gazal
इन्सान को बस इन्सान रहने दीजिए
हर चूल्हे में आग जलने तो दीजिए
कितनी जमीन बांधेगे आप पीठ पर
हवाओं को घरों से गुजरने तो दीजिए
चंाद और सूरज मुबारक हों आपको
यूं ही मुझे धूप में जलने तो दीजिए
मौसम की इनायतों से पहरा उठाइए
विचारों के पतझड़ गुजरने तो दीजिए
यकीनन किसी दिन खिलेंगे ये लोग
संग जमाने के थोड़ा चलने तो दीजिए
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