Sunday, May 8, 2016

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित



















    र.नं.63166/78

प्रकाशन का छत्तीसवां वर्ष

  अर्धवार्षिक प्रकाशन
   

    कविता अंक


   समय से संवाद
 जनवरी- जून 2016

 अंशुल शर्मा की कविताओं
      पर केन्द्रित 

           केन्द्रित        कविता अंक 



जन्म... 21अप्रैल 1987
शिक्षा...स्नातकोŸार रसायन शास्त्र
अध्यापन
861,आदर्श बाल विद्या मन्दिर, दूनी
जनपद....टोंक
राजस्थान, 304802
मोबाइल...
09166048404 व 08764252548

असुविधा का जनुअरी-जून २०१६ अंक 


अपनी बात
असुविधा का प्रस्तुत अंक युवा कवि अंशुल शर्मा जी की कविताओं पर केन्द्रित है, ये राजस्थान के रहने वाले हैं, सो इनकी कविताओं में बात कहने का तरीका व उसका आशय दोनों ही सपाट हैं, खरी खरी. कवि अंशुल शर्मा की कवितायें सादगी के साथ काव्य यात्रा करती हुई आलोचनात्मक वौद्धिकता के कवच से लापरवाह रहती हैं. उन कविताओं के लिए एक ही सूत्र है ‘चलना है तो चलते रहना है, यह जो चलना है, स्थगित नहीं करना है, चलने से ही बातें खुलेंगी, आलोचना का क्या, वो तो होती रहती है, लिखो तो भी न लिखो तो भी, कुछ लोग तो बिना लिखे ही जमे हुए हैं. वैसे आधुनिक कवितायें तो वौद्धिकता के जटिल तकनीकों व तथ्यों के साज सिंगार के साथ ही किसी काव्य यात्रा पर निकलती हैं, कथ्य तथा तथ्य खुले न खुले, कविता मित्रों द्वारा जमा दी जाती है.. ऐसी किस्मत सबकी नहीं. कवि अंशुल की कवितायें अपने कथन में आज के समय में भी सपाट हैं, बिना किसी बनावट तथा मिलावट के, इनसे सभी के सामने या अकेले भी दो चार हुआ जा सकता है और अपनी संवेदनायें साझा की जा सकती हैं.  
प्रस्तुत अंक की योजना भी अंशुल जी के कविताओं के अनुरूप अचानक व बिना किसी तैयारी के बन गयी...हुआ यह कि फेसबुक पर कुछ महीने पहले मैंने असुविधा के प्रकाशन के बारे में अनिश्चितता का जिक्र किया था, संभव है असुविधा का प्रकाशन बन्द करना पड़े... मुझे डिम्पू के न रहने के बाद लगने लगा है कि असुविधा का प्रकाशन न संभव हो सके, विवशतायें जिनकी कोई आकृति नहीं होती, उनका होना तो कुदरती हैं...चाहेे कोई उन्हें रचे न रचे. खेती किसानी की सीमा किसे नहीं मालूम, केवल दो जून की रोटी वह भी बमुश्किल तमाम...बहरहाल यह सब मेरा दर्द है, मुझे झेलना है, इससे दूसरों से क्या लेना देना पर दूसरा कौन है? साहित्य में तो कोई दूसरा होता नहीं. मुझे दूसरों के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए था, बाजार में तो केवल तीसरा होता है, और यह जो तीसरा है, वही बाजार को चलाता है, दुख सुख ही नहीं चेतना व अनुभूतियों तक को बाजार का उत्पाद बना डालता है...असुविधा को बिना बाजार की आज्ञा से कभी तीसरा नहीं मिल सकता, बाजार का अपना स्वतंत्र व निरंकुश तंत्र होता है, यह सब जानते तथा मानते हुए भी मैने अपने दर्द का जिक्र फेसबुक पर कर दिया था, शायद खुद को समझाने के लिए या अपना दुख कम करने के लिए, यही कारण रहा होगा. संभव है दुखियारे को तीसरे से दूसरे में तब्दील राम मिल जायें. मुझे अचरज लगा कि फेसबुक की दुनिया में असुविधा के लिए अंशुल शर्मा मिल गये एक दम अपरिचित... अंशुल शर्मा ने तत्काल असुविधा के खाते में दो हजार रूपया डलवा दिया. हालांकि मैं उन्हें असुविधा का खाता नंबर भेजना नहीं चाहता था पर जिद्द भी तो कोई चीज होती है...अंशुल जी की जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा उसी दौरान एक बात और हो गयी जिसका जिक्र न करना गलत होगा..मेरे लिए आदरणीय हैं विष्णु चन्द्र शर्मा जी, उनसे मेरा जुड़ाव बहुत पहले से है जुड़ाव का कारण है उनका बनारसी होना और खरा खरा बोलना, असुविधा ने बहुत पहले एक अंक उन पर भी केन्द्रित किया था. उन्हें मेरे पुत्र अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित अंक मिला और उन्होंने दो हजार रूपयों का चेक मेरे नाम से भेज दिया... चेक लेना है कि नहीं लेना है, इनकार करने का मुझे उन्होंने मौका भी नहीं दिया तो यह सब होता रहा असुविधा के साथ..असुविधा के लिए कम से कम दो लोग तो मिले जो सोचते है कि धन के अभाव के कारण असुविधा बन्द नहीं होनी चाहिए.. उन दोनों लोगों के सहयोग ने मुझे विवश कर दिया कि असुविधा का प्रकाशन बन्द नहीं होने देना है, आखिर खाना, पीना तो चल ही रहा है, मेरे घर के चूल्हे में आग जलती है, फिर असुविधा.क्यों न जले. जलेगी धुधुआती ही सही.... उन लोगों को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद...
अब अंशुल जी की कविताओं पर...
ये लोग/भूख प्यास/पानी बिजली/जैसी/छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्लाते हैं?/अरे/कोई इन्हें चुप कराओ/इनकी चीखें/गम्भीर मुद्दों से/ हमारा ध्यान हटाती हैं।........................
झूले/महŸवहीन/हो चले हैं/पेड़ों पर अब/किसानों की/लाशें झूलने लगी हैं/सबसे मजे की बात तो यह है कि/सबसे निर्मम हत्यारा/सबसे आगे खड़ा रहता है भीड़ में...बालकों के बचपन की लाश को/ पीछे छिपाए।
पसीने से तरबतर/मुँह लटकाए/फावड़ा कंधों पर टाँगे/शाम को घर लौटते मजदूर की पेन्टिंग/लाखों में बिक गयी/और उसके बच्चे.../आज भी भूखे सो गए।
लिखना एक कला है/किसी पर लिखना/कला की कला है/किसी के लिखे पर
लिखना/विशेष कला है/किसी के लिए लिखना/पुरस्कारणीय कला है/आपमें भी तो कोई कला होगी जनाब!
समय से बातें करती अंशुल की कवितायें हमें कुदरती काव्य परंपराओं की तरफ ले जाती हैं, जब कविताओं के सिंगार पटार नहीं किये जाते थे वे एक वाक्य भर होती थीं. धूमिल ने उस परंपरा का जोरदार ढंग से उपयोग किया हाल में विनय मिश्र ने ‘सूरज तो अपने हिसाब से निकलेगा’ तथा किरण अग्रवाल जी ने ‘धूप मेरे भीतर’ संकलन में किया है.
कवि अंशुल सीधे सवाल करते हैं आखिर लोग भूख, प्यास, पानी बिजली,जैसी छोटी मोटी बातों के लिए क्यों चिल्ला रहे हैं? इन्हें चुप कराओ, इनकी चीखें गम्भीर मुद्दों से हमारा ध्यान हटाती हैं. .ध्यान तो विचारकों चितकों, कैरियरिस्टों का तो हट ही रहा है... कौन कवि है जो नागार्जुन की तरह आन्दोलन का सहभागी बन रहा है? सभी तो अपना मुह पुरस्कारों की तरफ लगाये हुए हैं, मिले न मिले अलग बात है... आज का समय पुरस्कार लेने और लौटाने के बीच का है, दोनों की राजनीति है, ऐसी राजनीति करने वालों के लिए भूख,गरीबी,शोषण आदि के सवाल ध्यान हटाने वाले हुआ करते हैं. वे अक्षरों की अमरता के बहाने खुद को अमर बनाने की चिंता में हैं... अमर बनना इतिहास में होना है तथा इतिहास में कूट कलाकार ही जगह पा सकता है, और कोई नहीं...मेरे यहां के लक्ष्मण सिंह को अंग्रेजों ने मार दिया पर वे इतिहास में नहीं हैं.
कवि अंशुल शर्मा कविता की ठूंठ की तरह हैं और ऐसी ही कविताओं से संभावना भी है. किसे नहीं पता कि ठंूठ पेड़ की मजबूती का जीवित प्रमाण होता है, खुद को मिटाता हुआ.
खेत की मेड़/पर ये जो ठूँठ तुम देख रहे हो ना/ये ठूँठ नहीं हैं/ बरसात की आस में/आँखों को आसमान में टिकाए/खड़ी संभावना हैं.
प्रस्तुत कविता संकलन तमाम ऐसे कवियों के लिए संभावना है कि कवितायें नहीं मरा करतीं, सो लगातार काव्य यात्रा पर चलते रहना चाहिए, काव्य कर्म को निराश व हताश हो कर छोड़ नहीं देना चाहिए.. कवि अंशुल शर्मा साफ कहते हैं...
समय रथ/ अपने पहियों के नीचे/ वर्तमान को कुचलता हुआ/भविष्य होने जा रहा है/तुम इसकी गति को पहचानो/अन्यथा यह वर्तमान का/ अपहरण कर/
छोड़ जाएगा पीछे/ वर्तमान का भूत/और उस रथ/ की धूल से सना/ तुम्हारा चेहरा/किसी को पहचान न आएगा/समय की/ धूल ने बड़े बड़े/ चेहरों को/ धूमिल कर दिया है।
समय की धूल ने बड़े बड़े चेहरों को धूमिल कर दिया है, सो सावधान रहने की जरूरत है कि चेहरा धूमिल न होने पाये और ऐसा तभी होगा जब वर्तमान की चुनौतियों से टकराते रहा जाये. मुझे खुशी है कि कवि अंशुल शर्मा के जेहन में वर्तमान का खुरदुरापन मौजूद है तथा उससे टकराने की क्षमता भी. आशा है कि अंशुल शर्मा जी की कवितायें समय की चुनौतियों से टकराने वालों को स्वीकार्य होंगी, निकट भविष्य में प्रस्तुत संकलन से इतर उनकी और धारदार कवितायें हमें पढ़ने के लिए मिलेंगी.













