Monday, November 23, 2015

दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश

दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश

    






 कुछ अपनी बातें...
 दूसरी  आजादी् का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे हैं। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे।
आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र श्मीरजापुर् जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो श्सोनभद्र् एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वही दूसरी आजादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के ५७प्रतिशत  भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और प्रति व्यक्ति भूमिधारिता एक बीघे के कुछ भाग तक सीमित है। खाद्यान्न की उपलब्धता पांच सौ ग्राम से भी कम है। वन विभाग की जमीन्दाराना गतिविधियों के दंश और प्रताडना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ड्ढठुर हो तो अचरज की बात नहीं।
सोनभद्र में आपात काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मैं गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मैंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सुमिदिनी जिस तरह से राज व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात काल के दौर में जब दलित साहित्य का कहीं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन प्रबन्धन के खिलाफ संघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा श्हरियल की लकड़ी्य उपन्यास की नायिका है उसके संघर्षों को भी उल्ड्ढिलखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन से टकराती है फलस्वरूप प्रबन्धन उसे जेल भिजवा देता है।
मैं आभारी हूं पिलग्रिम्स प्रकाशन का तथा भाई गोपाल ठाकुर एवं सुरेश जायसवाल जी का जिनके सहयोग से २००८ में श्डफली बजाये जा्य कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ तथा तीसरा  रास्ता् उपन्यास भी।
तीसरा  रास्ता् उपन्यास के माध्यम से देश में जड़ जमाये एन. जी. ओ. की कार्य संस्कृति और परणति को देखने, समझने का प्रयास किया गया है। दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें तो कम से कम आजाद और जनतांत्रिक भारत में वर्ण, स्त्री  और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल हैं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे हैं। हालांकि यह सच है कि इन सवालों से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्टड्ढ (जो खुद को साबित कर सकें) लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलोच्य विषय हैं तो आलोचना भी, वही कथाकार हैं तो कथानक भी, वही पाठ है तो पाठ्य विषय भी। वे ही अखंडित हैं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दूसरा पाठ रचते हैं तो दूसरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी हैं। वे साहित्य का द्वन्द है तो अन्तर्द्वन्द भी। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक हैं, ब्रह्म हैं तथा साहित्य के प्रजनन श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका बाह्य रूप संसद की तरह है, उसमें हासिए पर पड़ा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शोषित, यातनाग्रस्त, प्रताडि़त वर्ग समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग से। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना होगी और वह यथार्थ कल्पना का यथार्थ होगा शिल्प और भाषा से सजा-संवरा चूमने चाटने लायक।
वैसे आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, वैश्ड्ढवीकरण, अणुबम संस्कृति सामाजिक वानिकी को चाहे जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप से प्रकट हुई हैकृवह है अपनी पीठ ठोंकने की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध हैं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरों की तलाश में है। एक बार फिर याद दिलाना चाहूंगा कि हम वर्ण (धर्म, जाति, गोत्र) सम्पत्ति व पूंजी  के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सोच रहे हैं और खुद को परिवर्तित होने से बचा रहे हैं। यदि कुछ कर भी रहे हैं तो आंख मारने जैसा ही। मैं साफ तौर से कहना चाहूंगा कि उपन्यास और कहानियों के लिए विषय का चुनाव मेरे लिए जटिल मामला है, कदाचित यह जटिल न भी होता, यदि मैं नागर समाज का होता। गंवई आदमी होने के नाते मेरी सोच भी गंवई है। फलस्वरूप मैं सोच नहीं पाता कि एक सक्रिय ी प्रजनन के नैसर्गिक गुण से अपने को मुक्त कर लें। दैहिक सम्बन्धों के लिये मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को धोखों और वादाखिलाफी से गढ़े।
सम्पत्ति, वर्ण और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत ी मुझे प्रभावित करती है और ऐसी ियां ही कथा पात्री हैं। मेरे लिए अपने मित्रतापूर्ण सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए उसके सुखों, दुखों को भोगते हुए तथा अपने सहभागिता पूर्ण सम्बन्धों को प्रमाणित करते हुए कि वे वादा खिलाफ और धोखेबाज नहीं है। देह उनके लिए सगुण समाधि है, न कि निर्गुण मोक्ष। सम्पत्ति के सवाल पर मैं आज भी भूमि प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हों, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। हरियल की लकड़ी, सहपुरवा, तीसरा रास्ता और मेरा यह चौथा उपन्यास श्दूसरी आजादी्य धोखे पूर्ण भूमि-प्रबन्धन पर सवाल उठाते हैं।
मैं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आजादी में कुछ इसी तरह की बहस से आप रूबरू होंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा, यदि आप निराश होते हैं तो मुझे क्षमा करें। छोटन के अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
श्दूसरी आजादी्य उपन्यास की सगुण या निर्गुण आलोचना के लिए आपकी प्रतिक्षा में-

रामनाथ शिवेन्द्र           
अक्षर घर, पूरब मोहाल रार्बट्सगंज (सोनभद्र)
मोबाइल...07376900866


