दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश
कुछ अपनी बातें...
दूसरी आजादी् का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे हैं। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे।
आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र श्मीरजापुर् जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो श्सोनभद्र् एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वही दूसरी आजादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के ५७प्रतिशत भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और प्रति व्यक्ति भूमिधारिता एक बीघे के कुछ भाग तक सीमित है। खाद्यान्न की उपलब्धता पांच सौ ग्राम से भी कम है। वन विभाग की जमीन्दाराना गतिविधियों के दंश और प्रताडना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ड्ढठुर हो तो अचरज की बात नहीं।
सोनभद्र में आपात काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मैं गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मैंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सुमिदिनी जिस तरह से राज व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात काल के दौर में जब दलित साहित्य का कहीं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन प्रबन्धन के खिलाफ संघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा श्हरियल की लकड़ी्य उपन्यास की नायिका है उसके संघर्षों को भी उल्ड्ढिलखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन से टकराती है फलस्वरूप प्रबन्धन उसे जेल भिजवा देता है।
मैं आभारी हूं पिलग्रिम्स प्रकाशन का तथा भाई गोपाल ठाकुर एवं सुरेश जायसवाल जी का जिनके सहयोग से २००८ में श्डफली बजाये जा्य कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ तथा तीसरा रास्ता् उपन्यास भी।
तीसरा रास्ता् उपन्यास के माध्यम से देश में जड़ जमाये एन. जी. ओ. की कार्य संस्कृति और परणति को देखने, समझने का प्रयास किया गया है। दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें तो कम से कम आजाद और जनतांत्रिक भारत में वर्ण, स्त्री और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल हैं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे हैं। हालांकि यह सच है कि इन सवालों से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्टड्ढ (जो खुद को साबित कर सकें) लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलोच्य विषय हैं तो आलोचना भी, वही कथाकार हैं तो कथानक भी, वही पाठ है तो पाठ्य विषय भी। वे ही अखंडित हैं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दूसरा पाठ रचते हैं तो दूसरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी हैं। वे साहित्य का द्वन्द है तो अन्तर्द्वन्द भी। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक हैं, ब्रह्म हैं तथा साहित्य के प्रजनन श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका बाह्य रूप संसद की तरह है, उसमें हासिए पर पड़ा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शोषित, यातनाग्रस्त, प्रताडि़त वर्ग समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग से। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना होगी और वह यथार्थ कल्पना का यथार्थ होगा शिल्प और भाषा से सजा-संवरा चूमने चाटने लायक।
वैसे आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, वैश्ड्ढवीकरण, अणुबम संस्कृति सामाजिक वानिकी को चाहे जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप से प्रकट हुई हैकृवह है अपनी पीठ ठोंकने की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध हैं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरों की तलाश में है। एक बार फिर याद दिलाना चाहूंगा कि हम वर्ण (धर्म, जाति, गोत्र) सम्पत्ति व पूंजी के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सोच रहे हैं और खुद को परिवर्तित होने से बचा रहे हैं। यदि कुछ कर भी रहे हैं तो आंख मारने जैसा ही। मैं साफ तौर से कहना चाहूंगा कि उपन्यास और कहानियों के लिए विषय का चुनाव मेरे लिए जटिल मामला है, कदाचित यह जटिल न भी होता, यदि मैं नागर समाज का होता। गंवई आदमी होने के नाते मेरी सोच भी गंवई है। फलस्वरूप मैं सोच नहीं पाता कि एक सक्रिय ी प्रजनन के नैसर्गिक गुण से अपने को मुक्त कर लें। दैहिक सम्बन्धों के लिये मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को धोखों और वादाखिलाफी से गढ़े।