पौ,पाठशाला
और पंक्तियाँ


पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
मीठे-मीठे सपने
देखा करती हैं
पौ फटते ही,
जबकि माँयें अपने बच्चों की
मनुहार करती हैं
चाय दूध पीने की।

पौ फटते ही,
जबकि उनकी सहेलियाँ
तैयार होने की
तैयारी कर रही होती हैं।

पौ फटते ही,
वे रवाना हो जाती हैं
अपने बस्तों का बोझ लिए।

देखते हैं उनके मवेशी
गीली आँखों से,
कि रस लेते जाओ
हमारे घी दूध का।

रास्ते के बबूल
हिल जाते हैं जोर से,
सुखाने के लिए
उनका पसीना।

समय से तेज दौड़ने की
कोशिश में,
कभी कभी खा जाती हैं ठोकरें,
और दोष देती हैं
सड़क को।

सड़क भी सहेली हैं उनकी
कान पकड़ लेती हैं
और सहला देती हैं
उनके पैरों को।

भागती,दौड़ती,
सिर से एड़ी तक
पसीने में तरबतर।

खुश हो जाती हैं प्रार्थना में
अपनी सहेलियों के साथ
पंक्तिबद्ध होकर।

मगर कभी कभी जब
समय उनसे
आगे निकल जाता है
दौड़ में,
अनजाना अपराध बोध लिए
खड़ी रहती हैं वो
अलग पंक्ति में।

शिक्षक देखते हैं उनको,
कमर पर दोनों हाथ
रखे हुए।

मैं कहता हूँ
आओ कभी
सात हजार मीटर से
दौड़ते भागते
गिरते उठते
उस पर लगो, अलग पंक्ति में
अपराध बोध लिए
उस अपराध का
जो तुमसे हो जाता है
ना चाहते हुए भी।

टाँगें फड़कने लगेगीं
तुम्हारी,
शरीर जकड़ने लगेगा,
पेशियाँ फैलने
और सिकुड़ने लगेंगी,
बहुत तेज रफ्तार से
और दिमाग की
ओर जाने वाला
सारा खून इकट्ठा हो जाएगा
तुम्हारी आँखों में,
सुन्न होते होते दिमाग के।

तब अहसास होगा तुम्हें
देर हो जाना
कितना खलता है
और पौ फटने से पहले
घर से
निकलना भी।

बड़ा प्रसिद्ध आदमी

कुछ आदमी,
बड़े प्रसिद्ध होते हैं,
कुछ आदमी बड़े होते हैं,
प्रसिद्ध नहीं होते।
कुछ आदमी प्रसिद्ध होते हैं,
बड़े नहीं होते।
कुछ आदमी ना बड़े होते हैं,
ना प्रसिद्ध होते हैं,
वहीं कुछ बडे़ और प्रसिद्ध
दोनों होते हैं
मगर
‘आदमी’ नहीं होते

स्मृतियाँ  (एक)


स्मृतियाँ
मरने कहाँ देती हैं
किसी को,
स्मृतियाँ
अमरत्व का दूसरा नाम हैं।

स्मृतियाँ (दो)


स्मृतियाँ
कभी खोती नहीं हैं
छिप जाती हैं,
सिर्फ
कुछ घटनाओं के बीच,
दब जाती हैं
जैसे
पुस्तकों के ढेर के बीच
दब जाता है कोई
पुराना पत्र।

स्मृतियाँ (तीन)


तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
डूबते चले जाना है,
 अन्तहीन गहराई में।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
चढते चले जाना है,
पर्वतों के अमापित
शिखरों पर।

तुम्हारी स्मृतियों में खोना
जैसे
उजड़े हुए गुलिस्तां में
गुलों की महक
महसूस करना है।

स्मृतियों की
इन
गहराइयों, ऊँचाइयों
और खुशबूओं में,
तुम्हें पा लेना
किसी उपलब्धि से कम नहीं।

स्मृतियॉ (4)


नीम का वो बूढ़ा पेड़,
उसके कई साथी परिन्दों का
पुश्तैनी मकान रहा था।
डर था कि कभी भी
कटवाया जा सकता है
(जैसा कि हर वृद्ध के
साथ होता है)
सो...
कटवा दिया गया
गृहस्वामी द्वारा।
रहना तो था ही कहीं
पालना था अपने भविष्य को,
जल्दी ही उन सबने
एक नया बसेरा तलाश लिया।

मगर एक तोता
अभी भी वहाँ आकर
बैठ जाता है।

बसेरे छूट जाया करते हैं
मगर,
उनसे जुड़ी स्मृतियाँ
नहीं छूटती हैं।

  प्रेम


मैं ‘तुम’ हूँ,
‘तुम’, ‘मैं’ हो,
मैं, मैं नहीं,
तुम, तुम नहीं।

होना और ना होना,
होकर ना होना
ना होकर होना
ही तो
प्रेम है।

 उलझन


जिसे याद रखना
जरूरी है
वह भूल, भूल जाता है,
जिसे भुलाना जरूरी है,
वह रह रह कर
याद आता है।

अजीब गुत्थी है
इस मन की भी
सुलझाने लगता हँू
और
उलझ जाता हूॅ।

परिभ्रमण


तुम तो घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो यथास्थिति
पर
तुम्हारे इस घूमने फिरने से
जो
दिन रात
साल महीने
बनते हैं
वे
नहीं सिरजते ‘यथास्थिति’
तुम्हारी तरह।

कभी कभी
किसी पल को
रोक लेना चाहता हूँ,
मगर
तुम रुको तो
वो पल रुकें।
तुम्हारा क्या है?
तुम तो
घूम फिरकर भी
सिरज लेती हो
यथास्थिति।
शामें और आवाजें

पहले शाम के वक्त
सुनाई पड़ता था
चहचहा रही हैं
घर लौटती
चिड़ियाएँ,

पुकार रहे हैं बछड़े
अपनी माँओं को,
तैयारी हो रही है
पास के मन्दिर में
आरती की,
शोर मचाते बच्चों के
झुण्ड पर
चिल्ला रही हैं
उनकी माँयें
कि.....
‘अब तो घर आ जाओ।’

अब वे कुदरती आवाजें
सुनाई नहीं पड़तीं,
अभी सुनाई दे रही है...
पास के मोबाइल
टावर से
घरघराते जेनरेटर
की आवाज,
कहीं दूर तेज आवाज में
बज रहा है डी.जे.,
तेजी से गुजरती बाइक्स
जिनके साइलेंसर
अपने नाम के विपरीत
मचाते हैं शोर।
हालाँकि
शामें भी है,
बच्चे भी हैं,
मॉयें भी हैं,
गॅायें भी हैं
मगर
वो
आवाजें अब
नहीं हैं।

झूठ


झूठ
बर्दाश्त होते हैं।
प्यारे झूठ!
अच्छा है
तुम हो।
वाकईं सच नाकाबिले।


दीवारें


इश्तिहारों
के इस जंगल में
‘यहाँ विज्ञापन
चिपकाना सख्त मना है’

लिखी दीवारों को
घोषित किया
जाना चाहिए
संरक्षित।
समस्याएँ

वोट,

दलबदल,
बहुमत,
गठबन्धन,
कुर्सी जैसी
गम्भीर समस्याओं
के बीच,
ये लोग
भूख प्यास
पानी, बिजली
जैसी
छोटी-मोटी
बातों के लिए
क्यों चिल्लाते हैं?

अरे !
कोई इन्हें चुप कराओ!
इनकी चीखें...
गम्भीर मुद्दों से,
हमारा
ध्यान हटाती हैं।
     

झूले


झूले
महŸवहीन
हो चले हैं।

पेड़ों
पर अब
किसानों की
लाशें
झूलने लगी हैं।

मजदूर


पसीने से तरबतर,
मुँह लटकाए,

फावड़ा कंधों पर टाँगे
शाम को घर लौटते
मजदूर की
पेन्टिंग

लाखों में बिक गयी
और
उसके बच्चे...

आज भी
भूखे सो गए।

लेखन एक कला


लिखना
एक कला है।

किसी पर लिखना
कला की कला है।

किसी के लिखे पर
लिखना
विशेष कला है।

किसी के लिए लिखना
पुरस्कारणीय कला है।

आपमें भी तो
कोई कला होगी जनाब!

 सवाल


किसान
दिखाया जाता है,
विज्ञापनों में हँसता हुआ।

या तो
वे विज्ञापन
फर्जी हैं,
या
हँसते हुए
वे किसान।

क्या आप बता सकते हैं
कौन फर्जी है

प्रकृति और मैं


मैंने
कल रात
एक स्वप्न देखा
कि
मैं
अपनी
सुविधाओं
के लिए
प्रकृति का गला
घोंट रहा हूँ।

जागा
तो
मेरे दोनों हाथ
अपनी ही
गर्दन को जकड़े हुए थे।


सिकुड़न


सूचनाओं
के इस तंत्र ने
दुनिया को छोटा
और
पडा़ेस को बड़ा
बना दिया है।

पूरी दुनिया की
खबरों से
हरदम अपडेट
रहने वालों को...

 कई बार

पड़ोसियों के घर
खाली करने
और
नए लोगों के बसने की
खबर तक नहीं लगती।

रोगी का कमरा


क्या कभी
रोगी का कमरा
आपने देखा है ध्यान से?

तरह तरह की
दवाइयों
की
कड़वाहट और गंध से भरा।

वो
गंध उस कमरे की
दीवारों में...
इतनी गहराई
तक घुस चुकी
होती है कि
शुभचिन्तकों द्वारा
भेजे गए खुशबूदार
गुलदस्ते
हो जाते हैं
गंधहीन

रोगी का कमरा
जिसमें प्रवेश करते ही
झूठी संवेदनाओं
की
गुरुत्वीय शक्ति से
शुभचिन्तकों के
चिकित्सकीय ज्ञान के
छिछले सागर
में ज्वार उठने लगता है।

रोगी के कानों में
ये सुझाव
असंख्य
घण्टों, घड़ियालों
का
शोर पैदा करते हैं।

वो झुँझलाता है,
रोगी को ऐसा
लगता है
जैसे
कमरे की दीवारें
धीरे धीरे
उसके पलंग की ओर
सरकने लगी हैं
उसे दबा डालने के लिए।

वो
डर जाता है।
अगर
इस दुनिया में
सबसे
भयावह कोई जगह है
तो
वह है
‘रोगी का कमरा।’

रिंगमास्टर


वह नहीं बोलता था,
उसकी आँखें बोलती थीं।

उसकी आँखों के घूमते ही
घूम जाते थे वे भी
भय से।

आलम यह था कि
उसकी पुतलियाँ
फैलते ही
फैल जाता था,
सन्नाटा चारों ओर।

फिर एक दिन
गजब हो गया,
उसकी पुतलियाँ फेलीं,
जितनी फैल सकती थी,ं
पर उस दिन
सन्नाटा नहीं फैला।

सामने चुप्पी नहीं थी,
भय भी नहीं,
थी बस खुसर पुसर।

वह खुद को नजरों में
गिरता न देख सका
और
उसने डण्डा उठा लिया।

तभी
एक आवाज आई..
‘एक दिन खत्म हो जाएगा
 इस डण्डे का भी भय’
जैसे खत्म हुआ आँखों का
फिर क्या करेगा?

वह चौंका
जैसे
जगा दिया हो
किसी ने नींद से।

समझ आ गया उसे
कि
वह
‘मास्टर’
है
‘रिंगमास्टर’
नहीं।

अनुशासन


पंक्ति में लगे
बालकों को देखकर
कितना
आनन्द आता है।

आनन्द
पंक्तिबद्धता से नहीं,
हमारे
निर्देशों की अनुपालना
को
देखकर आता है।

अनुपालना
हमारी “गुरुता” को
संतृप्त करती हैं।
          //22//

छंद और जीवन


माना
कठिन है,
छन्दबद्ध
कविता की रचना,
परन्तु
असंभव है
स्त्री जीवन की पीड़ा को
छन्दबद्ध
कर पाना भी।

प्रश्न


वे
कहते हैं
‘प्रश्न करना अपराध है’

प्रश्न करके
तुम
हमारी
गुरुता और शुचिता
को
चोट पहँुचा रहे हो।

वे
प्रश्नों को
अपराध घोषित कर
पतली गली से
निकल लेते हैं
क्योंकि
उनके पास

तुम्हारे प्रश्नों के
उŸार नहीं हैं।
उŸार होगे भी कैसे?

ऋण बटा ऋण

काँटे से काँटा
निकालने
और
जहर से जहर कटने
की
बात को सच मानकर,
उसकी
पुश्तें
कर्ज चुका चुका कर
मर गई हैं।

मगर
साहूकार का
कर्ज है कि
कटने का नाम ही
नहीं लेता
कर्ज से।

अकवि 


ये कौन है?
जो कछुए की तरह
अपनी खोल में सिमटा
बैठा है,
श्रीमान!

ये
कविवर कच्छप हैं!
ये
अपने
हाथ-पाँव और
पेट का ध्यान रखते हुए
कविता लिखते हैं।

ये
पुरस्कार लेते समय ही
अपनी खोल
से बाहर निकलते हैं।

हत्या


हमने
बालपन
की
हत्या
कर दी।
और
आरोप
यंत्रों
पर गढ दिया।

(वैसे भी
अपना अपराध
दूसरों पर थोप देने में
हम उस्ताद हैं)

सबसे
मजे की बात तो
यह है कि
सबसे निर्मम हत्यारा
सबसे
आगे खड़ा रहता है
भीड़ में,

बालकों के
बचपन की लाश को
पीछे छिपाए।

समाचार 


आज
समाचार,
विचार,
सदाचार,
शिष्टाचार
और
ऐसे
जितने भी
चार हैं,
सब
’अचार’ के भाव
बिक रहे हैं।



समाचार (2)


समाचार चैनल
वारदातें,
सनसनियाँ,
और
रहस्य

 परोसने में लगे हैं।
तर्क वितर्क
के नाम पर....
आयोजित बहसें
बदल जाती हैं,
व्यक्तिगत छींटाकशी में।

सास बहू से लेकर
अलौकिक शक्तियों
पर चर्चा करते
ये चैनल
अपने मूल उद्देश्यों को
विस्मृत कर चुके होते हैं?