 पहला अंश ----                    टूटता इतिहास

जो होना था, हो चुका था, इस होने और हो चुकने के बीच रणविजय, उलझे हुए थे। वे समझ पाने में असमर्थ थे कि उन्हें अपनों से अपेक्षा रखनी चाहिए कि नहीं, फिर उनका गुनाह क्या था, ऐसी विषम स्थिति की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं किया थाकृश्ऐसा भी हो सकता है।्य
एक दिन वे अकेले हो जायेंगे, अपने में डूबा हुआ, बाहर निकलने के लिए किसी गलियारे की तलाश करता, लेकिन बाहर निकल कर जाना कहां? हर ओर धुआं ही धुआं, आग ही आग, मार-काट, खून-खराबा। वे लॉन में बैठे हुए थेकृसुबह की नरम धूप भी उन्हें जला रही थी, जैसे आग में से तप कर आ रही हो। सामने दीख रहे फूलों की सुगन्ध का कहीं पता नहीं था, वहां धमाके थे, बमों की गर्जनायें थीं। नारियलों के पौधे हिलते तो वे सिहर उठते, भीतर से सवाल उठताकृश्क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
उन्हें अपने मनुष्य होने तथा मनुष्य बने रह सकने पर सन्देह हुआ। उन्होंने अपने हाथों को देखा, उसे इधर-उधर झटका दिया, उनमें पहले वाली ही ऊर्जा थी, वे फावड़ा, कुल्हाड़ी कुछ भी चला सकते थे, सामने से आ रहे बाघों को मार सकते थे तथा एक ही हाथ से रायफल दाग सकते थे। हाथ तो ठीक ठाक है, पूरी तरह दुरुस्त और स्वस्थ।
वे फौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए, लान में टहलने लगे, एक तरफ से दूसरी तरफ तक, अगल-बगल देख कर उन्होंने दौडना शुरू किया, गोया वे टहल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, विपरीत परिस्थितियों में आगे या पीछे भाग कर खुद को बचा सकते हैं। दौड़ते हुए ही उन्होंने महल देखा, महल सामने पूरी लम्बाई-चौड़ाई में खड़ा था, उन्हें घूरता हुआ। उसके बुर्ज, उसकी छतें, सारी चीजें उन्हें घूरती हुई दिख रही थीं, जैसे वे भी पूछ रही हों, क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
रणविजय उत्तरहीन थे। वही रणविजय... जो स्वतंत्रता संग्राम के बारे में सोचा करते थे। राजनीति के आचरण के बारे में तर्क किया करते थे। राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विषयों के बारे में मित्रों से बहसें किया करते थेकृगान्धी के अहिंसा के पक्ष में किसिम-किसिम के भारतीय मानस की चर्चा किया करते थे तथा उन रास्तों का विरोध किया करते थे, जो स्वतंत्रता हासिल करने के लिये युद्ध व हिंसा की पैरवी करते थे। हजारों साल की भारतीय गुलामी पर उनके तर्क विस्मयकारी थे, उनका मानना था कि भारतीय मन पूरी तरह मोह और माया से मुक्त आध्यात्मिक रहा है, वहां भौतिकता व इहलौकिता का रंच मात्र प्रभाव नहीं, जैसा कि अरबियों व ब्रिटिशियर्सों का हुआ करता है। मोह ग्रस्तता, कुंठित स्वार्थ तथा घृणित इहलौकिकता से पूर्ण। सारा कुछ अपने लिए तथा अपने को समाज पर आरोपित करता हुआ, सामाजिक होने तथा सामाजिकता का विभत्स प्रदर्शन। वही रणविजय निरुत्तर थे, वे महल की तरफ न देख सके, उन्होंने आंखें फेर लीं तथा लॉन के फूलों पर केन्द्रित कर लिया।
उनकी आंखें फूलों की तरफ केन्द्रित न रह सकीं, उन्हें फिर महल की दीवारों की तरफ लौटना पड़ा, उन्हें जान पड़ा कि महल कोई साधारण पनाहगाह नहीं, यहां विशेष किस्म के इतिहास का निर्माण होता है। यह किसी उत्पादन इकाई की तरह है, यहां सत्ता की नस्लें पैदा होती हैं, नस्लों की पहले कल्पना की जाती है, फिर उसे गढने व रचने का काम शुरू होता है। यहां युद्ध की भूमिका ही नहीं, उसके एकतरफा लाभकारी गुणों को रेखांकित किया जाता है। सेनायें इन्हीं महलों के इरादों पर अपना नाच नाचती हैं, उनका नृत्य खून से सने जमीन पर होता है, जहां सिर अलग ढंग से तथा धड़ अलग ढंग से अपनी युद्धगत भागीदारी की पहचान कराते हैं। एक बारगी उन्हें झटका लगा, वे आहत हुए फिर उन्हें लगा कि कोई अदृश्य ताकत है, जो उनका जीवन बहुत ही निर्ममता से छीन रही है पर वहां कोई ऐसी ताकत नहीं थी, जो उन्हें लान के फूलों, पौधों या पीछे मुस्करा रहे महल की तरह दीखती। पर वे तो वर्तमान जो भविष्य बना हुआ था, उसकी निर्मम कल्पना में फंसे हुए थे। उनके सामने कल जो बीत चुका था, एक पुरानी कल्पनाक--जिस पर कालिख पोती जा चुकी थी, और कल जो आने वाला था, वह उन्हें आतंकित कर रहा था श्कि तुम्हारा भविष्य गहरे कुंए में जा गिरा है और तुम एक अंधे भविष्य के आदमी हो। जहां सूरज उगता है, चांद खिलता है, मौसम हंसता-गुनगुनाता है, रिमझिम बदरियां दिल-दिमाग को बसन्ती बनाती है, फिर भी उन्हें तुम न देख सकते हो, न महसूस कर सकते हो।्य फिर तो उन्हें लगा कि वे अपनी आंखें खो चुके हैं, उन्हें कुछ नहीं दिख रहा, तभी किसी मुलायम हवा ने उन्हें सहलाया...
वे ठीक-ठाक ही नहीं, इतना ठीक-ठाक थे कि अपना होना बचा सकते थे तथा वह सब तौर-तरीका आजमा सकते थे, जो ठीक-ठाक होने के लिए समय और समाज द्वारा प्रस्तावित थे। तरीके दो थे या तो भागो या आगे बढ़ो। दोनों तरीके युद्धकालीन थे। भागने वाले तरीके में जमीन पर लेट जाना भी था। वे क्या करें, भागें और जमीन पर लेट कर इच्छा मृत्यु का प्रयास करें या आगे बढ़ें, ...और हत्या, प्रति हत्या करें। फिर विजेता के गौरव से आत्ममुग्ध हों। वे आत्म-लीन हो उठे, जैसे उनके मन के गहरे में विषम स्थितियों के सापेक्ष समाधान हों। पर वहां भी तूफान थे। तूफानों में तर्क थे, एक दूसरे की विपरीतता को प्रभावित करते...।
अचानक उन्हें लगा कि वे विजेता नहीं बनना चाहते, वे हिंसा, प्रतिहिंसा से अपना भविष्य संवारना नहीं चाहते। किसी सन्त की तरह उन्होंने विचारा---उन्हें किसी का जीवन लेने का क्या अधिकार?
श्लेकिन यदि उनका अधिकार छीना गया हो फिर्य
फिर तो... वे उलझ गये, अधिकार का मामला जटिल था। इतना जटिल, उन्होंने उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया इस मुद्दे पर उनके ज्ञात दार्शनिकों ने भी उनकी मदद नहीं की। भारतीय दार्शनिक तो किसी अधिकार की कल्पना तक नहीं करते... ले देकर उनके सामने महाभारत का उदाहरण था...श्सूई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य, दुर्योधन का यह दुराग्रही फैसला महाविनाशकारी युद्ध को आमंत्रित करता हैकृवे कांप उठे, उनके साथ कोई नहीं, यदि साथ में कृष्ण होते, फिर वे सोचते... नहीं! महाभारत महज एक कल्पना हैकृसंपत्ति के अधिकार के लिए युद्ध की अनिवार्यता को प्रमाणित करता, पर मन के गहरे में घुस चुके प्रबोधन आसानी से पिन्ड नहीं छोड़ते, वे धुआं-धुआं हो उठे।
श्सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य दुर्योधन का कल्पित चेहरा उनके सामने जीवन्त हो उठा और वह चेहरा भी जब वह सारा कुछ हार चुका होता है, अपने सभी भाईयों को घृणित अभिमान के युद्ध में गवां चुका होता है... उन्हें लगा कि वह युद्ध एक ऐसा विवादास्पद युद्ध था, जिसमें सभी पराजित होते हैं, कृष्ण अपनी कूटनीति में हारते हैं और दुर्योधन को ऐतिहासिक सन्तुलन के लिए राजी नहीं करा पाते। युधिष्ठिर अपने सच से पराजित होते हैं, अर्जुन, कर्ण से हारते हैं तथा कृष्ण जैसे देव रूप से अपना रथ हंकवाते हैं। कुन्ती अपनी गोपनीय सच को छिपाने में इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे कर्ण को पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए सहमत करने का प्रयास करना पड़ता है, तो उस युद्ध का कोई विजेता नहीं, सभी पराजित होते हैं...।
श्नहीं! नहीं, उन्हें किसी भी युद्ध को आमंत्रित नहीं करना्य उन्हें जय-पराजय दोनों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं... फिर क्या होगा, श्भइया राजा ने तो उन्हें महल से निर्वासित होने का आदेश दे दिया है्य भइया राजा के आदेश का अनुपालन या सबल प्रतिरोध, आखिर क्या करना है उन्हें?
श्आदेश का अनुपालन ही ठीक होगा्य
अचानक रणविजय ने समय के साथ हस्तक्षेप किये जा सकने वाले विचारों में से एक का चुनाव किया, यह उनके लिए खुशी प्रदान करने वाला क्षण था। ऐसा इसलिए कि उन्होंने आदेश का अनुपालन ही अब तक सीखा था, बड़ी अम्मा रानी यही सिखाया करती थीं। लेकिन उन्हें आदेश के अनुपालन के बाबत उचित अनुचित का ख्याल नहीं करना चाहिये विवेक भी तो कुछ होता है इसके आगे रणविजय विचारों के अंधेरे में कहीं खो गये...
एक उलझन भरी स्थिति, ऐसी स्थिति जो दीखती स्पष्ट, पर वह दीखने का आभास ही होती।
उनकी खुशी क्षण-भंगुर थी, जैसे आई वैसे लौट गई।
रणविजय को अपना जीवन खुरचने लगा, जो उन्होंने गांधी के चरणों पर चढ़ा दिया था...गांधी के दिशा निर्देशों से कौन सी शिक्षा उन्होंने हसिल किया है... श्सविनय अवज्ञा् यह है कि नहीं वे धरना और सत्याग्रह करते रहे कि नहीं, ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा करते रहे हैं कि नहीं।
श्हां ऐसा तो है्य फिर तो भइया राजा के सामने उन्हें हाजिर होना होगा् आखिर उनका अपराध क्या है? यह तो बतायें भइया राजा्----
रणविजय ने पारिवारिक संस्कारों से बाहर होकर समय की आवश्यकतानुसार कुछ करने के लिए सोचा कि चुपचाप होकर निर्वासित हो जाना, अपना अधिकार छोड़ देना, कायरता होगी। यह महल, महल के इर्द-गिर्द वाली सारी संपदा पर उनका भी अधिकार है, केवल भइया राजा का ही नहीं। फिर तो बंटवारा कराना होगा। 
श्बंटवारा्य के बारे में सोचते गुनते ही रणविजय का मस्तिष्क  तनाव से भर गया। एक बंटवारा तो उन्होंने देखा हैकृखून के सैलाबों और लाशों से पटी धरती का, भारत और पाकिस्तान का। एक देश को दो हिस्सों में बंटता हुआ। बंटा भी क्या, केवल धड़, सिर तो अपने-अपने स्थान पर बने रह गये, सिरों ने ही अपने अपने हिस्से की धरती का चुनाव किया था। पहली बार उन्हें लगा कि बंटवारे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। समाज का अपना कोई सिर नहीं होता... समाज तो एक अद्भुत गठबन्धन होता है, जो गिने-चुने सिरों के नेतृत्व में चला करता है। तो शायद भारत न बंटा होता, यदि वह कुछ चुनिन्दा सिरों का नेतृत्व न स्वीकारता। बंटवारे से हुआ क्या? क्या संस्कृति और सभ्यता की प्राचीन समरसता खंडित नहीं हुई?
तो महल का बंटवारा क्या सभ्यता और संस्कृति का बंटवारा नहीं होगा? उस खून का बंटवारा नहीं होगा, जो उनके और भइया राजा की नसों में धारा-प्रवाह दौड़ रहा है। वही होगा...
रणविजय अपनी सोच कुछ आगे बढ़ा पाते कि एक छोटी सी चिडिया उड़ती हुई उनके सामने से निकली, जो उनकी आंखों के इतना करीब से गुजरी कि उन्हें सिर को झटका देना पड़ा। चिडिया उनका ध्यान तोड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी। वह वहां आश्वस्त थी और चीं चीं कर रही थी। यह उसकी अपनी भाषा थी, जिसमें उसका सुख-दुख था या गुलाब के खूबसूरत फूलों की प्रशंसा, रणविजय चिडिया के अस्तित्व के बारे में सोचते हुए भावुक हो उठे। तथा चिडिया का चहचहाना सुनते रहे तथा यह भी निश्चित करते रहे कि वे चिडिया नहीं हो सकते, उसकी तरह चहचहाना तो कत्तई नहीं।
सुबह होते ही वे लॉन की तरफ निकल आये थे, फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रह गया था कि उनके साथ कोई दूसरा भी है। उनके साथ पढने वाली लडकी ने जिद्द किया था कि वह गांव देखना चाहती है। भारत तो गांवों का देश है, गांव देखना भारत को देखना होगा। उसने मजबूत तर्क दिया था। रणविजय जानते थे कि भारत के गांव दीखते सरल व सीधे हैं, पर होते काफी जटिल हैं। हालांकि लडकी भारत की ही थी। एक दो बार ही अपने डैड के साथ इंग्लैंड जा पाई थी तथा दो भिन्न-भिन्न तहजीबों में पल-बढ़ रही थी, ऐसी सूरत में वह मानसिक रूप से काफी परिपक्व भी होने लगी थी। कभी-कभी वह उन उत्तरों की चाहना करने लगती, जो उसके डैड या मम्मी ही दे पाते। पर वह पूछती नहीं, उसे उत्तरों को सवाल में बदलना बेतुका और अनावश्यक जान पड़ता। इसीलिये वह डैड और मम्मी के रिश्तों को स्वीकार कर चलती। मम्मी के साथ मम्मी की तरह, डैड के साथ डैड की तरह रहना उसकी आदत बन गई थी।
रणविजय का महल गांव में था, पर गांव महल में नहीं था। वहां दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिकता थी। गांव महल की संस्कृति ही नहीं हवा से भी काफी दूर था। महल की शान्ति, महल का सुख, उसका वैभव, हालांकि गांवों की सांसों पर ही टिका था। फिर भी ऐसा नहीं था कि महल की दीवारों पर गांवों की गरीबी और यातना के चकत्ते उभरते। गांवों की भूख महल में दाखिल हो कर रोटी का टुकड़ा पा जाती या कोई बीमारी अपना दवा इलाज करा पाती, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। रणविजय की मित्र लडकी महल में आकर अचरज पीने लगी थी क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन उसे मालूम था कि महल राजाओं के होते हैं, गरीबों के नहीं। गरीबों के बारे में उसे सुनी-सुनाई बातें मालूम थीं, महल में आकर वह कहीं खो गई थी।