सम्पत्ति, वर्ण और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत ी मुझे प्रभावित करती है और ऐसी ियां ही कथा पात्री हैं। मेरे लिए अपने मित्रतापूर्ण सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए उसके सुखों, दुखों को भोगते हुए तथा अपने सहभागिता पूर्ण सम्बन्धों को प्रमाणित करते हुए कि वे वादा खिलाफ और धोखेबाज नहीं है। देह उनके लिए सगुण समाधि है, न कि निर्गुण मोक्ष। सम्पत्ति के सवाल पर मैं आज भी भूमि प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हों, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। हरियल की लकड़ी, सहपुरवा, तीसरा रास्ता और मेरा यह चौथा उपन्यास श्दूसरी आजादी्य धोखे पूर्ण भूमि-प्रबन्धन पर सवाल उठाते हैं।
मैं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आजादी में कुछ इसी तरह की बहस से आप रूबरू होंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा, यदि आप निराश होते हैं तो मुझे क्षमा करें। छोटन के अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
श्दूसरी आजादी्य उपन्यास की सगुण या निर्गुण आलोचना के लिए आपकी प्रतिक्षा में-
रामनाथ शिवेन्द्र
अक्षर घर, पूरब मोहाल रार्बट्सगंज (सोनभद्र)
मोबाइल...07376900866
पहला अंश ---- टूटता इतिहास
जो होना था, हो चुका था, इस होने और हो चुकने के बीच रणविजय, उलझे हुए थे। वे समझ पाने में असमर्थ थे कि उन्हें अपनों से अपेक्षा रखनी चाहिए कि नहीं, फिर उनका गुनाह क्या था, ऐसी विषम स्थिति की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं किया थाकृश्ऐसा भी हो सकता है।्य
एक दिन वे अकेले हो जायेंगे, अपने में डूबा हुआ, बाहर निकलने के लिए किसी गलियारे की तलाश करता, लेकिन बाहर निकल कर जाना कहां? हर ओर धुआं ही धुआं, आग ही आग, मार-काट, खून-खराबा। वे लॉन में बैठे हुए थेकृसुबह की नरम धूप भी उन्हें जला रही थी, जैसे आग में से तप कर आ रही हो। सामने दीख रहे फूलों की सुगन्ध का कहीं पता नहीं था, वहां धमाके थे, बमों की गर्जनायें थीं। नारियलों के पौधे हिलते तो वे सिहर उठते, भीतर से सवाल उठताकृश्क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
उन्हें अपने मनुष्य होने तथा मनुष्य बने रह सकने पर सन्देह हुआ। उन्होंने अपने हाथों को देखा, उसे इधर-उधर झटका दिया, उनमें पहले वाली ही ऊर्जा थी, वे फावड़ा, कुल्हाड़ी कुछ भी चला सकते थे, सामने से आ रहे बाघों को मार सकते थे तथा एक ही हाथ से रायफल दाग सकते थे। हाथ तो ठीक ठाक है, पूरी तरह दुरुस्त और स्वस्थ।
वे फौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए, लान में टहलने लगे, एक तरफ से दूसरी तरफ तक, अगल-बगल देख कर उन्होंने दौडना शुरू किया, गोया वे टहल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, विपरीत परिस्थितियों में आगे या पीछे भाग कर खुद को बचा सकते हैं। दौड़ते हुए ही उन्होंने महल देखा, महल सामने पूरी लम्बाई-चौड़ाई में खड़ा था, उन्हें घूरता हुआ। उसके बुर्ज, उसकी छतें, सारी चीजें उन्हें घूरती हुई दिख रही थीं, जैसे वे भी पूछ रही हों, क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
रणविजय उत्तरहीन थे। वही रणविजय... जो स्वतंत्रता संग्राम के बारे में सोचा करते थे। राजनीति के आचरण के बारे में तर्क किया करते थे। राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विषयों के बारे में मित्रों से बहसें किया करते थेकृगान्धी के अहिंसा के पक्ष में किसिम-किसिम के भारतीय मानस की चर्चा किया करते थे तथा उन रास्तों का विरोध किया करते थे, जो स्वतंत्रता हासिल करने के लिये युद्ध व हिंसा की पैरवी करते थे। हजारों साल की भारतीय गुलामी पर उनके तर्क विस्मयकारी थे, उनका मानना था कि भारतीय मन पूरी तरह मोह और माया से मुक्त आध्यात्मिक रहा है, वहां भौतिकता व इहलौकिता का रंच मात्र प्रभाव नहीं, जैसा कि अरबियों व ब्रिटिशियर्सों का हुआ करता है। मोह ग्रस्तता, कुंठित स्वार्थ तथा घृणित इहलौकिकता से पूर्ण। सारा कुछ अपने लिए तथा अपने को समाज पर आरोपित करता हुआ, सामाजिक होने तथा सामाजिकता का विभत्स प्रदर्शन। वही रणविजय निरुत्तर थे, वे महल की तरफ न देख सके, उन्होंने आंखें फेर लीं तथा लॉन के फूलों पर केन्द्रित कर लिया।