क्या
लोकतंत्र का
पाँचवा स्तम्भ,
इतना कमजोर हो गया?
कि
उसे खड़ा रहने के लिए
इनका सहारा लेना पड़ेगा?

दूसरों को कटघरे में
खड़ा करने वालों
जरा अपनी गिरेबाँ में भी
झाँक कर तो देख लो।


प्रेम गीत


अगर कविताएँ
प्रेमालाप ही
करती रहेंगी
तो
     
समाज के रुदन,
समाज की पीड़ा,
समाज की विसंगतियों
पर प्रकाश कौन डालेगा?

अगर शब्द
गलबहियाँ डाले
बैठे रहेंगे
तो
समाज को नींद से
कौन जगाएगा ?

कविता ने
बादलों की सैर
खूब कर ली है,
खूब चाँद तारे
तोड़ लिए हैं,

अब
जमीन पर उतरकर
काँटों पर नगे पाँव
चलना होगा,
जनमानस के दर्द को
महसूस करना होगा
और चीख चीख कर
बयाँ भी करना होगा

क्योंकि
कान
प्रेमालापों को सुनने के
आदी हो गए हैं।



बचपन


ध्यान से देखो
इनका
बचपन
इन्हीं किताबों के
पन्नों
के बीच कहीं
दबा होगा।

आर्थ्रोपोड


जिस तरह से
तुम
छोटी छोटी
समस्याओं से घबराकर
झुक जाते हो।

मुझे डर है
तुम्हारी आने वाली नस्लें
बिना रीढ के
सबसे बड़े संघ में
शामिल ना हो जाएँ।

(आर्थ्रोपोडा यानि कीड़े
मकोड़े जन्तु जगत के
सबसे बड़े संघ का निर्माण करते है।)

मजदूर


दुनिया भर के
मजदूरो!
समय आ गया है,
 इकट्ठे हो जाओ!
जब भी
ऐसा
शोर सुनाई दे,
वो समय होता है
चुनावों का
या
मजदूर दिवस का।

गृह प्रवेश


नव-गृह प्रवेश
वास्तव में
एक घर से निकासी
होती है।

निकासी और प्रवेश
दो
समानान्तर प्रक्रियाएँ हैं।

ठूँठ


खेत की मेड़
पर
ये जो
ठूँठ तुम
देख रहे हो ना!
ये ठूँठ नहीं हैं,
बरसात की आस में
आँखों को
आसमान में टिकाए
खड़ी संभावना हैं।
जिसने अपने पैर
अभी भी
मजबूती से
जमीन में गाड़े हुए हैं।

सूने पड़े इस खेत में
ये ठूँठ
आशा का दूसरा नाम हैं।

आल इज वेल

पड़ोसी के लुटते
घर को
पूरा मोहल्ला
अपनी काँच लगी
खिड़कियों से
देखता रहा।

काँच ऐसे थे कि
जिनमें
अन्दर से बाहर तो
सब कुछ दिखाई देता था
पर बाहर वाले को
कुछ नज़र नहीं
आता भीतर।

(वहीं पडोसियों की
आँखें ऐसी थी कि
उन्हें अन्दर से बाहर का
कुछ नज़र नहीं आता था)

उन्होंने काँचों के साथ साथ
अपने कानों को भी
बन्द कर लिया था।
उधर लुटेरे फिर मिलेंगे का
वादा कर अपने पीछे
खबर छोड़ गए,
जिसे पूरा गाँव कल
चाय के साथ
पीने वाला था।

समय


समय रथ
अपने पहियों के नीचे
वर्तमान को
कुचलता हुआ
भविष्य होने जा रहा है।

तुम
इसकी गति को पहचानो
अन्यथा
यह वर्तमान का
अपहरण कर
छोड़ जाएगा पीछे
वर्तमान का भूत।

और उस रथ
की धूल से सना
तुम्हारा चेहरा
किसी को
पहचान न आएगा।

समय की
धूल ने बड़े बड़े
चेहरों को
धूमिल कर दिया है।


     

Thursday, April 14, 2016

अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में



इस अंक का संपादन... अनवर सुहैल


    र.नं.63166/78

प्रकाशन का पैंतीसवां वर्ष
  अर्धवार्षिक प्रकाशन
    

Asuvidha ka smriti ANK

    स्मृति अंक

समय पर समय की बात
 जुलाई- दिसंबर 2015

 अंशु शिवेन्द्र पर केन्द्रित 





स्मृति अंक

अंशु शिवेन्द्र (डिम्पू) की स्मृति में


आविर्भाव.. 26 जनवरी 1977
निर्वाण....2 जून 2014

रचना क्रम.....


     संपादकीय

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
‘सरोज-स्मृति’ 1935 ई. में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित लम्बी कविता और एक शोकगीत है। निराला ने यह कविता अपनी अठारह वर्षीय पुत्री सरोज के निधन के उपरांत लिखी थी।
इस कविता मंे उन्होंने शोक के साथ-साथ समाज के प्रति आक्रोश और व्यंग्य प्रकट किया है। यह कविता हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ शोकगीतों में से एक मानी जाती है। इस कविता की तुलना रामविलास शर्मा ने शेक्सपीयर की किंग लियर से करते हुए लिखा था--‘हिन्दी ही में नहीं अंग्रेजी में भी ऐसे शोकगीत दुर्लभ हैं।’ 
अग्रज रामनाथ शिवेन्द्र ने पुत्र-शोक में जो कविताएं और लेख-संस्मरणादि लिखे हैं उनसे गुज़रते हुए बरबस ही निराला की सरोज-स्मृति याद हो आती है। और उनकी विवशता का ये रूप भी दुखी कर जाता है--‘कुछ भी तेरे हित न कर सका!’
यह बाज़ारवाद में फंसे एक पिता की व्यथा-कथा है। 
एकमात्र पुत्र डिम्पूजी के एक दुर्घटना के बाद लम्बे इलाज और फिर निधन ने शिवेन्द्र को बुरी तरह से तोड़ दिया। भारतीय समाज में सिर्फ खेती पर निर्भर रहकर ‘असुविधा’ जैसी लघुपत्रिका का विगत कई बरसों से सम्पादन-प्रकाशन, खुद का लेखन और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना एक कष्टसाध्य कार्य है। इसमें आए दिन सम्वेदनाएं आहत होती हैं, निराशा और हताशा बढ़ते क़दम रोकती रहती हैं। बैसाखी पर चलती आर्थिक दशा ऐसी बनी रहती है कि सर ढांपो तो पैर खुले। चादर की लम्बाई बढ़ाने का कोई जादू अब तक किसी अर्थशास्त्री ने नहीं किया....न ही किसी वित्त मंत्री के बजट से ऐसा कोई उपाय निकला कि गरीब की चादर का आकार बढ़ेे। 
आजीविका का संकट और इज़्ज़त के साथ गुज़र-बसर करने की ज़िद ने शिवेन्द्र और उनकी धर्मंपत्नी शकुन्तला जी को कभी परिस्थिति से समझौता करने नहीं दिया। सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन के लिए दोनों के संयुक्त प्रयास से परिवार की गाड़ी सुचारू चलती रही है। 
इसी सब के बीच शिवेन्द्र ने ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास लिखा जिसे देश के प्रतिष्ठित प्रकाशक राजकमल ने शा‘ये किया। बनारस, इलाहाबाद आदि के मित्रों ने उस उपन्यास को बखूबी नज़रअंदाज़ किया। घनघोर लिक्खाड़ हैं रामनाथ शिवेन्द्र। ए-4 कागज़ पर लिखते हैं तो लिखते चले जाते हैं। मैं उनके उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ को अपने देखे में पूरा होते पाया है। उसके कई अध्याय जब मैं सिंगरौली में कार्यरत था, तब मेरे क्वार्टर में लिखे गए हैं। मेरी पत्नी नाज़रा उनकी लेखन-क्षमता और एकाग्रता की गवाह हैं। 
इतनी प्रतिकूलताओं को झेलते हुए भी शिवेन्द्र लगातार लिखते रहे हैं। असुविधा के कई अंक उन्होंने सोनभद्र अंचल के गुमनाम साहित्यकारों को प्रकाश में लाने के लिए निकाले हैं। अक्सर मैं उन्हेें समझाया करता कि हिन्दी का संसार बहुत बड़ा है। हज़ारों लेखक हैं, कईयों का कोई नामलेवा नहीं है। आलोचक अपनी तरफ से खोज कर नहीं पढ़ते। शिक्षण-संस्थाएं जाने किन विषयों पर शोध आयोजित करती हैं लेकिन जनपदीय लेखन पर बहुत कम शोध हो पाया है। सोनभद्र अंचल का इंसाइक्लोपीडिया हैं शिवेन्द्र। डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद से प्रभावित, वकालत का जमा-जमाया पेशा छोड़कर सिर्फ खेती के ज़रिए परिवार चलाने को कृत-संकल्पित शिवेन्द्र को कोई नहीं समझा सकता कि--
हम एक उम्र से वाकिफ हैं येे न समझाओ,
कि जुल्म क्या मिरी जान और सितम क्या है...’  --फै़ज़
सन् चौरानबे की बात होगी जब राबर्टसगंज बस-स्टेंड में मैैंने असुविधा की एक प्रति खरीदी। दुबली-पतली अनाकर्षक लघुपत्रिका। तब उस ज़मानेे में जब अंक ट्रेडिल पर छपा करते थे साधनहीन पत्रिकाएं इसी तरह अनाकर्षक हुआ करती थीं। मैंने पत्रिका पढ़कर शिवेंद्र को एक पोस्टकार्ड लिखा जो उन्हें लगभग छः माह बाद मिला। उस पोस्टकार्ड में दर्ज पते का पीछा करते एक दिन शिवेंद्र बीना प्रोजेक्ट के मेरे क्वाटर में आ पहुंचे। फिर हमने मिलकर असुविधा के कई अंक निकाले। कई लेखक मित्रों ने सहयोग दिया। हंस के पत्रिका-चर्चा कॉलम मंे असुविधा के अंकों की चर्चाएं हुईं। 
उस ज़माने में भी मुझे बहुत आश्चर्य होता था कि सिर्फ किसानी करके लघुपत्रिका निकालने जैसा घर-फूंक काम कोई कैसे करता है? इस बीच शिवेन्द्र के घर जाना हुआ और आदरणीय भाभीजी की आत्मीयता और आतिथ्य ने जैसे अवाक् कर दिया मुझे। वाकई संसार में जहां धन है वहां अहंकार है और कृपणता है। जहां गरीबी है वहां आत्मीयता की दौलत छलक-छलक पड़ती है। 
यह सब मुझे क्यों बताना पड़ रहा है, मैं बता नहीं सकता हूं। बस निराला की सरोज-स्मृति की वेदना और असुविधा के इस अंक में शिवेन्द्र की कविताओं में दुःख की सघनता बार-बार विचलित कर रही है। 
एक कवि-लेखक और किस तरीके से अपनों को याद कर सकता है। ये शब्द ही तो हैं, जिन शब्दों से जमाने की व्यथा आज तक लेखक दर्ज करता रहा है क्या उसे इतना भी हक नहीं कि अपनी व्यथा कोे भी समाज तक पहुंचाए।
फिर निराला की सरोज-स्मृति के अंश खलल डाल रहे हैंः
अस्तु  मैं  उपार्जन  को  अक्षम
कर  नहीं  सका  पोषण उत्तम
अजीब व्यथा है, एक साधनहीन पिता की और यही व्यथा हम शिवेन्द्र की लेखनी में भी पाते हैं, जब पुत्र के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अचानक उन्हें अपनी बेबसी पर तरस आता है। वाकई कितनी महंगी है चिकित्सा..जिसे नेह-नाते से कोई सरोकार नहीं। सिर्फ और सिर्फ रूपया और रूपया के इर्द गिर्द खड़ी होती है प्राचीरें, आलीशान अस्पतालों की। और ये रूपया जहां है वहां बहुतायत में है और जहां नहीं है वहां एकदम नहीं है। चाहे अपना वजूूद गिरवी रख दिया जाए, वह रूपया में नहीं बदल सकता अपने समूचे वजूूद को। गांव खड़ुई से राबर्टसगंज से बनारस तक बेटे के इलाज के लिए दौड़ते दौड़ते शिवेन्द्र जी हताश तो होते थे लेकिन निराश नहीं होते थे। लेकिन पुत्र डिम्पूूजी ठीक नहीं हो पाए और शिवेन्द्र के अस्तित्व में एक ऐेेसा खालीपन भर गए कि इस व्यथा से शायद ही कभी उबर पाएं।
समय और समाज की सम्वेदनहीनता और प्रकृति के क्रूर निर्णय के आगे निढाल क्या निराला भी नहीं थेः
मुझ  भाग्यहीन  की  तू  सम्बल 
युग  वर्ष  बाद जब हुई  विकल
दुख  ही  जीवन की कथा  रही
क्या कहूं आज, जो नहीं कही!
असुविधा ही तो वह मंच है जिस पर शिवेन्द्र का अधिकार है। आज तक असुविधा के अंक जाने कितने लेखकों कोे छापते रहे। सामाजिक राजनीतिक मुद्दे उठाते रहे और पुत्र-वियोग से उपजी व्यथा के लिए असुविधा से बढ़कर कौन जगह होगी। 
घर में राशन हो या न हो, असुविधा का अंक बनारस छपने चला ही जाता। कभी कागज़ वाले को तो कभी प्रेस वाले को उधारी लगाकर अंक छपवा ही लेते शिवेन्द्र। फिर बनारस से पत्रिका का पैकेट ढोकर ग्राम खड़ुई तक पहंुचाते शिवेन्द्र। एक एक प्रति में स्वयं ही पता लिखना फिर डाक-टिकट लगाना और फिर अंक को डाकखाने के हवाले करना। 
बहुधा लेखक /पाठक अंक की पावती नहीं देते हैं। कोई बात नहीं। यदि वार्षिक ग्राहकों की सूची बनाई जाए तो एक पन्ना भी कापी का न भर पाए। वो भी यदि किसी ने सन् 2000 में वार्षिक सदस्यता ली थी फिर कभी नवीनीकरण नहीं कराया फिर भी शिवेन्द्र ऐसे पाठक को आजीवन सदस्य मान लेते हैं कि जिन्दगी में कभी उस व्यक्ति ने असुविधा की सहयोग राशि दी थी। वरना हिन्दी में खरीदकर पढ़ने वाले लोग ही कितने हैं? 
तो असुविधा के इस अंक को विद्वतजन इस दृष्टि से देखें कि ये एक ऐसी व्यथा कथा है जिसे शिवेन्द्र नहीं लिखते तो कोई भी नहीं लिखता।
किंचित तब्दीली केेे साथ एक शे’रः
हम ही न कह सके अगर किस्सा-ए-गम, कहेगा कौन?’
मुझे आशा है कि असुविधा के इस अंक के ज़रिए शिवेन्द्र के लेखन को, उनकी भाव-भूमि को समझने में मदद मिलेगी।
                                            अनवर सुहैल  