रणविजय की मित्र लडकी सुबह देर से उठती, दैनिक क्रियायें निपटाती, फिर अखबार पढ़ती। उसने देखा कि रणविजय महल में नहीं हैं। किसी नौकर ने बताया कि छोटे भइया लॉन में बैठे हैं, फिर लडकी लॉन की तरफ निकल आई। लॉन की तरफ आते समय भाभी रानी मिली थीं, जो एक आधुनिक महिला थीं, गहनों से लदी, वे चलती तो छन-छन की आवाज होती। लडकी को अच्छा लगता। चेहरे पर कुटिलता नहीं थी, होंठ हमेशा मुस्कराहट पीते रहते, कुल मिलाकर लडकी भाभी रानी से प्रभावित थी, हालांकि उसकी मम्मी भी एक प्रभावशाली महिला थीं पर उनके चेहरे से सादगी फूटती और भाभी रानी के चेहरे पर हुकूमत नाचती रहती, वैभव थिरकता रहता श्उसे भी भाभी रानी की तरह ही महल में रहना होगा, सोचते- सोचते वह लॉन तक आ गई...
श्यहां क्या हो रहा है भाई! किसी कविता की रचना तो नहीं की जा रही?्य उसने पूछा और रणविजय के पास बैठ गई।
श्कुछ नहीं, सोच रहा था कि दिल्ली निकल लिया जाय, छोटा सा उत्तर दिया रणविजय ने।
क्यों शिकार पर नहीं चलना क्या? पूछा लडकी ने।
श्नहीं सरकार ने पाबन्दी लगा दिया है्----रणविजय ने उससे कहा।
कैसी बातें करते हो, डैड ने बताया था कि राजाओं की सारी सुविधायें बहाल कर दी गई हैं, उनकी जमीनों एवं अन्य संपदाओं का बाजार दर के अनुसार मुआवजा मिलेगा। डैड तो बोल रहे थे कि जमीनदारियां व रियासतें छीनी नहीं गई हैं, बल्कि सुविधाजनक समझौते किये गये हैं ताकि अमन-चौन बना रहे...चलो आज शिकार पर चलते हैं...
श्नहीं, लिली नहीं, बच्चों की तरह जिद नहीं करते, भइया राजा ने भी मना किया हुआ है्। रण विजय ने कुछ उदास होकर कहा।
पर लिली तो जिद पर अड़ी थी, उसे शिकार पर निकलना ही था, उसके डैड अब शिकार पर नहीं जाते, उनके पास हथियार भी नहीं। दिल्ली से वह शिकार का रोमांच देखने के लिए ही आई थी। लिली रणविजय के पास से फुदकी और सीधे जा पहुंची भाभी के पास।
श्भाभी रानी, आपसे कुछ कहना है, कहते हुए लिली उनसे चिपक गई।
बोलो  क्या है् दुलार भर कर पूछा भाभी ने। उसने ठुनक कर कहाक--
हम  शिकार पर निकलना चाहते हैं, पर रणविजय नहीं जा रहे..
तुम  दोनों आपस में बातें कर लो, मैं बोलती हूं छोटे भइया को--
यह कहते हुए भाभी रानी लॉन तक आईं, उन्होंने रणविजय से बातें की, पर रणविजय तो खामोश बैठे रहे, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न पड़ रहा हो या जान बूझ कर सुनना ही न चाह रहे हो, पर...भाभी रानी तो उन्हें सुनाने के लिए ही आई थीं कि वे सुनें और लिली के साथ शिकार पर निकलें।
श्नहीं भाभी रानी! मुझे दिल्ली निकलना है और फिर शिकार का मूड भी नहीं, वैसे भी नई सरकार ने शिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, अब जंगल भी अपना नहीं है।
तो  क्या हुआ! हमारे पास तो सरकारी पास है, पिछले हफ्ते ही भइया राजा शिकार पर निकले थे।्य भाभी रानी ने समझाने और राजी करने की हद तक रणविजय को समझाया, पर रणविजय कहां समझने वाले थे, फिर भाभी रानी ने लिली को ही आश्वस्त किया...
श्जाने दो लिली, दुबारा आना, फिर हम भी निकलेंगे शिकार पर, लम्बा समय गुजर गया है शिकार पर गये हुए भाभी ने लिली को किसी बच्चे की तरह विषयान्तरित किया।
रणविजय का शिकार पर न निकलना, भाभी रानी के सन्देह को पक्ड्ढका कर गया। भाभी रानी देख रही थीं कि जबसे महाराज ने रणविजय को भला बुरा कहा है, तब से उनका चहकना बन्द है। उन्होंने खुद को अपने में समेट लिया है। लेकिन भाभी रानी यह नहीं जानती थी कि भइया राजा वास्तव में उन्हें महल से निर्वासित ही करना चाहते हैं, वे तो उसे सामान्य सी परिघटना ही मान रही थीं कि भाइयों में ऐसा होता रहता है, सामान्य अनुशासन के तहत। पर मामला इतना ही नहीं था, भले ही भाभी रानी को आगे क्या होगा? नहीं मालूम था। लेकिन उन्हें यह तो मालूम ही था कि भइया राजा ने लिली के बारे में ही रणविजय से कहा-सुना था।
लिली यानि उस अंग्रेज की लडकी, उसी दासी की पुत्री जिससे उस अंग्रेज ने भारतीय रीति-रिवाज के अनुसार विवाह रचाया था। भाभी रानी उस अंग्रेज के बारे में पहले से ही जानती थीं, उन्हें बड़ी अम्मा रानी ने बताया था कि वह अंग्रेज, तब एक बहुत बड़ा हाकिम था। उस समय हर ओर अंग्रेजों की हुकूमत थी। अंग्रेज हाकिम से महाराज की काफी पटरी थी, वह जब भी शिकार पर जाता, महाराज को साथ लिये रहता। वह महाराज को उनकी शक्ल सूरत देख कर राजा ही समझता, पर वे राजा नहीं थे।
अंग्रेज हाकिम इतना ताकतवर तथा प्रभावशाली था कि वह जिसे चाहता राजा बनवा देता, खास तौर से ऐसे लोगों का जो मुगलों के विरोध में थे। उसी अंग्रेज हाकिम ने भइया को भी राजा बनवा दिया। राजा बनवाने के पहले वह यहां आया था, उसे आमंत्रित किया गया था। बड़ी अम्मा रानी उस किस्सा को काफी हास्यास्पद अंदाज में बतातीं।
रामदयाल के पिता एक प्रभावशाली आदमी थे तथा मुगलों के यहां  वजारत का काम किया करते थे, यह सारा कुछ उन्हीं का किया कराया था। जब अंग्रेज हाकिम के यहां आया तथा उसका स्वागत सत्कार किया जा रहा था उस समय रामदयाल के पिता, हाकिम के साथ-साथ थे तथा यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाय।
गड़बड़ तो कुछ होना ही नहीं था, अंग्रेज हाकिम का जोरदार स्वागत सत्कार किया गया। रात में आदिवासी नृत्य आयोजित किया गया। दासी, जो तब दासी थी, बहुत बढिया नृत्य भी करती थी। वह आदिवासी गांवों की रहने वाली थी, मूल रूप से वह आदिवासी नहीं थी, पर आदिवासियों के साथ रहते रहते उन्हीं के संस्कारों में ढली हुई थी। आदिवासी औरतों ने उसे पकड़ लिया तथा इतना मजबूर किया कि उसे नाचना पड़ा। फिर तो उसने खूब खुल कर नृत्य भी किया...यह भूल कर कि वह नृत्य कर रही है। दरअसल उसका नृत्य काफी प्रभावशाली था, हालांकि आदिवासी नृत्य श्करमा्य एक समूह नृत्य होता है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों पंक्तिबद्ध होकर एक दूसरे का हाथ पकड़, थोड़ी सी गर्दन झुका कर मानो वे जमीन देख रहे हों, एक निश्चित गोलाई में ही थिरकते हैं। उनके थिरकने से पैरों की घुंघरु, हाथों के कंगन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मधुर स्वरों में बजने लगते हैं। घुंघरुओं का श्छुन-छना छन-छन्य इतना प्रभावकारी होता है कि किसी को भी प्रभावित कर सकता है। लिली की मां थी कि वह नृत्य में मगन थी थोड़ा सा नशे के सुरूर में थी, हालांकि दारू तो सभी नाचने वालियों ने भी पिया था। बिना दारू पिये, करमा नाचना मुश्किल है।
नृत्य देखने वाले भी दारू के नशे में डूबे थे, उन्हें हर तरफ चांद तारे दिख रहे थे, उनके दिल बरसात के रिम-झिम से भरे हुए थे। अंग्रेज हाकिम दारू पीने के बाद भी काफी संयत था तथा उसे मालूम था कि वह मेहमान ही नहीं, एक ऐसा हाकिम हैय जिसकी कलम राजा और प्रजा बनाया करती है। वैसे भी उसे संयत तो रहना ही था क्योंकि उसी को वहां सारे लोग देख रहे थे। उसे अपनी मर्यादा का पूरा ख्याल था, जिसे वह पूरी तरह बचाये हुए था।
अंग्रेज हाकिम नृत्य देखने में इतना मगन था कि उसके सामने की रखी दारू की गिलास खाली नहीं हुई। सामने जो खास तौर से फ्राई की गई मछली रखी गई थी जिसे बंगाल से मंगवाया गया था, वह प्लेट भीआसमान ही ताकती रही। रामदयाल के पिता ने एक दो बार अंग्रेज हाकिम से आग्रह भी किया जिसे वह विनम्रता से टाल गया। वह तो नृत्य की तरफ था, खास तौर से लिली की मां की तरफ। जो समूह में थी, उसके साथ दस और लड़कियां थीं, नौजवान आकर्षक देह वाली वैसे उनके चेहेरे के रंगों में फूलोंवाला आकर्षण नहीं था। फिर भी ऐसा नहीं था कि उनमें पुरुष मन उद्वेलित करने का चुम्बकत्व नहीं था। लोग बाग नृत्य की तरफ खिंचे हुए थे, अंग्रेज हाकिम था कि वह लिली की मां की तरफ एकटक था। उसे लगता कि वह अकेली नृत्य कर रही है और समूह है कि उसमें महज सहभागिता कर रहा है। उसके भारतीय ज्ञान ने उससे कहलवाया श्नृत्य की देवी्य।
श्करमा्य के गायन और नृत्य की संयुक्तता से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित था। कुछ देर के लिए तो वह भावुक हो उठा, फिर तो उसे लगा कि वह कुर्सी छोड़ चुका है और लिली की मां का हाथ पकड़ कर उसी की तरह थिरकने लगा है। पर उसने खुद को दृढ़ किया कि उसे आम लोगों के बीच अपनी निश्छल भावुकता को रोकनी चाहिए। वस्तुतरू उसने ऐसा किया भी और भूनी मछली के साथ एक घूंट दारू भी पिया। अब वह ठीक था तथा हाकिम होने के प्रभाव को बचाये हुए था। फिर भी मन के गहरे में लिली की मां तैरने लगी थी खजुराहों की नग्न मूर्तियों की तरह। अंग्रेज हाकिम ने खजुराहों की मूर्तियां देखा था, जो किसी भी कोमल मन की उदात्तता बहुत ही मीठे ढंग से खींच लिया करती है। आदिवासी नृत्य करने वाली लड़कियां धीरे-धीरे खजुराहों की मूर्तियों में परिवर्तित होने लगीं, फिर तो अंग्रेज हाकिम के लिए वहां रुकना कठिन हो गया। वह सीधे विश्राम कक्ष में जा पहुंचा...।
पीछे-पीछे रामदयाल के पिताजी थे, फिर जाने क्या हुआ कि अंग्रेज हाकिम उसी रात वहां से वापस हो लिया, इसे अपशगुन माना गया कि कहीं हाकिम नाराज तो नहीं हो गया? पर वह नाराज नहीं था। यह बात दूसरे दिन मालूम हुई, जब रामदयाल के पिता उससे मिले। फिर तो लिली की मां व उसके माता-पिता से उन्होंने बातें की कि अंग्रेज हाकिम शादी करना चाहता है और यह भी कि अब वह इंग्लैण्ड वापस नहीं लौटेगा।
वहां तो सभी अचरज में थे कि इतना बड़ा हाकिम करने क्याजा रहा है? भइया राजा भी अचरज में थे, पर जो होना था वह होने के लिए समय का अनुकूलन कर रहा था। लडकी के मां बाप तो बहुत खुश थे, उन्हें केवल चिन्ता इस बात की थी कि वे दुबारा अपनी लडकी से न मिल सकेंगे, पर उन्हें आश्वस्त किया गया कि ऐसा नहीं होगा तथा उनकी यह बात भी मान ली गई कि शादी आदिवासी परंपरा के अनुसार ही होगी।
अंग्रेज हाकिम ने वैसा ही किया भी तथा लडकी के मां बाप के लिए एक गांव भी खरीद दिया, जो पड़ोसी रियासत में पड़ता था। अंग्रेज हाकिम आदिवासियों की परंपरा से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था कि जब तक लिली की मां गर्भवती नहीं होगी, शादी नहीं हो सकती। वस्तुतरू वैसा ही हुआ, लिली की मां अंग्रेज हाकिम के साथ रहने लगीं, जब गर्भवती हुईं तभी शादी का आयोजन किया गया। पड़ोस की दोनों रियासतों ने मिल कर जंगल में ही जहां उसके मां बाप के लिए गांव खरीदा गया था, शादी का प्रबन्ध किया। अद्भुत आयोजन था। मयूर के पंखों और जंगली फूलों से सजा हुआ, आदिवासी लिबास में अंग्रेज हाकिम अद्भुत एवं आकर्षक लग रहा था, बड़ी अम्मा रानी भी शादी में शामिल थीं।
भाभी रानी ने लिली को आश्वस्त ही नहीं किया, वरन उसे अपने साथ लान से वापस महल में लौटा ले आईं। रणविजय भी भाभी रानी के साथ ही वापस हुए, पर उनका महल में दाखिल होना महल से निर्वासित भी होना था। महल का बंटवारा सामान्य न होगा ...ऐसा सोच कर वे कांप उठे तथा सोचने लगे कि कल ही दिल्ली निकल चलना होगा। भाभी रानी लिली के साथ थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि दासियों वाली गंध लिली में चिपकी होगी, उसे वे पकड़ें। पर वहां तो दूसरी गन्ध थी ऐसी गंध जो भाभी रानी के पास तक थी, अंग्रेजी मेमों के साथ हो पर वे देसी हो जाती थीं किसी बंसवारी से निकलती हुई, लिली थी कि उससे बंसवारियां तथा जंगल की सरसराहटें गायब थीं। भाभी रानी को हालांकि लिली ने गहरे तक प्रभावित किया, फिर भी वे मान कर चल रही थीं कि भइया राजा इसे उनकी देवरानी तो नहीं बनाएंगे, फिर क्याहोगा, इसका? ये दोनों तो स्त्री-पुरुष की सारी वर्जनायें तोड़ एक दूसरे में अर्न्तलयित हो चुके हैं।
भाभी रानी, भइया राजा, रणविजय अंग्रेज हाकिम, दासी और लिली इन सबके अलावा पूरी खामोशी के साथ अपनी भव्यता व विलक्षणता बचाये हुए महल खड़ा था वही महल, जहां इतिहास जन्मता है। रणविजय महल में किसी अजनबी की तरह रात भर गुजार सकें, रात भर उन्हें दीखता रहा कि इतिहास टूट रहा है, खंड-खंड होकर बिखर रहा है। पास में सोई लिली ऐसी सोई हुई थी, जैसे उसके सपने भी नींद में चले गये हों।

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पिलग्रिम्श पब्लिशिंग,
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी-221010
0542-2314060, 2312456

Sunday, November 22, 2015

तीसरा रास्ता एन जी ओ पर केंद्रित उपन्यास




तीसरा रास्ता एन जी ओ  पर केंद्रित उपन्यास 

राजनीतिक व सामाजिक रूप से तीसरा रास्ता क्या हो, कैसा हो?
एन.जी.ओ. संस्कृति ने क्या सामाजिक बदलावों के लिए ईमानदारी से प्रयास किया?
एन.जी.ओ. की गतिविधियों का यथार्थ लेखा जोखा प्रस्तुत करता उपन्यास है तीसरा रास्ता...
तीसरा रास्ता फन्ड राजनीति के घालमेल पर से भी पर्दा उठाने का एक प्रयास है.
देखें.....