उनकी आंखें फूलों की तरफ केन्द्रित न रह सकीं, उन्हें फिर महल की दीवारों की तरफ लौटना पड़ा, उन्हें जान पड़ा कि महल कोई साधारण पनाहगाह नहीं, यहां विशेष किस्म के इतिहास का निर्माण होता है। यह किसी उत्पादन इकाई की तरह है, यहां सत्ता की नस्लें पैदा होती हैं, नस्लों की पहले कल्पना की जाती है, फिर उसे गढने व रचने का काम शुरू होता है। यहां युद्ध की भूमिका ही नहीं, उसके एकतरफा लाभकारी गुणों को रेखांकित किया जाता है। सेनायें इन्हीं महलों के इरादों पर अपना नाच नाचती हैं, उनका नृत्य खून से सने जमीन पर होता है, जहां सिर अलग ढंग से तथा धड़ अलग ढंग से अपनी युद्धगत भागीदारी की पहचान कराते हैं। एक बारगी उन्हें झटका लगा, वे आहत हुए फिर उन्हें लगा कि कोई अदृश्य ताकत है, जो उनका जीवन बहुत ही निर्ममता से छीन रही है पर वहां कोई ऐसी ताकत नहीं थी, जो उन्हें लान के फूलों, पौधों या पीछे मुस्करा रहे महल की तरह दीखती। पर वे तो वर्तमान जो भविष्य बना हुआ था, उसकी निर्मम कल्पना में फंसे हुए थे। उनके सामने कल जो बीत चुका था, एक पुरानी कल्पनाक--जिस पर कालिख पोती जा चुकी थी, और कल जो आने वाला था, वह उन्हें आतंकित कर रहा था श्कि तुम्हारा भविष्य गहरे कुंए में जा गिरा है और तुम एक अंधे भविष्य के आदमी हो। जहां सूरज उगता है, चांद खिलता है, मौसम हंसता-गुनगुनाता है, रिमझिम बदरियां दिल-दिमाग को बसन्ती बनाती है, फिर भी उन्हें तुम न देख सकते हो, न महसूस कर सकते हो।्य फिर तो उन्हें लगा कि वे अपनी आंखें खो चुके हैं, उन्हें कुछ नहीं दिख रहा, तभी किसी मुलायम हवा ने उन्हें सहलाया...
वे ठीक-ठाक ही नहीं, इतना ठीक-ठाक थे कि अपना होना बचा सकते थे तथा वह सब तौर-तरीका आजमा सकते थे, जो ठीक-ठाक होने के लिए समय और समाज द्वारा प्रस्तावित थे। तरीके दो थे या तो भागो या आगे बढ़ो। दोनों तरीके युद्धकालीन थे। भागने वाले तरीके में जमीन पर लेट जाना भी था। वे क्या करें, भागें और जमीन पर लेट कर इच्छा मृत्यु का प्रयास करें या आगे बढ़ें, ...और हत्या, प्रति हत्या करें। फिर विजेता के गौरव से आत्ममुग्ध हों। वे आत्म-लीन हो उठे, जैसे उनके मन के गहरे में विषम स्थितियों के सापेक्ष समाधान हों। पर वहां भी तूफान थे। तूफानों में तर्क थे, एक दूसरे की विपरीतता को प्रभावित करते...।
अचानक उन्हें लगा कि वे विजेता नहीं बनना चाहते, वे हिंसा, प्रतिहिंसा से अपना भविष्य संवारना नहीं चाहते। किसी सन्त की तरह उन्होंने विचारा---उन्हें किसी का जीवन लेने का क्या अधिकार?
श्लेकिन यदि उनका अधिकार छीना गया हो फिर्य
फिर तो... वे उलझ गये, अधिकार का मामला जटिल था। इतना जटिल, उन्होंने उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया इस मुद्दे पर उनके ज्ञात दार्शनिकों ने भी उनकी मदद नहीं की। भारतीय दार्शनिक तो किसी अधिकार की कल्पना तक नहीं करते... ले देकर उनके सामने महाभारत का उदाहरण था...श्सूई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य, दुर्योधन का यह दुराग्रही फैसला महाविनाशकारी युद्ध को आमंत्रित करता हैकृवे कांप उठे, उनके साथ कोई नहीं, यदि साथ में कृष्ण होते, फिर वे सोचते... नहीं! महाभारत महज एक कल्पना हैकृसंपत्ति के अधिकार के लिए युद्ध की अनिवार्यता को प्रमाणित करता, पर मन के गहरे में घुस चुके प्रबोधन आसानी से पिन्ड नहीं छोड़ते, वे धुआं-धुआं हो उठे।
श्सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य दुर्योधन का कल्पित चेहरा उनके सामने जीवन्त हो उठा और वह चेहरा भी जब वह सारा कुछ हार चुका होता है, अपने सभी भाईयों को घृणित अभिमान के युद्ध में गवां चुका होता है... उन्हें लगा कि वह युद्ध एक ऐसा विवादास्पद युद्ध था, जिसमें सभी पराजित होते हैं, कृष्ण अपनी कूटनीति में हारते हैं और दुर्योधन को ऐतिहासिक सन्तुलन के लिए राजी नहीं करा पाते। युधिष्ठिर अपने सच से पराजित होते हैं, अर्जुन, कर्ण से हारते हैं तथा कृष्ण जैसे देव रूप से अपना रथ हंकवाते हैं। कुन्ती अपनी गोपनीय सच को छिपाने में इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे कर्ण को पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए सहमत करने का प्रयास करना पड़ता है, तो उस युद्ध का कोई विजेता नहीं, सभी पराजित होते हैं...।
श्नहीं! नहीं, उन्हें किसी भी युद्ध को आमंत्रित नहीं करना्य उन्हें जय-पराजय दोनों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं... फिर क्या होगा, श्भइया राजा ने तो उन्हें महल से निर्वासित होने का आदेश दे दिया है्य भइया राजा के आदेश का अनुपालन या सबल प्रतिरोध, आखिर क्या करना है उन्हें?
