Friday, November 20, 2015

अंतर गाथा उपन्यास के अंश




अंतर गाथा उपन्यास का पहला अंश

                        

                                        पाण्डुलिपि

अमरेन्दर के बारे में, मुहल्ले वाले सिर्फ इतनी जानकारी रखते हैं कि वह प्रवासीनाथ जी का परम शिष्य है। सुबह-शाम प्रतिदिन प्रवासीनाथ जी के साथ परछाई बना रहता है, कभी इस चाय खाने में तो कभी उस चायखाने में दिख जाता है।
अमरेन्दर का नाम वोटरलिस्ट में है कि नहीं, उसने पी.एच.डी. की थीसिस जमा किया कि नहीं, या यही कि उसका बंगाली मकान मालिक किराएदारी से उसे क्यों बेदखल करना चाहता है? यह सब मुहल्ले वालों को कत्तई जानकारी नहीं, फिर मुहल्ले वाले जनगणना विभाग के तो नहीं जो अमरेन्दरों, सुरेन्द्रों, वीरेन्द्रों आदि के बारे में जानकारियां हासिल करते फिरें....
हां प्रवासीनाथ जी के बारे में पूरा मुहल्ला जानकारी रखता है तथा उन्हें शाकाहारी विद्वान मानता है। अमरेन्दर प्रवासीनाथ जी का शिष्य है इसलिए वह भी शाकाहारी ही होगा, सो मुहल्ले वाले अमरेन्दर के साथ किसी मोहब्बत का इजहार करते हैं न घृणा का।
पहले तो अमरेन्दर मुहल्ले की चर्चाओं से साफ-साफ बाहर था। चर्चाओं में वह तब आया जब चार-पांच साल गुजर गये। पहले जैसे मुहल्ले तो अब रहे नहीं... शहर के किनारे वाले....एकदम से बाहर, अशिक्षित मध्यमवर्गीयों के जमघट वाले... आज के मुहल्ले तो बड़े-बड़ों से आबाद है.....जगह-जगह चायखाना, दारूखाना, जिमखाना, ब्यूटी पार्लर आदि-आदि।
बहसें चायखानों में उतनी अच्छी नहीं होती, जितनी दारूखानों में... अमरेन्दर दोनों जगहों पर... समान रूप से स्थापित था... किसी-किसी ब्यूटी पार्लर या जिमखाने में भी उसकी चर्चा हो जाती...। चर्चा भी कोई खास बुरी नहीं... कि वह मायावती जी के साथ चला गया, मुलायम सिंह को छोड़कर या मुलायम सिंह के साथ चला गया शिव-सेना छोड़ कर। विश्व विद्यालय के चुनाव में स्टूडेन्ट फेडरेशन वाले उसकी बदमाशी से हारे... यह सब भी नहीं। चर्चा होती, खूब होती पर केवल प्रवासीनाथ जी और अमरेन्दर के बाबत ‘देखो कौन किसको पटखनी देता है?’
मुहल्ले में गंभीर किस्म के विद्वान कवि, आलोचक, कहानीकार, निबन्धकार, नाटककार, चित्रकार, वगैरह सभी बसते थे। ये लोग अमरेन्दर के बारे में दूसरे किस्म की चर्चा करते जिसमें गंभीरता की थोड़ी कमी होती लेकिन उजड्डता तो कत्तई नहीं। ‘कहीं अमरेन्दरा जोगाडू तो नहीं....’ इसी सवाल से चर्चा खड़ी होती और पसरती इस फैसले पर कि ‘अमरेन्दरा को नौकरी मिली, समझ लो जोगाडू’ नहीं तो साला थक कर भाग जाएगा घर। प्रवसिया सोच भी लेगा, तो मान लो कि अमरेन्दरा को लेक्चररई मिल गई, किसी डिग्री कालेज में ही सही...’
इस भांति अमरेन्दर चर्चित बनने की प्रक्रिया में आ ही रहा था कि उसके बंगाली मकान मालिक ने मकान का एक कमरा जो अमरेन्दर की किराएदारी में था, छोड़ने का हुक्म जारी कर दिया... पूरे मुहल्ले पर अघोषित रूप से बंगाली बाबू की सरकार चलती थी। सरकार चलने के अपने कारण थे.... पहला कारण था कि मुहल्ले के लोग कानून और न्याय व्यवस्था को फंसाऊ व उलझाऊ मानते थे,
दूसरा कारण था चट मंगनी-पट, ब्याह जैसी त्वरित कार्यवाही...। त्वरित कार्यवाही में माहिर कुछ दादा किस्म के लोग थे जिनका बंगाली बाबू के यहां आना-जाना था। अफवाह या सच बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया का दादाओं से दोस्ताना था... खूब पटती थी...। बंगाली बाबू की मकान छोड़ने की आज्ञा ने अमरेन्दर को मुहल्ले में चर्चित बना दिया। अब वह चर्चित होने की प्रक्रिया से ऊपर की चीज था... लेकिन एक दिन अचानक अमरेन्दर मुहल्ले से गायब हो गया। महीने, दो महीने गुजरे, अमरेन्दर का कहीं अता-पता नहीं। लोग सोचते अमरेन्दर गायब होने वाली चीज तो न था... बंगाली बाबू से भी उसकी सुलह हो गई थी... एक कामरेड ने बंगाली बाबू का किराया भी चुकता कर दिया था...।
बंगाली बाबू भी अमरेन्दर के बारे में जगह-जगह पूछते... ‘कहां गिया, सारा सामान छोड़ कर... ताला बन्द है।’
ऐसा नहीं था कि उस मुहल्ले में या उस शहर मेें गायब होने वाली चीजें न थी। वोटर लिस्ट से मतदाताओं के नाम, जमीन के कागजातों से मालिकानों, परीक्षा विभाग से प्रश्न-पत्रों का गायब होना तो शहर की सांस्कृतिक विरासत का अनिवार्य हिस्सा था, इसके अलावा भी एक दो मुहल्लों से कहीं मन्दिर तो कहीं मस्जिद भी गायब हो चुके थे........ जिनकी जांच-पड़ताल आज तक पूरी नहीं हुई.. शहर की या कालेजों की लड़कियों के गायब होने की सूचनाएं भी थानों में दर्ज हैं पर अमरेन्दर जैसे शाकाहारी छात्र का अचानक गायब हो जाना यह एक सवाल था जिससे मुहल्ला चिन्तित था साथ ही साथ प्रवासीनाथ जी भी...।
प्रवासीनाथ जी योग और संयोग तथा जोग और जोगाड़ में विशेष अन्तर न मानते हुए अमरेन्दर का अचानक गायब होना, संयोग मान रहे थे जबकि मुहल्ले वाले मान रहे थे कि ‘प्रवासिया ने... अमरेन्दरा का जोगाड़ नहीं किया, आखिर वह कब तक इसकी सेवा करने का चूतियापा करता’ सो भाग गया शहर छोड़ कर....।
मुहल्ले में यह बात साफ हो गई थी कि ‘प्रवासी गुरू’ बिना जोगाड़ के किसी का काम संपन्न नही कराते। ‘जोगाड़’ का अर्थ बन्द-बन्द सा था, कोई इसकी व्याख्या न करता, समझते सभी...। मुहल्ले में कुछ विखण्डन वादी भी थे जो ‘जोगाड़’ का पाठ व्यवहारिक ढंग से पढ़ते, महसूसते तथा समय असमय में कह भी देते। बिना सुरा-सुन्दरी के प्रवासीनाथ जी लकवाग्रस्त आदमी से भी बुरे हो जाते हैं... एड्स के रोगी के समतुल्य...। ऐसी स्थिति में वे किसका काम करायें ?