मौलिक अधिकारों के संघर्ष की तैयारी ‘तीसरा रास्ता’
                                                
                                       नन्द किशोर नीलम

एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो-आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्री) का काम खेत की रखवाली करना होता है, पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘तीसरा रास्ता’ में यही संशय उमड़ता-घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.ओ. का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्ति, जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं, शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के, समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है,कृवह कहता है...कृ
‘क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ’  वह आगे कहता है...कृ
‘बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’  पृ...21
इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई न कोई स्त्राी हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है, जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति, बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्राी का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बी. की सहायक  मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्राी की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा, अस्मिता, नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्राी पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्राी जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्राी पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।
प्रस्तुत उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्य शोषितों, पीड़ितों, दलितों, दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निश्क्रिय और उदासीन है, लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी -विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.ओ. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें...कृ
‘आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्रा की हत्या कर दी है’ पृ...224
‘एन.जी.ओ. वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं, आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं।’ समाज बदलने के व्यापक उद्दष्यों को छोड़कर ‘ये एन.जी.ओ. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ...198
इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता है, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जल, जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जन सहभागिता से बनवाये जा रहे बंधी निर्माण से खुश नहीं है, उसके धन व वर्चस्व का सारा खेल बड़े   बांध खड़े होने में है।
वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिस? नेता, और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधा, विजयकीर्ति भाई, निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाए? लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सत्तरवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में ‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ...222। यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डर, हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।
इस उपन्यास का  शीर्षक ‘तीसरा रास्ता’ देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह  उपन्यासकार भी एक ‘तीसरा रास्ता’ बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सत्ता और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंाड ‘तीसरा रास्ता’ में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवाना, हत्या की राजनीति का पैरोकार होना, बाद में एन.जी.ओ. चलाना और अपने भ्रश्ष्ट व्यभिचारी चरित्रा को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ‘तीसरा विकल्प’ या ‘तीसरा रास्ता’ बचा है? क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? क्या संघर्ष और प्रतिरोधी चेतना पर ‘धन’ और ‘आध्यात्म’ ने आधिपत्य कायम कर लिया है? क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्रा फलीभूत हो चुका है? ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की ‘जय’ है या ‘पराजय’ तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।
डी.बी. का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों, संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ‘तीसरा रास्ता’ तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया है? बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए ‘तीसरे रास्ते’ का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े   अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता है, जहां न तर्क चलता है न कानून। यहां तमाम धार्मिक व कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारें और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।
इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव व ऊभ-चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है, यही इस उपन्यास की सफलता है।
उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत न होगा।कृ
‘हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ...33
‘अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ...35
‘डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ...39
‘तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.ओ. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ...64
‘वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है।पृ....106
‘सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116
‘बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगाकृयदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली 
व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्रा व प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरषाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।’
‘प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193
‘आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ...224
‘यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्रा में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227

हंस कथा मासिकक--फरवरी--2010 पृ...84-85
समीक्ष्य कृति-तीसरा रास्ता’
पिलग्रिम्स प्रकाशन
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मूल्यक--225.00 फोनक--(91-542)2314060


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Saturday, November 21, 2015

सह पुरवा उपन्यास के अंश

 




सहपुरवा के अंश 


सहपुरवा 1978 में विन्ध्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. यह उपन्यास आपातकाल कर क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित है.. सामान्य सी एक दलित महिला कैसे अपनी तथा गांव की सुरक्षा के लिए संघर्ष करती है और व्यवस्था से टकराती है...
इसका पुनर्प्रकाशन ई बुक के रूप में  देश की मानी जानी साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा ने किया है... 
यहां प्रस्तुत है सहपुरवा के अंश......

‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’
‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’
फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी...
‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा.
‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’
फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ...
‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भयल रहऽल. जोखुआ कहत रहऽल के बड़ा मजा आयल रहऽल, हं रे चलऽल जाई, काहे न चलऽल जाई’
तीन चार बार सुर्ती ठोंक ठाक कर बिफना ने सुर्ती वाली हाथ की गदोरी फेकुआ की तरफ बढ़ा दिया. फेकुआ बिफना की गदोरी में से सुर्ती निकाल ही रहा था कि गांव के माने जाने मुखिया रामभरोस आ गये. रामभरोस खेतों की निगरानी के लिए निकले थे. सुर्ती मुंह में डाल कर फेकुआ ने रामभरोस से पूछा.. वह उन्हें चिढ़ाना चाहता था. अब पहिले वाला जमाना नाहीं है कि मजूरों को हंका दिया और काम शुरू, चाहे जोतनी हो, लवनी या कुछ भी.
‘सरकार! आप कऽ जोतनी आजु नहिंनी होत का?’
‘नाहीं रे! आज एकउ सारे काम पर अइबय नहीं कइनऽ, कुल मजूरवय बउराय गयल हवं. असउं सारेन के पट्टा का मिलि गयल, सभन कऽ दिमाग सिकहरे चढ़ि गयल बा, जब देख तब कामय बन्द कइ देनऽ सऽ, कातिक कऽ महीना बा अउर जोतनी बन्द, खेतवा उखड़ जाई तऽ का होई?’
रामभरोस ने बिफना व फेकुआ को ही नहीं पूरी हरिजन बिरादरी को उलाहा. सोनभद्र में बहुत पहले से ही हल जोतने का काम हरिजन ही किया करते हैं, एक तरह से हल जोतने में वंशवाद, बाप, फिर बेटा और बेटे के बाद बेटा.
फेकुआ को अपनी बिरादरी के बारे में रामभरोस की बातें सुन कर बुरा लगा. उसने भी रामभरोस की बात में बात जोड़ा...
‘हं सरकार! ई हरिजन हरिजनै रहि जइहंय, ई बिरादरियय अइसन हवय, अपनै हथवैं हरवा काहे नाही जोत लेहीत आप लोगन, लतियाईं हरिजनेन के, बनी मजूरी भी बचि जाई, कुलि घरे में रहि जाई. फिर आपन काम अपने हाथे करहीं के चाही.’
रामभरोस काहे के लिए फेकुआ की बातें सह पाते? उन्हें बहुत बुरा लगा..... हालांकि फेकुआ की बात कोई ऐसी नहीं थी जिससे कोई नाराज हो पर रामभरोस तो रामभरोस थे....
‘ई सारे कऽ मन बढ़ गयल बा, अइसन बतियावऽता, हमैं जबाब देता’
कोई दूसरी जगह होती तो रामभरोस फेकुआ को लतियाना शुरू कर देते पर जगह सिवान की थी, जहां रामभरोस अकेले थे, सिवान में फेकुआ को मारते तो जाने का होता. अगर फेकुआ भी लपट जाता तो...
वे अप्रत्याशित डर के कारण चुप थे.
रामभरोस ने देखा कि फेकुआ शरीर से गठा हुआ है, उन्हें मालूम था कि फेकुआ रियाज मारता है. वैसे भी फेकुआ एक दो आदमी को निपटा सकता है, रामभरोस ने मुड़ कर उसका शरीर देखा और सहम गये. उन्हें निराशा हुई, फेकुआ की तरह गठे हुए शरीर का अपनी बिरादरी में एक भी लड़का नहीं,
‘साला जाने का खाता है, अरे! का खाता होगा, भात और सिलहट की तरकारी, बहुत हुआ तो नून रोटी.’
जाने का बोल गया साला! अब यही रह गया कि रामभरोस हल चलांए, उनके लड़के हल जोतें, ये साले राड़, रहकार फिर का करेंगे, गद्दी पर बैठेंगे. ठीक है, जमाना बदल रहा है पर एकर का मतलब? कउआ हंस हो जाएगा, बाघ घांस खाएगा.’
रामभरोस काहे हल जोतेंगे? उनके घर में काहे की कमी है, पूरा गांव उनका है, ठीक है जमीनदारी टूट गई पर उन्होंने आज भी तीन चार सौ बीघे जमीन  कुŸो, बिल्लियों के नाम से करके बचा ही ली है. आलीशान बखरी है, जवान बेटा है जो बाहर के अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है, गांव के परधान हैं, कांग्रेसी हैं, बी.डी.ओ. से लेकर दारोगा तक जान पहचान है, जिले का कोई भी आला हाकिम जब भी इस तरफ आता है, उनकी बखरी की ओर आए बिना वापस नहीं लौटता. कौन नहीं जानता कि कलक्टर साहब भूमि आवंटन के सिलसिले में पिछले साल पूरे लहसन के साथ रामभरोस की बखरी पर आये थे. जोरदार दावत हुई थी. अधिकारी भी दावत का इन्तजाम देख कर दंग रह गये थे.
और यह फेकुआ!.....
रामभरोस से हल जोतने के लिए बोल रहा है. उसे नहीं पता कि रामभरोस ही ऐसे किसान हैं जिन पर सीलिंग का मुकदमा चल रहा है, उन्हीं की पुश्तैनी जमीन पर सहपुरवा ही नहीं कई गांव आबाद हैं. जमीनदारी न टूटी होती तो किसी को एक धूर भी जमीन नहीं मिली होती. वैसे भी कई तरह की बातें हैं जो रामभरोस को सरकार कहलवाती हैं, ऐसा कुछ केवल परंपराओं के कारण ही नहीं तमाम अन्य कारणों से भी है, जैसे इलाके में सबसे अधिक धनी मानी होना, सबसे अधिक जमीन और जोत वाला होना, अधिकारियों का उनकी बखरी पर रोज रोज की दावतें लेना, दबंग होना और हमेशा लठैतों से घिरे रहना, बात बात पर किसी को लतिया देना आदि आदि. यही सारी बातें रामभरोस को लोगों से सरकार कहलवाती हैं. रामभरोस उस समय कुछ बोलना नहीं चाहते थे पर भीतरी ऐंठन बिना खुले रह जाए, ऐसा नहीं होता, वे खुले...
‘का रे फेकुआ! आज कल रियाज मारत हए का? देखत हई कि तोरे देंही पर मांस ढेर चढ़ि गयल बा, दिमग तऽ नहिंनी खराब होत नऽ’
रामभरोस की अधपकी मूंछें और सुर्ख ऑखों ने मिल जुल कर उनकी ऐसी आकृति बनाई कि फेकुआ फक्क रह गया. उसके देह की ऐंठन एक ही घुड़की में खुल गई. फेकुआ को अपने कहे पर अफसोस होने लगा.
फेकुआ को मालूम था कि रामभरोस ने रामगढ़ अस्पताल के सामने रमदिनवा को बुरी तरह पीटा था, जो तीन चार दिन बाद बिना दवा दारू के मर गया था. दवाई कराता भी कौन, गांव में किसी की हैसियत ही नही थी जो रामभरोस द्वारा मरवाए गये आदमी की दवाई करवाये, और रमदिनवा को रामभरोस की बखरी से कुछ मिलना जुलना नहीं था, बखरी नाराज तो नाराज फिर किसकी हिम्मत जो एक कदम भी आगे बढ़ता. बेचारा रमदिनवा तड़प तड़प कर मर गया.
रमदिनवा ही क्यों बहुत सारे लोगों को रामभरोस ने खुद मारा पीटा है, या तो अपने लठैतों से मरवाया पिटवाया है. किसी को भी मरवाने पिटवाने के लिए रामभरोस का इशारा ही काफी है.
कुछ दिन पहले की ही तो बात है रमचेलवा का धान ही लवा ले गये, अपने खलिहान में दवां भी लिए, वह बेचारा हिम्मत जुटा कर थाने पर गया फिर भी रामभरोस का रोआं तक टेढ़ा नहीं हुआ. किसे नहीं मालूम कि रामभरोस जब जैसा चाहते हैं कर गुजरते हैं. परधान के चुनाव में शोभनाथ पंडित उनके खिलाफ खड़े क्या हो गये कि आफत आ गई, बेचारे का घर बार ही उजड़ गया, भाइयों में बटवारा हो गया, इतना ही नहीं रामभरोस के मन की जलन तब हल्की हुई जब शोभनाथ का खलिहान आग के हवाले हो गया. सारा अनाज जल कर भसम हो गया. पूरा गांव तमाशा देख रहा था और शोभनाथ का खलिहान जल रहा था.
गांव में कोई माई का लाल नहीं जो रामभरोस की मर्जी के खिलाफ उनके सामने ही नहीं पीठ पीछे भी बोल दे.
फेकुआ को पीछे का ख्याल कर पसीना छूटने लगा
‘सरकार हमसे गलती होय गयल, भला आप बड़हर अदमी, हर काहे जोतब, हमरे गलती पर धियान जीन देब सरकार!’
पास ही में बिफना भी था, वह भी रामभरोस से माफी मांगने लगा पर रामभरोस का माथा काहे ठंडा होता... वे गरम हो गये और भावी दुर्घटनाओं की तरफ इशारा करने लगे. समूचा लील जाने के तर्ज पर उन्होंने फेकुआ को देखा जबकि फेकुआ और बिफना दोनों सम्मिलित रूप से माफी मांग रहे थे.रामभरोस तो रामभरोस, समय को मुठ्ठी में बांध कर रखने वाले, उस समय कुछ नहीं बोले, रास्ता पकड़े और सीधे बखरी की ओर वापस हो लिए.
रामभरोस के लौट जाने के बाद बिफना फेकुआ को सीख देने लगा, वही सीख जिसे उसने बाप दादों से सीखा था. उसने सीखा था कि बड़ों से ऐंठ कर नहीं बोलना, बतियाना चाहिए. बिफना ने फेकुआ को डांटा...
‘तोय कुछ नाहीं बुझते, भला सरकार से अइसे बतियावल जाला, तोसे का मतलब, ऊ हल जोतंय चाहे न जोतंय, ओन्हय चलले हऽ पढ़ावै.’
फेकुआ का करता, उसे जो बोलना था बोल चुका था बोली और गोली वापस तो होती नहीं. अपराधी की तरह बिफना की खरी खोटी सुनता रहा बाद में उसने अपना गुस्सा बैलों पर उतारा. पैना पर पैना पीटे जा रहा था बैलों को, उसे लगता कि वह हल में जुते बैलों को नहीं रामभरोस को ही मार रहा है. सतघरिया होते ही दोनों ने हल जोतना बन्द कर दिया तथा घर की ओर वापस हो लिए.
घर बहुत दूर नहीं था, दोनों कुछ ही देर में घर पहुंच गये. अभी सूरज डूबा नहीं था सो हर तरफ उजाला था.
खेत पर हल जोतते समय जो कुछ हुआ था सारा कुछ बिफना ने फेकुआ के बाप औतार से बता दिया..
फिर तो औतार फेकुआ पर लाल लाल हो गये..
‘सरकार से अइसन बतियइले हऽ तूं, तोर ई मजाल. ई ससुरा इहय करबय करी. येे सारे के का मालूम कि सरकार कवन आदमी हवन. तनिक रियाज का मारै लगल पगलाय गयल बा. ई ससुरा कहऽला कि हमार माई अब नार न काटी, सउरी न कमाई, गाय गोरू कऽ गोबर न फेंकी, न खलियाई’
‘अरे! ससुर तोहके का मालूम एतना सब कइले पर तऽ सरकार रिसिअइलय रहऽ नऽ, जब जवन चाहनऽ तवनय करऽ न, अउर जौने दिन ई सब न होई तउने दिन जाने का हो जाई. केके मालूम बा कि का होई, कब घर फुंकाय जाई, कहां पीठ पर डंडा पड़य लागी, के जान सकऽला.’
औतार एक आम आदमी, गालियों की दुनिया में ही पैदा हुए, बात बात पर गाली, एक तरह से संबोधन ही गालियों का, किसिम किसिम की गालियां, गालियों के लिए हर वह पात्र है जो उनके अनुसार टेढ़ा चलता है पर रामभरोस जैसा दबंग नहीं, रामभरोस को तो वह कहीं छिप कर भी गाली नहीं दे सकते, उन्हें मालूम है कि दीवारों के भी कान होते हैं.
औतार को भूला नहीं है अब तक कि ये वही रामभरोस हैं जो बिना किसी गलती के उन्हें जवानी में खूब मारा पीटा था एक महीने तक दवा दारू करना पड़ा था और सुगिया की बात.... उसे कैसे भूला जा सकता है कि रामभरोस ने अपने लठैतों द्वारा उसे उठवा लिया था. नुची, चुथी, लुटी, सुगिया तीन दिन बाद घर वापस आई थी. सुगिया को घर से उठाए जाने की खबर सहपुरवा के सारे लोगों को थी, सभी कान में तेल डाले थे तथा अपनी ऑखें ढाप ली थीं. गूंगा रहने में ही भलाई है, कौन रामभरोस से झगड़ा मोल ले.
सहपुरवा के लोगों ने सुगिया के उठाए जाने की घटना को किसी दुर्घटना की तरह माना था फलस्वरूप इसका अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव किसी पर नहीं पड़ा. वैसे भी इस तरह की घटनाएं केवल सहपुरवा की ही नहीं थी बल्कि पूरे विजयगढ़ और जसौली की थीं.
गांव भर अच्छी तरह जानता था कि सुगिया जवान हो गई है, उसके देह के उतार चढ़ाव मनोरम लगने लगे हैं, सुगिया बोले बतियाए भले नहीं पर उसकी देह हमेशा बोलती और गुदगुदाती रहती है. हालत यह हो गई थी कि जवान लड़के अपनी दृढ़तायें नहीं रोक पाते थे, खासतौर से वे जवान लड़के जो सवर्ण होते थे. वे समझते थे कि सुगिया उनके लिए किसी सामग्री की तरह है जो उनके गांव की सार्वजनिक संपŸिा है.
सुगिया केवल उन लोगों के लिए ही नहीं उन लोगों के लिए भी मनोरम दीखती थी जिनकी बेटियां सुगिया की हमउम्र थीं. गोया सबकी नजर सांवली, पतली, इकहरी बदन वाली सुगिया पर थी और सुगिया थी कि अपनी देह के करतबों से अजान थी, उसे पता ही नहीं था कि वह किसी कुसंयोग का बेहूदा प्रस्ताव है.
रामभरोस भी सहपुरवा के ही थे वे सुगिया को अपने बिस्तरे पर देखना चाहते थे. गांव के दूसरे तो सुगिया को देख कर ही मनोरम पीते थे पर रामभरोस ने तो योजना ही बना लिया. वे चाहते थे कि किसी भी तरह से सुगिया को हासिल करना है, इस हासिल को वे प्यार मानते थेे, प्यार की उनकी अपनी परिभाषा थी. देखा भी गया है कि जिस किसी को उन्होने अपना बिस्तरा बनाया फिर कोई दूसरा उसे बिस्तरा नहीं बना पाया. अगर किसी ने बनाया भी तो रामभरोस ने उसकी तेरही कर दिया.
अपने तरीके के प्यार के कारण रामभरोस ने औतार को अपना असामी बनाया. पहले औतार शोभनाथ के असामी थे. असामी बना लेने के बाद कई तरह की अतिरिक्त सुविधांयें भी औतार को दीं. जैसे यही कि दो बीधे खेत की माफी रहेगी, लगान नहीं देना पड़ेगा, बीज बंेगा भी बखरी से मिलेगा.
रामभरोस जानते थे कि असामी होने के नाते रामभरोस का आना जाना बखरी पर रहेगा ही, उसके साथ सुगिया भी आती जाती रहेगी, ऐसा करने से ही सुगिया के करीब पहुंचा जा सकता है, मेल मिलाप का सिलसिला अगर एकबार शुरू हो गया फिर काहे खतम होगा.
हुआ भी यही, सुगिया अक्सर औतार के साथ बखरी में आने जाने लगी पर रामभरोस सुगिया के आस पास तक नहीं पहुंच पाये. सुगिया रामभरोस से भी चालाक निकली, वह खुद को बचा कर उनसे दूर रहती.
उस समय रामभरोस बाप नहीं बने थे. बखरी में केवल उनकी जवान औरत ही रहती थीं. रामभरोस के मां बाप कुछ साल पहले मर चुके थे. कोई भाई वाई नहीं था, रामभरोस बाप के अकेले वारिस थे. बखरी के एकांत का लाभ लेने के लिए रामभरोस ने एक बार सुगिया से छेड़ छाड़ की पर सब बेकार हो गया, रामभरोस की पत्नी तथा सुगिया के सबल प्रतिरोध के कारण, रामभरोस मन मसोस कर रह गये, करते भी क्या? उनकी पत्नी सुगिया के बचाव में रणचण्डी की तरह खड़ी हो गईं.
रामभरोस का गुस्सा पत्नी पर दिनों दिन बढ़ता चला गया, बेचारी को रोज रोज बेवजह पिटना पड़ता. उसके बाद रामभरोस अपने असफल प्रयत्न की प्रतिक्रिया में जीने लगे. हार मान कर रामभरोस ने दूसरे रास्ते का चुनाव किया.
रामभरोस के लिए दूसरा रास्ता आसान और आजमाया हुआ था, वह रास्ता खानदानी था. प्रलोभन देकर, औतार को असामी बना कर, अतिरिक्त मजदूरी देकर, फिर भी उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ, सुगिया को अपनी गोदी में देखना जैसे पहले सपना था, वह सपना जस के तस बना हुआ था.
आजमाए हुए खानदानी रास्ते पर चलते हुए रामभरोस ने एक दिन अपने दरबार के डण्डपेलुओं और लठैतों द्वारा सुगिया को उसके घर से ही उठवा लिया, ऐसा करना उनके लिए काफी लाभप्रद भी हुआ. दूसरे रास्ते के प्रयोग में कहीं कोई बाधा नहीं आये सो उन्होंने अपनी पत्नी को मॉ विन्ध्यवासिनी के पूजन के लिए विन्ध्याचल भेज दिया था, साथ में साले को भी लगा दिया.
यह अवसर रामभरोस के लिए आश्वस्ति दायक और मनोरम था, सुगिया उनके घर में थी, जहां ढेर सारा एकांत था और सुरक्षा भी खूब खूब थी. घर में एकांत ऐसा था कि कैसे सुगिया ने रामभरोस का माथा फोड़ दिया यह रामभरोस को पता ही नहीं चला, हाथ और देह को कई जगहों पर काट लिया फिर भी रामभरोस अपने लक्ष्य से एक रŸाी भी बांए दांए नहीं हुए. कुछ निशान तो आज भी रामभरोस के चेहरे पर उनके करतबों की कहानी के रूप में दीखते हैं.
दो दिन बाद सुगिया को रामभरोस ने उसके घर भिजवा दिया. औतार और उनकी पत्नी को अचरज नहीं हुआ क्योंकि इस तरह की घटनांए हरिजन बस्ती के लिए आम थीं, वह भी उस घर के लिए जवान बेटियां हों, गदराई और मांसल. भला हो रामभरोस का कि वे घर पर नहीं चढ़ आये, चढ़ भी आते और सुगिया को उसके घर से ही उठवा लेते तो क्या हो जाता? कोई उनका क्या बिगाड़ लेता, कौन उनका प्रतिरोध करता, मान लिया जाता कि ऐसा होता रहा है और आगे भी होता रहेगा. थाने जा कर रपट करना यह भी तो आसान नहीं, रपट हो भी जाती तो दारोगा गवाही मांगता, गवाही कौन देगा? कौन बोलेगा कि यह सब हमने देखा है फिर इतना ही थाने पर थोड़य होता, थाने पर तो रामभरोस से अधिक होता, थाना भी तो नामी और प्रतापी जगह है किसे नहीं मालूम कि प्रतापियों के ताप में बहुत आग होती है.
दो दिन बाद सुगिया अपने घर वापस आ गई या भेज दी गई यह रहस्य माफिक था. औतार तथा उनकी पत्नी को आश्चर्य नहीं हुआ. वे पहले से ही जानते थे कि सुगिया कहां होगी, वे डर रहे थे कहीं सुगिया की हत्या न कर दी जाए पर ऐसा नहीं हुआ सुगिया साबूत थी. हरिजन बस्ती के लिए यह आम बात थी वे जानते थे कि मालिक लोगों के लिए औरतों की देह अछूत नहीं होती, अछूत तो केवल मरद ही होते हैं.
सुगिया टूट चुकी थी, उसकी सारी चंचलता व अल्हड़ता समाप्त हो चुकी थी अब वह केवल एक देह भर थी जिसमें जीवन नाम की कोई चीज नहीं थी, जो संासें ले सकती थी, कराह सकती थी तथा किस्मत पर रो सकती थी. सुगिया का घर बड़ा नहीं था. घर की दीवारें माटी की थीं तथा उस पर दो छान्हें टिकी थीं. एक में औतार तथा उनकी पत्नी बैठी थीं जिसमें में वे अक्सर बैठा करते थे. दूसरे में सुगिया जा कर बैठ गयी. दिन बीतते गये, बीतते गये, सुगिया तोड़ दी गयी, औतार तोड़ दिए गये, पर बिरादरी नहीं टूटी. सुगिया के घर वापस आते ही बिरादरी का कानून औतार के माथे पर चढ़ बैठा. गवाही के नाम पर बिरादरी का कोई भी आदमी सामने नहीं आया, औतार ने अपने लोगों को टटोला और मालूम किया तो मालूम हुआ जो पहले से ही मालूम था कि उनकी बिरादरी के लोग थाने पर नहीं बोलेंगे कि रामभरोस ने सुगिया को उठवा लिया था और दो दिनों तक अपने घर में जबरन रखा था.