श्आदेश का अनुपालन ही ठीक होगा्य
अचानक रणविजय ने समय के साथ हस्तक्षेप किये जा सकने वाले विचारों में से एक का चुनाव किया, यह उनके लिए खुशी प्रदान करने वाला क्षण था। ऐसा इसलिए कि उन्होंने आदेश का अनुपालन ही अब तक सीखा था, बड़ी अम्मा रानी यही सिखाया करती थीं। लेकिन उन्हें आदेश के अनुपालन के बाबत उचित अनुचित का ख्याल नहीं करना चाहिये विवेक भी तो कुछ होता है इसके आगे रणविजय विचारों के अंधेरे में कहीं खो गये...
एक उलझन भरी स्थिति, ऐसी स्थिति जो दीखती स्पष्ट, पर वह दीखने का आभास ही होती।
उनकी खुशी क्षण-भंगुर थी, जैसे आई वैसे लौट गई।
रणविजय को अपना जीवन खुरचने लगा, जो उन्होंने गांधी के चरणों पर चढ़ा दिया था...गांधी के दिशा निर्देशों से कौन सी शिक्षा उन्होंने हसिल किया है... श्सविनय अवज्ञा् यह है कि नहीं वे धरना और सत्याग्रह करते रहे कि नहीं, ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा करते रहे हैं कि नहीं।
श्हां ऐसा तो है्य फिर तो भइया राजा के सामने उन्हें हाजिर होना होगा् आखिर उनका अपराध क्या है? यह तो बतायें भइया राजा्----
रणविजय ने पारिवारिक संस्कारों से बाहर होकर समय की आवश्यकतानुसार कुछ करने के लिए सोचा कि चुपचाप होकर निर्वासित हो जाना, अपना अधिकार छोड़ देना, कायरता होगी। यह महल, महल के इर्द-गिर्द वाली सारी संपदा पर उनका भी अधिकार है, केवल भइया राजा का ही नहीं। फिर तो बंटवारा कराना होगा।
श्बंटवारा्य के बारे में सोचते गुनते ही रणविजय का मस्तिष्क तनाव से भर गया। एक बंटवारा तो उन्होंने देखा हैकृखून के सैलाबों और लाशों से पटी धरती का, भारत और पाकिस्तान का। एक देश को दो हिस्सों में बंटता हुआ। बंटा भी क्या, केवल धड़, सिर तो अपने-अपने स्थान पर बने रह गये, सिरों ने ही अपने अपने हिस्से की धरती का चुनाव किया था। पहली बार उन्हें लगा कि बंटवारे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। समाज का अपना कोई सिर नहीं होता... समाज तो एक अद्भुत गठबन्धन होता है, जो गिने-चुने सिरों के नेतृत्व में चला करता है। तो शायद भारत न बंटा होता, यदि वह कुछ चुनिन्दा सिरों का नेतृत्व न स्वीकारता। बंटवारे से हुआ क्या? क्या संस्कृति और सभ्यता की प्राचीन समरसता खंडित नहीं हुई?
तो महल का बंटवारा क्या सभ्यता और संस्कृति का बंटवारा नहीं होगा? उस खून का बंटवारा नहीं होगा, जो उनके और भइया राजा की नसों में धारा-प्रवाह दौड़ रहा है। वही होगा...