प्रवासीनाथ जी थे कि बिना सुरा-सुन्दरी के न कुछ लिख पाते न सोच पाते, न किसी का कोई काम करा पाते... वे इसे लिखने का रोग मानते। सुरा-सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगांे ने कुछ न लिखने की कसम खा ली है उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा। अपने खास मित्रों से प्रवासी नाथ जी कहते भी ‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संबेदनाओं से निरन्तर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वभाविक है।’
प्रवासीनाथ जी ने उस दिन अमरेन्दर को यही समझाया भी था। प्रति दिन की तरह अमरेन्दर उस दिन पहुंच गया था प्रवासीनाथ जी के घर। प्रवासीनाथ जी का खूबसूरत ‘किरयहवा’ घर अपने आपे से बाहर था, गुस्से से कांपता हुआ। प्रवासीनाथ जी की घरनी जिन्हें वे ‘पूसी’ कहते अपनी संपूर्ण प्रतिरोधात्मक क्षमता
 के साथ बड़-बड़ा रही थीं, उनके हाथ में लोहे का एक राड था ‘रम्मा’ की तरह। प्रवासीनाथ जी दयनीय व निरीह शब्दों को उचार रहे थे कि रण-चंडी बनी उनकी प्यारी-प्यारी सी घरनी उन्हें क्षमा कर दे। प्रवासीनाथ जी का ड्राइंगरूम जो लोक-शिल्प का नमूना था, सोफा सेट से लेकर मेज पर रखे कलमदान तक सभी अनजानी कंप-कंपियों से भरे थे... उनका नमूना होना उनसे छिन चुका था।
अमरेन्दर की समझ उस दिन परायी हो गई थी... वह अवाक खड़ा था। किसी आदमकद मोम की मूर्ति की तरह जिसे थोड़ी सी गर्मी भी पिघला दे...। अमरेन्दर प्रवासीनाथ जी की निजी जिन्दगी की भयानक गर्मी से पिघल तो जाता ही पर तभी पिछवाड़े से सुशीला निकली... धीरे-धीरे स्त्री-पुरूष के व्यवहारिक रिश्तों को दबा-दबा कर चलते हुए। उसकी ऑखें फर्श पर चिपकीं थीं... ऑखें तो प्रवासीनाथ जी की भी फर्श पर ही चिपकीं थीं पर फर्श पर जीवन जीने की कलायें थीं तो कलाओं का विरोध भी था। अमरेन्दर देख रहा था देह-प्रिय कला का विरोध। अपनी तमाम लोकप्रियता के बावजूद भी इस कला पर नाक-मुह सिकोड़ने वालों की तादात कम नहीं... इन्ही लोगेां मेें थीं प्रवासीनाथ जी की अधेड़ घरनी, सोहर, लचारी गाने वाली...।
अमरेन्दर सारा दृश्य देख कर अचंभित था... अचंभित इसलिए नहीं कि सुशीला प्रवासीनाथ जी की पांडुलिपि थी...। पांडुलिपि तो वह थी ही, एक दम से मौलिक, अप्रकाशित, अप्रसारित जिसे मशहूर प्रकाशक मधोक मधुकरी पांच-छंह महीनों से लगातार मांग रहा था...। एडवान्स भी दे रहा था पर प्रवासीनाथ जी के सामने विक्रम सेठों जैसों के करोड़ों का मामला था, सो वे ना-नुकूर कर रहे थे और सुशीला की तरह पांडुलिपि वाला संस्मरण भी दाबे बैठे थे।
अमरेन्दर फिर क्यों अचंभित था? इसलिए कि प्रवासीनाथ जी की धरनी को अगले सप्ताह अपने मायके से लौटना था जिसमें तीन भरे-पुरे स्वस्थ दिन बाकी थे। ‘पाप छिपाये नहीं छिपाता’ ऐसा मानकर, दृश्य का अन्त देखने के लिए प्रस्तुत हो गया।
पूरे दृश्य का सुखद अन्त हुआ... प्रवासीनाथ जी ने अपनी घरनी से माफी मांगी। माफी मांगने का तरीका सांस्कृतिक था... सांस्कृतिक इसलिए कि प्रवासीनाथ जी घरनी के कोमल-कोमल... लाल रंग से रंगे हुए पांव पकड़ कर रोने लगे... थोड़ी देर में सुशीला ने भी वही किया जैसा प्रवासीनाथ जी कर रहे थे। विलाप व पश्चाताप की इस युगलबन्दी से अमरेन्दर हतप्रभ था।
प्रवासीनाथ जी की पत्नी दया की देवी थीं... सबको क्षमा करने वाली... सुशीला को क्षमादान देते हुए उन्होंने समझाया कि ‘तूं लड़की जात है, तन को तपाया कर। तन को तपाना ही तपस्या है... मर्दो का क्या... वे तो बर्द होते हैं, कहीं भी सानी-भूसा खाने वाले...।’ फिर वे प्रवासीनाथ जी के सारे दैहिक शास्त्र को रौंदनें लगी...‘शर्म नहीं आती धड़-धड़ा-धड़ कलेजा नहीं करता...?’ बिटिया सरीखी लड़की के साथ
सुशीला की पांडुलिपि का, अमरेन्दर आई विटनेस था। वह जब तक शहर में रहा प्रवासीनाथ जी के लिए सन्देह का कारण बना रहा कि अमरेन्दर कभी भी पांडुलिपि की फोटो कापी कर सकता है... सो उन्हें अमरेन्दर का गायब हो जाना भला लगा...। उनकी इस आन्तरिक खुशी को कोई जान न ले इसलिए वे अमरेन्दर के परचितों से अमरेन्दर के बारे में अवश्य पूछते... तथा उन पत्रों का हवाला देते जो उनके द्वारा अमरेन्दर के गांव के पते पर छोड़े गये थे...।
खैर.. संभव तो यह था कि मुहल्ले का कोई अमरेन्दर के गांव चला जाता, उसका हाल-अहवाल मालूम कर वापस आ जाता...। ऐसा करना भावुकता होती... तथा मुहल्ला प्रवासीनाथ जी की देखा-देखी भावुकता विरोधी था। मुहल्ले के लोग कारण मालूम कर रहे थे कि अमरेन्दर क्यों गायब हुआ... न कारण मालूम हो न अमरेन्दर का पता चले...। साल-दो साल गुजर गये अमरेन्दर का कहीं पता नहीं।
पहले तो अमरेन्दर भौतिक रूप से गायब हुआ फिर मुहल्ले की चर्चाओं से भी गायब हो गया। जब अमरेन्दर के गायब होने की चर्चा मुहल्ले में जोर पर थी तभी प्रवासीनाथ जी भी मुहल्ला छोड़ कर विश्व विद्यालय कैम्पस में चले गये। कैैम्पस में रहते हुए, लेक्चरर से रीडर फिर विभागाध्यक्षी जोगाड़ने में सुविधा थी... मुहल्ले की उंगली उठाओ संस्कृति इसमें बाधा थी। समय प्रवासीनाथ जी का चेहरा मौसमी रंगों से रंगते हुए आगे बढ़ता रहा तथा प्रवासीनाथ जी तरक्की दर तरक्की करते रहे... अब वे विभागाध्यक्षी के महज हाथ भर दूर थे।
प्रोफेसर प्रवासीनाथ और लेखक प्रवासीनाथ, में मुहल्ले के जो लोग समानता ढूंढते या उन पर शोध जैसा कुछ करते, उन्हें प्रायः मुर्ख समझा जाता। लेखक प्रवासीनाथ जी के पाठकों का भी वही हाल था... कुछ आलोचक तो यथानाम यथाकाम जैसा उन्हें मानते ‘जो वास, रहवास एवं सहवास का आत्म-आलोचक हो, वही प्रवासीनाथ हो सकता है, कोई दूसरा नहीं...।
कहते हैं समय एक जैसा नही होता... मुहल्ले का समय बदलने लगा। उसने नया चोला धारण कर लिया। धोती, कुर्ता, भांग के गोले, ठंडई, बादाम के शर्बत सबके सब नाली में फेंका गये... कोका कोला और दारू की बोतलें हर तरफ टकराने लगीं। जीन्स के कपड़ों की परेडें होतीं तथा कटे हुए बालों से देह-दाह को उभारा जाता... यह वही दौर था जब दिल्ली, एक अदद प्रधानमंत्री के लिए परेशान थी। संसदीय चुनाव हो चुके थे, सारी पार्टिंया बहुमत विहीन थी... कोई ऐसा जोगाडू नहीं था जो बहुमत योग्य सांसदों को पटा कर प्रधानमंत्री बन जाता... बहरहाल मुहल्ला भी दिल्ली की तरह से दुविधा में था... सो... प्रतिक्रिया स्वरूप... मुहल्ले ने राजनीतिज्ञों व साहित्यकारों को लफ्फाजों की एक प्रजाति मानकर, चर्चाओं से खारिज कर दिया था... ऐसी हालत में अमरेन्दर ही नहीं प्रवासीनाथ जी भी चर्चाओं से बाहर थे...