कोई भी गूं गा नहीं किया पर बिरादरी की पंचायत के फैसले के लिए सभी उतावले हो गये, हुक्का पानी बन्द करने की धमकी देने लगे. औतार को बतौर सजा भात, मांड़ देना सारा कुछ स्वीकार है पर उनका कहना था कि जिस बात की सजा उन्हें दी जा रही है उसे ही थाने पर चल कर बोलो कि सुगिया के साथ क्या और कैसे हुआ. भात माड़ ले रहे हो तो थाने पर चल कर बोलो नाहीं तो काहे के लिए भात माड़?
पूछने पर सभी ने नकार दिया था और सभी की गर्दनें जमीन ताकनें लगीं थीं, कोई आगे नहीं आया, कई कदम नहीं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया कोई.
औतार ने कहा भी कि हम भात माड़ देंगे, निश्चितरूप से देंगे पर जिस लिए भात माड़ लिया जा रहा है उसे थाने पर बोलो तभी, नहीं तो नहीं. औतार जानते थे कि भात माड़ नहीं देने पर उन्हें बिरादरी से निकाल दिया जाएगा, निकाल दिया जाए बिरादरी से फिर वे क्या हो जांएगे, हरिजन से भी कोई छोटी बिरादरी है का?
सुगिया दो दिनों तक घर से बाहर थी, कहां थी यह सभी को मालूम था पर कोई कहने बोलने वाला नहीं था. बिरादरी ने आसान रास्ता पकड़ा और सुगिया को दुश्चरित्र घोषित कर दिया, सुगिया का घर से बाहर होना ही काफी था और दूसरे सबूतों की जरूरत ही नहीं थी. क्योंकि सुगिया चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी कि उसके साथ रामभरोस ने बलात्कार किया, यही काफी था, बिरादरी का कोई भी यह नहीं देख रहा था कि रामभरोस ने गांव की लड़की के साथ बलात्कार क्यों किया? बिरादरी के सामने रामभरोस नहीं थे, केवल सुगिया थी और औतार थे, जिन्हें दण्डित किया जा सकता था, इतनी ताकत थी बिरादरी के पास पर रामभरोस को दण्डित करने की ताकत नहीं थी. औतार को सारा कुछ मालूम था कि बरादरी कितना पउंड़ सकती है? गांव के पंचायती लोग जाति की पंचायत न बुलायें संभव नहीं था. आनन फानन में पंचायत के सभी चौधरियों को सूचनांए भेज दी गईं. बिरादरी का सिपाही पंचायत की तैयारी में जुट गया. पंचायत तो जैसे तैयार बैठी थी कि पंचायत हो और हम सभी एक साथ जुटें. पंचायत के लोग निश्चित दिन पर जुट गये. यह एक ऐसा अवसर होता है जब हरिजनों में एकता ही नहीं अनुशासन भी दिखाई पड़ता है, नहीं तो काहे का अनुशासन, काहे की एकता, काहे का संगठन. पंचायत तो इस आश में जुटी है कि एक दिन भात माड़ कायदे से मिलेगा नहीं तो कौन किसे खिलाता है,
गांव के विशाल पीपर के पेड़ के नीचे पंचायत बैठ गई, यह वही पेड़ है जहां रामभरोस की शौर्यगाथा ने पहली बार दमन का हुंकार भरा था, उसके पहले तो केवल विजयगढ़ राजा के सजावल ही हुंकार भरा करते थे और लोगों को पकड़ कर बेगार कराने के लिए ले जाया करते थे. रियासतें खतम होने के बाद सजावल की तरह रामभरोस की हुकूमत पूरे गांव में हुंकार भरने लगी.
सुर्ती, तमाखू आदि लेकर पंचायत के चौधरीगण टाट पर आसीन हो गये. टाट पर बैठते ही वरिष्ठतम् चौधरी पुनवासी ने सुगिया को तलब किया पर सुगिया वहां नहीं थी, सिपाही कुछ ही देर में सुगिया को पकड़ कर ले आया फिर सुगिया को पंचायत में हाजिर करा दिया गया.
पुनवासी चौधरी ने सुगिया से साफ साफ पूछा, बिना लाग लपेट के...
‘तोहरे साथे का कइलन हंऽ रामरोस सरकार! साफ साफ बोलो’
सुगिया ने साफ साफ बता दिया. साफ साफ में साफ था कि रामभरोस अपराधी हैं, और उन्हें गांव से बाहर निकाल देना चाहिए पर पंचायत के लोग तो इस लिए एकत्र ही नहीं हुए थे उनका लक्ष्य तो केवल भात माड़ था न कि क्या हुआ था सुगिया के साथ यह जानना. औतार भरी पंचायत में रो रो कर रामभरोस की काली करतूत बताते रहे थे पर उनकी सुनता कौन?, दोषी उन्हें ही माना गया. औतार को एक दरी तथा भात माड़ की सजा कबूल करनी पड़ी. चौधरियों के इस अन्यायी फैसले की बिफना के बाप सुक्खू ने कड़ी आलोचना की...
‘अरे! चौधरी साहब! एमें सुगिया कऽ का दोष बा? ऊ कवन जुरूम कइ देलेस कि ओकरे बापे के आप लोगन सजाय देत हई, जुरूम तऽ रामभरोस कइनऽ, ओन्हइ सजाय देहीं, काहे सुगिया के? ओके बेचारी के तऽ जबरी घरे से उठाय के लेगयनऽ रामभरोस, गांयें में के नाहीं जानत ई बात, तब तऽ सब तमाशा देखऽत रहल, अब कइसन पंचाइत?’
पंचायत के वरिष्ठ चौधरी पुनवासी को सुक्खू पर गुस्सा आ गया, उन्हें पंचायत के मामलों में अक्सर गुस्सा आ ही जाया करता है, लोग जानते हैं कि पुनवासी चौधरी के लिए गुस्सा एक ऐसी चीज है जिसे वे हमेशा नाक पर धरे रहते हैं और जुबान पर वही सनातनी गालियां..
‘का बकते है रे सुखुआ! तुम नाहीं जानते है हमार बिरादरी को कानून, हमारे अनियाव को बड़का, बुड़का सभै मानते हैं कि हमार पंचायत साफ साफ अनियाव करती है. तुम्हारी यह मजाल कि तुम बिरादरी के कानून को नाहीं मानो, हम जो चाहेंगे वोही करेंगे. गांव में तो और भी लड़की लोग होते हैं उनको तो सरकार नाहीं पकड़ लिए. तुम का जानेगा, औतरवा साला ओनकर आदमी है, असामी है, सिरवही करता है, ये ही कारण सरकार ओके उठवा ले गये, जरूर कउनो लस पुस रहा होगा, सुगनी का सरकार से, एम्मे कउनो चाल है, जौन हम बूझ रहे हैं, एही कऽ कमाई औतरवा खाय रहा है, जब कमाई खाएगा सरकार की तब तो सरकार उठवा ले जांएगे ही नऽ’
सुक्खू को महसूस हुआ असामी का काम करना, हरवाही करना अपनी बहिन बेटी बेच देना है. ई का बक बक कर रहा है पुनवासी चौधरी.
सुक्खू औतार को जानते थे, सुगिया को जानते थे, सचाई जानते थे कि रामभरोस का का कर सकते हैं, सुघ्घर लड़की देख कर उसे हासिल करने के लिए कौन करम नाहीं कर सकते. सुक्खू ने एकबार अपनी ऑखों से देखा था. सुगिया जंगल से लकड़ी का बोझ लिए घर वापस आ रही थी, रामभरोस ने उसे वहीं कहीं देख लिया था फिर क्या था रामभरोस का पुरुषार्थ जाग उठा और उन्होंने सुगिया को पकड़ लिया, पकड़ छुड़ाकर किसी तरह से सुगिया भागी, पर कितना भागती, कहां जाती, सुनसान सिवान, एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, हर तरफ सन्नाटा और मरघटी खामोशी. सुगिया को दुबारा रामभरोस ने पकड़ लिया फिर तो वह उनकी पकड़ में थी, कसमसाती, छटपटाती, सुगिया रामभरोस को जानती थी, सुरक्षा मिल जाए कहीं से वह चिल्लाने लगी. संयोग था कि सुक्खू भी जंगल से लकड़ी का बोझ लिए वापस आ रहे थे. सुक्खू को सुगिया की चीख साफ सुनाई पड़ी, वे चीख की ओर दौड़े. चीख रहर के खेत में से आ रही थी पर वहां कोई दीख नहीं रहा था, वहां केवल आर्तनाक चीखें थीं जो साफ साफ किसी औरत की जान पड़ रही थीं. रामभरोस सुगिया को रहर के खेत के अन्तःपुर की ओर घसीटे जा रहे थे. सुक्खू ने देखा....
कि यह तो सुगिया है, औतार की बिटियवा, सुगिया हांफ रही थी हकर हकर, सांसें जहां थीं वहीं टंगी हुई थीं, टंगी हुई दूसरी चीजों की तरह. सुगिया रामभरोस की पकड़ में मछली की तरह छटपटा रही थी. सुक्खू ने लकड़ी का गट्ठर पहले ही उतार दिया था तथा उसी गट्ठर में से एक सीधी लकड़ी डंडा माफिक हाथ में ले लिया था यह मानकर कि इसकी जरूरत पड़ सकती है, उसकी जरूरत पड़ भी गई उसी लकड़ी से सुक्खू ने बिना आगा पीछे देखे रामभरोस को पीटना शरू कर दिया, इतना मारा कि उनका पलीदा निकल गया. किसी तरह तब जा कर सुगिया का कुंआरापन सुरक्षित रह सका.सुक्खू रामभरोस की असलियत जानते थे फिर काहे खामोश रहते...
‘चौधरी साहब का बक बक करत हवऽ, कुछ जनबो करऽल कि अइसहीं हवा में झारत हवऽ, हम तोहसे जानल चाहत हई कि सुगिया तोहार लड़की होत त का करतऽ. औतरवा रामभरोस के ईहां मेहनत, मजूरी करऽला तब रामभरोस ओके बनी मजूरी देनऽ, फोकट में नाहीं देतन. तूं औन्हय जानऽ चाहे जीन जानऽ हम ओन्हैं जानीला, आजु औतरवा के लड़की के संघे तऽ काल्हु तोहरे लड़की के संघे, तब जीन नरियाया.
सुक्खू ने बहुत खरी खोटी पुनवासी चौधरी को सुनाया. चौधरी को सुक्खूं की बातें बिरादरी के अनुशासन के प्रतिकूल जान पड़ीं. बिरादरी की इज्जत बचाने के लिए पुनवासी चौधरी ने सुक्खू को पेड़ से बांध कर पचास जूते मारने का आदेश दिया पुनवासी चौधरी के आदेश के अनुपालन में बिरादरी के सिपाही उठे पर वे उठे ही रह गये. पूरी बिरादरी पुनवासी के इस आक्रामक आदेश के खिलाफ थी. पंचायत में शोर उठा...
सुक्खू को अगर किसी ने मारा तो वह हमारे गांव से साबिक नाहीं लौटेगा, उसे मार मार कर भर्ता बना दिया जाएगा. फिर तो सारा मामला रफा दफा हो गया और सारी पंचायत सुगिया के अपराध पर केंद्रित हो गई. पुनवासी चौधरी को भी यही ठीक जान पड़ा उनसे सुक्खू से क्या लेना देना. मामला तो सुगिया का है जो पंचायत के सामने है. सुक्खू को पंचायत में घसीटने से सुगिया का मामला भी हल नहीं होगा जबकि उसे हर हाल में सजा देना है और औतार से भात, मांड़ और एक दरी लेना ही है., सुगिया के मामले की पंचायत शान्तिपूर्ण ढंग से निपट गई, उसमें हो हल्ला नहीं मचा. मचता भी नहीं, औतार ने बिरादरी को भात मांड़ देना स्वीकार कर लिया, वे इसके विपरीत कुछ कर भी नहीं सकते थे. झगड़ा करने से अच्छा है भात, मांड़ दे देना, सो उन्होंने भात, माड़ की सजा को स्वीकार कर लिया.
औतार जानते थे कि वे बिरादरी के बिपरीत जा नहीं सकते थे, जाते भी कहां, सुगिया का बियाह भी तो करना था और बियाह होगा बिरादरी में ही, बिरादरी के अलावा दूसरी जाति के लोग सुगिया से थौडै बियाह करेंगे, देहीं पर चाहे जेतना नाच कूद लें पर बियाह नाहीं. औतार केवल एक ही काम कर सकते थे, रामभरोस का काम छोड़ सकते थे और उन्होंने वैसा किया भी.
फेकुआ की उमर उस समय चार साल की थी. सुगिया के साथ क्या हुआ था इसकी जानकारी उसे सुन सुनाकर ही हुई थी, उसे तो केवल औतार ही जानते थे, उन्होंने उस संत्रास को भोगा था, जिया था, गांव भर की उलाहनाएं सुना था तथा रामभरोस के प्रकोपों को भी झेला था..
सुक्खू और औतार दोनों हरिजन हैं पर उनमें बिरादरी का बारीक फर्क भी है, सुक्खू उतरहा हरिजन हैं तो औतार बड़हरिया. माना जाता है कि उतरहा हरिजनों का राज रियासत से कोई सरोकार कभी नहीं रहा है और बड़हरिया का सदैव से रहा है, वे बिजयगढ़ में चन्देल राजाओं के आने के साथ ही आये थे. दोनों की दोस्ती बचपन से ही है क्योंकि हरिजन बस्ती में यही दोनों खानदान ऐसे हैं जो सहपुरवा में कई पीढ़ियों से आबाद हैं. दूसरे जो है वे सालाना इस गांव से उस गांव अपने डेरा तम्बू लगाते रहते हैं. गांव में बिरादरी के सभी बड़े बूढ़ों ने फेकुआ को भला बुरा कहा कि वह काहे के लिए रामभरोस से उलझ गया. उसे मालूम होना चाहिए कि रामभरोस सरकार हैं और उनके सामने सिर झुका कर रहना चाहिए.
फेकुआ हताश और निराश, सभी की बातें चुपचाप सुनता फिर भी नहीं समझ पाता कि उसने रामभरोस के साथ ऐसा क्या कर दिया या बोल दिया जो बुरा हो, क्या वह इतना भी नहीं बोल सकता? फेकुआ करता भी क्या? किसी तरह औतार का गुस्सा ठंडा हुआ, फेकुआ ने अपने मां बाप तथा दूसरे बड़े बूढों की चेतावनियों का बोझ लिए बिना सोए ही रात बिता लिया.
फेकुआ को अपनी गलती समझ में नहीं आ रही थी आखिकार उसने किया क्या? रामभरोस का क्या नुकसान हो गया, क्या उनकी इज्जत इतनी कमजोर तथा भुरभुर है कि उसके कहने से भरभरा गई? उसे रह रह कर बिफना पर गुस्सा आता, उसने रामभरोस से हुई बात चीत का हवाला उसके बाप से क्यों बता दिया अगर नहीं बताया होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती फिर काहे के लिए उसका बाप नाराज होता.
फेकुआ निपटान के लिए गांव से बाहर गया हुआ था, बिफना भी उधर ही गया था, उधर ही गांव के सभी लोग निपटान के लिए जाते भी हैं पोखरे की तरफ. बिफना को लौटता देकर फेकुआ उसका इन्तजार करने लगा. इन्तजार का गहन रिश्ता सुर्ती से है और वह सुर्ती मलने लगा तब तक बिफना आ गया.
‘का रे बिफना! ससुर तूं बड़ा काबिल बनऽल, बाबू से काहे बताय देले रे! कि रामभरोस से हम का कहले रहली, तोके ओनसे कहिकऽ का मिलल ससुर’
बिफना कुछ देर तक फेकुआ का चेहरा ही देखता रह गया, उसे लगा कि उसके कारण फेकुआ नाराज हो गया है और उस पर शक कर रहा है, उसने बहुत ही मुलायमियत से कहा...
‘देख फेकुआ ई सब तोंय का जनबे, केकरे से कइसे बोलल,बतियायल जाला, रामभरोस के बारे में कोई से जानि बूझि लेहे, फिर हमसे बतियाये.’
फेकुआ निर्बुद्धि नहीं था, वह भी रामभरोस के बारे में बहुत कुछ जानता था. कई काण्ड रामभरोस ने उसके सामने किया कराया था, जिन्हें उसने बहुत पास से घटते हुए देखा था. हालात समझते हुए उसने बिफना से प्रतिवाद नहीं किया बल्कि आगे क्या करना चाहिए उसके बारे में जनना चाहा. जो बीत चुका था बीत चुका था, उसे तो लौटना नहीं था. बिफना ने आश्वासनों के सहारे उसे समझाया बुझाया कि रामभरोस सहुरवा में सबसे नीच और खराब आदमी है,ं या यह कहो कि वे आदमी ही नहीं हैं. उनसे बेमतलब रार नहीं लेना चाहिए.फेकुआ आशंकाओं में घिर गया जाने का करें रामभरोस. दैनिक क्रिया से निवृŸा हो कर दोनों अपने अपने घर लौट आये. रात में जो भोजन बना था उसे फेकुआ की अइया ने उसके सामने परोस दिया. फेकुआ सहजता से खाने लगा नहीं तो वह ताजा भात ही खाना चाहता है नून और मर्चा की चटनी के साथ. यह मौका फेकुआ की अइया के लिए अच्छा था, उन्हांेने उसे समझाना शुरू किया....
‘बड़का अदमिन से तनिक नरम होइ के बोलल बतियावल जाला, तोंइ नाही जनते, बड़का अदमिन कऽ मन अउर दिमाग, दुन्नो जनमै से गरम रहऽला अइसने में एक के नरम तऽ दुसरका के गरम रहले कऽ फरक नाहीं पड़ऽत. दुनौ गरम रहिययं तऽ मारैपीट होई नऽ.’
फेकुआ की अइया इतना ही बोल पाई थीं कि उन्हें सुगिया की याद आ गई, सुगिया की ही नहीं उसके साथ घटी घटना की भी. रोना रोकना चाहा पर नहीं रोक पाईं, मड़हा के अन्दर भाग कर चली गईं. मां का बोलते बोलते रोना, बाप का डांटना सारा दृश्य फेकुआ को उलट पुलट गया, उसे लगा कि वह सिर के बल खड़ा है और धरती कांप रही है.
वह घर से पैना लेकर बाहर निकला, उसे सन्देह था कि आज जरूर कुछ न कुछ होगा, सभी लोग बेकार नहीं बोल रहे, रामभरोस करेंगे कुछ न कुछ. सामने से उसके मालिक चौथी गंवहा आ रहे थे जिनके यहां वह हरवाही करता था, फेकुआ को देखते ही गुस्से में डांटने लगे....
‘अबहीं कऽ तोहार बेला भयल हऽ ससुर, बिफना कब्बइ काम पर निकल गयल अउर तूं अबहीं कऽ जात हव हर जोतय, न बाप कऽ पता अउर न काम कऽ पता’
रामभरोस ने तो चौथी गवहां की तुलना में कुछ असंगत नहीं कहा था उसे लगा कि चौथी गवहां तो रामभरोस से भी आगे हैं. फेकुआ इन सभी बातों को आज से ही नहीं सुन रहा है, स्कूल जाने के तथा जब से उसने गाय गोरू की चरवही शुरू किया था तब से सुन रहा है. अभी दो ही साल तो हुए जब चौथी गंवहां ने उसे हरवाही पर लगाया. उसके बाप औतार ने कोले के रूप में दो बिगहे खेत की मांग की थी चौथी गवहां से, पर चौथी गवहां ने औतार की बात पर विचार नहीं किया एक तरह से नहीं माना.
चौथी गवहां ऐसे वैसे आदमी तो हैं नहीं, हिसाबी आदमी हैं, बातों का वजन तौल कर चलने वाले, उन्हें सोदा महंगा जान पड़ा. वे पहले बड़े जोतदारों की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करते थे, छोटी आमदनी थी, उसी में से बचाकर बाढ़ी डेढ़ा का कारोबार करने लगे, कारबार चल निकला. छाछठ का अकाल आते ही उनकी किस्मत चमक गई, बाढ़ी डेढ़ा के उनके कारोबार ने उन्हें फटाफट धनी बना दिया. अकाल के समय हर कोई उनके पास खाद्यान्न के लिए जाता और बाढ़ी डेढ़ा पर खाद्यान्न ले जाता, मान कर चलता कि एक का दो ही देना पड़ेगा नऽ, बालबुतरू कम से कम भूखे तो नहीं मरेंगे.
गांव में चौथी नाम से जाने जाने वाले चौथी, चौथी गवहां हो गये. हजारों रुपया बैंक में जमा हो गया, जमीन खरीद ली, पक्का मकान बनवा लिया, उनके घर में कितना गल्ला है किसी के लिए थाह लगाना भी मुश्किल. चौथी गवहां ने हिसाब लगा कर फेकुआ को अधारा पर रख लिया क्योंकि वह अकेला था, पत्नी होती तो पूरे पर रखते, अधारा पर नहीं फिर पूरा कोला  भी देना पड़ता.
फेकुआ काम पर देर से आने का कारण चौथी गवहां को जरूर बताता पर कहीं शिष्टाचार में कोई कमी न रह जाए इसलिए महटिया गया. रामभरोस के नाराज होने का मतलब गाली गलौज, मारपीट आदि आदि और चौथी गवहां के नाराज होने का मतलब भूख प्यास, चूल्हा ही नहीं जल सकता, पेट में जाने का का दोड़ने कूदने लगे. बिफना हल जोत रहा था, फेकुआ की इन्तजारी में चौथी गवहां का लड़का बैलों को चरा रहा था कि फेकुआ आये और बैलों को नाधे. अपने बाप की तरह ही उसने भी फेकुआ को भला बुरा कहा. फेकुआ खामोश था तथा बैलों को नाध लेने के बाद सारा गुस्सा अपने थूथुन पर उतारने लगा यानि मन के भीतर हजारों किस्म की गालियां चौथी के लिए और उनके लड़के, दोनों के लिए.