रणविजय अपनी सोच कुछ आगे बढ़ा पाते कि एक छोटी सी चिडिया उड़ती हुई उनके सामने से निकली, जो उनकी आंखों के इतना करीब से गुजरी कि उन्हें सिर को झटका देना पड़ा। चिडिया उनका ध्यान तोड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी। वह वहां आश्वस्त थी और चीं चीं कर रही थी। यह उसकी अपनी भाषा थी, जिसमें उसका सुख-दुख था या गुलाब के खूबसूरत फूलों की प्रशंसा, रणविजय चिडिया के अस्तित्व के बारे में सोचते हुए भावुक हो उठे। तथा चिडिया का चहचहाना सुनते रहे तथा यह भी निश्चित करते रहे कि वे चिडिया नहीं हो सकते, उसकी तरह चहचहाना तो कत्तई नहीं।
सुबह होते ही वे लॉन की तरफ निकल आये थे, फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रह गया था कि उनके साथ कोई दूसरा भी है। उनके साथ पढने वाली लडकी ने जिद्द किया था कि वह गांव देखना चाहती है। भारत तो गांवों का देश है, गांव देखना भारत को देखना होगा। उसने मजबूत तर्क दिया था। रणविजय जानते थे कि भारत के गांव दीखते सरल व सीधे हैं, पर होते काफी जटिल हैं। हालांकि लडकी भारत की ही थी। एक दो बार ही अपने डैड के साथ इंग्लैंड जा पाई थी तथा दो भिन्न-भिन्न तहजीबों में पल-बढ़ रही थी, ऐसी सूरत में वह मानसिक रूप से काफी परिपक्व भी होने लगी थी। कभी-कभी वह उन उत्तरों की चाहना करने लगती, जो उसके डैड या मम्मी ही दे पाते। पर वह पूछती नहीं, उसे उत्तरों को सवाल में बदलना बेतुका और अनावश्यक जान पड़ता। इसीलिये वह डैड और मम्मी के रिश्तों को स्वीकार कर चलती। मम्मी के साथ मम्मी की तरह, डैड के साथ डैड की तरह रहना उसकी आदत बन गई थी।
रणविजय का महल गांव में था, पर गांव महल में नहीं था। वहां दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिकता थी। गांव महल की संस्कृति ही नहीं हवा से भी काफी दूर था। महल की शान्ति, महल का सुख, उसका वैभव, हालांकि गांवों की सांसों पर ही टिका था। फिर भी ऐसा नहीं था कि महल की दीवारों पर गांवों की गरीबी और यातना के चकत्ते उभरते। गांवों की भूख महल में दाखिल हो कर रोटी का टुकड़ा पा जाती या कोई बीमारी अपना दवा इलाज करा पाती, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। रणविजय की मित्र लडकी महल में आकर अचरज पीने लगी थी क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन उसे मालूम था कि महल राजाओं के होते हैं, गरीबों के नहीं। गरीबों के बारे में उसे सुनी-सुनाई बातें मालूम थीं, महल में आकर वह कहीं खो गई थी।
रणविजय की मित्र लडकी सुबह देर से उठती, दैनिक क्रियायें निपटाती, फिर अखबार पढ़ती। उसने देखा कि रणविजय महल में नहीं हैं। किसी नौकर ने बताया कि छोटे भइया लॉन में बैठे हैं, फिर लडकी लॉन की तरफ निकल आई। लॉन की तरफ आते समय भाभी रानी मिली थीं, जो एक आधुनिक महिला थीं, गहनों से लदी, वे चलती तो छन-छन की आवाज होती। लडकी को अच्छा लगता। चेहरे पर कुटिलता नहीं थी, होंठ हमेशा मुस्कराहट पीते रहते, कुल मिलाकर लडकी भाभी रानी से प्रभावित थी, हालांकि उसकी मम्मी भी एक प्रभावशाली महिला थीं पर उनके चेहरे से सादगी फूटती और भाभी रानी के चेहरे पर हुकूमत नाचती रहती, वैभव थिरकता रहता श्उसे भी भाभी रानी की तरह ही महल में रहना होगा, सोचते- सोचते वह लॉन तक आ गई...
श्यहां क्या हो रहा है भाई! किसी कविता की रचना तो नहीं की जा रही?्य उसने पूछा और रणविजय के पास बैठ गई।
श्कुछ नहीं, सोच रहा था कि दिल्ली निकल लिया जाय, छोटा सा उत्तर दिया रणविजय ने।
क्यों शिकार पर नहीं चलना क्या? पूछा लडकी ने।
श्नहीं सरकार ने पाबन्दी लगा दिया है्----रणविजय ने उससे कहा।
कैसी बातें करते हो, डैड ने बताया था कि राजाओं की सारी सुविधायें बहाल कर दी गई हैं, उनकी जमीनों एवं अन्य संपदाओं का बाजार दर के अनुसार मुआवजा मिलेगा। डैड तो बोल रहे थे कि जमीनदारियां व रियासतें छीनी नहीं गई हैं, बल्कि सुविधाजनक समझौते किये गये हैं ताकि अमन-चौन बना रहे...चलो आज शिकार पर चलते हैं...