समय पलटा... मुहल्ले का हर चायखाना प्रवासीनाथ जी व अमरेन्दर की चर्चा से गंुजायमान हो उठा। हुआ यह कि कहानी की किसी मशहूर महिनवारी में प्रवासीनाथ जी का संस्मरण प्रकाशित हुआ जो अमरेन्दर, उसके मकान मालिक बंगाली बाबू व उनकी छोटकी बिटिया की परिधि पर था...। संस्मरण का आशय था कि अमरेन्दर बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया के साथ जंगल की तरफ भाग गया है... अब वह हिंसा में विश्वास करने वाली क्रान्तिकारी पार्टी का कर्ता-धर्ता बन गया है। किसी काल में वे खुद भी क्रान्ति के महाकाल हुआ करते थे लेकिन रूस की बाई-पास सर्जरी हो जाने के बाद उन्होंने धारा बदल ली। चित्त और चिन्तन में से चित्त की अमृत-धारा को उन्होंने चुन लिया और इसे ही बुढ़ौती काटने का सहारा बना लिया।
प्रवासीनाथ जी के संस्मरण पर यकीन करने वालों की संख्या से अविश्वास करने वालों की संख्या कम न थी। सो संस्मरण किसी खून, डकैती की तरह अफवाह बन गया। संस्मरण को गल्प व झूठ मानने वालों के आगे यकीन करने वाले माथा टेक बैठे... माना गया कि बंगाली बाबू की बिटिया शहर के किसी दादा के संग बंबई में ऐश कर रही है। बंगाली बाबू भी इसीलिए अपना मकान डिग्री कालेज के एक प्रोफेसर को बेच दिये ताकि बिटिया के साथ बंबई में रह सके।
क्षण भर के लिए यदि यह यकीन कर लिया जाय कि संस्मरणों की सूचनायें सच होती हैं तो मान लेना चाहिए कि अमरेन्दर यूं ही मुहल्ले से गायब नहीं हुआ... गायब हुई बंगाली बाबू की लड़की और गायब करने वाला हुआ अमरेन्दर, जो प्रवासीनाथ जी का कभी शिष्य हुआ करता था। वह जंगल की तरफ नहीं भागा, भागा बंबई। संस्मरण के कारण प्रवासीनाथ जी घाटे में चले गये, मुनाफा हुआ अमरेन्दर को... वह हीरो बन गया। हीरो इसलिए की लड़की भगाना कोई हंसी-खेल नहीं वह भी बंगाली बाबू की बिटिया। खिलन्दड़ी भाषा, सधुक्कड़ी भूषा व जादुई अभिव्यक्ति के कलाकार प्रवसीनाथ जी के अनुमान कभी गलत न होते थे... यह संयोग ही था कि अमरेन्दर वाले संस्मरण पर मुहल्ले वालों ने शक किया इससे प्रवासीनाथ को पीड़ा पहुंची पर मुहल्ला तो महज मुहल्ला ही था.. कोई प्रदेश, देश या महादेश तो नहीं संस्मरण मुहल्ला ही नहीं प्रदेश और देश लांघ कर विदेश तक जा पहुंचा... खूब वाह-वाही मिली प्रवासीनाथ जी को... सो प्रवासीनाथ जी की पीड़ा, वाह-वाहियों में घुल कर समाप्त हो गई... उन्हें एक बार फिर अपने अनुमान पर थोड़ा घमंड जैसा हुआ।
लिखे-पढ़े का जो हस्र होता है, वही प्रवासीनाथ जी के संस्मरण का भी हुआ। महीने-दो महीने में पठनीयता की हिस्टीरिया खत्म हो गई... मुहल्ला सामान्य गतिविधियों में लग गया जैसे कुछ हुआ ही न था...। इसी बीच बंगाली बाबू की छोटकी बिटिया मुहल्ले में दिख गई। वह अपनी मौसी के यहां आई हुई थी। बिपदा की मारी सी दिख रही थी... फिर भी वह वही थी... पहले वाली... केवल उसका मन-भावन व लुभावन रूप छिन गया था।
मुश्किल से एक दिन गुज़रा कि दूसरे दिन ही रंग-बिरंगी चर्चाओं ने मुहल्ले की तटस्थता भंग कर दी...।
‘यार! अमरेन्दरा बंगाली बाबू की बिटियवा के साथ नहीं भागा था वह तो सुशीला ही अमरेन्दरा को भगा ले गई थी’ तथा शहर छोड़ दी थी।
नहीं-नहीं उसको का भगाना... वह तो खुद भागी थी। सुशीला भी तो प्रवासीनाथ के यहां रखैल से ऊपर न उठ पाई... उसे भी लेक्चराई कहां मिली? दिल्ली के किसी फिल्मी गीतकार से उसकी पहचान थी। गीतकार असली था, तन के ताप और दिल के दर्द को पकड़ने वाला। सुशीला उसके संग हो ली। बंबई पहुंच कर वह मैडम सुशीला हो गई... तीन-चार साल गुजरे होंगे कि गीतकार ने आत्म-हत्या कर ली...। गीतकार की आत्म-हत्या के बाद सुशीला ही गीतकार की संपत्ति की मालकिन हुई... सम्पत्ति अधिक थी... सुख था, वैभव था। कमी थी तो एक ऐसे आदमी की जो उससे प्रेम करे... सुशीला ने अमरेन्दरा का चुनाव किया...। एक दिन उसे यहां से भगा ले गई, मरता का न करता...।
इसी भांति बंगाली बाबू की बिटिया ने अमरेन्दर के गायब होने का रहस्य खोल दिया था इतना ही होता तो कोई बात न थी... किसी का गायब हो जाना, मर जाना, दंगे में मार दिया जाना जैसी घटनाये मुहल्ले को सिर्फ महीने दो महीने के लिए गर्म रखती थीं। अमरेन्दर इन घटनाओं से ऊपर था... ऊपर इसलिए कि वह बड़ा आदमी बन चुका था... मशहूर पटकथा लेखक... दो-तीन फिल्में भी बना चुका था... उसके सीरियल के एक कड़ी की शूटिंग इसी शहर के इसी मुहल्ले में की जानी है।
इस तरह की पक्की खबरें मामूली तो होती नहीं जो अमरेन्दर के परचित कवियों, कथाकारों, को अप्रभावित रहने देतीं...। कवि, कथाकार ही नहीं गाने-बजाने वाले लोग भी बंगाली बाबू की बिटिया की मौसी के यहां जा कर अमरेन्दर का पता मालूम करने लगे... फिर तो बंगाली बाबू की बिटिया परेशान-परेशान हो गई...।
उसे अक्ल सूझी... उसने छोटा सा पर्चा छपवाया जिस पर अमरेन्दर का पूरा पता लिखा था... फैक्स, फोन, इन्टरनेट के साथ-साथ डाक वाला भी... आफिस और घर का अलग-अलग...। किसी मजदूर के जरिये उसने मुहल्ले की जागृत दुकानों पर चिपकवा दिया... इससे बंगाली बाबू की बिटिया को राहत मिली... लोगों का उसकी मौसी के यहां आना-जाना बन्द हो गया... सभी अमरेन्दर का पता दुकानों पर चिपके पर्चे से जान लेते।
और सब तो ठीक-ठाक था, कहीं कोई दिक्कत नहीं। किसी ने अमरेन्दर को पत्र लिखा तो किसी ने फोन या फैक्स किया। कोई किसी को कुछ न बताता सारा चोरी-चोरी चलने लगा... सभी परेशान-परेशान -सीरियल की होने वाली शूटिंग के कारण...। जाने क्या करे अमरेन्दर कहां-कहां, किसे-किसे शूट करे...’ हितुआ और विरोधी दोनों।
