एम. ए.खान पर केंद्रित
असुविधा का जुलाई दिसंबर अंक 2013
संपादकीय का संक्षिप्त अंश-----
मरहूम एम. ए.खान सोनभद्र के बारे में क्या सोचते थे यहां के दलितों पीड़ितों के लिए क्या करना चाहते थे यह बात तो उनके साथ ही समाप्त हो गई पर उनकी सोच या विश्लेषण जो कई रिपोर्टों की शक्ल में आज भी उपलब्ध है उनसे साफ साफ पता चलता है कि सोनभद्र अभी भी डरावने अंधेरे में भटका हुआ है वे इसी अंधेरे को हटाना चाहते थे।
सोनभद्र के निवासी पुराने कॉमरेड,अच्छी देह भु जा वाले एम ए खान साहब जिन की शिक्षा दीक्षा उर्दू तालीम में हुई थी पर वे अंग्रेजी व हिंदी भी जानते थे उनका दखल कविता और कहानी में था। वे एक्टिविस्ट होने के नाते साथ साथ साहित्यिक भी थे उनकी जुबान पर मीर गालिब हमेशा थिरकते रहते थे। उनका जीवन जो कभी उनका था उस दौर में वे कामरेड थे सीपीआई वाले यानी जवानी के दिनों में उनका कामरेड होना उनकी अपनी प्रतिक्रिया थी एक ऐसा विरोध था जो उनका अपने और अपनों से था क्योंकि वे उच्च मध्यमवर्गीय संरचना वाले परिवार के थे वह उन्हें कुबूल न था। वे सामान्य थे औरअपनी सामान्यता खोना भी नहीं चाहते थे ।
एम ए खान कुछ अलग किस्म के पेचीदा व्यक्तित्व वाले थे सो वे सरकार के उन कार्यक्रमों को अनावश्यक मानते थे जो दान प्रतिदान की आर्थिक गतिविधियों द्वारा चालित हुआ करते हैं उनका मानना था कि आर्थिक सहायता समस्या का समाधान नहीं बल्कि समस्या का प्रारंभ है ऐसी स्थिति में उत्पादन व कमाई के साधनों में समान अवसर प्रदान करने की रणनीत ही कारगर हो सकती है क्योंकि गरीबी का समाधान आसान नहीं काफी पेचीदा है। गरीबी का कारण है असंतुलित रूप से उत्पादन संबंधों की बहाली और उसके कानूनी मान्यता। एम ए खान द्वारा सोनभद्र के बारे में जुटाई गई सारी सामग्री हालांकि विशेष अध्ययन की मांग करती है फिर भी इतना साफ है कि खान साहब ने सोनभद्र को काफी नजदीक से देखने जांचने का काम किया था तथा पाया था कि यहां कम से कम आदिवासी क्षेत्रों में सघन अंधेरा है यहां इतिहास मर चुका है तथा विकास पूरी तरह घायल व चोटिल है।
कभी डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था गरीबों में गरीबी की भूख तथा अमीरों में अमीरी lकी संतुष्ट पैदा हो जाए तो समाज का नक्शा ही बदल जाए। सोनभद्र को समझने के लिए खान साहब ने सामाजिक व आर्थिक रूप से संपन्न सामाजिक ताकतों की क्रूर निष्ठुर ताकतो को भी समझा था तथा यहां के कारखाना वालों को भी जो सीएसआर तक का सारा रुपया डकार जाते हैं । उनका मानना था कि यहां का समाज इतना अतीत जीबी है की वर्तमान के जीवित बोध व जीवन जीने के लिए वांछित हस्तक्षेपों तक को जानता ही नहीं , एक तरह से आत्मीयता का परम।
ए एम ए खान साहब अपने बारे में कहा करते थे मैं कोई साहित्यकार या लेखक नहीं हूं लेकिन आसपास के माहौल से मु त pस्सिर होना आदमी की फितरत में है मैं भी आदमी हूं क्या करता है जिंदगी के लंबे सफर के दौरान कभी दिल ने रोया कभी आंखें नम हुई जब कुछ न बन पड़ा तब कागज और कलम का सहारा लेकर मैंने अपने आप को समझने की कोशिश की है। लिखना मेरा पैसा नहीं शौक है ,लिखा ढेर सारा लिखा मगर बदकिस्मती यह कि कुछ बच्चों के हाथ लग गया और कुछ पुलिस उठा ले गई दोनों का हसर बराबर रहा बचा खुचा आहऔर वाह की शक्ल मे समेटने की कोशिश किया है मैं अच्छी तरह जानता हूं जो मैंने लिखा है एक कंजूस माल की तरह सिर्फ मुझे ही सुकून दे सकता है उसे छापने वाला कभी कोई नहीं मिलेगा।मगर सनक तो सनक है।
अपनी मृत्यु के 3 महीने पहले तक वे आदिवासियों के अधिकारों की जनतांत्रिक लड़ाई की अगुवाई कर रहे थे । वे अपने कार्यों का आधार क्षेत्र नक्सली क्षेत्र नगवा को बनाए हुए थे। वहां वे जन चौपाल के द्वारा मनरेगा में काम में वाजिब मजदूरी दिए जाने भूमि आवंटन सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से खाद्यान्न वितरण सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सामाजिक सेवाओं के कार्यों की निगरानी जन चौपाल के माध्यम से किया करते थे तथा प्रशासनिक स्तर पर भी प्रयास करते थे कि अधिकारी उनके आधार क्षेत्र की तरफ ध्यान दें। वे नगवा के करीब 10 गांव को अपने गांव सरीखा बना चुके थे ।वहां के लोगों के सुख-दुख में वह हरदम शामिल रहा करते थे उन गांवों में मुझे भी कई बार जाने का मौका मिला।
वे हमारे शहर के लिए अजनबीयत के शिकार भी थे एक तरह से उपेक्षित ठीक डॉक्टर अर्जुनदास केसरी की तरह फिर भी बहुत सारे लोग थे जो उन्हें प्यार करते थे मनोहर खांबे, श्याम नारायण लाल, डॉक्टर सिंगला, मुनीर बख्श आलम जैसे लोग उनसे काफी प्यार करते थे। अगर वे एक्टिविस्ट की भूमिका में ना होते तो नामी कहानीकार होते। तमाम लोगों की तरह वेभी समय को भजाने के कलाकार नहीं थे । इस मामले में वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह सरल व तरल थे उनकी यही सरलता और तरलता प्रतिरोध के लिए उन्हें कभी थाने ले जाती तो कभी कलेक्ट्री का घेराव करने के लिए उत्प्रेरित करती थी।
आशान्वित हूं की असुविधा के तमाम अंकों की तरह एम ए खान पर केंद्रित इस अंक को भी आपका पाठ्य सहयोग मिलेगा तथा प्रतिक्रिया भी धन्यवाद। रामनाथ शिवेंद्रद

No comments:
Post a Comment