आदमी खलिहान नहीं हो सकता
वे खलिहान थे और सूरज उगने से लेकर डूबने तक
खलिहान बने रहते थे
खलिहान से अलग वे गोशाला भी थे
तथा रात भर खाट पर लेटे बैठे पगुराते रहते थे,
उनका पगुराना उन लोगों की तरह था,
जो दिन भर या रात भर देश बन कर,
कभी कुछ तो कभी कुछ,
उपदेश दिया करते थे
हालाकि पगुराना; खामोशी से किया
जाने वाला कर्म है, जबकि उपदेश....
यह तो विशेष किस्म के चिल्ल पों का उत्पाद है ं
खास उत्पाद तो वे भी हैं जो देशी विदेशी या
आर्य अनार्य की जांच करते हैं
तथा धर्म कर्म को
भूगोल पर चिपका कर संस्कृति संवारना चाहते हैं
बहरहाल वे खलिहान थे और
खलिहान बने रहना चाहते थे
लेकिन जब गोशाला बनते थे और पगुराने लगते थे
फिर तो भूल जाते थे कि
अमीन कुरकी के लिए धमकिया रहा था
साहूकार कर्ज वसूली में बैल हांक रहा था
बच्चों का स्कूल जाना छूट गया है
उनकी पत्नी तेतरी इस लिए मरी थी क्योंकि
वे दवाई नहीं करा सके थे, तो क्या वे
खलिहान और गोशाला के बीच की कोई चीज थे
या दोनांे थे, या दोनों में से
कोई एक ही चीज थे
गोशाला या खलिहान
चलिए मान लेते हैं कि वे खलिहान थे
गोशाला होते तो अपने बाबत
भी न सोच पाते, खेती भी काहे करते
वे खलिहान थे तो थोडी़ सुविधा थी
कविताओं से बाहर
शुभ शुभ था वे खुली प्रतियोगिता में थे
चाहे जितना अनाज पैदा करें
उसे खुले बाजार या काला बाजार में बेचें
सबसे बड़ी बात खेती करना
उनका अपना चुनाव था
और अपना चुनाव गलत हो संभव नहीं
वे खलिहान थेे या गोशाला इस बाबत आलोचक
विरोध कर रहे थे, खास तौर से वे जो मठी थे,
उनका मानना था कि
आदमी खलिहान नहीं हो सकता
वह भी ऐसे समय में, जब पुल,
सड़कें और चिमनियां
स्तनों की तरह हिल रही हों,
तथा घर में कुदाल रखना
अश्लीलता हो, ऐसा समय जब जाति की पीठ पर
चुनाव की मुहर लगाई जा रही हो
और खलिहान से जुडे लोग
आत्म हत्या को देह मुक्ति का
उपकरण समझ रहे हों
फिर तो ऐसे समय में आदमी
खलिहान नहीं हो सकता,
पर भारत तो कृषि प्रधान देश है
आखिर इस सूत्र का क्या होगा?
यह सूत्र तो हजारों साल से प्रमाणित है
फिर आलोचक क्या बोल रहा?
तर्क दिया जा सकता है कि
आलोचक महज विश्वविद्यालय होता है
सो उसे विश्वविद्यालय के बारे में बोलना चाहिए,
तथा अच्छे राजनीतिज्ञों की
मुकम्मल नकल करना चहिए,
एक भी ऐसा उदाहरण नहीं कि किसी राजनीतिज्ञ ने
कुर्सी छोड़ने के बाबत कभी गंू गा किया हो
वह जब भी बोलता है, उसमें संसद होती है
एक कुर्सी होती है, कुछ कानून होते हैं,
कविताओं से बाहर
प्रधान मंत्री बनने का गुणा भाग होता है
आखिर आलोचक होता भी कौन है?
खलिहान के बारे में सोचने वाला?
उसे सोचना और बोलना है तो
विश्वविद्यालय के बारे में बोले
जो बौद्धिकों के उत्पादन का कारखाना है,
एक ऐसा उत्पादन जिसके लिए कहीं बाजार नहीं,
जबकि खलिहान! खलिहान तो मुकम्म्लि बाजार है
खलिहान में ही अनाज, अनाज जैसा दिखता है,
वहां उसकी सफाई की जाती है,
दुल्हन की तरह सजाया जाता है उसे
साफ अनाज खुद बखुद दूसरे का हो जाता है
किसका हो जाता है पूछने वाला जाने.....
अनाज खेतों में पैदा होता है,
खेत साहूकार या महजन का या
सरकार का, बहुत हुआ तो जमीनदार का.
पर खेती करने वालों का नहीं.
इसके अलावा और क्या होता है बाजार में
जिसका बाजा बजाया जा रहा हर तरफ
तो क्या, खलिहान के बाजार में, खलिहान का आदमी
दुरूस्त बाजार होता है, जिसे कभी भी बिक जाना है
और वह बिकता है चुनाव में,
बिकता है तहसील के हवालात में, या जेल में
वह बिकता है थाने पर, जरा सोचिए!
खलिहान और खलिहान का आदमी
न हो तो क्या होगा?
आपके घर के गुशलखाने की सफाई करने वाला
न हो तो क्या होगा? क्या होगा अगर आपके घर का?
जब खाना बनाने वाली दाई न हो, और आप
अपने पवित्र हाथ से वह सारा काम निपटाते हों
जिसे नौकर निपटाते रहे हों.....
क्या होगा उस देश का, उस संविधान का
जिसके हर छोटे बड़े आदेश उसकी
पीठ पर लिखे जाते हैं
कविताओं से बाहर
वैसे कहा जाता है कि संविधान भी
उसकी पीठ पर ही लिखा गया था
ऐसे में भूमंडलीकरण, उपभोक्ता संस्कृति
या खुला बाजार वगैरह ...
कुछ जरूरी लिखना ही हो तो ,
कहां लिखा जाएगा?
क्या पीठ पर ?
पीठ तो वैसे ही भरी हुई है
धर्म कानून परंपराओं आदि से
जाने क्या क्या लिखा हुआ है वहां ?
हाॅ गोली के लिए जगह
बनाई जा सकती है,
जो छेद सकती है,
तमाम लिखा हुआ.
पेट पर भी लिखा जा सकता
है कुछ
पर...पेट तो खाली है,
उस पर क्या लिखाएगा?
सभी जानते हैं
‘बुभुक्षितम किम न करोति पापम्’
फिर यह भी तो है
खाली पेट की कोई भाषा नहीं होती
जबकि किसान मजूर गरीब
शोषित, विस्थापित वगैरह
ये तो राष्ट्र भाषा हैं फिर
राष्ट्र भाषा को पढ़ने गुनने की क्या
जरूरत?