तीन-चार सप्ताह बाद अखबार की एक खबर ने मुहल्ले को हंसा दिया... हंसते हुये लोग सतर्क हो गये... खबर थी कि अमरेन्दर अगले महीने के पहले सोमवार को अपनी यूनिट के साथ सीरियलकी शूटिंग के लिए इस शहर में आ रहा है... उसके साथ केन्द्रीय सरकार के निर्विभागीय मंत्री व प्रदेश सरकार के गृहमंत्री भी होंगे... ‘खबर में अमरेन्दर की यूनिट के रहने, खाने-पीने, शूटिंग करने के विस्तृत विवरण प्रकाशित थे...।’
अमरेन्दर को एक सप्ताह बाद दाखिल होना था बावजूद इसके प्रशासन की सक्रियता बढ़ गई... प्रशासन उन समितियों या संस्थाओं की जांच-पड़ताल करने लगा जो अमरेन्दर के स्वागत के लिए अचानक उग आई थीं... प्रलेस, जलेस व जसम को छोड़ दीजिये इन्हें तो प्रशासन किसी तरह जानता था, इनकी सांस्कृतिक स्थितियों से प्रशासन परचित था क्यों कि इन संस्थाओं के अध्यक्ष, मंत्री वगैरह विश्व विद्यालयों या कालेजों के प्रधानाध्यापक या विभागाध्यक्ष ही थे... दिक्कत थी गाने-बजाने-नाचने वाली संस्थाओं की... सो उनकी जांच हो रही थी।
देखते-देखते वह दिन आ धमका। सीरियल की चर्चाये शहर की जुबान पर। अमरेन्दर की शूटिंग यूनिट ने सबसे पहले विश्व विद्यालय के महत्वपूर्ण स्थानों की शूटिंग की। दूसरे दिन शहर से जुड़े गांवों के प्राथमिक पाठशालाओं, आंगनबाड़ी केन्द्रों वगैरह की... तीसरे दिन अमरेन्दर को... स्वागताकांक्षियों से अपना स्वागत, अभिनन्दन इत्यादि कराना था। इस क्रम से सबसे पहले प्रलेस के प्रान्तीय अध्यक्ष, प्रवासीनाथ जी के यहां आयोजित भोज-भात में अमरेन्दर को शामिल होना था... पर उसे टाल दिया गया। टालने की वजह सुशीला थी जो परछाई की तरह अमरेन्दर से चिपकी थी... प्रवासीनाथ जी के बारे में जानकारी रखने वालों को खुशी हुई... ‘बवाल टल गया नहीं तो पूसी भउजाई कोई न कोई ‘लचारी’ शुरू कर देतीं। अच्छा हुआ भोज-भात की जिम्मेवारी प्रलेस के मंत्री पर थोप दी गई...।
मुहल्ले में चर्चा थी कि प्रवसिया खेल, खेल गया, पुराना मदारी है पर अमरेन्दर भी कम न था, था तो उनका ही चेला। यूनिट और सुरक्षा व्यवस्था का सारा ताम-झाम छोड़कर अमरेन्दर, सुशीला के साथ प्रवासीनाथ जी के यहां हाजिर हो गया...। मुहल्ले के लोगों को इससे अधिक जानकारी नहीं... यह तो बंगाली बाबू की बिटिया ने खुलासा किया कि सीरियल के जीवन्त चरित्र प्रवासीनाथ ही तो हैं... फिर भी लोगों को यकीन नहीं हुआ...।
यकीन तो तब हुआ जब प्रवासीनाथ जी अपनी घरनी के साथ हवाई अड्डे पर देखे गये हाथ हिलाते हुये... उस दिन अमरेन्दर वापस बंबई जा रहा था। हो सकता है बंगाली बाबू की बिटिया सही हो पर मुहल्ले में प्रवासीनाथ के विरोधी उससे असहमत थे... ऐसा होता तो प्रवासीनाथ का मुंह लकवाग्रस्त हो चुप न रहता। उनकी वाणी खुजलाने लगती...वैसे मुहल्ले ने यकीन कर लिया कि अमरेन्दरा प्रवासीनाथ से बड़ी हैसियत का है... तथा सुशीला प्रवासीनाथ से तलवा चटवायेगी फिर भी उनकी किसी कहानी पर कभी भी फिल्म न बनाएगी...।

 DUSARA ANSH

                                   एक जोड़ी जूता

अमरेन्दर बंबई वापस चला गया, सिर्फ वापस चला गया होता तब ठीक था पर बहुत कुछ छोड़ गया, जैसे सीरियल के जीवित प्रेतों की चर्चा-परिचर्चा। खास तौर से उन लोगों की चर्चा जो अमरेन्दर के लिए एक तिनका भी मुहैया न करा सकते थे। वे लोग ही उसके अगल-बगल डोल रहे थे। वे जान चुके थे कि अमरेन्दर अब गली का पत्तल-चाट कुत्ता नहीं, नहीं जगेशर। जगेशर एक ऐसा आदमी जो जवानी से लेकर अब तक इन्कलाब आने की प्रतीक्षा में कम से कम दो बार पागल हो चुका है। एक बार चारू मजुमदार की मृत्यु के बाद तथा दूसरी बार विनोद मिश्रा के चुनावी राजनीति में कूद जाने के बाद। सामान्य रूप से तो जगेशर आज भी पागल की ही हैसियत वाला है पर पान की दूकान खोल तथा उसे चला कर साबित कर चुका है कि वह पागल नहीं तीन-तिकड़म वाला है, पान बेचने के साथ-साथ क्रान्ति के सूत्रों को भी बेच सकता है। बच्चे जगेशर से थोड़ा आगे है, पानी में दूध या दूध में पानी मिला कर बेच लेते है। क्रान्ति का होना असंभव मान कर जगेशर ने अपने छोटे से मकान को डेयरी में तबदील कर दिया है। अमरेन्दर को कम से कम जगेशर के यहां तो जाना ही चाहिये था।
अमरेन्दर पूरे तीन दिन तक ऐसे लोगों के साथ घिरा रह गया जो शहर के इतिहास में या तो छेद करने वाले थे या उसे मोटी जिल्द में बांध कर पूजने वाले थे। उन लोगों ने कल के मामूली, व सड़क छाप अमरेन्दर को आसमान में टांग दिया फिर वह वहां से गिरता भी तो कैसे? गिरता तो खजूर पर अटक जाता। अपनी तईं अमरंेन्दर सावधान था पर स्वागत-सत्कार कोई बुरी चीज तो नहीं जिसमें शामिल न हुआ जाये। सो वह मजबूर था... आत्म-रति व आत्म-छबि वाले जैसा कहते वैसा करता। हालांकि इस आरोेप से प्रवासीनाथ जी बरी थे... यह साफ था कि अमरेन्दर उनके दिशा-निर्देश पर अपना प्रोग्राम नहीं बना रहा था वह तो सुशीला थी... सुशीला कहां से चालित-संचालित थी किसी को नहीं मालूम।
जगेशर के यहां भी अमरेन्दर जाता न जाता कोई बात न थी पर एल.आर.के यहां। उसके यहां तो जाना ही चाहिये था। एल.आर. बनने के पहले वह लोटन राम था। कामरेडियत का चोंगा पहनते ही एल.आर. में तबदील हो गया यानि कि कामरेड एल.आर.। यह वही व्यक्ति था जिसने बंगाली बाबू को अमरेन्दर के बाकी किराये का भुगतान किया था। थोड़ी-बहुत रकम नहीं पूरे तीन हजार छह सौ। रूपया गिनते समय बंगाली बाबू चकरा गये थे। एल.आर. के पास इतना रूपया कहां...? अचरजाते हुए पूछा उन्होंने...