मृत नहीं थे अक्षर

चले गये तुम...
शायद जाना ही था तुम्हें,
संभव है तुमने भी सोचा व गुना हो 
जाने के बारे में, 
पर नहीं, तुम्हारे पास समय ही कहां था
सोचने व गुनने के लिए, 
खुद को जाने के बारे में.
संभव है सोचा हो, जाते हुए कुछ.
जाना और न जाना वैसे भी,
होता है अचानक और आकस्मिक.
सो तुम कैसे जान सकते थे..
जैविक क्रिया के बारे में, 
कि क्या होने वाला है?
और चले गये हो... 
हर उन चीजों व बातों की तरह
जिन्हें किसी न किसी दिन जाना ही होता है.
पर हमें तो कुछ भी पता नहीं था कि. 
क्या होता है जाना और नहीं जाना..
मुझे तो यह भी नहीं पता था कि
क्या फर्क होता है जाने न जाने के बीच.
अब समझने लगा हूं कि
सब कुछ चला जाता है 
जाने वाले के साथ. 
कुछ भी नहीं रह जाता शेष.
केवल बचा रहता है आकाश,
बची रहती है पृथ्वी,
तारे भी घूमते रहते हैं अपने कक्ष में,
हर ओर छितराई रहती है हवा..
फिर भी दुनिया फसी रहती है 
जाने न जाने के चक्कर में.
जाने को जान लेना और 
जानने को जान लेना.... 
कुछ न कुछ तो फर्क होगा उनमें
जो जाना हुआ है या 
//6//
जो अजाना है, वही है सब कुछ.
किसे नहीं पता कि.. 
जाने वाला चला जाता है...
रह जाती हैं उससे जुड़ी यादें.
अब जो चाहे उसमें गोते लगाये या डूब जाये.
बन जाये कोई कविता या कहानी.
एक ऐसी कहानी जिसका न कोई अंत हो
और नही प्रारंभ.
पर क्या यादों को किया जा सकता है याद?
यादें तो बस यादें होती हैं,
जो जुड़ी होती हैं, संवेदनों से,
दिल की धड़कनों से,
यादें धर सकती है पटकथा का रूप,
और कुरेद सकती हैं दिल के संवेदनों को..
रूला सकती हैं तो हसा भी सकती हैं.
मेरे पास तो बचे हुए, वे स्वर भी नहीं जो
होते हैं नश्वर...
स्वर होंगे भी तो क्या हो जायेगा?
वे खुद तो बोलेंगे नही...ं
स्वर कभी नहीं बोलते, 
नही किसी को तोलते हैं.
वे डोलते रहते हैं मन के भीतर.
मन भी तो कोई चीज है,
उसकी झील में होते हैं जो खनिज 
उनमें नहीं होती सहभागिता
सहकार तो कŸाई नहीं.
जाने किन किन रसायनों से 
बना होता है मन,
कैसे करता है काम.
कैसे बांध देता है मन की गांठें
खोल देता है स्मृतियों के सारे दरवाजे,
जिससे आ सके ताजी बयार,
सहला सके तन को.
यही तो मन का खेल है,  
तन के खेलों से एकदम अलग.
कविता के बहाने, 
मैं याद करना चाह रहा हूं तुम्हें,
//7//
याद करना चाह रहा हूं तुम्हें, 
उन शब्दों के सहारे,
जिसे गढ़ती हैं संवेदनायें,
संवेदनायें ही तो 
बनाती हैं कविता को कविता, 
कवि नहीं होती कोई कविता,
पर कविता होती है कवि,
कवि में छिपी होती है कविता, 
कविता में ही कवि 
लगा रहा होता है गोते.
देखा जा सकता है 
कविता में कवि को.
उसके जीवन के क,ख,ग को
उसकी किकुड़ियायी छातियों को,
झुर्रियों वाले गालों को 
तथा उन हाथों को भी,
जिनसे बनती हैं मुठ्ठियां..
जिन्हें लहराया जाता है खुले आकाश में..
फिर कंठ से निकली हुई आवाज..
खुद ब खुद बदल जाती है इन्कलाब में...
यह जो इन्कलाब है... 
नहीं निकलता किसी झील में से
कवि खोदता रहे कोई झील..
झील में तो फसी होती हैं संवेदनायें..
कवि उसी झील में ढंूढता है खुद को,
पूछता है झील के किनारों से,
उसकी तलहटी से,
‘मैं कहां हूं’
तुम्हारे जाने को मैं जाना अगर मान भी लूं..
फिर तुझे कैसे ढूढूंगा यादों में?
यादों में नहीं मिलोगे तूं..
यादें तो वैसे भी बीती हुई बातें होती हैं.
समय की पर्तेंं चढ़ी होती हैं उस पर..
समय की पर्तों को छीलना या 
हटाना आसान नहीं.
यादों के संग पर्तें जैविक हो जाती हैं,
यादों को फिर से सृजित करना..
//8//
उसे रचना, गढ़ना और फिर 
उसे ताजा बना देना..
संभव भी नहीं जान पड़ता..
मेरी कविता में तुम्हारे शब्द चित्र 
बन पायंगे कि नहीं, मैं नहीं जानता.
कविता के बहाने बनना चाहता हूं, 
मैं तुम्हारे माफिक
तुम्हारे छोड़े गये स्वरों को चाहता हूं 
गुनगुनाना, गूंथना चाहता हूं
उन्हें एक लड़ी में,
पर तुम तो नहीं जानते थे गुनगुनाना,
सीधी राह के मुसाफिर थे तुम..
अक्षरों से बहुत दूर..
हकीकतों के आस पास..
तुम्हारे पास नहीं थी, अक्षरों की दुनिया
फिर भी मृत नहीं थे अक्षर.
वे जीवित थे तुम्हारे पास..
इस लिए कि पुरखों को सम्हालने व 
अक्षरों को बचाये रखने की,
कला थी तुम्हारे पास.









   बीते दिनों में

लौटना चाह रहा हूं मैं,
उन दिनों में, उन समयों में
जिसे जिया था मैंने तुम्हारे साथ.
मैं चाहता हूं उस समय पर कुछ लिखना,
पर कैसे लिखूंगा उस पर.
 //9//
समय कागज तो होता नहीं,
जिस पर उड़ेला जा सके अक्षर ज्ञान.
किसे नही पता कि 
पत्थर नहीं होता समय.
जिस पर छेनियों से भी लिखा जा सके कुछ,
पहले की तरह.
जब नहीं थी लिपियां.. 
तब लिखा जाता था शैल खण्डों पर..
गढ़ी जाती थीं किसिम की आकृतियां ..
आकृतियां ही होती थीं लिपियां,
वे संवाद करती थीं.
बताती थीं समय के बारे में.
कागज पर टांके गये अक्षरों की तरह,
उस पर उतारा जाता था समय को. 
कागज को तो जलाया जा सकता है,
फाड़ा जा सकता है,
पर पत्थरों पर खुदे अक्षर,  
नहीं मिटाये जा सकते.
दिक्कत यह नहीं है कि
कितनी दूरी है कागज और पत्थर के बीच,
दिक्कत है कि लिखा जाये तो.. 
क्या लिखा जाय?
सभी लिखा हुआ खिलखिलाता नहीं,
बाहें नहीं फुलाता,
नही रोता है,
उसे तो नहीं बोला जा सकता शोक गाथा भी,
वैसे वह होता है कुछ न कुछ,
पर ऐसा भी नहीं होता कि
उसे बाजार उठा ले अपनी गोदी में.
चूमने चाटने लगे उसे.
बाजार बिछ जाये उसके कदमों पर,
जैसे अंधेरों से निकली कोई रौशनी हो...
जगमगा जाये जिससे सारी दुनिया.
या दुनिया का कोई हिस्सा ही.
वह हिस्सा डूबा हुआ हो भूख में,
विस्थापन में और कानून के मकड़ जालों में.
जहां समानता ढकी हुई हो,
//10//
बारूद की पर्तों में और मनुष्यता...
मनुष्यता तो जैसे 
आग में पैदा होने वाली कोई चीज हो.
तुम्हारे जाने के बाद लगता है मुझे कि
नहीं लौटा जा सकता उन समयों में...
जिसे जिया था हम दोनों ने एक साथ
बाप बेटे की तरह, 
दोस्त व हितैषी की तरह
भाई की तरह... 