Friday, November 20, 2015

अंतर गाथा उपन्यास के अंश




अंतर गाथा उपन्यास का पहला अंश

                        

                                        पाण्डुलिपि

अमरेन्दर के बारे में, मुहल्ले वाले सिर्फ इतनी जानकारी रखते हैं कि वह प्रवासीनाथ जी का परम शिष्य है। सुबह-शाम प्रतिदिन प्रवासीनाथ जी के साथ परछाई बना रहता है, कभी इस चाय खाने में तो कभी उस चायखाने में दिख जाता है।
अमरेन्दर का नाम वोटरलिस्ट में है कि नहीं, उसने पी.एच.डी. की थीसिस जमा किया कि नहीं, या यही कि उसका बंगाली मकान मालिक किराएदारी से उसे क्यों बेदखल करना चाहता है? यह सब मुहल्ले वालों को कत्तई जानकारी नहीं, फिर मुहल्ले वाले जनगणना विभाग के तो नहीं जो अमरेन्दरों, सुरेन्द्रों, वीरेन्द्रों आदि के बारे में जानकारियां हासिल करते फिरें....
हां प्रवासीनाथ जी के बारे में पूरा मुहल्ला जानकारी रखता है तथा उन्हें शाकाहारी विद्वान मानता है। अमरेन्दर प्रवासीनाथ जी का शिष्य है इसलिए वह भी शाकाहारी ही होगा, सो मुहल्ले वाले अमरेन्दर के साथ किसी मोहब्बत का इजहार करते हैं न घृणा का।
पहले तो अमरेन्दर मुहल्ले की चर्चाओं से साफ-साफ बाहर था। चर्चाओं में वह तब आया जब चार-पांच साल गुजर गये। पहले जैसे मुहल्ले तो अब रहे नहीं... शहर के किनारे वाले....एकदम से बाहर, अशिक्षित मध्यमवर्गीयों के जमघट वाले... आज के मुहल्ले तो बड़े-बड़ों से आबाद है.....जगह-जगह चायखाना, दारूखाना, जिमखाना, ब्यूटी पार्लर आदि-आदि।
बहसें चायखानों में उतनी अच्छी नहीं होती, जितनी दारूखानों में... अमरेन्दर दोनों जगहों पर... समान रूप से स्थापित था... किसी-किसी ब्यूटी पार्लर या जिमखाने में भी उसकी चर्चा हो जाती...। चर्चा भी कोई खास बुरी नहीं... कि वह मायावती जी के साथ चला गया, मुलायम सिंह को छोड़कर या मुलायम सिंह के साथ चला गया शिव-सेना छोड़ कर। विश्व विद्यालय के चुनाव में स्टूडेन्ट फेडरेशन वाले उसकी बदमाशी से हारे... यह सब भी नहीं। चर्चा होती, खूब होती पर केवल प्रवासीनाथ जी और अमरेन्दर के बाबत ‘देखो कौन किसको पटखनी देता है?’
मुहल्ले में गंभीर किस्म के विद्वान कवि, आलोचक, कहानीकार, निबन्धकार, नाटककार, चित्रकार, वगैरह सभी बसते थे। ये लोग अमरेन्दर के बारे में दूसरे किस्म की चर्चा करते जिसमें गंभीरता की थोड़ी कमी होती लेकिन उजड्डता तो कत्तई नहीं। ‘कहीं अमरेन्दरा जोगाडू तो नहीं....’ इसी सवाल से चर्चा खड़ी होती और पसरती इस फैसले पर कि ‘अमरेन्दरा को नौकरी मिली, समझ लो जोगाडू’ नहीं तो साला थक कर भाग जाएगा घर। प्रवसिया सोच भी लेगा, तो मान लो कि अमरेन्दरा को लेक्चररई मिल गई, किसी डिग्री कालेज में ही सही...’
इस भांति अमरेन्दर चर्चित बनने की प्रक्रिया में आ ही रहा था कि उसके बंगाली मकान मालिक ने मकान का एक कमरा जो अमरेन्दर की किराएदारी में था, छोड़ने का हुक्म जारी कर दिया... पूरे मुहल्ले पर अघोषित रूप से बंगाली बाबू की सरकार चलती थी। सरकार चलने के अपने कारण थे.... पहला कारण था कि मुहल्ले के लोग कानून और न्याय व्यवस्था को फंसाऊ व उलझाऊ मानते थे,
दूसरा कारण था चट मंगनी-पट, ब्याह जैसी त्वरित कार्यवाही...। त्वरित कार्यवाही में माहिर कुछ दादा किस्म के लोग थे जिनका बंगाली बाबू के यहां आना-जाना था। अफवाह या सच बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया का दादाओं से दोस्ताना था... खूब पटती थी...। बंगाली बाबू की मकान छोड़ने की आज्ञा ने अमरेन्दर को मुहल्ले में चर्चित बना दिया। अब वह चर्चित होने की प्रक्रिया से ऊपर की चीज था... लेकिन एक दिन अचानक अमरेन्दर मुहल्ले से गायब हो गया। महीने, दो महीने गुजरे, अमरेन्दर का कहीं अता-पता नहीं। लोग सोचते अमरेन्दर गायब होने वाली चीज तो न था... बंगाली बाबू से भी उसकी सुलह हो गई थी... एक कामरेड ने बंगाली बाबू का किराया भी चुकता कर दिया था...।
बंगाली बाबू भी अमरेन्दर के बारे में जगह-जगह पूछते... ‘कहां गिया, सारा सामान छोड़ कर... ताला बन्द है।’
ऐसा नहीं था कि उस मुहल्ले में या उस शहर मेें गायब होने वाली चीजें न थी। वोटर लिस्ट से मतदाताओं के नाम, जमीन के कागजातों से मालिकानों, परीक्षा विभाग से प्रश्न-पत्रों का गायब होना तो शहर की सांस्कृतिक विरासत का अनिवार्य हिस्सा था, इसके अलावा भी एक दो मुहल्लों से कहीं मन्दिर तो कहीं मस्जिद भी गायब हो चुके थे........ जिनकी जांच-पड़ताल आज तक पूरी नहीं हुई.. शहर की या कालेजों की लड़कियों के गायब होने की सूचनाएं भी थानों में दर्ज हैं पर अमरेन्दर जैसे शाकाहारी छात्र का अचानक गायब हो जाना यह एक सवाल था जिससे मुहल्ला चिन्तित था साथ ही साथ प्रवासीनाथ जी भी...।
प्रवासीनाथ जी योग और संयोग तथा जोग और जोगाड़ में विशेष अन्तर न मानते हुए अमरेन्दर का अचानक गायब होना, संयोग मान रहे थे जबकि मुहल्ले वाले मान रहे थे कि ‘प्रवासिया ने... अमरेन्दरा का जोगाड़ नहीं किया, आखिर वह कब तक इसकी सेवा करने का चूतियापा करता’ सो भाग गया शहर छोड़ कर....।
मुहल्ले में यह बात साफ हो गई थी कि ‘प्रवासी गुरू’ बिना जोगाड़ के किसी का काम संपन्न नही कराते। ‘जोगाड़’ का अर्थ बन्द-बन्द सा था, कोई इसकी व्याख्या न करता, समझते सभी...। मुहल्ले में कुछ विखण्डन वादी भी थे जो ‘जोगाड़’ का पाठ व्यवहारिक ढंग से पढ़ते, महसूसते तथा समय असमय में कह भी देते। बिना सुरा-सुन्दरी के प्रवासीनाथ जी लकवाग्रस्त आदमी से भी बुरे हो जाते हैं... एड्स के रोगी के समतुल्य...। ऐसी स्थिति में वे किसका काम करायें ?
प्रवासीनाथ जी थे कि बिना सुरा-सुन्दरी के न कुछ लिख पाते न सोच पाते, न किसी का कोई काम करा पाते... वे इसे लिखने का रोग मानते। सुरा-सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगांे ने कुछ न लिखने की कसम खा ली है उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा। अपने खास मित्रों से प्रवासी नाथ जी कहते भी ‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संबेदनाओं से निरन्तर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वभाविक है।’
प्रवासीनाथ जी ने उस दिन अमरेन्दर को यही समझाया भी था। प्रति दिन की तरह अमरेन्दर उस दिन पहुंच गया था प्रवासीनाथ जी के घर। प्रवासीनाथ जी का खूबसूरत ‘किरयहवा’ घर अपने आपे से बाहर था, गुस्से से कांपता हुआ। प्रवासीनाथ जी की घरनी जिन्हें वे ‘पूसी’ कहते अपनी संपूर्ण प्रतिरोधात्मक क्षमता
 के साथ बड़-बड़ा रही थीं, उनके हाथ में लोहे का एक राड था ‘रम्मा’ की तरह। प्रवासीनाथ जी दयनीय व निरीह शब्दों को उचार रहे थे कि रण-चंडी बनी उनकी प्यारी-प्यारी सी घरनी उन्हें क्षमा कर दे। प्रवासीनाथ जी का ड्राइंगरूम जो लोक-शिल्प का नमूना था, सोफा सेट से लेकर मेज पर रखे कलमदान तक सभी अनजानी कंप-कंपियों से भरे थे... उनका नमूना होना उनसे छिन चुका था।
अमरेन्दर की समझ उस दिन परायी हो गई थी... वह अवाक खड़ा था। किसी आदमकद मोम की मूर्ति की तरह जिसे थोड़ी सी गर्मी भी पिघला दे...। अमरेन्दर प्रवासीनाथ जी की निजी जिन्दगी की भयानक गर्मी से पिघल तो जाता ही पर तभी पिछवाड़े से सुशीला निकली... धीरे-धीरे स्त्री-पुरूष के व्यवहारिक रिश्तों को दबा-दबा कर चलते हुए। उसकी ऑखें फर्श पर चिपकीं थीं... ऑखें तो प्रवासीनाथ जी की भी फर्श पर ही चिपकीं थीं पर फर्श पर जीवन जीने की कलायें थीं तो कलाओं का विरोध भी था। अमरेन्दर देख रहा था देह-प्रिय कला का विरोध। अपनी तमाम लोकप्रियता के बावजूद भी इस कला पर नाक-मुह सिकोड़ने वालों की तादात कम नहीं... इन्ही लोगेां मेें थीं प्रवासीनाथ जी की अधेड़ घरनी, सोहर, लचारी गाने वाली...।
अमरेन्दर सारा दृश्य देख कर अचंभित था... अचंभित इसलिए नहीं कि सुशीला प्रवासीनाथ जी की पांडुलिपि थी...। पांडुलिपि तो वह थी ही, एक दम से मौलिक, अप्रकाशित, अप्रसारित जिसे मशहूर प्रकाशक मधोक मधुकरी पांच-छंह महीनों से लगातार मांग रहा था...। एडवान्स भी दे रहा था पर प्रवासीनाथ जी के सामने विक्रम सेठों जैसों के करोड़ों का मामला था, सो वे ना-नुकूर कर रहे थे और सुशीला की तरह पांडुलिपि वाला संस्मरण भी दाबे बैठे थे।
अमरेन्दर फिर क्यों अचंभित था? इसलिए कि प्रवासीनाथ जी की धरनी को अगले सप्ताह अपने मायके से लौटना था जिसमें तीन भरे-पुरे स्वस्थ दिन बाकी थे। ‘पाप छिपाये नहीं छिपाता’ ऐसा मानकर, दृश्य का अन्त देखने के लिए प्रस्तुत हो गया।
पूरे दृश्य का सुखद अन्त हुआ... प्रवासीनाथ जी ने अपनी घरनी से माफी मांगी। माफी मांगने का तरीका सांस्कृतिक था... सांस्कृतिक इसलिए कि प्रवासीनाथ जी घरनी के कोमल-कोमल... लाल रंग से रंगे हुए पांव पकड़ कर रोने लगे... थोड़ी देर में सुशीला ने भी वही किया जैसा प्रवासीनाथ जी कर रहे थे। विलाप व पश्चाताप की इस युगलबन्दी से अमरेन्दर हतप्रभ था।
प्रवासीनाथ जी की पत्नी दया की देवी थीं... सबको क्षमा करने वाली... सुशीला को क्षमादान देते हुए उन्होंने समझाया कि ‘तूं लड़की जात है, तन को तपाया कर। तन को तपाना ही तपस्या है... मर्दो का क्या... वे तो बर्द होते हैं, कहीं भी सानी-भूसा खाने वाले...।’ फिर वे प्रवासीनाथ जी के सारे दैहिक शास्त्र को रौंदनें लगी...‘शर्म नहीं आती धड़-धड़ा-धड़ कलेजा नहीं करता...?’ बिटिया सरीखी लड़की के साथ
सुशीला की पांडुलिपि का, अमरेन्दर आई विटनेस था। वह जब तक शहर में रहा प्रवासीनाथ जी के लिए सन्देह का कारण बना रहा कि अमरेन्दर कभी भी पांडुलिपि की फोटो कापी कर सकता है... सो उन्हें अमरेन्दर का गायब हो जाना भला लगा...। उनकी इस आन्तरिक खुशी को कोई जान न ले इसलिए वे अमरेन्दर के परचितों से अमरेन्दर के बारे में अवश्य पूछते... तथा उन पत्रों का हवाला देते जो उनके द्वारा अमरेन्दर के गांव के पते पर छोड़े गये थे...।
खैर.. संभव तो यह था कि मुहल्ले का कोई अमरेन्दर के गांव चला जाता, उसका हाल-अहवाल मालूम कर वापस आ जाता...। ऐसा करना भावुकता होती... तथा मुहल्ला प्रवासीनाथ जी की देखा-देखी भावुकता विरोधी था। मुहल्ले के लोग कारण मालूम कर रहे थे कि अमरेन्दर क्यों गायब हुआ... न कारण मालूम हो न अमरेन्दर का पता चले...। साल-दो साल गुजर गये अमरेन्दर का कहीं पता नहीं।
पहले तो अमरेन्दर भौतिक रूप से गायब हुआ फिर मुहल्ले की चर्चाओं से भी गायब हो गया। जब अमरेन्दर के गायब होने की चर्चा मुहल्ले में जोर पर थी तभी प्रवासीनाथ जी भी मुहल्ला छोड़ कर विश्व विद्यालय कैम्पस में चले गये। कैैम्पस में रहते हुए, लेक्चरर से रीडर फिर विभागाध्यक्षी जोगाड़ने में सुविधा थी... मुहल्ले की उंगली उठाओ संस्कृति इसमें बाधा थी। समय प्रवासीनाथ जी का चेहरा मौसमी रंगों से रंगते हुए आगे बढ़ता रहा तथा प्रवासीनाथ जी तरक्की दर तरक्की करते रहे... अब वे विभागाध्यक्षी के महज हाथ भर दूर थे।
प्रोफेसर प्रवासीनाथ और लेखक प्रवासीनाथ, में मुहल्ले के जो लोग समानता ढूंढते या उन पर शोध जैसा कुछ करते, उन्हें प्रायः मुर्ख समझा जाता। लेखक प्रवासीनाथ जी के पाठकों का भी वही हाल था... कुछ आलोचक तो यथानाम यथाकाम जैसा उन्हें मानते ‘जो वास, रहवास एवं सहवास का आत्म-आलोचक हो, वही प्रवासीनाथ हो सकता है, कोई दूसरा नहीं...।
कहते हैं समय एक जैसा नही होता... मुहल्ले का समय बदलने लगा। उसने नया चोला धारण कर लिया। धोती, कुर्ता, भांग के गोले, ठंडई, बादाम के शर्बत सबके सब नाली में फेंका गये... कोका कोला और दारू की बोतलें हर तरफ टकराने लगीं। जीन्स के कपड़ों की परेडें होतीं तथा कटे हुए बालों से देह-दाह को उभारा जाता... यह वही दौर था जब दिल्ली, एक अदद प्रधानमंत्री के लिए परेशान थी। संसदीय चुनाव हो चुके थे, सारी पार्टिंया बहुमत विहीन थी... कोई ऐसा जोगाडू नहीं था जो बहुमत योग्य सांसदों को पटा कर प्रधानमंत्री बन जाता... बहरहाल मुहल्ला भी दिल्ली की तरह से दुविधा में था... सो... प्रतिक्रिया स्वरूप... मुहल्ले ने राजनीतिज्ञों व साहित्यकारों को लफ्फाजों की एक प्रजाति मानकर, चर्चाओं से खारिज कर दिया था... ऐसी हालत में अमरेन्दर ही नहीं प्रवासीनाथ जी भी चर्चाओं से बाहर थे...
समय पलटा... मुहल्ले का हर चायखाना प्रवासीनाथ जी व अमरेन्दर की चर्चा से गंुजायमान हो उठा। हुआ यह कि कहानी की किसी मशहूर महिनवारी में प्रवासीनाथ जी का संस्मरण प्रकाशित हुआ जो अमरेन्दर, उसके मकान मालिक बंगाली बाबू व उनकी छोटकी बिटिया की परिधि पर था...। संस्मरण का आशय था कि अमरेन्दर बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया के साथ जंगल की तरफ भाग गया है... अब वह हिंसा में विश्वास करने वाली क्रान्तिकारी पार्टी का कर्ता-धर्ता बन गया है। किसी काल में वे खुद भी क्रान्ति के महाकाल हुआ करते थे लेकिन रूस की बाई-पास सर्जरी हो जाने के बाद उन्होंने धारा बदल ली। चित्त और चिन्तन में से चित्त की अमृत-धारा को उन्होंने चुन लिया और इसे ही बुढ़ौती काटने का सहारा बना लिया।
प्रवासीनाथ जी के संस्मरण पर यकीन करने वालों की संख्या से अविश्वास करने वालों की संख्या कम न थी। सो संस्मरण किसी खून, डकैती की तरह अफवाह बन गया। संस्मरण को गल्प व झूठ मानने वालों के आगे यकीन करने वाले माथा टेक बैठे... माना गया कि बंगाली बाबू की बिटिया शहर के किसी दादा के संग बंबई में ऐश कर रही है। बंगाली बाबू भी इसीलिए अपना मकान डिग्री कालेज के एक प्रोफेसर को बेच दिये ताकि बिटिया के साथ बंबई में रह सके।
क्षण भर के लिए यदि यह यकीन कर लिया जाय कि संस्मरणों की सूचनायें सच होती हैं तो मान लेना चाहिए कि अमरेन्दर यूं ही मुहल्ले से गायब नहीं हुआ... गायब हुई बंगाली बाबू की लड़की और गायब करने वाला हुआ अमरेन्दर, जो प्रवासीनाथ जी का कभी शिष्य हुआ करता था। वह जंगल की तरफ नहीं भागा, भागा बंबई। संस्मरण के कारण प्रवासीनाथ जी घाटे में चले गये, मुनाफा हुआ अमरेन्दर को... वह हीरो बन गया। हीरो इसलिए की लड़की भगाना कोई हंसी-खेल नहीं वह भी बंगाली बाबू की बिटिया। खिलन्दड़ी भाषा, सधुक्कड़ी भूषा व जादुई अभिव्यक्ति के कलाकार प्रवसीनाथ जी के अनुमान कभी गलत न होते थे... यह संयोग ही था कि अमरेन्दर वाले संस्मरण पर मुहल्ले वालों ने शक किया इससे प्रवासीनाथ को पीड़ा पहुंची पर मुहल्ला तो महज मुहल्ला ही था.. कोई प्रदेश, देश या महादेश तो नहीं संस्मरण मुहल्ला ही नहीं प्रदेश और देश लांघ कर विदेश तक जा पहुंचा... खूब वाह-वाही मिली प्रवासीनाथ जी को... सो प्रवासीनाथ जी की पीड़ा, वाह-वाहियों में घुल कर समाप्त हो गई... उन्हें एक बार फिर अपने अनुमान पर थोड़ा घमंड जैसा हुआ।
लिखे-पढ़े का जो हस्र होता है, वही प्रवासीनाथ जी के संस्मरण का भी हुआ। महीने-दो महीने में पठनीयता की हिस्टीरिया खत्म हो गई... मुहल्ला सामान्य गतिविधियों में लग गया जैसे कुछ हुआ ही न था...। इसी बीच बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया मुहल्ले में दिख गई। वह अपनी मौसी के यहां आई हुई थी। बिपदा की मारी सी दिख रही थी... फिर भी वह वही थी... पहले वाली... केवल उसका मन-भावन व लुभावन रूप छिन गया था।
मुश्किल से एक दिन गुज़रा कि दूसरे दिन ही रंग-बिरंगी चर्चाओं ने मुहल्ले की तटस्थता भंग कर दी...।
‘यार! अमरेन्दरा बंगाली बाबू की बिटियवा के साथ नहीं भागा था वह तो सुशीला ही अमरेन्दरा को भगा ले गई थी’ तथा शहर छोड़ दी थी।
नहीं-नहीं उसको का भगाना... वह तो खुद भागी थी। सुशीला भी तो प्रवासीनाथ के यहां रखैल से ऊपर न उठ पाई... उसे भी लेक्चराई कहां मिली? दिल्ली के किसी फिल्मी गीतकार से उसकी पहचान थी। गीतकार असली था, तन के ताप और दिल के दर्द को पकड़ने वाला। सुशीला उसके संग हो ली। बंबई पहुंच कर वह मैडम सुशीला हो गई... तीन-चार साल गुजरे होंगे कि गीतकार ने आत्म-हत्या कर ली...। गीतकार की आत्म-हत्या के बाद सुशीला ही गीतकार की संपत्ति की मालकिन हुई... सम्पत्ति अधिक थी... सुख था, वैभव था। कमी थी तो एक ऐसे आदमी की जो उससे प्रेम करे... सुशीला ने अमरेन्दरा का चुनाव किया...। एक दिन उसे यहां से भगा ले गई, मरता का न करता...।
इसी भांति बंगाली बाबू की बिटिया ने अमरेन्दर के गायब होने का रहस्य खोल दिया था इतना ही होता तो कोई बात न थी... किसी का गायब हो जाना, मर जाना, दंगे में मार दिया जाना जैसी घटनाये मुहल्ले को सिर्फ महीने दो महीने के लिए गर्म रखती थीं। अमरेन्दर इन घटनाओं से ऊपर था... ऊपर इसलिए कि वह बड़ा आदमी बन चुका था... मशहूर पटकथा लेखक... दो-तीन फिल्में भी बना चुका था... उसके सीरियल के एक कड़ी की शूटिंग इसी शहर के इसी मुहल्ले में की जानी है।
इस तरह की पक्की खबरें मामूली तो होती नहीं जो अमरेन्दर के परचित कवियों, कथाकारों, को अप्रभावित रहने देतीं...। कवि, कथाकार ही नहीं गाने-बजाने वाले लोग भी बंगाली बाबू की बिटिया की मौसी के यहां जा कर अमरेन्दर का पता मालूम करने लगे... फिर तो बंगाली बाबू की बिटिया परेशान-परेशान हो गई...।
उसे अक्ल सूझी... उसने छोटा सा पर्चा छपवाया जिस पर अमरेन्दर का पूरा पता लिखा था... फैक्स, फोन, इन्टरनेट के साथ-साथ डाक वाला भी... आफिस और घर का अलग-अलग...। किसी मजदूर के जरिये उसने मुहल्ले की जागृत दुकानों पर चिपकवा दिया... इससे बंगाली बाबू की बिटिया को राहत मिली... लोगों का उसकी मौसी के यहां आना-जाना बन्द हो गया... सभी अमरेन्दर का पता दुकानों पर चिपके पर्चे से जान लेते।
और सब तो ठीक-ठाक था, कहीं कोई दिक्कत नहीं। किसी ने अमरेन्दर को पत्र लिखा तो किसी ने फोन या फैक्स किया। कोई किसी को कुछ न बताता सारा चोरी-चोरी चलने लगा... सभी परेशान-परेशान -सीरियल की होने वाली शूटिंग के कारण...। जाने क्या करे अमरेन्दर कहां-कहां, किसे-किसे शूट करे...’ हितुआ और विरोधी दोनों।
तीन-चार सप्ताह बाद अखबार की एक खबर ने मुहल्ले को हंसा दिया... हंसते हुये लोग सतर्क हो गये... खबर थी कि अमरेन्दर अगले महीने के पहले सोमवार को अपनी यूनिट के साथ सीरियलकी शूटिंग के लिए इस शहर में आ रहा है... उसके साथ केन्द्रीय सरकार के निर्विभागीय मंत्री व प्रदेश सरकार के गृहमंत्री भी होंगे... ‘खबर में अमरेन्दर की यूनिट के रहने, खाने-पीने, शूटिंग करने के विस्तृत विवरण प्रकाशित थे...।’
अमरेन्दर को एक सप्ताह बाद दाखिल होना था बावजूद इसके प्रशासन की सक्रियता बढ़ गई... प्रशासन उन समितियों या संस्थाओं की जांच-पड़ताल करने लगा जो अमरेन्दर के स्वागत के लिए अचानक उग आई थीं... प्रलेस, जलेस व जसम को छोड़ दीजिये इन्हें तो प्रशासन किसी तरह जानता था, इनकी सांस्कृतिक स्थितियों से प्रशासन परचित था क्यों कि इन संस्थाओं के अध्यक्ष, मंत्री वगैरह विश्व विद्यालयों या कालेजों के प्रधानाध्यापक या विभागाध्यक्ष ही थे... दिक्कत थी गाने-बजाने-नाचने वाली संस्थाओं की... सो उनकी जांच हो रही थी।
देखते-देखते वह दिन आ धमका। सीरियल की चर्चाये शहर की जुबान पर। अमरेन्दर की शूटिंग यूनिट ने सबसे पहले विश्व विद्यालय के महत्वपूर्ण स्थानों की शूटिंग की। दूसरे दिन शहर से जुड़े गांवों के प्राथमिक पाठशालाओं, आंगनबाड़ी केन्द्रों वगैरह की... तीसरे दिन अमरेन्दर को... स्वागताकांक्षियों से अपना स्वागत, अभिनन्दन इत्यादि कराना था। इस क्रम से सबसे पहले प्रलेस के प्रान्तीय अध्यक्ष, प्रवासीनाथ जी के यहां आयोजित भोज-भात में अमरेन्दर को शामिल होना था... पर उसे टाल दिया गया। टालने की वजह सुशीला थी जो परछाई की तरह अमरेन्दर से चिपकी थी... प्रवासीनाथ जी के बारे में जानकारी रखने वालों को खुशी हुई... ‘बवाल टल गया नहीं तो पूसी भउजाई कोई न कोई ‘लचारी’ शुरू कर देतीं। अच्छा हुआ भोज-भात की जिम्मेवारी प्रलेस के मंत्री पर थोप दी गई...।
मुहल्ले में चर्चा थी कि प्रवसिया खेल, खेल गया, पुराना मदारी है पर अमरेन्दर भी कम न था, था तो उनका ही चेला। यूनिट और सुरक्षा व्यवस्था का सारा ताम-झाम छोड़कर अमरेन्दर, सुशीला के साथ प्रवासीनाथ जी के यहां हाजिर हो गया...। मुहल्ले के लोगों को इससे अधिक जानकारी नहीं... यह तो बंगाली बाबू की बिटिया ने खुलासा किया कि सीरियल के जीवन्त चरित्र प्रवासीनाथ ही तो हैं... फिर भी लोगों को यकीन नहीं हुआ...।
यकीन तो तब हुआ जब प्रवासीनाथ जी अपनी घरनी के साथ हवाई अड्डे पर देखे गये हाथ हिलाते हुये... उस दिन अमरेन्दर वापस बंबई जा रहा था। हो सकता है बंगाली बाबू की बिटिया सही हो पर मुहल्ले में प्रवासीनाथ के विरोधी उससे असहमत थे... ऐसा होता तो प्रवासीनाथ का मुंह लकवाग्रस्त हो चुप न रहता। उनकी वाणी खुजलाने लगती...वैसे मुहल्ले ने यकीन कर लिया कि अमरेन्दरा प्रवासीनाथ से बड़ी हैसियत का है... तथा सुशीला प्रवासीनाथ से तलवा चटवायेगी फिर भी उनकी किसी कहानी पर कभी भी फिल्म न बनाएगी...।