श्नहीं, लिली नहीं, बच्चों की तरह जिद नहीं करते, भइया राजा ने भी मना किया हुआ है्। रण विजय ने कुछ उदास होकर कहा।
पर लिली तो जिद पर अड़ी थी, उसे शिकार पर निकलना ही था, उसके डैड अब शिकार पर नहीं जाते, उनके पास हथियार भी नहीं। दिल्ली से वह शिकार का रोमांच देखने के लिए ही आई थी। लिली रणविजय के पास से फुदकी और सीधे जा पहुंची भाभी के पास।
श्भाभी रानी, आपसे कुछ कहना है, कहते हुए लिली उनसे चिपक गई।
बोलो क्या है् दुलार भर कर पूछा भाभी ने। उसने ठुनक कर कहाक--
हम शिकार पर निकलना चाहते हैं, पर रणविजय नहीं जा रहे..
तुम दोनों आपस में बातें कर लो, मैं बोलती हूं छोटे भइया को--
यह कहते हुए भाभी रानी लॉन तक आईं, उन्होंने रणविजय से बातें की, पर रणविजय तो खामोश बैठे रहे, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न पड़ रहा हो या जान बूझ कर सुनना ही न चाह रहे हो, पर...भाभी रानी तो उन्हें सुनाने के लिए ही आई थीं कि वे सुनें और लिली के साथ शिकार पर निकलें।
श्नहीं भाभी रानी! मुझे दिल्ली निकलना है और फिर शिकार का मूड भी नहीं, वैसे भी नई सरकार ने शिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, अब जंगल भी अपना नहीं है।
तो क्या हुआ! हमारे पास तो सरकारी पास है, पिछले हफ्ते ही भइया राजा शिकार पर निकले थे।्य भाभी रानी ने समझाने और राजी करने की हद तक रणविजय को समझाया, पर रणविजय कहां समझने वाले थे, फिर भाभी रानी ने लिली को ही आश्वस्त किया...
श्जाने दो लिली, दुबारा आना, फिर हम भी निकलेंगे शिकार पर, लम्बा समय गुजर गया है शिकार पर गये हुए भाभी ने लिली को किसी बच्चे की तरह विषयान्तरित किया।
रणविजय का शिकार पर न निकलना, भाभी रानी के सन्देह को पक्ड्ढका कर गया। भाभी रानी देख रही थीं कि जबसे महाराज ने रणविजय को भला बुरा कहा है, तब से उनका चहकना बन्द है। उन्होंने खुद को अपने में समेट लिया है। लेकिन भाभी रानी यह नहीं जानती थी कि भइया राजा वास्तव में उन्हें महल से निर्वासित ही करना चाहते हैं, वे तो उसे सामान्य सी परिघटना ही मान रही थीं कि भाइयों में ऐसा होता रहता है, सामान्य अनुशासन के तहत। पर मामला इतना ही नहीं था, भले ही भाभी रानी को आगे क्या होगा? नहीं मालूम था। लेकिन उन्हें यह तो मालूम ही था कि भइया राजा ने लिली के बारे में ही रणविजय से कहा-सुना था।
लिली यानि उस अंग्रेज की लडकी, उसी दासी की पुत्री जिससे उस अंग्रेज ने भारतीय रीति-रिवाज के अनुसार विवाह रचाया था। भाभी रानी उस अंग्रेज के बारे में पहले से ही जानती थीं, उन्हें बड़ी अम्मा रानी ने बताया था कि वह अंग्रेज, तब एक बहुत बड़ा हाकिम था। उस समय हर ओर अंग्रेजों की हुकूमत थी। अंग्रेज हाकिम से महाराज की काफी पटरी थी, वह जब भी शिकार पर जाता, महाराज को साथ लिये रहता। वह महाराज को उनकी शक्ल सूरत देख कर राजा ही समझता, पर वे राजा नहीं थे।
अंग्रेज हाकिम इतना ताकतवर तथा प्रभावशाली था कि वह जिसे चाहता राजा बनवा देता, खास तौर से ऐसे लोगों का जो मुगलों के विरोध में थे। उसी अंग्रेज हाकिम ने भइया को भी राजा बनवा दिया। राजा बनवाने के पहले वह यहां आया था, उसे आमंत्रित किया गया था। बड़ी अम्मा रानी उस किस्सा को काफी हास्यास्पद अंदाज में बतातीं।
रामदयाल के पिता एक प्रभावशाली आदमी थे तथा मुगलों के यहां वजारत का काम किया करते थे, यह सारा कुछ उन्हीं का किया कराया था। जब अंग्रेज हाकिम के यहां आया तथा उसका स्वागत सत्कार किया जा रहा था उस समय रामदयाल के पिता, हाकिम के साथ-साथ थे तथा यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाय।