‘तू इत्ता रूपया पाया कहां से रे?
‘डाका डाला था ‘ज्योति बाबू’ के यहां’
खबरदार जो ज्योति दा का नाम लिया...
अच्छा-अच्छा नाम न लूंगा... गिन तो पूरे है कि नहीं...
रूपया सहेज लेने के बाद बंगाली बाबू ने पूछा था...सामान कौन ले जायेगा अमरेन्दर का ? वही ले जायेगा..मेरे से सामान का का लेना-देना, कहीं रखवा देना संभाल कर, एल.आर. झटके से कहता हुआ बंगाली बाबू के घर से लौट गया था।
बंगाली बाबू एल.आर. को मुसीबत मानते, रूपया लेकर खामोश हो गये... उनके लिए यह बहुत था कि एल.आर. दूसरे के बकाया का भुगतान कर रहा था। उसके ऊपर यदि उनका बकाया होता तो शायद कभी न मांग पाते क्योंकि एल.आर. की छवि नखनहा की थी, जो काटता तो नहीं पर नखनियाता जरूर। एल.आर. के कई-कई प्रसंग मुहल्ले में आज भी ताजा हैं कवि विलोचन वाला प्रसंग तो बंगाली बाबू भी बखूबी जानते थे।
कवि विलोचन ने कुछ गड़बड़ कर दिया था, ऐसा कत्तई नहीं। एल.आर. को अपमानित कर पाने की शक्ति उनमें कहां से आती? कवि विलोचन अक्षर-ब्रह्म वाले आदमी, मुक्का तथा मुद्रा दोेनों से अभावग्रस्त...। चाय वाली दुकान भरी थी सुजानों से... कविता पर बहस गर्म थी, विलोचन जी ने तत्कालीन छन्द-मुक्त कविताओं की ले दे शुरू किया। उस समय धूमिल का जोर था। धूमिल छोटी-बड़ी सभी जगहों पर घुसपैठ कर रहे थे... धूमिल की कविता ‘मोची’ का सन्दर्भ विलोचन उठा बैठे... लीजिये साहब। अब आदमी एक जोड़ी जूता है, जो आदमी को पहचानना चाहे वह मोची...।
चायखानों के सुजानों के लिए प्रिय थे कवि विलोचन... गला बारीक, प्रिय की गलियों में तान अलापने लायक... सुजानों में बैठा था एल.आर.। पहले तो वह धीर-गंभीर था... शायद प्रसंग इतना ही हो... पर जब विलोचन धूमिल की मोची कविता का व्यंगात्मक पाठ करने लगे वह उबल पड़ा...।
बात गाली-गलौज, हांथा-पाई तक जा पहुंची... चायखाने के सुजानों ने किसी तरह उस अनावश्यक प्रसंग को आगे बढ़ने से रोका। प्रसंग के पटाछेप तक प्रवासीनाथ जी भी चायखानें में हाजिर हो गये थे... अपना समझ कर उन्होंने एल.आर.को समझाया...।
‘यह तो चायखाना है एल.आर...! फिर तोहसे येह मुंहनोचौव्वल से का मतलब । तू तो धूमिल को जानते भी न होगे। वह यहां आया ही नहीं...।’
बहरहाल एल.आर. ने खुद पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। कुछ स्त्रैण चित्त वालों ने कवि विलोचन को अच्छी सीख दी... ‘बहस इज्जतदारों से करनी चाहिये। एल.आर. उनमें से नहीं...।, वह तो एक जोड़ी जूता है।’
वास्तव में एल.आर.इज्जतदार तो न था प्रवासीनाथ या विलोचन की तरह, पर तर्क व दो-दो हाथ करने में बलशाली था। भरा-पुरा जिस्म, मछलियों वाली बाहें, बड़ी-बड़ी आंखें, फ्रेंचकट दाढ़ी, फर्राटा बोलता, धूमिल मुक्तिबोध, देरिदा, फुकूयामा सभी को पढ़ता, बिना पढ़े-विचारे कुछ न बोलता। बोलता तभी जब बकवास किया जाता तो वह आपा खो बैठता...।
उसका आपे से बाहर निकल जाना उसे गुस्सैल बनाता तथा प्रचार भी करता था कि वह कभी क्रान्ति वाली पार्टी का सक्रिय सदस्य था। ऐसे आकस्मिक अवसरों पर लोग न भूल पाते कि वह कभी चारू के साथ था। उस समय वह एम.एस.सी कर चुका था। चाहता तो मुर्दरिसी जोगाड़ लेता किसी कालेज में, पर घर-बार छोड़ कर भाग गया बंगाल। उसे अपनी ताकत पर यकीन था तथा उस विचार पर भी कि क्रान्ति की शुरूआत भर की देरी है नही ंतो जनता तो तैयार बैठी है। हुआ उलटा। एल.आर. गया था क्रान्ति पीठ पर लादने, जब बंगाल से वापस लौटा तब उसके सिर पर पराजित होने या भगोड़ा होने का बोझ था तथा पैर में दो-दो गोलियां...।
गोलियां निकल र्गइं तथा उसकी नर्स मत्र ने उसे लंगड़ने से भी बचा लिया, अब वह पैरों से पूरा काम लेने में समर्थ है जितना कि हाथों से लेता है। गोलियों के गाढ़े दागों ने उसे जीवित आदमी बनाया हुआ था, नही ंतो मुहल्ले के लोग उसे कब का खदेड़ चुके होते।
कवि विलोचन वाला प्रसंग तो थोड़ा गड़बड़ था पर प्रवासीनाथ वाला...। उससे तो एल.आर.का कद ऊंचा हुआ था। अब नये कहानीकार की ऐसी औकात जो जमेे-जमाये कथाकार, प्रवक्ता प्रवासीनाथ पर ऊंची-नीची बातें करे तथा चायखाना जैसी जगह पर अपमानित करे...। भला एल.आर. कैसे तूफान न खड़ा करता, उसने वैसा ही किया जैसा कि वही कर सकता था...। नये कहानीकार का कालर पकड़ा तथा दूकान में खड़ा कर दिया...।
‘तो क्या पात्र तुम्हारी... में से निकलेगा इसमें क्या गलती हो गई कि एक समर्पित कामरेड किसी... वांक्षित शोषक के यहां किचन संभाल लेता है, फिर एक दिन उसे जहर देकर मार डालता है... आखिर वह उसे मारता कैसे...? आमने-सामने लड़कर... राणा प्रताप की... हो क्या... एक झापड़ पर तो हग दोगे..।’