 DUSARA ANSH

                                   एक जोड़ी जूता

अमरेन्दर बंबई वापस चला गया, सिर्फ वापस चला गया होता तब ठीक था पर बहुत कुछ छोड़ गया, जैसे सीरियल के जीवित प्रेतों की चर्चा-परिचर्चा। खास तौर से उन लोगों की चर्चा जो अमरेन्दर के लिए एक तिनका भी मुहैया न करा सकते थे। वे लोग ही उसके अगल-बगल डोल रहे थे। वे जान चुके थे कि अमरेन्दर अब गली का पत्तल-चाट कुत्ता नहीं, नहीं जगेशर। जगेशर एक ऐसा आदमी जो जवानी से लेकर अब तक इन्कलाब आने की प्रतीक्षा में कम से कम दो बार पागल हो चुका है। एक बार चारू मजुमदार की मृत्यु के बाद तथा दूसरी बार विनोद मिश्रा के चुनावी राजनीति में कूद जाने के बाद। सामान्य रूप से तो जगेशर आज भी पागल की ही हैसियत वाला है पर पान की दूकान खोल तथा उसे चला कर साबित कर चुका है कि वह पागल नहीं तीन-तिकड़म वाला है, पान बेचने के साथ-साथ क्रान्ति के सूत्रों को भी बेच सकता है। बच्चे जगेशर से थोड़ा आगे है, पानी में दूध या दूध में पानी मिला कर बेच लेते है। क्रान्ति का होना असंभव मान कर जगेशर ने अपने छोटे से मकान को डेयरी में तबदील कर दिया है। अमरेन्दर को कम से कम जगेशर के यहां तो जाना ही चाहिये था।
अमरेन्दर पूरे तीन दिन तक ऐसे लोगों के साथ घिरा रह गया जो शहर के इतिहास में या तो छेद करने वाले थे या उसे मोटी जिल्द में बांध कर पूजने वाले थे। उन लोगों ने कल के मामूली, व सड़क छाप अमरेन्दर को आसमान में टांग दिया फिर वह वहां से गिरता भी तो कैसे? गिरता तो खजूर पर अटक जाता। अपनी तईं अमरंेन्दर सावधान था पर स्वागत-सत्कार कोई बुरी चीज तो नहीं जिसमें शामिल न हुआ जाये। सो वह मजबूर था... आत्म-रति व आत्म-छबि वाले जैसा कहते वैसा करता। हालांकि इस आरोेप से प्रवासीनाथ जी बरी थे... यह साफ था कि अमरेन्दर उनके दिशा-निर्देश पर अपना प्रोग्राम नहीं बना रहा था वह तो सुशीला थी... सुशीला कहां से चालित-संचालित थी किसी को नहीं मालूम।
जगेशर के यहां भी अमरेन्दर जाता न जाता कोई बात न थी पर एल.आर.के यहां। उसके यहां तो जाना ही चाहिये था। एल.आर. बनने के पहले वह लोटन राम था। कामरेडियत का चोंगा पहनते ही एल.आर. में तबदील हो गया यानि कि कामरेड एल.आर.। यह वही व्यक्ति था जिसने बंगाली बाबू को अमरेन्दर के बाकी किराये का भुगतान किया था। थोड़ी-बहुत रकम नहीं पूरे तीन हजार छह सौ। रूपया गिनते समय बंगाली बाबू चकरा गये थे। एल.आर. के पास इतना रूपया कहां...? अचरजाते हुए पूछा उन्होंने...
‘तू इत्ता रूपया पाया कहां से रे?
‘डाका डाला था ‘ज्योति बाबू’ के यहां’
खबरदार जो ज्योति दा का नाम लिया...
अच्छा-अच्छा नाम न लूंगा... गिन तो पूरे है कि नहीं...
रूपया सहेज लेने के बाद बंगाली बाबू ने पूछा था...सामान कौन ले जायेगा अमरेन्दर का ? वही ले जायेगा..मेरे से सामान का का लेना-देना, कहीं रखवा देना संभाल कर, एल.आर. झटके से कहता हुआ बंगाली बाबू के घर से लौट गया था।
बंगाली बाबू एल.आर. को मुसीबत मानते, रूपया लेकर खामोश हो गये... उनके लिए यह बहुत था कि एल.आर. दूसरे के बकाया का भुगतान कर रहा था। उसके ऊपर यदि उनका बकाया होता तो शायद कभी न मांग पाते क्योंकि एल.आर. की छवि नखनहा की थी, जो काटता तो नहीं पर नखनियाता जरूर। एल.आर. के कई-कई प्रसंग मुहल्ले में आज भी ताजा हैं कवि विलोचन वाला प्रसंग तो बंगाली बाबू भी बखूबी जानते थे।
कवि विलोचन ने कुछ गड़बड़ कर दिया था, ऐसा कत्तई नहीं। एल.आर. को अपमानित कर पाने की शक्ति उनमें कहां से आती? कवि विलोचन अक्षर-ब्रह्म वाले आदमी, मुक्का तथा मुद्रा दोेनों से अभावग्रस्त...। चाय वाली दुकान भरी थी सुजानों से... कविता पर बहस गर्म थी, विलोचन जी ने तत्कालीन छन्द-मुक्त कविताओं की ले दे शुरू किया। उस समय धूमिल का जोर था। धूमिल छोटी-बड़ी सभी जगहों पर घुसपैठ कर रहे थे... धूमिल की कविता ‘मोची’ का सन्दर्भ विलोचन उठा बैठे... लीजिये साहब। अब आदमी एक जोड़ी जूता है, जो आदमी को पहचानना चाहे वह मोची...।
चायखानों के सुजानों के लिए प्रिय थे कवि विलोचन... गला बारीक, प्रिय की गलियों में तान अलापने लायक... सुजानों में बैठा था एल.आर.। पहले तो वह धीर-गंभीर था... शायद प्रसंग इतना ही हो... पर जब विलोचन धूमिल की मोची कविता का व्यंगात्मक पाठ करने लगे वह उबल पड़ा...।
बात गाली-गलौज, हांथा-पाई तक जा पहुंची... चायखाने के सुजानों ने किसी तरह उस अनावश्यक प्रसंग को आगे बढ़ने से रोका। प्रसंग के पटाछेप तक प्रवासीनाथ जी भी चायखानें में हाजिर हो गये थे... अपना समझ कर उन्होंने एल.आर.को समझाया...।
‘यह तो चायखाना है एल.आर...! फिर तोहसे येह मुंहनोचौव्वल से का मतलब । तू तो धूमिल को जानते भी न होगे। वह यहां आया ही नहीं...।’
बहरहाल एल.आर. ने खुद पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। कुछ स्त्रैण चित्त वालों ने कवि विलोचन को अच्छी सीख दी... ‘बहस इज्जतदारों से करनी चाहिये। एल.आर. उनमें से नहीं...।, वह तो एक जोड़ी जूता है।’
वास्तव में एल.आर.इज्जतदार तो न था प्रवासीनाथ या विलोचन की तरह, पर तर्क व दो-दो हाथ करने में बलशाली था। भरा-पुरा जिस्म, मछलियों वाली बाहें, बड़ी-बड़ी आंखें, फ्रेंचकट दाढ़ी, फर्राटा बोलता, धूमिल मुक्तिबोध, देरिदा, फुकूयामा सभी को पढ़ता, बिना पढ़े-विचारे कुछ न बोलता। बोलता तभी जब बकवास किया जाता तो वह आपा खो बैठता...।
उसका आपे से बाहर निकल जाना उसे गुस्सैल बनाता तथा प्रचार भी करता था कि वह कभी क्रान्ति वाली पार्टी का सक्रिय सदस्य था। ऐसे आकस्मिक अवसरों पर लोग न भूल पाते कि वह कभी चारू के साथ था। उस समय वह एम.एस.सी कर चुका था। चाहता तो मुर्दरिसी जोगाड़ लेता किसी कालेज में, पर घर-बार छोड़ कर भाग गया बंगाल। उसे अपनी ताकत पर यकीन था तथा उस विचार पर भी कि क्रान्ति की शुरूआत भर की देरी है नही ंतो जनता तो तैयार बैठी है। हुआ उलटा। एल.आर. गया था क्रान्ति पीठ पर लादने, जब बंगाल से वापस लौटा तब उसके सिर पर पराजित होने या भगोड़ा होने का बोझ था तथा पैर में दो-दो गोलियां...।
गोलियां निकल र्गइं तथा उसकी नर्स मत्र ने उसे लंगड़ने से भी बचा लिया, अब वह पैरों से पूरा काम लेने में समर्थ है जितना कि हाथों से लेता है। गोलियों के गाढ़े दागों ने उसे जीवित आदमी बनाया हुआ था, नही ंतो मुहल्ले के लोग उसे कब का खदेड़ चुके होते।
कवि विलोचन वाला प्रसंग तो थोड़ा गड़बड़ था पर प्रवासीनाथ वाला...। उससे तो एल.आर.का कद ऊंचा हुआ था। अब नये कहानीकार की ऐसी औकात जो जमेे-जमाये कथाकार, प्रवक्ता प्रवासीनाथ पर ऊंची-नीची बातें करे तथा चायखाना जैसी जगह पर अपमानित करे...। भला एल.आर. कैसे तूफान न खड़ा करता, उसने वैसा ही किया जैसा कि वही कर सकता था...। नये कहानीकार का कालर पकड़ा तथा दूकान में खड़ा कर दिया...।
‘तो क्या पात्र तुम्हारी... में से निकलेगा इसमें क्या गलती हो गई कि एक समर्पित कामरेड किसी... वांक्षित शोषक के यहां किचन संभाल लेता है, फिर एक दिन उसे जहर देकर मार डालता है... आखिर वह उसे मारता कैसे...? आमने-सामने लड़कर... राणा प्रताप की... हो क्या... एक झापड़ पर तो हग दोगे..।’
नया कहानीकार प्रवासीनाथ की कहानी का पोस्टमार्टम कर रहा था... दरअसल वह अपने वश में नही था... वश में होता तो प्रवासीनाथ के साथ होता क्योंकि स्थानीयता का भाव सभी में होता है। हुआ यह था कि प्रवासीनाथ की उक्त कहानी पक्षीनाम-धारी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी जिसके विरोध में पशुनामधारी एक दूसरी पत्रिका थी। इस दूसरी पत्रिका ने प्रवासीनाथ की कहानी का अंग-प्रत्यंग आलोचना के नाम पर निपोर दिया था। नया कहानीकार उस पत्रिका का सलाना सदस्य था तथा चिट्ठी-पत्री लिख कर उस पत्रिका से बतौर लेखक संपर्क बनाये हुआ था। पक्षीनामधारी पत्रिका वाले इतने बेदर्द थे कि उस नये कहानीकार की चिट्ठी तक न छापते थे... सो वह गुस्से में था... अब उसे क्या मालूम कि गुस्सा उतारने की गलत जगह का उसने चुनाव कर लिया है... सो फंस गया एल.आर. के चक्कर में...।
एल.आर हमेशा पक्षहीन बातें करने की कोशिश करता, उस दिन प्रवासीनाथ के पक्ष में हो जाने का मतलब यह नहीं था कि वह उनका दलाल था। दलाली तो उस जैसे को क्या आती एक निष्ठुर और कठोर आदमी को। सारा किस्सा सुनकर पहली बार प्रवासीनाथ ने एल.आर.को गंभीरता से लिया तथा छिपा कर रखी गई डायरी में दर्ज किया...
‘तार्किक कूबत हर समय झगड़ा लगाती है, जिससे मार-पीट की संभावना भी बढ़ती है पर शरीरी कूबत हमेशा और समयानुसार काम देती है... कम से कम बचाव के लिए तो अवश्य ही।’
एल.आर. को बाद में प्रवासीनाथ जी अपनी किसी धांसू कहानी का चरित्र ही मानने लगे थे। उससे जब मिलते कुछ न कुछ उसमें से निकालते... उसके बात-चीत करने के तौर-तरीके को विश्लेषित करते... कुछ जोड़ते, घटाते... कुल मिलाकर मुहल्ला एल.आर. की जिस्मानी ताकत से घबराता तथा अपने मुंह पर दो-चार घूंसो की चोटें महसूसता। बंगाली बाबू की क्या औकात कि वे पूछते ‘रूपिया कहां से पाया रे’ एक बार जो पूछ लिया, पूछ लिया फिर नहीं। अमरेन्दर का सामान कमरे में से निकलवा कर स्टोर वाले कमरे में रखवा दिया। बंगाली बाबू ने जब मकान बेचा और उस पर कब्जा दे दिया उसके पहले ही अमरेन्दर के सामान को एल.आर के यहां भेजवा दिया... ठेले का भाड़ा भी खुद दिया...। बंगाली बाबू का किराया चुकता हो जाना मुहल्ले के लिए जरूरी सवाल था। अपनी-अपनी अक्ल के अनुसार लोग इसे हल करने की कोशिश में थे। किसी के सामने आधुनिक गणित थी तो किसी के सामने वैदिक... तो कोई एल.आर. की जीवनचर्या लिये बैठा था। एल.आर था कि गणित से ऊपर था। किसी तरह से शहर में रहता था...। न कोई काम न कमाई। ट्यूशन वगैरह भी नहीं। कभी कभार एक पत्रिका निकालता जिसमें कामरेडियत की शास्त्रीय चर्चा होती। देश में चल रहे लोकतंत्र को शोकतंत्र में बदल जाने के बाबत कुछ विचारणीय लेख हेाते। प्रथम द्रष्टया पत्रिका प्रभावित करती पर ऐसा विश्वास न दिलाती कि पत्रिका सदस्यों के योगदान से प्रकाशित होती है। कुछ कामरेड सुविधा-संपन्न तथा धनी थे उनके लिए तीन हजार छह सौ रूपया कोई समस्या नहीं पर मुहल्ला उन पर विश्वास न करता... वे यह मानते कि कामरेड किसी को कुछ लेता देता नहीं। फिर एल.आर. को देना... वह भी बंगाली बाबू को देने के लिए अमरेन्दर होता तो बात दूसरी थी...।
फिर इतना रूपया किसने दिया एल.आर. को...। सभी सवाल करते उत्तर देते पर उत्तर सटीक न बैठते... इसी तरह एक टहलता हुआ उत्तर था कि प्रवासीनाथ ने दिया होगा। उत्तर पर लोग गंभीर होते लेकिन उत्तर तो खुद सवाल था प्रवासीनाथ को देना होता तो बंगाली बाबू को स्वतः न देते... एल.आर. को काहे देते... फिर प्रवासीनाथ इस तरह का काम नहीं किया करते... फिर किसने दिया? किसी ने तो दिया ही... क्यों कि एल.आर. से किसी अवैध या अनैतिक कार्य की उम्मीद नहीं, वह भी दूसरे के लिए...।
किसी को सच्चाई मालूम नहीं, सच्चाई एल.आर. किसी को क्यों बताता? कोई उससे पूछता भी नहीं... पूछे भी कौन? पूछे गाली सुने, ठीक नहीं... फिर एल.आर. कम से कम कामरेडों को तो गरियाता ही... सभी मठी कामरेड हैं... मठ चलाने वाले... सीधे-साधे डॉ. लोहिया की भाषा... खुद को कुजात कामरेड बताता।
सभी अनुमान पीते हुये खुद में दुबक लेते। एक दो जो एल.आर. की दिनचर्या में थे वे जानते थे कि पूरा रूपया सुशीला ने दिया था वह भी तब जब अमरेन्दर उससे जुड़ा नहीं था और तब गीतकार आत्महत्या कर चुका था। एक तरह से सुशीला अमरेन्दर से जुड़ने का वह अर्थयुक्त प्रस्ताव था। सुशीला ने ही अमरेन्दर को तलाशा, जाने वह कहां था... वह तो कहीं भटक रहा था... फिर सुशीला अमरेन्दर को साथ लेकर बंबई चली गई...
यह रहस्य मुहल्ले के कान में नहीं गया, नही तो बेमतलब परिचर्चा शुरू हो जाती... इसलिए जो होता है वह ठीक होता है। कोई सुशीला के देहन्दा मिजाज़ पर शक तो न करता पर एल.आर. पर अवश्य करता... एल.आर. में वह जज़्बा कहां जिस्म वाला... एल.आर. की प्रतिभा अदृश्य थी तथा खूबसूरती एक शिरे से गायब, फिर भी कुछ था एल.आर. के पास वह भी बहुतों के पास नहीं था। सुशीला जाने किस कैड़े की थी कि एल. आर. का सम्मान करती तथा कभी-कभार उसकी मद्द भी लेती...।
विश्व विद्यालय के हीरोनुमा नेता की पिटाई का मामला सीधे सुशीला से जुड़ा था। सुशीला अक्सर प्रवासीनाथ के यहां आती-जाती। छात्र नेता उसके आने-जाने में किसी अवरोध की तरह निगरानी करता, एक दो बार छेड़ने की भी कोशिश की। विश्व विद्यालय का मिजाज़ चुनाव के कारण गर्म था... उक्त छात्र नेता कांग्रेस समर्थित यूनियन का था... एल.आर., कम्युनिस्टों के समर्थन वाले छात्रों के साथ था... सुशीला भी उन्हीं के साथ थी। मार-पीट का अच्छा अवसर देख कर एल.आर. ने उक्त छात्र नेता की धुनाई कर दी... उसी के बाद से एल.आर. का कद सुशीला के लिए चढ़ गया था।
ऐसा नहीं था कि एल.आर. अपराजेय योद्धा था; न हारने वाला.़.. वह शर्मनाक युद्ध लड़ता हीं नहीं था... सो हार या जीत दोनों स्थिति में वह भारी रहता। लेकिन एक बार उसे बुरी तरह गच्चा खाना पड़ा वह भी एक खूंसट समाजवादी से। समाजवादी की हैसियत बात-बात पर झगड़ा लगाने वाले की थी। एक बार विश्व विद्यालय की छात्रसभा का अध्यक्ष समाजवादी हो गया सयुस वाला। वह नाममात्र का समाजवादी था। यूनियन में अविश्वास आ गया... इस अविश्वास को पलटने के लिए समाजवादी नेता आया... उसकी सभा विश्व विद्यालय परिसर में होनी थी... छात्रों में था कि छात्रों की बातें छात्र तय करेंगे... समाजवादी नेता काहे आया... सो बहुतेरे छात्र सभा के प्रारंभ के समय... ‘गो बैक, गो बैक’ का नारा लगाने लगे...। एल.आर. सबसे आगे था, जबकि वह छात्र नहीं था... समाजवादी नेता इस तथ्य को जानता था।
ज्योंही छात्रों की तरफ से जोरदार ‘गो बैक, गो बैक’ हुआ... समाजवादी नेता मंच से उछला सीधा एल.आर. की तरफ गया तथा उसकी बाहें पकड़ लिया...।
‘कहां जाऊ बेटा! मैं बाहरी नहीं, यहीं जन्मा यहीं मरूंगा... बोल तू कहां से आया। पहली बात कांव-कांव बन्द करो, रही बात गुंडई की, तो आओ एक-एक निपट लो, साठ का हूं तो इससे का...?
बात सिर्फ वाद-प्रतिवाद तक होती तब शायद छात्रों की सभा न चकराती पर समाजवादी नेता सठियाया हुआ था। उसने कुर्ता निकाला, फेंका तथा मल्ल-युद्ध के लिए तत्पर हो गया... एल.आर. दर्शक बना चकित था, हो क्या रहा है। सभा के छात्र चकित थे, समाजवादी नेता की लम्बी तोंद देख। वह अकड़ा खड़ा गंजी और कच्छा में धोती तो पहले ही खुल चुकी थी। कौन किसको रोके, एल.आर. और समाजवादी दोनों अपनी जिदों के मालिक थे।
किसी तरह मल्ल-युद्ध की नौबत नहीं आई फिर भी समाजवादी नेता ने एल.आर. को मंच पर बैठा कर अपनी जिद पूरी कर ली। नेता ने खुद आमंत्रित किया एल.आर. को कि वह अपनी बात रखे, विरोध आमने-सामने का प्रशंसनीय होता है पर एल.आर. ने दूसरे के मंच से अपनी बात रखना ठीक न समझा इसलिए इंकार कर गया तथा मंच से उतर आया, क्षमा-याचना के साथ। लोग भले ही इस प्रसंग को भूल गये हों पर एल.आर. को यह कभी नहीं भूलता। उसे आशा ही न थी कि कभी ऐसा युद्ध होगा, वह भी उसके जीवन में जिसमें न कोई विजेता हो न विजित।
इस एक घटना ने एल.आर. को इतना प्रभावित किया कि वह समाजवादी नेता का नैतिक शिष्य बन गया फिर तो कामरेडों को फटकारते हुए कहता..दो-चार कामरेड भी समाजवादी नेता की तरह होते तो आज कम्युनिस्टों का सिर आसमान में होता... समाजवादी जो कहता था वह करता था तथा जो करता था वही कहता था।
तीन हजार छह सौ रूपया एल.आर. के पास कैसे तथा कहां से आया किसी समय यह सवाल मुहल्ले को धुंआ-धुंआ कर गया था पर अब कोई इस पर चिन्तित न था। मान लिया गया कि सुशीला ने ही दिया था...।
सुशीला से उसका साबिका था, काफी घना, एक दूसरे में अर्न्तलयित होने लायक। सुशीला से पुरातनता की उम्मीद करना कई मायनों में बेकार था कि वह भरी-पुरी नारी होने के कारण इस हद तक स्त्रैण होगी कि सिमटी रहे एक दो के साथ। सुशीला सम्पन्न तथा उच्च कुल वाली है... पति या प्रेमी को ईश्वर का अवतार मानने वाली... इसी उम्मीद के कारण कवि विलोचन कई मौकों पर बेवकूफियां कर बैठे... नही ंतो सुशीला को सबसे पहले सभा तथा गोष्ठियों में साथ ले जाने वाले वे एक मात्र अधिकृत व्यक्ति थे... प्रवासीनाथ तो बहुत देर बाद सुशीला की कहानी का हिस्सा बने वह भी तब जब सुशीला पी.एच.डी. करने लगी फिर वे उसके पर्यवेक्षक बन पाये।
कवि विलोचन का जो हुआ सो हुआ प्रवासीनाथ भी सुशीला की शुचिता को लेकर काफी चिन्तित रहा करते थे। वे बार-बार कोशिश करते कि सुशीला शहर के लफंगों से तार न जोड़े तथा अपनी गरिमा का ध्यान रखे...। ‘अमरेन्दर तो ठीक जान पड़ता है पर एल.आर. तो पक्का लफंगा है ‘साला कामरेड की दुम’। प्रवासीनाथ एल.आर. को लफंगों की आधुनिक नस्ल मानते हैं। डी.एन.ए. की नई प्रजाति।
प्रवासीनाथ पहले भले ही भ्रम पाले रहे हों कि सुशीला उनकी सीखों को धारण कर लेगी पर बाद में तो उनका भ्रम स्वतः फुर्र हो गया। सुशीला जटिल संबन्धों वाली गंभीर लड़की थी तथा वादाखिलाफी को ही अनैतिक मानती थी। इसके आगे-पीछे कुछ नहीं... अब प्रवासीनाथ सुशीला को अपनी कहानी की पांडुलिपि समझते हैं तो समझा करें। इससे सुशीला को क्या लेना-देना...?
लेना-देना तो एल.आर को भी प्रवासीनाथ से कुछ नहीं था... प्रवासीनाथ ही क्यों किसी से भी लेकिन कामरेडियत का बुखार दोनों को हमेशा परेशान किये रहता था सो एक रिश्ता तो स्वतः बन जाता था... पर रिश्ते की बनावट साफ न थी, कभी लगता था कि रेशे अलग-अलग हैं कभी लगता कि गुंथे हुए तो कभी लगता कि मोटी पर्त जमा दी गई है, औपचारिकता की। कुछ भी था, छीजन तो था ही जो रिसता था बीस साल पहले वाला तो एक दम से स्पष्ट था... मवाद माफिक बहता हुआ, बदबू करता...।
एक समय था जब ‘मठी’ कम्युनिस्टों के लिए ‘चुनाव’ का मुद्दा कम्युनिस्ट संस्कृति के लिए संशोधनवाद था... संशोधनवाद की सीमा एक तरफ पथ-भ्रष्टता थी तो दूसरे तरफ गद्दारी व मक्कारी थी। एल.आर. चुनाव को व्यवसाय मानता तथा विरोध करता जबकि प्रवासीनाथ चुनाव को लोक-मत का फैसला मानते एवं जनता को प्राप्त मतदान के अधिकार को ठीक मानते। जनमत को अपने पक्ष में कर लेना कामरेडियत का कार्यभार होना चाहिये...। जाहिर है दो विपरीत ध्रुव आपस में कैसे मिलते... इसी लिए एल.आर. और प्रवासीनाथ का जब भी आमना-सामना होता बात झगड़े तक पहुंच जाती, गनीमत होती उस समय प्रवासीनाथ अपनी खोल में दुबक लेते। लेकिन एक दिन प्रवासीनाथ खोल में न दुबक सके फिर तो एल.आर. उलझ गया... संशोधनवादी, हिजड़ा जो उचारा, उचारा ही कहानी माफिया तक कह डाला... इतना ही नहीं सबूत तक प्रस्तुत कर दिया।
चायखाने के सुजान हतप्रभ थे क्योंकि प्रवासीनाथ चाहे जो हों, कहानी माफिया तो कत्तई नहीं, पर एल.आर. का मुंह कौन रोके, बक-बकाता रहा जब तक प्रवासीनाथ चायखाना छोड़ कर नहीं चले गये। प्रवासीनाथ के जाने से क्या होता... एल.आर. तो चालू था। चायखाने के सुजान एल.आर. की बातें चूसने लगे कि प्रवासीनाथ की सारी नही ंतो कम से कम आधी कहानियां तो दूसरांे की हैं, उस आदमी की जो कहीं दूर देहाती कस्बे के प्राइमरी स्कूल में मास्टर है। उस बेचारे मास्टर ने अपनी कहानियां ठीक-ठीक करने एवं छापने के लिए प्रवासीनाथ को दिया था...। प्रवासीनाथ ने उन्हें कहीं नहीं छपवाया... थोड़ा बहुत रूप बदल कर उन कहानियों को धीरे-धीरे अपने नाम से छपाने लगे...। मास्टर के पूछने पर बता दिया कि कहानियां तो संपादकों के पास हैं तथा संपादकों ने बार-बार मांगने पर भी नहीं लौटाया। गल्ती यह हुई कि उन्होंने मूल-प्रतियां ही भेज दी थी। ऐसे में कोई क्या करे... मास्टर माथा पकड़ कर राम भरोसे हो गया... बाद में उसने खुद कोशिश की, अब वह चर्चित कथाकार है। संयोग से वह एल.आर. के गुट का है।
एल.आर. की प्रवासीनाथ से यह खुली नोक-झोंक थी तथा इससे एल.आर. न तो आत्ममुग्ध था और न ही दुखी। चायखाने से भांग का एक गोला खरीदा, खाया फिर अपने कमरे की तरफ चला गया... चायखाने के सुजान भी धीरे-धीरे खिसक लिए। लौटते समय सबके सामने प्रवासीनाथ का संकोची चेहरा था, तो क्या प्रवासीनाथ भी...।
सच यह था कि मुहल्ले के कान खुले थे, जीभ नुकीली थी तथा आंखें कौओं काली, सो मुहल्ले में पनपने वाला किसी भी तरह का रिश्ता सदैव बेपर्दा रहता चाहे प्रेम-प्रसंग में भगाई का मामला हो, या नदी किनारे सांस्कृतिक कार्यक्रम निपटाने का ही। अमरेन्दर का एल.आर. या जगेशर के यहां न जाना, शहर में आना तथा इतिहास में दरार करने वालों के यहां राम-रामी कर लौट जाना पर्दे में न रह सका। माना यह गया कि अमरेन्दर का कोई अपना आकाश नहीं वह सुशीला के सौर्य मंडल का मात्र एक कमजोर ग्रह भर है। सुशीला कवि विलोचन या प्रवासीनाथ को रद्दी की टोकरी में डाल दे तथा उन्हें अपनी कहानी से विस्थापित कर दे ऐसा संभव नहीं।
एल.आर. मुहल्ले वालों से एकदम अलग था, यही हाल जगेशर का भी था... ‘यार हम लोगों का अमरेन्दर से अब क्या मतलब, अमरेन्दर हम लोगों के काम का भी नहीं... वह धन-दौलत वाला हो गया है एक जीवित प्रेत... फिर तो वह अपने सरीखे प्रेतों से ही मिलेगा...।’
एक-दो लोगों ने अमरेन्दर के बाबत एल.आर. से उलाहना भी दिया...। एल.आर. साफ-साफ अलग हो गया अमरेन्दर से ‘कौन अमरेन्दर’ ? मैं तो उस साले को जानता तक नहीं... जाकर पूछो प्रवासीनाथ और कवि विलोचन से... हां सुशीला को जानता हूं पर वह क्या करे? औरत जात! मजबूरियां हैं...। बहुत मुश्किल है जगता प्रेतों से बचना सुशीला चाह कर भी प्रवासीनाथ या कवि विलोचन के चक्र-व्यूह से बाहर नहीं निकल सकती। मेरी कमजारी है कि मैं न तो मठ में जाता हूं न ही किसी मन्दिर में, इसलिए अक्षर-ज्ञानियों या सौन्दर्य की देवी किसी की भी पूजा नहीं कर पाता... वैसे भी सुशीला तो महज एक मामूली सी लड़की, छुई-मुई सी, रही बात अमरेन्दर की... अमरेन्दर तो पहले भी मेरे लिए लौंडा था और आज भी।’
प्रवासीनाथ, कवि विलोचन एवं बंगाली बाबू की बिटिया ही नहीं, सारा मुहल्ला अमरेन्दर की वाह-वाही में लगा था... और एल.आर. तथा जगेशर के लिए जैसे कुछ था ही नहीं, वाह-वाही करना तो दूर, जब भी सुशीला या अमरेन्दर का प्रसंग उठता, खासतौर से सीरियल की शूटिंग के बाबत... एल.आर. प्रसंग का रूख बदल देता... तथा आकाश की तरफ ताकने लगता। आकाश में या नीचे जमीन पर एल.आर. की नर्स मित्र जहां काबिज थी, चायखाने के सुजानों को क्या मालूम? उन्हें मालूम करने की जरूरत भी क्या?
अमरेन्दर तो तब चर्चित हुआ जब प्रवासीनाथ का उस पर संस्मरण प्रकाशित हुआ। सुशीला की पांडुलिपि, मधोक मधुकरी जाने कब प्रकाशित करे, लगता है उसके पहले ही सुशीला और अमरेन्दर का सीरियल आ जायेगा...।
सीरियल जब आयेगा तब आयेगा... तो क्या सीरियल आने के पहले मुहल्ला जैनियों की तरह मुंह पर पट्टी बांधे रहेगा या तभी चर्चा-परिचर्चा प्रारंभ होगी जब प्रवासीनाथ की किश्तों वाली कहानी आयेगी... नही ऐसा कत्तई नहीं... सुशीला तो पहले से ही लोगांे की जुबान पर थी, फिसलती हुई या गले में फंसती हुई ‘यार! अमरेन्दरा किस्मत वाला निकला, मोम जैसी देह तथा किसिम-किसिम की गड्डियों दोनों का मालिक।