मजहबो में जकड़े है इन्सान किस लिए
वीरान वस्तियो में है मकान किस लिए
बुतों से है नफरत और कब्रों से मुहब्बत
दिए जलेगे इन पर तो भगवन किस लिए
मंदिर और मस्जिद तो इबादत के लिए है
इनमे जलेंगे लोग तो श्मशान किस लिए
हथियार ही से होंगे दिलों के फैसले तो
गूंगे को चाहिए फिर जुबान किस लिए
हमें रोटिया ही दीजिये बहुत भूख लगी है
दे रहे है गीता और कुरान किस लिए
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