असुविधा समय
.......शिवेन्द्र
लगता है आदमी होने लगे हैं लोग
तटस्थ जिंदगी को धोने लागु है लोग
सभ्यता की फसलों को जाने क्या हुआ
बीज बबूल के बोने लगे हैं लोग
गोलियों की भाषा सीख सीख कर
बारूदी आग घर में सजोने कगे है लोग
इतिहास के बौने हिमालय क्या बने
भूगोल की परिधि भी टोने लगे हैं लोग
अतीत की अधूरी समझ के पहाड़ को
हनुमान की मानिंद ढोने लगे हैं लोग
नया स्वर्ग बनाने की चाहत तो देखिये
विश्वामित्र भी यहीं होने लगे है लोग
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