अस्पताल का पहला दिन

डूब जाते हैं हम तारीखों के खेल में,
तारीखों से जुड़े सŸाा कौतुकों में.
उन कौतुकों में भी जो हमें बना देते हैं,
अभ्यर्थी और ढकेल देते हैं व्यवस्था की गुफा में.
जिसमें थिरक रहा होता है विज्ञान का कौतुक..
गुफायें तो पहले हुआ करती थीं,
जिनमें रहा करते थे हमारे पुरखे.
वैसे हम आज भी किसी न किसी 
गुफा के ही रहवासी हैं.
गुफा किसी भी आकार और प्रकार की हो सकती है.
कानूनी गुफाओं में रहना और निवसना तो हम
सीख चुके हैं अंग्रेजों के जमाने से.
इससे इतर हमें रास आता है,
धर्म की गुफाओं में बैठ कर माला फेरना,
और शंखध्वनि पर मंत्रोच्चार करना.
घर में भी होती हैं गुफायें..
//11//
घर में घर की तरह,
ऐसी ही गुफाओं में, 
हम ढंूढ रहे हैं चावल के दानों को.
मॉज रहे हैं करियायी डेकचियां.
पोत रहे हैं गोबर और माटी से,
जले हुए चूल्हे.
लगा था मुझे अस्पताल भी किसी गुफा की तरह..
उसमें फड़ फडाते नोट डरा रहे थे मुझे.. 
मुझे याद है इमरजेन्सी का वह कक्ष..
भला कैसे भूल सकता हूं उस कक्ष को मैं..
उन डाक्टरों को जो लगातार पूछे जा रहे थे...
चोट लगी तो कैसे?
क्या मोटर साइकिल से गिरने पर.. 
टूट सकती है रीढ़ की हड्डी?
वह भी मोटर साइकिल स्टार्ट करते समय
क्या तमाशा है?
अस्पताल की वह गुफा चीख पड़ी थी..
गुफा के जानकार गुम थे अपने अस्पताली ज्ञान में.
इमरजेन्सी का वह कक्ष अचानक तब्दील हो गया था
डरावनी बाजारू गुफा में..
जहां ढूढे जा रहे थे विज्ञान के सूत्र..
सूत्र तो वहां नहीं दिख रहे थे.. 
दिख रहे थे डाक्टर.,,
उनके चेहरे, जो स्थिर और शान्त थे.
और कक्ष अपने आप गरमाया हुआ था,
पर्ची लिखी जा रही थी,
उस पर उड़ेला जा रहा था विज्ञान का ज्ञान..
और वह मरीज जो मेरा उŸाराधिकारी था..
जो मेरा पुत्र था.. 
जो मेरे होने न होने का..
प्रमाण था..
चोट से कराह रहा था...
हिल नहीं सकता था वह .. 
नही फैला सकता था अपनी टांगे
सिर्फ देख व सुन सकता था..
और वह देख रहा था कि 
वह अस्पताल में है..
//12//
उसे पता नहीं था कि 
उसके पैर क्यों नहीं कर रहे काम?
दिमाग तो कर रहा था काम फिर 
पैरों को क्या हुआ..
दिमाग ही तो चलाता है पूरी देह को
पैर भी तो देह का हिस्सा है
डाक्टरों को पता था कि 
जांच से ही पता चला सकता है
कारणों के बारे में..
मैं देख रहा था कि डिम्पू 
तब्दील हो चुका था दवा कंपनियों की प्रयोगशाला में
किसिम किसिम की दवाइयां.. 
उसके पेट में डाली जायंगी
जांचें भी होगी.
खून की, पाखाने की, पेशाब की,
प्रयोग दर प्रयोग..
मैं क्या कर सकता हूं ऐसे में,
मेरा उŸाराधिकारी अस्पताल के बेड पर था.
कराहता हांफता..
मैं फसा हुआ था.. 
क्या होगा और क्या नहीं के वृŸा में..
जिसमें नहीं थी कोई त्रिज्या..
जीवा तो कŸाई नहीं.
रात गुजर रही थी.
डिम्पू का दर्द कम होने लगा था..
फिर भी उसकी ऑखों में तैरने वाले सपने गायब थे.
उनमें खालीपन था, ऑसुओं में तैरता हुआ
ऑसुओं में छिपी बातें तो वैसे भी नहीं दिखतीं,
वहां दिखता है, घुप्प अंधेरा..
मैं अंधरों में फसा हुआ.. 
इधर से उधर डोल रहा था..
भला कैसे भूल सकता हूं ईमरजेन्सी का वह वार्ड
जहां हर ओर कराह रहे थे मरीज..
उनके अगल बगल मडरा रहे थे..
उन्हें संभालने वाले..
वैसे भी अस्पताल अस्पताल होता है
उसके अपने रिवाज होते हैं..
//13//
डाक्टरों की पसरी होती है गंभीरतायें..
उनकी गंभीरताओं में छलकता है ज्ञान
एक भयानक किस्म की खामोशी..
हम भी उसी खामोशी के साथ
डिम्पू के अगल बगल डोल रहे थे.
देख रहे थे, समय
उसकी चाल देखते हुए
बन गये थे समय..
समय तो समय होता है
वहां नहीं होता असमय.. 
होता है सिर्फ समय का चक्र
चक्र के भीतर होती हैं खाइयां..  
और हम धंसते जा रहे थे भयानक खाइयों में.
खाइयों में किसिम किसिम की, 
पसरी होती है सूचनायें.
वह भी अस्पष्ट और भ्रामक..
अपठनीय और कुरूप..
जाने क्या होगा डिम्पू का?
क्या वह भी बन गया है
समय, समय के भीतर
हम लोगों की तरह
हो सकेगा खड़ा और चल सकेगा दो कदम.
अपने पैरों के सहारे..
समय के साथ रोते या मुस्कुराते हुए..
किसे नहीं पता कि समय के साथ चलने के लिए
पैरों को मजबूती से जमाना होता है धरती पर..
हवा में ही नही, समय पर भी तानना होता है घूंसे
क्या डिम्पू तान सकेगा घंूसे समय की पीठ पर?
पर समय को तो पीठ होती ही नहीं,
वह अभिशप्त होता है अतीत बनने के लिए..
और अतीत तो सिर्फ व्यतीत का
हिस्सा होता है विभाजित और खंडित.
किस्सा होता है अनगढ़ कथानकों का..
जिनमें कथा तो होती है पर नहीं होते,
समय के साथ टकरा सकने वाले कथा पात्र.
घटनायें भी औंघी पड़ी होती हैं, चोटें खा कर
पर रहती हैं जीवित.
//14//
यादों व स्मृतियों के सहारे,
और स्मृतियां तो
स्मरण और मरण की उत्पाद होती है.  

समय से मुठभेड़ 

सिकुड़ता जा रहा था मैं
अस्पताल में लगातार.
अस्पताल नहीं सिकुड़ता,
वह किकुड़ियाता भी नहीं,
लगातार बढ़ता है और बढ़ता जाता है,
विज्ञान के बाजारू फैलावों के साथ.
अस्पताल के रूतबे के हिसाब से 
डिम्पू की दवाइयां भी बढ़ रही थीं.
उन्हें बढ़ना ही था.... 
पर कुछ चीजें वहां भी ऐसी थीं 
जो सिकुड़ रही थीं मेरी तरह.
सिकुड़ रही थीं मरीजों की इच्छायें.
उनके जीने की कामनायें,
और वह उत्साह भी सिकुड़ रहा था, 
जिसके लिए जाना जाना जाता है आदमी.
आदमी तो महज आदमी होता है पर....
अस्पताल में हो जाता है बहुत कुछ,
उसे वहां हो जाना होता है,
दवाइयां, दवाइयों की बोतलें और डाक्टरों की पर्चीं..
इसके अलावा भी उसे होना होता है..
रुपया, तब्दील होना होता है उसे,
दवाइयों के दाम में,
बन जाना होता है कंपनियों का वफादार,
जो बनाती हैं किसिम किसिम की दवाइयां.
बनना होता है उसे बाजार का हिस्सा,
जिस बाजार से करता है वह नफरत.
बाजार ही क्यों..
उसे तो उन चेहरों की भी सूची बनानी होती है,
जो आ सकते हैं उसके काम,
उसकी पीठ पर छाप सकते हैं,
//15//
रुपयों की कार्बन लिपि या 
उसे ही बना सकते हैं मुद्रा. 
जिसमें छिपी होती है खरीदने की ताकत.
क्या करेगा कोई जब समय ही बन जाये शत्रु.
समय से टकराने के लिए
अपना मित्र तो बनाना होगा ही उन लोगों को.
जो लतियाते रहते हैं खुद को गढ़ने के लिए सभी को.
राजनीति हो या समाजनीति, 
जो होते है माहिर समय को मित्र बनाने में, 
समय करता है उन्हें सलाम..
जो लतिया सकते हैं समय को.
पर मेरे लिए समय तो.. 
किसी ड्रेगन की तरह था
जो हर क्षण नोच रहा था, ताने मार रहा था..
जब समय को मित्र बनाना था.
तब तो तूने बना लिया शत्रु उसे.
कुछ निर्जीव सुभाषितों के जरिए,
तूने काट लिए खुद के हाथ पैर.
‘यह करना है,’ ‘यह नहीं करना है’,
बद्जात व्यवस्था से लड़ना है...
तो लड़ते क्यों नहीं व्यवस्था से 
अस्पताल भी तो व्यवस्था है...
तूने क्या सोचा था अरस्तू मूरख था
जिसने रुपये को उतारा बाजार में..
क्या समय से टकराया जा सकता है इमानदारी से, 
चला जा सकता है दो कदम धरती पर
क्या इलाज करा सकते हो अपनों का, 
या पढा़ सकते हो वंशजों को..... 
आखिर क्या सोचा था तूंने? 

      

Monday, November 23, 2015

दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश

दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश

    






 कुछ अपनी बातें...
 दूसरी  आजादी् का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे हैं। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे।
आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र श्मीरजापुर् जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो श्सोनभद्र् एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वही दूसरी आजादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के ५७प्रतिशत  भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और प्रति व्यक्ति भूमिधारिता एक बीघे के कुछ भाग तक सीमित है। खाद्यान्न की उपलब्धता पांच सौ ग्राम से भी कम है। वन विभाग की जमीन्दाराना गतिविधियों के दंश और प्रताडना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ड्ढठुर हो तो अचरज की बात नहीं।
सोनभद्र में आपात काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मैं गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मैंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सुमिदिनी जिस तरह से राज व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात काल के दौर में जब दलित साहित्य का कहीं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन प्रबन्धन के खिलाफ संघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा श्हरियल की लकड़ी्य उपन्यास की नायिका है उसके संघर्षों को भी उल्ड्ढिलखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन से टकराती है फलस्वरूप प्रबन्धन उसे जेल भिजवा देता है।
मैं आभारी हूं पिलग्रिम्स प्रकाशन का तथा भाई गोपाल ठाकुर एवं सुरेश जायसवाल जी का जिनके सहयोग से २००८ में श्डफली बजाये जा्य कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ तथा तीसरा  रास्ता् उपन्यास भी।
तीसरा  रास्ता् उपन्यास के माध्यम से देश में जड़ जमाये एन. जी. ओ. की कार्य संस्कृति और परणति को देखने, समझने का प्रयास किया गया है। दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें तो कम से कम आजाद और जनतांत्रिक भारत में वर्ण, स्त्री  और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल हैं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे हैं। हालांकि यह सच है कि इन सवालों से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्टड्ढ (जो खुद को साबित कर सकें) लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलोच्य विषय हैं तो आलोचना भी, वही कथाकार हैं तो कथानक भी, वही पाठ है तो पाठ्य विषय भी। वे ही अखंडित हैं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दूसरा पाठ रचते हैं तो दूसरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी हैं। वे साहित्य का द्वन्द है तो अन्तर्द्वन्द भी। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक हैं, ब्रह्म हैं तथा साहित्य के प्रजनन श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका बाह्य रूप संसद की तरह है, उसमें हासिए पर पड़ा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शोषित, यातनाग्रस्त, प्रताडि़त वर्ग समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग से। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना होगी और वह यथार्थ कल्पना का यथार्थ होगा शिल्प और भाषा से सजा-संवरा चूमने चाटने लायक।
वैसे आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, वैश्ड्ढवीकरण, अणुबम संस्कृति सामाजिक वानिकी को चाहे जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप से प्रकट हुई हैकृवह है अपनी पीठ ठोंकने की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध हैं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरों की तलाश में है। एक बार फिर याद दिलाना चाहूंगा कि हम वर्ण (धर्म, जाति, गोत्र) सम्पत्ति व पूंजी  के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सोच रहे हैं और खुद को परिवर्तित होने से बचा रहे हैं। यदि कुछ कर भी रहे हैं तो आंख मारने जैसा ही। मैं साफ तौर से कहना चाहूंगा कि उपन्यास और कहानियों के लिए विषय का चुनाव मेरे लिए जटिल मामला है, कदाचित यह जटिल न भी होता, यदि मैं नागर समाज का होता। गंवई आदमी होने के नाते मेरी सोच भी गंवई है। फलस्वरूप मैं सोच नहीं पाता कि एक सक्रिय ी प्रजनन के नैसर्गिक गुण से अपने को मुक्त कर लें। दैहिक सम्बन्धों के लिये मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को धोखों और वादाखिलाफी से गढ़े।
सम्पत्ति, वर्ण और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत ी मुझे प्रभावित करती है और ऐसी ियां ही कथा पात्री हैं। मेरे लिए अपने मित्रतापूर्ण सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए उसके सुखों, दुखों को भोगते हुए तथा अपने सहभागिता पूर्ण सम्बन्धों को प्रमाणित करते हुए कि वे वादा खिलाफ और धोखेबाज नहीं है। देह उनके लिए सगुण समाधि है, न कि निर्गुण मोक्ष। सम्पत्ति के सवाल पर मैं आज भी भूमि प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हों, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। हरियल की लकड़ी, सहपुरवा, तीसरा रास्ता और मेरा यह चौथा उपन्यास श्दूसरी आजादी्य धोखे पूर्ण भूमि-प्रबन्धन पर सवाल उठाते हैं।
मैं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आजादी में कुछ इसी तरह की बहस से आप रूबरू होंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा, यदि आप निराश होते हैं तो मुझे क्षमा करें। छोटन के अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
श्दूसरी आजादी्य उपन्यास की सगुण या निर्गुण आलोचना के लिए आपकी प्रतिक्षा में-