नया कहानीकार प्रवासीनाथ की कहानी का पोस्टमार्टम कर रहा था... दरअसल वह अपने वश में नही था... वश में होता तो प्रवासीनाथ के साथ होता क्योंकि स्थानीयता का भाव सभी में होता है। हुआ यह था कि प्रवासीनाथ की उक्त कहानी पक्षीनाम-धारी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी जिसके विरोध में पशुनामधारी एक दूसरी पत्रिका थी। इस दूसरी पत्रिका ने प्रवासीनाथ की कहानी का अंग-प्रत्यंग आलोचना के नाम पर निपोर दिया था। नया कहानीकार उस पत्रिका का सलाना सदस्य था तथा चिट्ठी-पत्री लिख कर उस पत्रिका से बतौर लेखक संपर्क बनाये हुआ था। पक्षीनामधारी पत्रिका वाले इतने बेदर्द थे कि उस नये कहानीकार की चिट्ठी तक न छापते थे... सो वह गुस्से में था... अब उसे क्या मालूम कि गुस्सा उतारने की गलत जगह का उसने चुनाव कर लिया है... सो फंस गया एल.आर. के चक्कर में...।
एल.आर हमेशा पक्षहीन बातें करने की कोशिश करता, उस दिन प्रवासीनाथ के पक्ष में हो जाने का मतलब यह नहीं था कि वह उनका दलाल था। दलाली तो उस जैसे को क्या आती एक निष्ठुर और कठोर आदमी को। सारा किस्सा सुनकर पहली बार प्रवासीनाथ ने एल.आर.को गंभीरता से लिया तथा छिपा कर रखी गई डायरी में दर्ज किया...
‘तार्किक कूबत हर समय झगड़ा लगाती है, जिससे मार-पीट की संभावना भी बढ़ती है पर शरीरी कूबत हमेशा और समयानुसार काम देती है... कम से कम बचाव के लिए तो अवश्य ही।’
एल.आर. को बाद में प्रवासीनाथ जी अपनी किसी धांसू कहानी का चरित्र ही मानने लगे थे। उससे जब मिलते कुछ न कुछ उसमें से निकालते... उसके बात-चीत करने के तौर-तरीके को विश्लेषित करते... कुछ जोड़ते, घटाते... कुल मिलाकर मुहल्ला एल.आर. की जिस्मानी ताकत से घबराता तथा अपने मुंह पर दो-चार घूंसो की चोटें महसूसता। बंगाली बाबू की क्या औकात कि वे पूछते ‘रूपिया कहां से पाया रे’ एक बार जो पूछ लिया, पूछ लिया फिर नहीं। अमरेन्दर का सामान कमरे में से निकलवा कर स्टोर वाले कमरे में रखवा दिया। बंगाली बाबू ने जब मकान बेचा और उस पर कब्जा दे दिया उसके पहले ही अमरेन्दर के सामान को एल.आर के यहां भेजवा दिया... ठेले का भाड़ा भी खुद दिया...। बंगाली बाबू का किराया चुकता हो जाना मुहल्ले के लिए जरूरी सवाल था। अपनी-अपनी अक्ल के अनुसार लोग इसे हल करने की कोशिश में थे। किसी के सामने आधुनिक गणित थी तो किसी के सामने वैदिक... तो कोई एल.आर. की जीवनचर्या लिये बैठा था। एल.आर था कि गणित से ऊपर था। किसी तरह से शहर में रहता था...। न कोई काम न कमाई। ट्यूशन वगैरह भी नहीं। कभी कभार एक पत्रिका निकालता जिसमें कामरेडियत की शास्त्रीय चर्चा होती। देश में चल रहे लोकतंत्र को शोकतंत्र में बदल जाने के बाबत कुछ विचारणीय लेख हेाते। प्रथम द्रष्टया पत्रिका प्रभावित करती पर ऐसा विश्वास न दिलाती कि पत्रिका सदस्यों के योगदान से प्रकाशित होती है। कुछ कामरेड सुविधा-संपन्न तथा धनी थे उनके लिए तीन हजार छह सौ रूपया कोई समस्या नहीं पर मुहल्ला उन पर विश्वास न करता... वे यह मानते कि कामरेड किसी को कुछ लेता देता नहीं। फिर एल.आर. को देना... वह भी बंगाली बाबू को देने के लिए अमरेन्दर होता तो बात दूसरी थी...।
फिर इतना रूपया किसने दिया एल.आर. को...। सभी सवाल करते उत्तर देते पर उत्तर सटीक न बैठते... इसी तरह एक टहलता हुआ उत्तर था कि प्रवासीनाथ ने दिया होगा। उत्तर पर लोग गंभीर होते लेकिन उत्तर तो खुद सवाल था प्रवासीनाथ को देना होता तो बंगाली बाबू को स्वतः न देते... एल.आर. को काहे देते... फिर प्रवासीनाथ इस तरह का काम नहीं किया करते... फिर किसने दिया? किसी ने तो दिया ही... क्यों कि एल.आर. से किसी अवैध या अनैतिक कार्य की उम्मीद नहीं, वह भी दूसरे के लिए...।
किसी को सच्चाई मालूम नहीं, सच्चाई एल.आर. किसी को क्यों बताता? कोई उससे पूछता भी नहीं... पूछे भी कौन? पूछे गाली सुने, ठीक नहीं... फिर एल.आर. कम से कम कामरेडों को तो गरियाता ही... सभी मठी कामरेड हैं... मठ चलाने वाले... सीधे-साधे डॉ. लोहिया की भाषा... खुद को कुजात कामरेड बताता।
सभी अनुमान पीते हुये खुद में दुबक लेते। एक दो जो एल.आर. की दिनचर्या में थे वे जानते थे कि पूरा रूपया सुशीला ने दिया था वह भी तब जब अमरेन्दर उससे जुड़ा नहीं था और तब गीतकार आत्महत्या कर चुका था। एक तरह से सुशीला अमरेन्दर से जुड़ने का वह अर्थयुक्त प्रस्ताव था। सुशीला ने ही अमरेन्दर को तलाशा, जाने वह कहां था... वह तो कहीं भटक रहा था... फिर सुशीला अमरेन्दर को साथ लेकर बंबई चली गई...
