असुविधा का यह अंक बहुचर्चित रचनाकार श्री मुनीर बख्श आलम की गजलों पर केंद्रित है। इस संग्रह के प्रकाशन के कुछ समय पहले असुविधा ने नजर मोहम्मद नजर पर केंद्रित गजल संग्रह का प्रकाशन किया था जिसे पूरे हिंदी जगत में सराहा गया था। असुविधा के चहेते साहित्य अनुरागीयों ने मुझे सुझाया भी था की लघु पत्रिकाओं को चाहिए कि वे एक ही रचनाकार को 1 अंक में प्रकाशित करें चाहे कविताएं गजलें या कहानियां कुछ भी हो पर उस रचनाकार को समग्रता में प्रकाशित करें। जिससे रचनाकार की रचना धर्मिता पूरी तरह प्रकाश में आए
असुविधा लगातार अपने मित्रों के सुझावों का अनुगमन कर रही है। यहां यह बताना आवश्यक होगा कि असुविधा ने अब तक किया क्या? हम इतना ही जानते हैं हम जितना बेहतर कर व सोच सकते हैं उतना कर रहे हैं और लगातार 31 सालों से अक्षरों से लड़ रहे हैं हमें तो पता ही नहीं कि लडने से मिलता क्या है लड़ना है तो लड़ना है। लड़ना खुद ही हासिल है और एक तरह से खेती किसानी भी है जो मन को हिलोर देती है और यही हिलोर असुविधा की पूंजी है। श्री आलम साहब के ग़ज़ल संग्रह को प्रकाशित करने का मुझे अवसर मिला मेरे लिए बहुत ही शुभ है , शुभ इसलिए कि यह मेरे लिए बहुत बड़े भार से मुक्त होने का अवसर भी है ।
मैं महसूस कर रहा हूं कि मैं काफी हल्का हो चुका हूं पहले काफी दबा हुआ महसूस करता था। लगातार सोचता था काश! मै आलम साहेब के किसी किताब का प्रकाशक का हो पता ,अचानक यह अवसर मिल ही गया।
सोनभद्र के बाहर के लोगों को नहीं मालूम कि आलम साहब का सहयोग नहीं मिला होता तो शायद मेरा पहला उपन्यास सहपुरवा प्रकाशित नहीं हो पाता संयोग तो यह भी था कि मैं अक्षर बटोर भी ना बन पाता है और कचहरी में जाकर मुकदमों की बदरंग दुनिया में कहीं खो जाता जहां मुझे अपने व्यक्ति गत संप्रभुता को भी किसी अदालत में अगली सुनवाई हेतु गिरवी रख देना पड़ता। लोग तो मुझसे मिलना चाहते पर उस कचहरी की दुनिया में शायद मुझे तलाश नहीं पाते क्योंकि वहां जाकर हर कोई खुद खो जाता है और किसी खोई हुई फाइल माफिक हो जाता है। मैं यह नहीं कहता कि कचहरी की दुनिया से नफरत करने की जरूरत है ऐसा मैं कभी नहीं सकता क्योंकि मैं गांधी नहीं हूं ।उनके जैसा हो भी नहीं सकता और यह समय भी उन्नीस सौ आठ हिंद स्वराज वाला नहीं है। हिंद स्वराज में गांधी जैसा लिखे हैं वैसा वे ही लिख सकते हैं और बता सकते थे यह जो बुद्धि है कितने प्रकार के खेलों को खेला करती है और बात बात पर तुतुर मुतुर किया करती है वह ताकत के साथ सामाजिक बिद्रूपों से टकराती है बिना परवाह किए की टकराने की कलाएं भी होती हैं जिन्हें सीखना पड़ता है आश्रमों में या बौद्धिक केंद्रों में। आलम साहब की सरलता ही उनकी गजलों की ताकत है। इसे नहीं पता कि सरलता ही गजलों की ताकत होती है और यही आदमी को आदमी भी बनाती है। सहजता व सरलता को गढ़ना नहीं पड़ता गढ़ना पड़ता है जटिलता तथा और असहजता को। जो सरल है वही सरल है कहीं भी किसी रूप में ढलकर आकार लेने वाला । वैसे भी आलम साहब मील के पत्थर वाले मुहावरे से खुद को अलगियाकर चलने वाले हैं । इस बात के शौकीन भी नहीं कि वे कहीं अपने नाम का खूंटा गाड़े और अवाम को ललकारे आओ दम हो तो उखाड़ो। वे खूंटा नहीं है वे दीवार की वह खूंटी है जिस पर आप अपना बहुत कुछ टांग सकते हैं और यकीन कर सकते हैं आपका विश्वास भी उस पर आराम से टगकर सस्ता रहा है, कहीं खोया नहीं है ।आप जानते हैं की जैसे हर दीवार में खिड़की जरूरी है वैसे ही खूंटी भी जरूरी है ।
