Sunday, February 10, 2013

gazal


इन्सान  को बस इन्सान रहने दीजिए
हर  चूल्हे में आग  जलने तो दीजिए

कितनी  जमीन  बांधेगे आप पीठ पर
हवाओं को घरों से गुजरने तो दीजिए

चंाद और  सूरज  मुबारक हों आपको
यूं  ही मुझे  धूप में जलने तो दीजिए

मौसम  की इनायतों से पहरा उठाइए
विचारों के पतझड़ गुजरने तो दीजिए

यकीनन किसी  दिन  खिलेंगे ये लोग
संग जमाने के थोड़ा चलने तो दीजिए



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