यह रहस्य मुहल्ले के कान में नहीं गया, नही तो बेमतलब परिचर्चा शुरू हो जाती... इसलिए जो होता है वह ठीक होता है। कोई सुशीला के देहन्दा मिजाज़ पर शक तो न करता पर एल.आर. पर अवश्य करता... एल.आर. में वह जज़्बा कहां जिस्म वाला... एल.आर. की प्रतिभा अदृश्य थी तथा खूबसूरती एक शिरे से गायब, फिर भी कुछ था एल.आर. के पास वह भी बहुतों के पास नहीं था। सुशीला जाने किस कैड़े की थी कि एल. आर. का सम्मान करती तथा कभी-कभार उसकी मद्द भी लेती...।
विश्व विद्यालय के हीरोनुमा नेता की पिटाई का मामला सीधे सुशीला से जुड़ा था। सुशीला अक्सर प्रवासीनाथ के यहां आती-जाती। छात्र नेता उसके आने-जाने में किसी अवरोध की तरह निगरानी करता, एक दो बार छेड़ने की भी कोशिश की। विश्व विद्यालय का मिजाज़ चुनाव के कारण गर्म था... उक्त छात्र नेता कांग्रेस समर्थित यूनियन का था... एल.आर., कम्युनिस्टों के समर्थन वाले छात्रों के साथ था... सुशीला भी उन्हीं के साथ थी। मार-पीट का अच्छा अवसर देख कर एल.आर. ने उक्त छात्र नेता की धुनाई कर दी... उसी के बाद से एल.आर. का कद सुशीला के लिए चढ़ गया था।
ऐसा नहीं था कि एल.आर. अपराजेय योद्धा था; न हारने वाला.़.. वह शर्मनाक युद्ध लड़ता हीं नहीं था... सो हार या जीत दोनों स्थिति में वह भारी रहता। लेकिन एक बार उसे बुरी तरह गच्चा खाना पड़ा वह भी एक खूंसट समाजवादी से। समाजवादी की हैसियत बात-बात पर झगड़ा लगाने वाले की थी। एक बार विश्व विद्यालय की छात्रसभा का अध्यक्ष समाजवादी हो गया सयुस वाला। वह नाममात्र का समाजवादी था। यूनियन में अविश्वास आ गया... इस अविश्वास को पलटने के लिए समाजवादी नेता आया... उसकी सभा विश्व विद्यालय परिसर में होनी थी... छात्रों में था कि छात्रों की बातें छात्र तय करेंगे... समाजवादी नेता काहे आया... सो बहुतेरे छात्र सभा के प्रारंभ के समय... ‘गो बैक, गो बैक’ का नारा लगाने लगे...। एल.आर. सबसे आगे था, जबकि वह छात्र नहीं था... समाजवादी नेता इस तथ्य को जानता था।
ज्योंही छात्रों की तरफ से जोरदार ‘गो बैक, गो बैक’ हुआ... समाजवादी नेता मंच से उछला सीधा एल.आर. की तरफ गया तथा उसकी बाहें पकड़ लिया...।
‘कहां जाऊ बेटा! मैं बाहरी नहीं, यहीं जन्मा यहीं मरूंगा... बोल तू कहां से आया। पहली बात कांव-कांव बन्द करो, रही बात गुंडई की, तो आओ एक-एक निपट लो, साठ का हूं तो इससे का...?
बात सिर्फ वाद-प्रतिवाद तक होती तब शायद छात्रों की सभा न चकराती पर समाजवादी नेता सठियाया हुआ था। उसने कुर्ता निकाला, फेंका तथा मल्ल-युद्ध के लिए तत्पर हो गया... एल.आर. दर्शक बना चकित था, हो क्या रहा है। सभा के छात्र चकित थे, समाजवादी नेता की लम्बी तोंद देख। वह अकड़ा खड़ा गंजी और कच्छा में धोती तो पहले ही खुल चुकी थी। कौन किसको रोके, एल.आर. और समाजवादी दोनों अपनी जिदों के मालिक थे।
किसी तरह मल्ल-युद्ध की नौबत नहीं आई फिर भी समाजवादी नेता ने एल.आर. को मंच पर बैठा कर अपनी जिद पूरी कर ली। नेता ने खुद आमंत्रित किया एल.आर. को कि वह अपनी बात रखे, विरोध आमने-सामने का प्रशंसनीय होता है पर एल.आर. ने दूसरे के मंच से अपनी बात रखना ठीक न समझा इसलिए इंकार कर गया तथा मंच से उतर आया, क्षमा-याचना के साथ। लोग भले ही इस प्रसंग को भूल गये हों पर एल.आर. को यह कभी नहीं भूलता। उसे आशा ही न थी कि कभी ऐसा युद्ध होगा, वह भी उसके जीवन में जिसमें न कोई विजेता हो न विजित।
इस एक घटना ने एल.आर. को इतना प्रभावित किया कि वह समाजवादी नेता का नैतिक शिष्य बन गया फिर तो कामरेडों को फटकारते हुए कहता..दो-चार कामरेड भी समाजवादी नेता की तरह होते तो आज कम्युनिस्टों का सिर आसमान में होता... समाजवादी जो कहता था वह करता था तथा जो करता था वही कहता था।
तीन हजार छह सौ रूपया एल.आर. के पास कैसे तथा कहां से आया किसी समय यह सवाल मुहल्ले को धुंआ-धुंआ कर गया था पर अब कोई इस पर चिन्तित न था। मान लिया गया कि सुशीला ने ही दिया था...।
सुशीला से उसका साबिका था, काफी घना, एक दूसरे में अर्न्तलयित होने लायक। सुशीला से पुरातनता की उम्मीद करना कई मायनों में बेकार था कि वह भरी-पुरी नारी होने के कारण इस हद तक स्त्रैण होगी कि सिमटी रहे एक दो के साथ। सुशीला सम्पन्न तथा उच्च कुल वाली है... पति या प्रेमी को ईश्वर का अवतार मानने वाली... इसी उम्मीद के कारण कवि विलोचन कई मौकों पर बेवकूफियां कर बैठे... नही ंतो सुशीला को सबसे पहले सभा तथा गोष्ठियों में साथ ले जाने वाले वे एक मात्र अधिकृत व्यक्ति थे... प्रवासीनाथ तो बहुत देर बाद सुशीला की कहानी का हिस्सा बने वह भी तब जब सुशीला पी.एच.डी. करने लगी फिर वे उसके पर्यवेक्षक बन पाये।
कवि विलोचन का जो हुआ सो हुआ प्रवासीनाथ भी सुशीला की शुचिता को लेकर काफी चिन्तित रहा करते थे। वे बार-बार कोशिश करते कि सुशीला शहर के लफंगों से तार न जोड़े तथा अपनी गरिमा का ध्यान रखे...। ‘अमरेन्दर तो ठीक जान पड़ता है पर एल.आर. तो पक्का लफंगा है ‘साला कामरेड की दुम’। प्रवासीनाथ एल.आर. को लफंगों की आधुनिक नस्ल मानते हैं। डी.एन.ए. की नई प्रजाति।
प्रवासीनाथ पहले भले ही भ्रम पाले रहे हों कि सुशीला उनकी सीखों को धारण कर लेगी पर बाद में तो उनका भ्रम स्वतः फुर्र हो गया। सुशीला जटिल संबन्धों वाली गंभीर लड़की थी तथा वादाखिलाफी को ही अनैतिक मानती थी। इसके आगे-पीछे कुछ नहीं... अब प्रवासीनाथ सुशीला को अपनी कहानी की पांडुलिपि समझते हैं तो समझा करें। इससे सुशीला को क्या लेना-देना...?