गड़बड़ तो कुछ होना ही नहीं था, अंग्रेज हाकिम का जोरदार स्वागत सत्कार किया गया। रात में आदिवासी नृत्य आयोजित किया गया। दासी, जो तब दासी थी, बहुत बढिया नृत्य भी करती थी। वह आदिवासी गांवों की रहने वाली थी, मूल रूप से वह आदिवासी नहीं थी, पर आदिवासियों के साथ रहते रहते उन्हीं के संस्कारों में ढली हुई थी। आदिवासी औरतों ने उसे पकड़ लिया तथा इतना मजबूर किया कि उसे नाचना पड़ा। फिर तो उसने खूब खुल कर नृत्य भी किया...यह भूल कर कि वह नृत्य कर रही है। दरअसल उसका नृत्य काफी प्रभावशाली था, हालांकि आदिवासी नृत्य श्करमा्य एक समूह नृत्य होता है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों पंक्तिबद्ध होकर एक दूसरे का हाथ पकड़, थोड़ी सी गर्दन झुका कर मानो वे जमीन देख रहे हों, एक निश्चित गोलाई में ही थिरकते हैं। उनके थिरकने से पैरों की घुंघरु, हाथों के कंगन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मधुर स्वरों में बजने लगते हैं। घुंघरुओं का श्छुन-छना छन-छन्य इतना प्रभावकारी होता है कि किसी को भी प्रभावित कर सकता है। लिली की मां थी कि वह नृत्य में मगन थी थोड़ा सा नशे के सुरूर में थी, हालांकि दारू तो सभी नाचने वालियों ने भी पिया था। बिना दारू पिये, करमा नाचना मुश्किल है।
नृत्य देखने वाले भी दारू के नशे में डूबे थे, उन्हें हर तरफ चांद तारे दिख रहे थे, उनके दिल बरसात के रिम-झिम से भरे हुए थे। अंग्रेज हाकिम दारू पीने के बाद भी काफी संयत था तथा उसे मालूम था कि वह मेहमान ही नहीं, एक ऐसा हाकिम हैय जिसकी कलम राजा और प्रजा बनाया करती है। वैसे भी उसे संयत तो रहना ही था क्योंकि उसी को वहां सारे लोग देख रहे थे। उसे अपनी मर्यादा का पूरा ख्याल था, जिसे वह पूरी तरह बचाये हुए था।
अंग्रेज हाकिम नृत्य देखने में इतना मगन था कि उसके सामने की रखी दारू की गिलास खाली नहीं हुई। सामने जो खास तौर से फ्राई की गई मछली रखी गई थी जिसे बंगाल से मंगवाया गया था, वह प्लेट भीआसमान ही ताकती रही। रामदयाल के पिता ने एक दो बार अंग्रेज हाकिम से आग्रह भी किया जिसे वह विनम्रता से टाल गया। वह तो नृत्य की तरफ था, खास तौर से लिली की मां की तरफ। जो समूह में थी, उसके साथ दस और लड़कियां थीं, नौजवान आकर्षक देह वाली वैसे उनके चेहेरे के रंगों में फूलोंवाला आकर्षण नहीं था। फिर भी ऐसा नहीं था कि उनमें पुरुष मन उद्वेलित करने का चुम्बकत्व नहीं था। लोग बाग नृत्य की तरफ खिंचे हुए थे, अंग्रेज हाकिम था कि वह लिली की मां की तरफ एकटक था। उसे लगता कि वह अकेली नृत्य कर रही है और समूह है कि उसमें महज सहभागिता कर रहा है। उसके भारतीय ज्ञान ने उससे कहलवाया श्नृत्य की देवी्य।
श्करमा्य के गायन और नृत्य की संयुक्तता से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित था। कुछ देर के लिए तो वह भावुक हो उठा, फिर तो उसे लगा कि वह कुर्सी छोड़ चुका है और लिली की मां का हाथ पकड़ कर उसी की तरह थिरकने लगा है। पर उसने खुद को दृढ़ किया कि उसे आम लोगों के बीच अपनी निश्छल भावुकता को रोकनी चाहिए। वस्तुतरू उसने ऐसा किया भी और भूनी मछली के साथ एक घूंट दारू भी पिया। अब वह ठीक था तथा हाकिम होने के प्रभाव को बचाये हुए था। फिर भी मन के गहरे में लिली की मां तैरने लगी थी खजुराहों की नग्न मूर्तियों की तरह। अंग्रेज हाकिम ने खजुराहों की मूर्तियां देखा था, जो किसी भी कोमल मन की उदात्तता बहुत ही मीठे ढंग से खींच लिया करती है। आदिवासी नृत्य करने वाली लड़कियां धीरे-धीरे खजुराहों की मूर्तियों में परिवर्तित होने लगीं, फिर तो अंग्रेज हाकिम के लिए वहां रुकना कठिन हो गया। वह सीधे विश्राम कक्ष में जा पहुंचा...।