रामनाथ शिवेन्द्र           
अक्षर घर, पूरब मोहाल रार्बट्सगंज (सोनभद्र)
मोबाइल...07376900866


 पहला अंश ----                    टूटता इतिहास

जो होना था, हो चुका था, इस होने और हो चुकने के बीच रणविजय, उलझे हुए थे। वे समझ पाने में असमर्थ थे कि उन्हें अपनों से अपेक्षा रखनी चाहिए कि नहीं, फिर उनका गुनाह क्या था, ऐसी विषम स्थिति की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं किया थाकृश्ऐसा भी हो सकता है।्य
एक दिन वे अकेले हो जायेंगे, अपने में डूबा हुआ, बाहर निकलने के लिए किसी गलियारे की तलाश करता, लेकिन बाहर निकल कर जाना कहां? हर ओर धुआं ही धुआं, आग ही आग, मार-काट, खून-खराबा। वे लॉन में बैठे हुए थेकृसुबह की नरम धूप भी उन्हें जला रही थी, जैसे आग में से तप कर आ रही हो। सामने दीख रहे फूलों की सुगन्ध का कहीं पता नहीं था, वहां धमाके थे, बमों की गर्जनायें थीं। नारियलों के पौधे हिलते तो वे सिहर उठते, भीतर से सवाल उठताकृश्क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
उन्हें अपने मनुष्य होने तथा मनुष्य बने रह सकने पर सन्देह हुआ। उन्होंने अपने हाथों को देखा, उसे इधर-उधर झटका दिया, उनमें पहले वाली ही ऊर्जा थी, वे फावड़ा, कुल्हाड़ी कुछ भी चला सकते थे, सामने से आ रहे बाघों को मार सकते थे तथा एक ही हाथ से रायफल दाग सकते थे। हाथ तो ठीक ठाक है, पूरी तरह दुरुस्त और स्वस्थ।
वे फौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए, लान में टहलने लगे, एक तरफ से दूसरी तरफ तक, अगल-बगल देख कर उन्होंने दौडना शुरू किया, गोया वे टहल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, विपरीत परिस्थितियों में आगे या पीछे भाग कर खुद को बचा सकते हैं। दौड़ते हुए ही उन्होंने महल देखा, महल सामने पूरी लम्बाई-चौड़ाई में खड़ा था, उन्हें घूरता हुआ। उसके बुर्ज, उसकी छतें, सारी चीजें उन्हें घूरती हुई दिख रही थीं, जैसे वे भी पूछ रही हों, क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
रणविजय उत्तरहीन थे। वही रणविजय... जो स्वतंत्रता संग्राम के बारे में सोचा करते थे। राजनीति के आचरण के बारे में तर्क किया करते थे। राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विषयों के बारे में मित्रों से बहसें किया करते थेकृगान्धी के अहिंसा के पक्ष में किसिम-किसिम के भारतीय मानस की चर्चा किया करते थे तथा उन रास्तों का विरोध किया करते थे, जो स्वतंत्रता हासिल करने के लिये युद्ध व हिंसा की पैरवी करते थे। हजारों साल की भारतीय गुलामी पर उनके तर्क विस्मयकारी थे, उनका मानना था कि भारतीय मन पूरी तरह मोह और माया से मुक्त आध्यात्मिक रहा है, वहां भौतिकता व इहलौकिता का रंच मात्र प्रभाव नहीं, जैसा कि अरबियों व ब्रिटिशियर्सों का हुआ करता है। मोह ग्रस्तता, कुंठित स्वार्थ तथा घृणित इहलौकिकता से पूर्ण। सारा कुछ अपने लिए तथा अपने को समाज पर आरोपित करता हुआ, सामाजिक होने तथा सामाजिकता का विभत्स प्रदर्शन। वही रणविजय निरुत्तर थे, वे महल की तरफ न देख सके, उन्होंने आंखें फेर लीं तथा लॉन के फूलों पर केन्द्रित कर लिया।
उनकी आंखें फूलों की तरफ केन्द्रित न रह सकीं, उन्हें फिर महल की दीवारों की तरफ लौटना पड़ा, उन्हें जान पड़ा कि महल कोई साधारण पनाहगाह नहीं, यहां विशेष किस्म के इतिहास का निर्माण होता है। यह किसी उत्पादन इकाई की तरह है, यहां सत्ता की नस्लें पैदा होती हैं, नस्लों की पहले कल्पना की जाती है, फिर उसे गढने व रचने का काम शुरू होता है। यहां युद्ध की भूमिका ही नहीं, उसके एकतरफा लाभकारी गुणों को रेखांकित किया जाता है। सेनायें इन्हीं महलों के इरादों पर अपना नाच नाचती हैं, उनका नृत्य खून से सने जमीन पर होता है, जहां सिर अलग ढंग से तथा धड़ अलग ढंग से अपनी युद्धगत भागीदारी की पहचान कराते हैं। एक बारगी उन्हें झटका लगा, वे आहत हुए फिर उन्हें लगा कि कोई अदृश्य ताकत है, जो उनका जीवन बहुत ही निर्ममता से छीन रही है पर वहां कोई ऐसी ताकत नहीं थी, जो उन्हें लान के फूलों, पौधों या पीछे मुस्करा रहे महल की तरह दीखती। पर वे तो वर्तमान जो भविष्य बना हुआ था, उसकी निर्मम कल्पना में फंसे हुए थे। उनके सामने कल जो बीत चुका था, एक पुरानी कल्पनाक--जिस पर कालिख पोती जा चुकी थी, और कल जो आने वाला था, वह उन्हें आतंकित कर रहा था श्कि तुम्हारा भविष्य गहरे कुंए में जा गिरा है और तुम एक अंधे भविष्य के आदमी हो। जहां सूरज उगता है, चांद खिलता है, मौसम हंसता-गुनगुनाता है, रिमझिम बदरियां दिल-दिमाग को बसन्ती बनाती है, फिर भी उन्हें तुम न देख सकते हो, न महसूस कर सकते हो।्य फिर तो उन्हें लगा कि वे अपनी आंखें खो चुके हैं, उन्हें कुछ नहीं दिख रहा, तभी किसी मुलायम हवा ने उन्हें सहलाया...
वे ठीक-ठाक ही नहीं, इतना ठीक-ठाक थे कि अपना होना बचा सकते थे तथा वह सब तौर-तरीका आजमा सकते थे, जो ठीक-ठाक होने के लिए समय और समाज द्वारा प्रस्तावित थे। तरीके दो थे या तो भागो या आगे बढ़ो। दोनों तरीके युद्धकालीन थे। भागने वाले तरीके में जमीन पर लेट जाना भी था। वे क्या करें, भागें और जमीन पर लेट कर इच्छा मृत्यु का प्रयास करें या आगे बढ़ें, ...और हत्या, प्रति हत्या करें। फिर विजेता के गौरव से आत्ममुग्ध हों। वे आत्म-लीन हो उठे, जैसे उनके मन के गहरे में विषम स्थितियों के सापेक्ष समाधान हों। पर वहां भी तूफान थे। तूफानों में तर्क थे, एक दूसरे की विपरीतता को प्रभावित करते...।
अचानक उन्हें लगा कि वे विजेता नहीं बनना चाहते, वे हिंसा, प्रतिहिंसा से अपना भविष्य संवारना नहीं चाहते। किसी सन्त की तरह उन्होंने विचारा---उन्हें किसी का जीवन लेने का क्या अधिकार?
श्लेकिन यदि उनका अधिकार छीना गया हो फिर्य
फिर तो... वे उलझ गये, अधिकार का मामला जटिल था। इतना जटिल, उन्होंने उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया इस मुद्दे पर उनके ज्ञात दार्शनिकों ने भी उनकी मदद नहीं की। भारतीय दार्शनिक तो किसी अधिकार की कल्पना तक नहीं करते... ले देकर उनके सामने महाभारत का उदाहरण था...श्सूई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य, दुर्योधन का यह दुराग्रही फैसला महाविनाशकारी युद्ध को आमंत्रित करता हैकृवे कांप उठे, उनके साथ कोई नहीं, यदि साथ में कृष्ण होते, फिर वे सोचते... नहीं! महाभारत महज एक कल्पना हैकृसंपत्ति के अधिकार के लिए युद्ध की अनिवार्यता को प्रमाणित करता, पर मन के गहरे में घुस चुके प्रबोधन आसानी से पिन्ड नहीं छोड़ते, वे धुआं-धुआं हो उठे।
श्सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा्य दुर्योधन का कल्पित चेहरा उनके सामने जीवन्त हो उठा और वह चेहरा भी जब वह सारा कुछ हार चुका होता है, अपने सभी भाईयों को घृणित अभिमान के युद्ध में गवां चुका होता है... उन्हें लगा कि वह युद्ध एक ऐसा विवादास्पद युद्ध था, जिसमें सभी पराजित होते हैं, कृष्ण अपनी कूटनीति में हारते हैं और दुर्योधन को ऐतिहासिक सन्तुलन के लिए राजी नहीं करा पाते। युधिष्ठिर अपने सच से पराजित होते हैं, अर्जुन, कर्ण से हारते हैं तथा कृष्ण जैसे देव रूप से अपना रथ हंकवाते हैं। कुन्ती अपनी गोपनीय सच को छिपाने में इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे कर्ण को पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए सहमत करने का प्रयास करना पड़ता है, तो उस युद्ध का कोई विजेता नहीं, सभी पराजित होते हैं...।
श्नहीं! नहीं, उन्हें किसी भी युद्ध को आमंत्रित नहीं करना्य उन्हें जय-पराजय दोनों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं... फिर क्या होगा, श्भइया राजा ने तो उन्हें महल से निर्वासित होने का आदेश दे दिया है्य भइया राजा के आदेश का अनुपालन या सबल प्रतिरोध, आखिर क्या करना है उन्हें?
श्आदेश का अनुपालन ही ठीक होगा्य
अचानक रणविजय ने समय के साथ हस्तक्षेप किये जा सकने वाले विचारों में से एक का चुनाव किया, यह उनके लिए खुशी प्रदान करने वाला क्षण था। ऐसा इसलिए कि उन्होंने आदेश का अनुपालन ही अब तक सीखा था, बड़ी अम्मा रानी यही सिखाया करती थीं। लेकिन उन्हें आदेश के अनुपालन के बाबत उचित अनुचित का ख्याल नहीं करना चाहिये विवेक भी तो कुछ होता है इसके आगे रणविजय विचारों के अंधेरे में कहीं खो गये...
एक उलझन भरी स्थिति, ऐसी स्थिति जो दीखती स्पष्ट, पर वह दीखने का आभास ही होती।
उनकी खुशी क्षण-भंगुर थी, जैसे आई वैसे लौट गई।
रणविजय को अपना जीवन खुरचने लगा, जो उन्होंने गांधी के चरणों पर चढ़ा दिया था...गांधी के दिशा निर्देशों से कौन सी शिक्षा उन्होंने हसिल किया है... श्सविनय अवज्ञा् यह है कि नहीं वे धरना और सत्याग्रह करते रहे कि नहीं, ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा करते रहे हैं कि नहीं।
श्हां ऐसा तो है्य फिर तो भइया राजा के सामने उन्हें हाजिर होना होगा् आखिर उनका अपराध क्या है? यह तो बतायें भइया राजा्----
रणविजय ने पारिवारिक संस्कारों से बाहर होकर समय की आवश्यकतानुसार कुछ करने के लिए सोचा कि चुपचाप होकर निर्वासित हो जाना, अपना अधिकार छोड़ देना, कायरता होगी। यह महल, महल के इर्द-गिर्द वाली सारी संपदा पर उनका भी अधिकार है, केवल भइया राजा का ही नहीं। फिर तो बंटवारा कराना होगा। 
श्बंटवारा्य के बारे में सोचते गुनते ही रणविजय का मस्तिष्क  तनाव से भर गया। एक बंटवारा तो उन्होंने देखा हैकृखून के सैलाबों और लाशों से पटी धरती का, भारत और पाकिस्तान का। एक देश को दो हिस्सों में बंटता हुआ। बंटा भी क्या, केवल धड़, सिर तो अपने-अपने स्थान पर बने रह गये, सिरों ने ही अपने अपने हिस्से की धरती का चुनाव किया था। पहली बार उन्हें लगा कि बंटवारे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। समाज का अपना कोई सिर नहीं होता... समाज तो एक अद्भुत गठबन्धन होता है, जो गिने-चुने सिरों के नेतृत्व में चला करता है। तो शायद भारत न बंटा होता, यदि वह कुछ चुनिन्दा सिरों का नेतृत्व न स्वीकारता। बंटवारे से हुआ क्या? क्या संस्कृति और सभ्यता की प्राचीन समरसता खंडित नहीं हुई?
तो महल का बंटवारा क्या सभ्यता और संस्कृति का बंटवारा नहीं होगा? उस खून का बंटवारा नहीं होगा, जो उनके और भइया राजा की नसों में धारा-प्रवाह दौड़ रहा है। वही होगा...
रणविजय अपनी सोच कुछ आगे बढ़ा पाते कि एक छोटी सी चिडिया उड़ती हुई उनके सामने से निकली, जो उनकी आंखों के इतना करीब से गुजरी कि उन्हें सिर को झटका देना पड़ा। चिडिया उनका ध्यान तोड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी। वह वहां आश्वस्त थी और चीं चीं कर रही थी। यह उसकी अपनी भाषा थी, जिसमें उसका सुख-दुख था या गुलाब के खूबसूरत फूलों की प्रशंसा, रणविजय चिडिया के अस्तित्व के बारे में सोचते हुए भावुक हो उठे। तथा चिडिया का चहचहाना सुनते रहे तथा यह भी निश्चित करते रहे कि वे चिडिया नहीं हो सकते, उसकी तरह चहचहाना तो कत्तई नहीं।
सुबह होते ही वे लॉन की तरफ निकल आये थे, फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रह गया था कि उनके साथ कोई दूसरा भी है। उनके साथ पढने वाली लडकी ने जिद्द किया था कि वह गांव देखना चाहती है। भारत तो गांवों का देश है, गांव देखना भारत को देखना होगा। उसने मजबूत तर्क दिया था। रणविजय जानते थे कि भारत के गांव दीखते सरल व सीधे हैं, पर होते काफी जटिल हैं। हालांकि लडकी भारत की ही थी। एक दो बार ही अपने डैड के साथ इंग्लैंड जा पाई थी तथा दो भिन्न-भिन्न तहजीबों में पल-बढ़ रही थी, ऐसी सूरत में वह मानसिक रूप से काफी परिपक्व भी होने लगी थी। कभी-कभी वह उन उत्तरों की चाहना करने लगती, जो उसके डैड या मम्मी ही दे पाते। पर वह पूछती नहीं, उसे उत्तरों को सवाल में बदलना बेतुका और अनावश्यक जान पड़ता। इसीलिये वह डैड और मम्मी के रिश्तों को स्वीकार कर चलती। मम्मी के साथ मम्मी की तरह, डैड के साथ डैड की तरह रहना उसकी आदत बन गई थी।
