगा दो कदम.
अपने पैरों के सहारे..
समय के साथ रोते या मुस्कुराते हुए..
किसे नहीं पता कि समय के साथ चलने के लिए
पैरों को मजबूती से जमाना होता है धरती पर..
हवा में ही नही, समय पर भी तानना होता है घूंसे
क्या डिम्पू तान सकेगा घंूसे समय की पीठ पर?
पर समय को तो पीठ होती ही नहीं,
वह अभिशप्त होता है अतीत बनने के लिए..
और अतीत तो सिर्फ व्यतीत का
हिस्सा होता है विभाजित और खंडित.
किस्सा होता है अनगढ़ कथानकों का..
जिनमें कथा तो होती है पर नहीं होते,
समय के साथ टकरा सकने वाले कथा पात्र.
घटनायें भी औंघी पड़ी होती हैं, चोटें खा कर
पर रहती हैं जीवित.
//14//
यादों व स्मृतियों के सहारे,
और स्मृतियां तो
स्मरण और मरण की उत्पाद होती है.
समय से मुठभेड़
सिकुड़ता जा रहा था मैं
अस्पताल में लगातार.
अस्पताल नहीं सिकुड़ता,
वह किकुड़ियाता भी नहीं,
लगातार बढ़ता है और बढ़ता जाता है,
विज्ञान के बाजारू फैलावों के साथ.
अस्पताल के रूतबे के हिसाब से
डिम्पू की दवाइयां भी बढ़ रही थीं.
उन्हें बढ़ना ही था....
पर कुछ चीजें वहां भी ऐसी थीं
जो सिकुड़ रही थीं मेरी तरह.
सिकुड़ रही थीं मरीजों की इच्छायें.
उनके जीने की कामनायें,
और वह उत्साह भी सिकुड़ रहा था,
जिसके लिए जाना जाना जाता है आदमी.
आदमी तो महज आदमी होता है पर....
अस्पताल में हो जाता है बहुत कुछ,
उसे वहां हो जाना होता है,
दवाइयां, दवाइयों की बोतलें और डाक्टरों की पर्चीं..
इसके अलावा भी उसे होना होता है..
रुपया, तब्दील होना होता है उसे,
दवाइयों के दाम में,
बन जाना होता है कंपनियों का वफादार,
जो बनाती हैं किसिम किसिम की दवाइयां.
बनना होता है उसे बाजार का हिस्सा,
जिस बाजार से करता है वह नफरत.
बाजार ही क्यों..
उसे तो उन चेहरों की भी सूची बनानी होती है,
जो आ सकते हैं उसके काम,
उसकी पीठ पर छाप सकते हैं,
//15//
रुपयों की कार्बन लिपि या
उसे ही बना सकते हैं मुद्रा.
जिसमें छिपी होती है खरीदने की ताकत.
क्या करेगा कोई जब समय ही बन जाये शत्रु.
समय से टकराने के लिए
अपना मित्र तो बनाना होगा ही उन लोगों को.
जो लतियाते रहते हैं खुद को गढ़ने के लिए सभी को.
राजनीति हो या समाजनीति,
जो होते है माहिर समय को मित्र बनाने में,
समय करता है उन्हें सलाम..
जो लतिया सकते हैं समय को.
पर मेरे लिए समय तो..
किसी ड्रेगन की तरह था
जो हर क्षण नोच रहा था, ताने मार रहा था..
जब समय को मित्र बनाना था.
तब तो तूने बना लिया शत्रु उसे.
कुछ निर्जीव सुभाषितों के जरिए,
तूने काट लिए खुद के हाथ पैर.
‘यह करना है,’ ‘यह नहीं करना है’,
बद्जात व्यवस्था से लड़ना है...
तो लड़ते क्यों नहीं व्यवस्था से
अस्पताल भी तो व्यवस्था है...
तूने क्या सोचा था अरस्तू मूरख था
जिसने रुपये को उतारा बाजार में..
क्या समय से टकराया जा सकता है इमानदारी से,
चला जा सकता है दो कदम धरती पर
क्या इलाज करा सकते हो अपनों का,
या पढा़ सकते हो वंशजों को.....
आखिर क्या सोचा था तूंने?

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