पीछे-पीछे रामदयाल के पिताजी थे, फिर जाने क्या हुआ कि अंग्रेज हाकिम उसी रात वहां से वापस हो लिया, इसे अपशगुन माना गया कि कहीं हाकिम नाराज तो नहीं हो गया? पर वह नाराज नहीं था। यह बात दूसरे दिन मालूम हुई, जब रामदयाल के पिता उससे मिले। फिर तो लिली की मां व उसके माता-पिता से उन्होंने बातें की कि अंग्रेज हाकिम शादी करना चाहता है और यह भी कि अब वह इंग्लैण्ड वापस नहीं लौटेगा।
वहां तो सभी अचरज में थे कि इतना बड़ा हाकिम करने क्याजा रहा है? भइया राजा भी अचरज में थे, पर जो होना था वह होने के लिए समय का अनुकूलन कर रहा था। लडकी के मां बाप तो बहुत खुश थे, उन्हें केवल चिन्ता इस बात की थी कि वे दुबारा अपनी लडकी से न मिल सकेंगे, पर उन्हें आश्वस्त किया गया कि ऐसा नहीं होगा तथा उनकी यह बात भी मान ली गई कि शादी आदिवासी परंपरा के अनुसार ही होगी।
अंग्रेज हाकिम ने वैसा ही किया भी तथा लडकी के मां बाप के लिए एक गांव भी खरीद दिया, जो पड़ोसी रियासत में पड़ता था। अंग्रेज हाकिम आदिवासियों की परंपरा से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था कि जब तक लिली की मां गर्भवती नहीं होगी, शादी नहीं हो सकती। वस्तुतरू वैसा ही हुआ, लिली की मां अंग्रेज हाकिम के साथ रहने लगीं, जब गर्भवती हुईं तभी शादी का आयोजन किया गया। पड़ोस की दोनों रियासतों ने मिल कर जंगल में ही जहां उसके मां बाप के लिए गांव खरीदा गया था, शादी का प्रबन्ध किया। अद्भुत आयोजन था। मयूर के पंखों और जंगली फूलों से सजा हुआ, आदिवासी लिबास में अंग्रेज हाकिम अद्भुत एवं आकर्षक लग रहा था, बड़ी अम्मा रानी भी शादी में शामिल थीं।
भाभी रानी ने लिली को आश्वस्त ही नहीं किया, वरन उसे अपने साथ लान से वापस महल में लौटा ले आईं। रणविजय भी भाभी रानी के साथ ही वापस हुए, पर उनका महल में दाखिल होना महल से निर्वासित भी होना था। महल का बंटवारा सामान्य न होगा ...ऐसा सोच कर वे कांप उठे तथा सोचने लगे कि कल ही दिल्ली निकल चलना होगा। भाभी रानी लिली के साथ थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि दासियों वाली गंध लिली में चिपकी होगी, उसे वे पकड़ें। पर वहां तो दूसरी गन्ध थी ऐसी गंध जो भाभी रानी के पास तक थी, अंग्रेजी मेमों के साथ हो पर वे देसी हो जाती थीं किसी बंसवारी से निकलती हुई, लिली थी कि उससे बंसवारियां तथा जंगल की सरसराहटें गायब थीं। भाभी रानी को हालांकि लिली ने गहरे तक प्रभावित किया, फिर भी वे मान कर चल रही थीं कि भइया राजा इसे उनकी देवरानी तो नहीं बनाएंगे, फिर क्याहोगा, इसका? ये दोनों तो स्त्री-पुरुष की सारी वर्जनायें तोड़ एक दूसरे में अर्न्तलयित हो चुके हैं।
भाभी रानी, भइया राजा, रणविजय अंग्रेज हाकिम, दासी और लिली इन सबके अलावा पूरी खामोशी के साथ अपनी भव्यता व विलक्षणता बचाये हुए महल खड़ा था वही महल, जहां इतिहास जन्मता है। रणविजय महल में किसी अजनबी की तरह रात भर गुजार सकें, रात भर उन्हें दीखता रहा कि इतिहास टूट रहा है, खंड-खंड होकर बिखर रहा है। पास में सोई लिली ऐसी सोई हुई थी, जैसे उसके सपने भी नींद में चले गये हों।
उपन्यास के लिए संपर्क करें.....
प्रकाशक...
पिलग्रिम्श पब्लिशिंग,
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी-221010
0542-2314060, 2312456







