Wednesday, February 6, 2013
Tuesday, February 5, 2013
Monday, February 4, 2013
गजल
असुविधा समय
.......शिवेन्द्र
लगता है आदमी होने लगे हैं लोग
तटस्थ जिंदगी को धोने लागु है लोग
सभ्यता की फसलों को जाने क्या हुआ
बीज बबूल के बोने लगे हैं लोग
गोलियों की भाषा सीख सीख कर
बारूदी आग घर में सजोने कगे है लोग
इतिहास के बौने हिमालय क्या बने
भूगोल की परिधि भी टोने लगे हैं लोग
अतीत की अधूरी समझ के पहाड़ को
हनुमान की मानिंद ढोने लगे हैं लोग
नया स्वर्ग बनाने की चाहत तो देखिये
विश्वामित्र भी यहीं होने लगे है लोग
लोग जले कितने कितने घर कहो
ताजी खबर को दोस्त बासी खबर कहो
सुना था तेरे घर में आग लगी थी
बाख गए हो तो तुम खुदा का असर कहो
शोषित सभ्यता के प्रतीकों से पूछ कर
फिर बता , हो इधर या की उधर कहो
सुकरात की मौत अगर याद है तुम्हे
फिर तो बात दोस्त हो कर, निडर कहो
गरीबों में गरीबी की अगर भीख जगा दो
होगा नहीं मुस्ग्किल फिर सफ़र कहो
अमीरी और गरीबी सब खुद की फज़ल से
यह बात हो चुकी है अब बे असर कहो
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