मैं बता नहीं सकता कि आलम साहब की गजलों को प्रकाशित करके मैं कितना मस्त हूं । एक त्रस्त्त आदमी और मस्त दोनों है ना एक दूसरे के विरोधी फिर भी मस्त हूं इसलिए कि जाने कितने वर्षों से मैं अपनों से अग्रेजों से निवेदन कर रहा हूं कि आप अपना बेहतर हमें प्रकाशन के लिए दें और समय को अपनी रचना से सजाएं पर सुनता कौन है ? खास तौर से यहां मैं भाई अजय शेखर जी कहना चाहूंगा कि वे समय के साथ अपनी रचना धर्मीता प्रकाश में लाने का प्रयास नहीं कर पा रहे हैं और जीवन जीने के तरीकों में जाने किन तरीकों को अपना प्रेय बना लिए हैं । मेरे लिए तो वह श्रेय होता है जब उनकी आज के समय से टकराने वाली रचनाएं प्रकाश में आती। मैं यह नहीं कहता कि वे मुझे ही अपना सर्वोत्तम प्रकाशन के लिए दें ,कहीं और से भी छपवा लेते तब भी ठीक था पर ऐसा नहीं हो रहा।
मैं आलम साहब का मुरीद हूं कि वे रिटायर होने के बाद भी बहुत सक्रिय हैं कभी-कभी तो मुझे उन से जलन होती है और गुस्सा भी आता है की अगर इस आदमी ने आज की जैसी सक्रियता कुछ पहले दिखाया होता तो आज सोनभद्र का नाम बहुत बड़ा होता और हम भी गर्व से कहते कि हमारे पास एक आलम है , वैसे कहते तो हम आज भी हैं पर वह बात कुछ अलग होतीl मैं कह सकता हूं और मुझे कहना भी चाहिए कि मैं आलम साहब को हमेशा कुरेदता रहा हूं कि वे कुछ करें ,मुझे खुशी है कि वे बहुत कुछ कर रहे हैं । उनकी कई किताबें आज आज प्रकाशन के लिए तैयार हैं जिन्हें देर सबेर प्रकाशित हो ही जाना है । मैंने उन्हें आश्वासन भी दिया हुआ है कि मैं उनकी किताबों के प्रकाशन के लिए जितना कर सकता हूं उतना करूंगा और मुझे करना भी है।
आलम साहब की बेचैनियों को मैं महसूस कर सकता हूं वेआज उम्र के उतार पर हैं अक्सर अस्वस्थ रहते हैं पर विचारों के चढ़ाव पर है। उनके भीतर छिपी हुई सृजन की असीम ऊर्जा को उन से सरोकार रखने वाला कोई भी देख व महसूस सकता है मैंने तो महसूस किया है की जरूरत पड़ने पर वे रात भर
जाग करअक्षरों से लड़ सकते हैं फिर भी थकान नहीं। उन्हें कोई बाधा नहीं रोक सकती ।
आलम साहिब की गजलों के बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता हूं इसलिए कि लोग कहें और बताएं कि उनकी गजलों ने उन्हें प्रभावित किया कि नहीं? मेरा मानना है कि कविताएं हो या गजलें वे साफ-साफ बोलती हैं और मन की बातों को खोलती है। सामाजिक विद्रूपताओं के जालों को काटने की कोशिश करती हैं और ललकार कर हर जटिलताओं के विरोध में खड़ी हो जाती हैं। यही प्रतिरोध समय की चाल को नियंत्रित ही नहीं अनुशासित करने का काम भी करता है। सभी जानते हैं कि प्रतिरोध जब जन प्रतिरोध बन जाते हैं तब वे एक तरह से सामाजिक अनुरोध का विनम्र रूप धर लेते हैं।आलम साहेब भी प्रतिरोध की विनम्रता के साथ आज के कठिन और जटिल समय को खोलते व तोलते हुए अपनी गजलों में उपस्थित हैं जो एक उपलब्धि है वह प्रतिरोध मैं आलम साहब की गजलों में देख रहा हूं इतना ही नहीं बात कहने की विनम्रता तथा एक कदम आगे चलने की प्रवृत्ति भी मैं उन गजलों में देख रहा हूं अगर ऐसा नहीं होता तो शायद यह गजल संग्रह प्रकाश में नहीं आ पाता । एक कदम आगे चलने का सूत्र कभी भी पीछे देखू नहीं बनने देता वह हमेशा ललकारता रहता है कि आगे देखो ।
मैं आलम साहब के बारे में कह सकता हूं और मुझे कहना भी चाहिए कि वे पीछे देखू नहीं है वे आगे देखते हैं और एक कदम आगे चलने की तैयारी में मन से जुड़े रहते हैं दौड़ने कूदने और उछलने से अलग आलम साहेब की दुनिया है वे मानते हैं कि एक कदम आगे ही काफी है उसी में मेरा चरैवेति समाहित है दौडूंगा तो भाहरा कर गिर जाऊंगा सो वे संभल संभल कर चल रहे हैं । मेरी कामना है कि वे धरती पर पांव जमा कर ही चले क्योंकि दौड़ना और गिर जाना किसी के लिए भी ठीक नहीं होता।
लोक चेतना से जुड़ी आलम साहब की गजलें हमारे समय में किसी चुनौती से कम नहीं ,एक ऐसे समय में जब लोग मुलायम बिस्तरों पर पसर कर समाज और राजनीति पर बहसें कर रहे हैं और अपनी आत्ममुग्धताओं को पीठ पर लाद कर घूम रहे हैं आशा है आलम साहब की गजलें साहित्य में अपना स्थान पाएंगी।
रामनाथ शिवेंद्र दिसंबर 2011
नोट ----यह संपादककीय आलम साहब की गजलों पर केंद्रित असुविधा के अंक २०११से हैं।
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