रणविजय का महल गांव में था, पर गांव महल में नहीं था। वहां दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिकता थी। गांव महल की संस्कृति ही नहीं हवा से भी काफी दूर था। महल की शान्ति, महल का सुख, उसका वैभव, हालांकि गांवों की सांसों पर ही टिका था। फिर भी ऐसा नहीं था कि महल की दीवारों पर गांवों की गरीबी और यातना के चकत्ते उभरते। गांवों की भूख महल में दाखिल हो कर रोटी का टुकड़ा पा जाती या कोई बीमारी अपना दवा इलाज करा पाती, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। रणविजय की मित्र लडकी महल में आकर अचरज पीने लगी थी क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन उसे मालूम था कि महल राजाओं के होते हैं, गरीबों के नहीं। गरीबों के बारे में उसे सुनी-सुनाई बातें मालूम थीं, महल में आकर वह कहीं खो गई थी।
रणविजय की मित्र लडकी सुबह देर से उठती, दैनिक क्रियायें निपटाती, फिर अखबार पढ़ती। उसने देखा कि रणविजय महल में नहीं हैं। किसी नौकर ने बताया कि छोटे भइया लॉन में बैठे हैं, फिर लडकी लॉन की तरफ निकल आई। लॉन की तरफ आते समय भाभी रानी मिली थीं, जो एक आधुनिक महिला थीं, गहनों से लदी, वे चलती तो छन-छन की आवाज होती। लडकी को अच्छा लगता। चेहरे पर कुटिलता नहीं थी, होंठ हमेशा मुस्कराहट पीते रहते, कुल मिलाकर लडकी भाभी रानी से प्रभावित थी, हालांकि उसकी मम्मी भी एक प्रभावशाली महिला थीं पर उनके चेहरे से सादगी फूटती और भाभी रानी के चेहरे पर हुकूमत नाचती रहती, वैभव थिरकता रहता श्उसे भी भाभी रानी की तरह ही महल में रहना होगा, सोचते- सोचते वह लॉन तक आ गई...
श्यहां क्या हो रहा है भाई! किसी कविता की रचना तो नहीं की जा रही?्य उसने पूछा और रणविजय के पास बैठ गई।
श्कुछ नहीं, सोच रहा था कि दिल्ली निकल लिया जाय, छोटा सा उत्तर दिया रणविजय ने।
क्यों शिकार पर नहीं चलना क्या? पूछा लडकी ने।
श्नहीं सरकार ने पाबन्दी लगा दिया है्----रणविजय ने उससे कहा।
कैसी बातें करते हो, डैड ने बताया था कि राजाओं की सारी सुविधायें बहाल कर दी गई हैं, उनकी जमीनों एवं अन्य संपदाओं का बाजार दर के अनुसार मुआवजा मिलेगा। डैड तो बोल रहे थे कि जमीनदारियां व रियासतें छीनी नहीं गई हैं, बल्कि सुविधाजनक समझौते किये गये हैं ताकि अमन-चौन बना रहे...चलो आज शिकार पर चलते हैं...
श्नहीं, लिली नहीं, बच्चों की तरह जिद नहीं करते, भइया राजा ने भी मना किया हुआ है्। रण विजय ने कुछ उदास होकर कहा।
पर लिली तो जिद पर अड़ी थी, उसे शिकार पर निकलना ही था, उसके डैड अब शिकार पर नहीं जाते, उनके पास हथियार भी नहीं। दिल्ली से वह शिकार का रोमांच देखने के लिए ही आई थी। लिली रणविजय के पास से फुदकी और सीधे जा पहुंची भाभी के पास।
श्भाभी रानी, आपसे कुछ कहना है, कहते हुए लिली उनसे चिपक गई।
बोलो  क्या है् दुलार भर कर पूछा भाभी ने। उसने ठुनक कर कहाक--
हम  शिकार पर निकलना चाहते हैं, पर रणविजय नहीं जा रहे..
तुम  दोनों आपस में बातें कर लो, मैं बोलती हूं छोटे भइया को--
यह कहते हुए भाभी रानी लॉन तक आईं, उन्होंने रणविजय से बातें की, पर रणविजय तो खामोश बैठे रहे, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न पड़ रहा हो या जान बूझ कर सुनना ही न चाह रहे हो, पर...भाभी रानी तो उन्हें सुनाने के लिए ही आई थीं कि वे सुनें और लिली के साथ शिकार पर निकलें।
श्नहीं भाभी रानी! मुझे दिल्ली निकलना है और फिर शिकार का मूड भी नहीं, वैसे भी नई सरकार ने शिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, अब जंगल भी अपना नहीं है।
तो  क्या हुआ! हमारे पास तो सरकारी पास है, पिछले हफ्ते ही भइया राजा शिकार पर निकले थे।्य भाभी रानी ने समझाने और राजी करने की हद तक रणविजय को समझाया, पर रणविजय कहां समझने वाले थे, फिर भाभी रानी ने लिली को ही आश्वस्त किया...
श्जाने दो लिली, दुबारा आना, फिर हम भी निकलेंगे शिकार पर, लम्बा समय गुजर गया है शिकार पर गये हुए भाभी ने लिली को किसी बच्चे की तरह विषयान्तरित किया।
रणविजय का शिकार पर न निकलना, भाभी रानी के सन्देह को पक्ड्ढका कर गया। भाभी रानी देख रही थीं कि जबसे महाराज ने रणविजय को भला बुरा कहा है, तब से उनका चहकना बन्द है। उन्होंने खुद को अपने में समेट लिया है। लेकिन भाभी रानी यह नहीं जानती थी कि भइया राजा वास्तव में उन्हें महल से निर्वासित ही करना चाहते हैं, वे तो उसे सामान्य सी परिघटना ही मान रही थीं कि भाइयों में ऐसा होता रहता है, सामान्य अनुशासन के तहत। पर मामला इतना ही नहीं था, भले ही भाभी रानी को आगे क्या होगा? नहीं मालूम था। लेकिन उन्हें यह तो मालूम ही था कि भइया राजा ने लिली के बारे में ही रणविजय से कहा-सुना था।
लिली यानि उस अंग्रेज की लडकी, उसी दासी की पुत्री जिससे उस अंग्रेज ने भारतीय रीति-रिवाज के अनुसार विवाह रचाया था। भाभी रानी उस अंग्रेज के बारे में पहले से ही जानती थीं, उन्हें बड़ी अम्मा रानी ने बताया था कि वह अंग्रेज, तब एक बहुत बड़ा हाकिम था। उस समय हर ओर अंग्रेजों की हुकूमत थी। अंग्रेज हाकिम से महाराज की काफी पटरी थी, वह जब भी शिकार पर जाता, महाराज को साथ लिये रहता। वह महाराज को उनकी शक्ल सूरत देख कर राजा ही समझता, पर वे राजा नहीं थे।
अंग्रेज हाकिम इतना ताकतवर तथा प्रभावशाली था कि वह जिसे चाहता राजा बनवा देता, खास तौर से ऐसे लोगों का जो मुगलों के विरोध में थे। उसी अंग्रेज हाकिम ने भइया को भी राजा बनवा दिया। राजा बनवाने के पहले वह यहां आया था, उसे आमंत्रित किया गया था। बड़ी अम्मा रानी उस किस्सा को काफी हास्यास्पद अंदाज में बतातीं।
रामदयाल के पिता एक प्रभावशाली आदमी थे तथा मुगलों के यहां  वजारत का काम किया करते थे, यह सारा कुछ उन्हीं का किया कराया था। जब अंग्रेज हाकिम के यहां आया तथा उसका स्वागत सत्कार किया जा रहा था उस समय रामदयाल के पिता, हाकिम के साथ-साथ थे तथा यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाय।
गड़बड़ तो कुछ होना ही नहीं था, अंग्रेज हाकिम का जोरदार स्वागत सत्कार किया गया। रात में आदिवासी नृत्य आयोजित किया गया। दासी, जो तब दासी थी, बहुत बढिया नृत्य भी करती थी। वह आदिवासी गांवों की रहने वाली थी, मूल रूप से वह आदिवासी नहीं थी, पर आदिवासियों के साथ रहते रहते उन्हीं के संस्कारों में ढली हुई थी। आदिवासी औरतों ने उसे पकड़ लिया तथा इतना मजबूर किया कि उसे नाचना पड़ा। फिर तो उसने खूब खुल कर नृत्य भी किया...यह भूल कर कि वह नृत्य कर रही है। दरअसल उसका नृत्य काफी प्रभावशाली था, हालांकि आदिवासी नृत्य श्करमा्य एक समूह नृत्य होता है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों पंक्तिबद्ध होकर एक दूसरे का हाथ पकड़, थोड़ी सी गर्दन झुका कर मानो वे जमीन देख रहे हों, एक निश्चित गोलाई में ही थिरकते हैं। उनके थिरकने से पैरों की घुंघरु, हाथों के कंगन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मधुर स्वरों में बजने लगते हैं। घुंघरुओं का श्छुन-छना छन-छन्य इतना प्रभावकारी होता है कि किसी को भी प्रभावित कर सकता है। लिली की मां थी कि वह नृत्य में मगन थी थोड़ा सा नशे के सुरूर में थी, हालांकि दारू तो सभी नाचने वालियों ने भी पिया था। बिना दारू पिये, करमा नाचना मुश्किल है।
नृत्य देखने वाले भी दारू के नशे में डूबे थे, उन्हें हर तरफ चांद तारे दिख रहे थे, उनके दिल बरसात के रिम-झिम से भरे हुए थे। अंग्रेज हाकिम दारू पीने के बाद भी काफी संयत था तथा उसे मालूम था कि वह मेहमान ही नहीं, एक ऐसा हाकिम हैय जिसकी कलम राजा और प्रजा बनाया करती है। वैसे भी उसे संयत तो रहना ही था क्योंकि उसी को वहां सारे लोग देख रहे थे। उसे अपनी मर्यादा का पूरा ख्याल था, जिसे वह पूरी तरह बचाये हुए था।
अंग्रेज हाकिम नृत्य देखने में इतना मगन था कि उसके सामने की रखी दारू की गिलास खाली नहीं हुई। सामने जो खास तौर से फ्राई की गई मछली रखी गई थी जिसे बंगाल से मंगवाया गया था, वह प्लेट भीआसमान ही ताकती रही। रामदयाल के पिता ने एक दो बार अंग्रेज हाकिम से आग्रह भी किया जिसे वह विनम्रता से टाल गया। वह तो नृत्य की तरफ था, खास तौर से लिली की मां की तरफ। जो समूह में थी, उसके साथ दस और लड़कियां थीं, नौजवान आकर्षक देह वाली वैसे उनके चेहेरे के रंगों में फूलोंवाला आकर्षण नहीं था। फिर भी ऐसा नहीं था कि उनमें पुरुष मन उद्वेलित करने का चुम्बकत्व नहीं था। लोग बाग नृत्य की तरफ खिंचे हुए थे, अंग्रेज हाकिम था कि वह लिली की मां की तरफ एकटक था। उसे लगता कि वह अकेली नृत्य कर रही है और समूह है कि उसमें महज सहभागिता कर रहा है। उसके भारतीय ज्ञान ने उससे कहलवाया श्नृत्य की देवी्य।
श्करमा्य के गायन और नृत्य की संयुक्तता से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित था। कुछ देर के लिए तो वह भावुक हो उठा, फिर तो उसे लगा कि वह कुर्सी छोड़ चुका है और लिली की मां का हाथ पकड़ कर उसी की तरह थिरकने लगा है। पर उसने खुद को दृढ़ किया कि उसे आम लोगों के बीच अपनी निश्छल भावुकता को रोकनी चाहिए। वस्तुतरू उसने ऐसा किया भी और भूनी मछली के साथ एक घूंट दारू भी पिया। अब वह ठीक था तथा हाकिम होने के प्रभाव को बचाये हुए था। फिर भी मन के गहरे में लिली की मां तैरने लगी थी खजुराहों की नग्न मूर्तियों की तरह। अंग्रेज हाकिम ने खजुराहों की मूर्तियां देखा था, जो किसी भी कोमल मन की उदात्तता बहुत ही मीठे ढंग से खींच लिया करती है। आदिवासी नृत्य करने वाली लड़कियां धीरे-धीरे खजुराहों की मूर्तियों में परिवर्तित होने लगीं, फिर तो अंग्रेज हाकिम के लिए वहां रुकना कठिन हो गया। वह सीधे विश्राम कक्ष में जा पहुंचा...।
पीछे-पीछे रामदयाल के पिताजी थे, फिर जाने क्या हुआ कि अंग्रेज हाकिम उसी रात वहां से वापस हो लिया, इसे अपशगुन माना गया कि कहीं हाकिम नाराज तो नहीं हो गया? पर वह नाराज नहीं था। यह बात दूसरे दिन मालूम हुई, जब रामदयाल के पिता उससे मिले। फिर तो लिली की मां व उसके माता-पिता से उन्होंने बातें की कि अंग्रेज हाकिम शादी करना चाहता है और यह भी कि अब वह इंग्लैण्ड वापस नहीं लौटेगा।
वहां तो सभी अचरज में थे कि इतना बड़ा हाकिम करने क्याजा रहा है? भइया राजा भी अचरज में थे, पर जो होना था वह होने के लिए समय का अनुकूलन कर रहा था। लडकी के मां बाप तो बहुत खुश थे, उन्हें केवल चिन्ता इस बात की थी कि वे दुबारा अपनी लडकी से न मिल सकेंगे, पर उन्हें आश्वस्त किया गया कि ऐसा नहीं होगा तथा उनकी यह बात भी मान ली गई कि शादी आदिवासी परंपरा के अनुसार ही होगी।
अंग्रेज हाकिम ने वैसा ही किया भी तथा लडकी के मां बाप के लिए एक गांव भी खरीद दिया, जो पड़ोसी रियासत में पड़ता था। अंग्रेज हाकिम आदिवासियों की परंपरा से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था कि जब तक लिली की मां गर्भवती नहीं होगी, शादी नहीं हो सकती। वस्तुतरू वैसा ही हुआ, लिली की मां अंग्रेज हाकिम के साथ रहने लगीं, जब गर्भवती हुईं तभी शादी का आयोजन किया गया। पड़ोस की दोनों रियासतों ने मिल कर जंगल में ही जहां उसके मां बाप के लिए गांव खरीदा गया था, शादी का प्रबन्ध किया। अद्भुत आयोजन था। मयूर के पंखों और जंगली फूलों से सजा हुआ, आदिवासी लिबास में अंग्रेज हाकिम अद्भुत एवं आकर्षक लग रहा था, बड़ी अम्मा रानी भी शादी में शामिल थीं।
भाभी रानी ने लिली को आश्वस्त ही नहीं किया, वरन उसे अपने साथ लान से वापस महल में लौटा ले आईं। रणविजय भी भाभी रानी के साथ ही वापस हुए, पर उनका महल में दाखिल होना महल से निर्वासित भी होना था। महल का बंटवारा सामान्य न होगा ...ऐसा सोच कर वे कांप उठे तथा सोचने लगे कि कल ही दिल्ली निकल चलना होगा। भाभी रानी लिली के साथ थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि दासियों वाली गंध लिली में चिपकी होगी, उसे वे पकड़ें। पर वहां तो दूसरी गन्ध थी ऐसी गंध जो भाभी रानी के पास तक थी, अंग्रेजी मेमों के साथ हो पर वे देसी हो जाती थीं किसी बंसवारी से निकलती हुई, लिली थी कि उससे बंसवारियां तथा जंगल की सरसराहटें गायब थीं। भाभी रानी को हालांकि लिली ने गहरे तक प्रभावित किया, फिर भी वे मान कर चल रही थीं कि भइया राजा इसे उनकी देवरानी तो नहीं बनाएंगे, फिर क्याहोगा, इसका? ये दोनों तो स्त्री-पुरुष की सारी वर्जनायें तोड़ एक दूसरे में अर्न्तलयित हो चुके हैं।
भाभी रानी, भइया राजा, रणविजय अंग्रेज हाकिम, दासी और लिली इन सबके अलावा पूरी खामोशी के साथ अपनी भव्यता व विलक्षणता बचाये हुए महल खड़ा था वही महल, जहां इतिहास जन्मता है। रणविजय महल में किसी अजनबी की तरह रात भर गुजार सकें, रात भर उन्हें दीखता रहा कि इतिहास टूट रहा है, खंड-खंड होकर बिखर रहा है। पास में सोई लिली ऐसी सोई हुई थी, जैसे उसके सपने भी नींद में चले गये हों।

