Thursday, July 12, 2012

kavita

किस तरह के आईने . पहुँच रहे है गाओं कि तरफ खलिहानों की ओर
दिखाने के लिए गालों की झुर्रियां,सिकुड़ने तथा खरोचे भी,
उस आदमी को भी जो कभी था जीवित 
जिसे भूख ने तब्दील किया था लाश में 
तंत्र कला का अद्भुत नमूना कि विश्वाश तब्दील हो जाये लाश में 
chunav ख़तम आईने भी ख़तम 
कहा चले गए आईने?
क्या हुआ उन्हें? कहाँ  गढ़े जाते हैं आईने  हर पाँच साल बाद 
कभी कभी बीच में ही 
किसिम किसिम के आईने खड़े  हैं  हर चौराहे पर, हर गली में 
आखिर क्या दिखता है उनमे 
मक्कारी और धोखे के सिवा
उसमे नहीं दिखाती  भूख. गरीबी और बेरोजगारी  
तथा विस्थापित और प्रताड़ित दुनिया 
कोई जिंदा कौम आखिर कैसे देखे अपनी सूरत चुनावी आईनो में 
साफ करने के लिए चहरे के दागो को 
जिन्दा कौमे अपना हाँथ भी नहीं देख सकती है उनमे
जिससे उठाये जाते है मशाल 
तn जाती है aasman  कि ओर मुठिया 
  

Saturday, June 30, 2012

विचारो के पौधे रोपना चाहता हू कियारियो में 
पर उन्हें सीचने के लिए 
कहा से पाउँगा सुविधाओं का पानी 
यकीन कर लिया जाये अगर कि 
विपरीत परिस्थितयों में भी 
कियारियां , बदचलन मौसम कि उदारताए करा सकती है वर्षात 
भर सकते हैं बंधे, पिछले साल हल्ला मचा था कि नाहर कि नालिया 
छोड़ देंगी परधन को सलाम करना पर क्या ऐसा संभव है?
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.........ख़बरदार जो रिमझिम किये, हमारे गरम मिजाज को नरम किये, देखते नहीं 
पकी फसलों कि दुल्हन बेताब है घर आने के लिए, और तुम उसे करना चाहते हो निर्वस्त्र