लेना-देना तो एल.आर को भी प्रवासीनाथ से कुछ नहीं था... प्रवासीनाथ ही क्यों किसी से भी लेकिन कामरेडियत का बुखार दोनों को हमेशा परेशान किये रहता था सो एक रिश्ता तो स्वतः बन जाता था... पर रिश्ते की बनावट साफ न थी, कभी लगता था कि रेशे अलग-अलग हैं कभी लगता कि गुंथे हुए तो कभी लगता कि मोटी पर्त जमा दी गई है, औपचारिकता की। कुछ भी था, छीजन तो था ही जो रिसता था बीस साल पहले वाला तो एक दम से स्पष्ट था... मवाद माफिक बहता हुआ, बदबू करता...।
एक समय था जब ‘मठी’ कम्युनिस्टों के लिए ‘चुनाव’ का मुद्दा कम्युनिस्ट संस्कृति के लिए संशोधनवाद था... संशोधनवाद की सीमा एक तरफ पथ-भ्रष्टता थी तो दूसरे तरफ गद्दारी व मक्कारी थी। एल.आर. चुनाव को व्यवसाय मानता तथा विरोध करता जबकि प्रवासीनाथ चुनाव को लोक-मत का फैसला मानते एवं जनता को प्राप्त मतदान के अधिकार को ठीक मानते। जनमत को अपने पक्ष में कर लेना कामरेडियत का कार्यभार होना चाहिये...। जाहिर है दो विपरीत ध्रुव आपस में कैसे मिलते... इसी लिए एल.आर. और प्रवासीनाथ का जब भी आमना-सामना होता बात झगड़े तक पहुंच जाती, गनीमत होती उस समय प्रवासीनाथ अपनी खोल में दुबक लेते। लेकिन एक दिन प्रवासीनाथ खोल में न दुबक सके फिर तो एल.आर. उलझ गया... संशोधनवादी, हिजड़ा जो उचारा, उचारा ही कहानी माफिया तक कह डाला... इतना ही नहीं सबूत तक प्रस्तुत कर दिया।
चायखाने के सुजान हतप्रभ थे क्योंकि प्रवासीनाथ चाहे जो हों, कहानी माफिया तो कत्तई नहीं, पर एल.आर. का मुंह कौन रोके, बक-बकाता रहा जब तक प्रवासीनाथ चायखाना छोड़ कर नहीं चले गये। प्रवासीनाथ के जाने से क्या होता... एल.आर. तो चालू था। चायखाने के सुजान एल.आर. की बातें चूसने लगे कि प्रवासीनाथ की सारी नही ंतो कम से कम आधी कहानियां तो दूसरांे की हैं, उस आदमी की जो कहीं दूर देहाती कस्बे के प्राइमरी स्कूल में मास्टर है। उस बेचारे मास्टर ने अपनी कहानियां ठीक-ठीक करने एवं छापने के लिए प्रवासीनाथ को दिया था...। प्रवासीनाथ ने उन्हें कहीं नहीं छपवाया... थोड़ा बहुत रूप बदल कर उन कहानियों को धीरे-धीरे अपने नाम से छपाने लगे...। मास्टर के पूछने पर बता दिया कि कहानियां तो संपादकों के पास हैं तथा संपादकों ने बार-बार मांगने पर भी नहीं लौटाया। गल्ती यह हुई कि उन्होंने मूल-प्रतियां ही भेज दी थी। ऐसे में कोई क्या करे... मास्टर माथा पकड़ कर राम भरोसे हो गया... बाद में उसने खुद कोशिश की, अब वह चर्चित कथाकार है। संयोग से वह एल.आर. के गुट का है।
एल.आर. की प्रवासीनाथ से यह खुली नोक-झोंक थी तथा इससे एल.आर. न तो आत्ममुग्ध था और न ही दुखी। चायखाने से भांग का एक गोला खरीदा, खाया फिर अपने कमरे की तरफ चला गया... चायखाने के सुजान भी धीरे-धीरे खिसक लिए। लौटते समय सबके सामने प्रवासीनाथ का संकोची चेहरा था, तो क्या प्रवासीनाथ भी...।
सच यह था कि मुहल्ले के कान खुले थे, जीभ नुकीली थी तथा आंखें कौओं काली, सो मुहल्ले में पनपने वाला किसी भी तरह का रिश्ता सदैव बेपर्दा रहता चाहे प्रेम-प्रसंग में भगाई का मामला हो, या नदी किनारे सांस्कृतिक कार्यक्रम निपटाने का ही। अमरेन्दर का एल.आर. या जगेशर के यहां न जाना, शहर में आना तथा इतिहास में दरार करने वालों के यहां राम-रामी कर लौट जाना पर्दे में न रह सका। माना यह गया कि अमरेन्दर का कोई अपना आकाश नहीं वह सुशीला के सौर्य मंडल का मात्र एक कमजोर ग्रह भर है। सुशीला कवि विलोचन या प्रवासीनाथ को रद्दी की टोकरी में डाल दे तथा उन्हें अपनी कहानी से विस्थापित कर दे ऐसा संभव नहीं।
एल.आर. मुहल्ले वालों से एकदम अलग था, यही हाल जगेशर का भी था... ‘यार हम लोगों का अमरेन्दर से अब क्या मतलब, अमरेन्दर हम लोगों के काम का भी नहीं... वह धन-दौलत वाला हो गया है एक जीवित प्रेत... फिर तो वह अपने सरीखे प्रेतों से ही मिलेगा...।’
एक-दो लोगों ने अमरेन्दर के बाबत एल.आर. से उलाहना भी दिया...। एल.आर. साफ-साफ अलग हो गया अमरेन्दर से ‘कौन अमरेन्दर’ ? मैं तो उस साले को जानता तक नहीं... जाकर पूछो प्रवासीनाथ और कवि विलोचन से... हां सुशीला को जानता हूं पर वह क्या करे? औरत जात! मजबूरियां हैं...। बहुत मुश्किल है जगता प्रेतों से बचना सुशीला चाह कर भी प्रवासीनाथ या कवि विलोचन के चक्र-व्यूह से बाहर नहीं निकल सकती। मेरी कमजारी है कि मैं न तो मठ में जाता हूं न ही किसी मन्दिर में, इसलिए अक्षर-ज्ञानियों या सौन्दर्य की देवी किसी की भी पूजा नहीं कर पाता... वैसे भी सुशीला तो महज एक मामूली सी लड़की, छुई-मुई सी, रही बात अमरेन्दर की... अमरेन्दर तो पहले भी मेरे लिए लौंडा था और आज भी।’
प्रवासीनाथ, कवि विलोचन एवं बंगाली बाबू की बिटिया ही नहीं, सारा मुहल्ला अमरेन्दर की वाह-वाही में लगा था... और एल.आर. तथा जगेशर के लिए जैसे कुछ था ही नहीं, वाह-वाही करना तो दूर, जब भी सुशीला या अमरेन्दर का प्रसंग उठता, खासतौर से सीरियल की शूटिंग के बाबत... एल.आर. प्रसंग का रूख बदल देता... तथा आकाश की तरफ ताकने लगता। आकाश में या नीचे जमीन पर एल.आर. की नर्स मित्र जहां काबिज थी, चायखाने के सुजानों को क्या मालूम? उन्हें मालूम करने की जरूरत भी क्या?
अमरेन्दर तो तब चर्चित हुआ जब प्रवासीनाथ का उस पर संस्मरण प्रकाशित हुआ। सुशीला की पांडुलिपि, मधोक मधुकरी जाने कब प्रकाशित करे, लगता है उसके पहले ही सुशीला और अमरेन्दर का सीरियल आ जायेगा...।
सीरियल जब आयेगा तब आयेगा... तो क्या सीरियल आने के पहले मुहल्ला जैनियों की तरह मुंह पर पट्टी बांधे रहेगा या तभी चर्चा-परिचर्चा प्रारंभ होगी जब प्रवासीनाथ की किश्तों वाली कहानी आयेगी... नही ऐसा कत्तई नहीं... सुशीला तो पहले से ही लोगांे की जुबान पर थी, फिसलती हुई या गले में फंसती हुई ‘यार! अमरेन्दरा किस्मत वाला निकला, मोम जैसी देह तथा किसिम-किसिम की गड्डियों दोनों का मालिक।

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