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0542-2314060, 2312456

Sunday, November 22, 2015

तीसरा रास्ता एन जी ओ पर केंद्रित उपन्यास




तीसरा रास्ता एन जी ओ  पर केंद्रित उपन्यास 

राजनीतिक व सामाजिक रूप से तीसरा रास्ता क्या हो, कैसा हो?
एन.जी.ओ. संस्कृति ने क्या सामाजिक बदलावों के लिए ईमानदारी से प्रयास किया?
एन.जी.ओ. की गतिविधियों का यथार्थ लेखा जोखा प्रस्तुत करता उपन्यास है तीसरा रास्ता...
तीसरा रास्ता फन्ड राजनीति के घालमेल पर से भी पर्दा उठाने का एक प्रयास है.
देखें.....



मौलिक अधिकारों के संघर्ष की तैयारी ‘तीसरा रास्ता’
                                                
                                       नन्द किशोर नीलम

एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो-आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्री) का काम खेत की रखवाली करना होता है, पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘तीसरा रास्ता’ में यही संशय उमड़ता-घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.ओ. का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्ति, जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं, शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के, समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है,कृवह कहता है...कृ
‘क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ’  वह आगे कहता है...कृ
‘बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’  पृ...21
इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई न कोई स्त्राी हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है, जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति, बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्राी का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बी. की सहायक  मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्राी की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा, अस्मिता, नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्राी पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्राी जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्राी पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।
प्रस्तुत उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्य शोषितों, पीड़ितों, दलितों, दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निश्क्रिय और उदासीन है, लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी -विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.ओ. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें...कृ
‘आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्रा की हत्या कर दी है’ पृ...224
‘एन.जी.ओ. वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं, आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं।’ समाज बदलने के व्यापक उद्दष्यों को छोड़कर ‘ये एन.जी.ओ. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ...198
इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता है, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जल, जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जन सहभागिता से बनवाये जा रहे बंधी निर्माण से खुश नहीं है, उसके धन व वर्चस्व का सारा खेल बड़े   बांध खड़े होने में है।
वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिस? नेता, और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधा, विजयकीर्ति भाई, निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाए? लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सत्तरवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में ‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ...222। यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डर, हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।
इस उपन्यास का  शीर्षक ‘तीसरा रास्ता’ देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह  उपन्यासकार भी एक ‘तीसरा रास्ता’ बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सत्ता और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंाड ‘तीसरा रास्ता’ में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवाना, हत्या की राजनीति का पैरोकार होना, बाद में एन.जी.ओ. चलाना और अपने भ्रश्ष्ट व्यभिचारी चरित्रा को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ‘तीसरा विकल्प’ या ‘तीसरा रास्ता’ बचा है? क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? क्या संघर्ष और प्रतिरोधी चेतना पर ‘धन’ और ‘आध्यात्म’ ने आधिपत्य कायम कर लिया है? क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्रा फलीभूत हो चुका है? ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की ‘जय’ है या ‘पराजय’ तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।
डी.बी. का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों, संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ‘तीसरा रास्ता’ तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया है? बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए ‘तीसरे रास्ते’ का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े   अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता है, जहां न तर्क चलता है न कानून। यहां तमाम धार्मिक व कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारें और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।
इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव व ऊभ-चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है, यही इस उपन्यास की सफलता है।
उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत न होगा।कृ
‘हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ...33
‘अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ...35
‘डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ...39
‘तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.ओ. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ...64
‘वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है।पृ....106
‘सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116
‘बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगाकृयदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली 
व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्रा व प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरषाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।’
‘प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193
‘आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ...224
‘यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्रा में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227

हंस कथा मासिकक--फरवरी--2010 पृ...84-85
समीक्ष्य कृति-तीसरा रास्ता’
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी, 221010
मूल्यक--225.00 फोनक--(91-542)2314060


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