अपनी बातअसुविधा मेें खुद की कवितायें प्रकाशित करते हुए मुझे भला नहीं लग रहा, फिर भी एसा करना पड़ रहा है. असुविधा के पाठक जानते हैं कि असुविधा अपने जनपद सोनभद्र के रचनाकारों को प्रकाश में लाने की कोशिश कर रही है, प्रस्तुत अंक भी स्थानीय रचनाकारों के लिए प्रस्तावित था पर ऐसा संभव नहीं हो पाया. हमारे प्रिय रचनाकार हमें अपनी रचनायें उपलब्ध नहीं करा सके. फलस्वरूप इस अंक को मुझे अपनी ही कविताओं पर केन्द्रित करना पड़ा.वैसे यह निश्चित है अगर किसी तरह की बाधा उपस्थित नहीं हुई तो असुविधा का अगला अंक भी पहले की तरह स्थानीय रचनाकार पर ही केन्द्रित होगा. इसके बाद हम असुविधा को सामान्य अंकों की तरह प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे.इस अंक में प्रकाशित कवितायें मेरी हैं पर मैं इनका रचनाकार नहीं हूं इन्हें तो रचा है यहां की प्रकृति ने, यहां की माटी ने, यहां की सोन, बिजुल, कनहर, बेलन जैसी नदियों ने. प्रस्तुत कविताओं के एक एक शब्द यहां के आदिवासियों के आॅसुओं में नहाये हुए हैं, कविताओं की कला तथा उसका ब्याकरण सारा कुछ उनकी सूखी आॅतों ने गढ़ा है.मुझे अपनी कविताओं के बारे में कुछ नहीं कहना. प्रस्तुत कवितायें मेरी आह तथा कराह की उपज हैं, उस आह तथा कराह की जिसके कारण मैं यहां के शोषितों वंचितों की नैतिक लड़ाई में शामिल नहीं हो सका और कागज पर उपन्यास, कहानियां तथा कवितायें आदि लिखता रहा. यह मान कर कि रचनाधर्मिता के द्वारा भी सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ी जा सकती है पर अब मानता हूं कि कागज पर कविताओं, कहानियों को उतारना एक बात है और वंचितों के साथ जमीन पर खड़े हो कर जनतंात्रिक लड़ाई लड़ते हुए इन्कलाब जिन्दावाद बोलना और खुद कोई कविता या कहानी बन जाना अलग बात है.प्रस्तुत कवितायें कैसी हैं, साहित्य के कौशल से लबालब हैं कि नहीं, इनमें आघात, प्रतिघात करने की क्षमता है कि नहीं, इनमें क्या है इसका मूल्यांकन तो आप सुधी पाठक ही करेंगे. प्रस्तुत कवितायें सोनभद्र के तनावपूर्ण एवं निराशापूर्ण परिस्थितियों की उपज हैं इतना कहने की अनुमति तो मुझे अवश्य ही मिलनी चाहिए. अब जरा सोचिए सोनभद्र के बारे में... यहां ऊंची ऊंची चिमनियां हैं, दुनिया के माने जाने कमाऊ कारखाने हैं जो लाभ कमाने के शिखर तापमान पर हैं, लाभ के बारे में किसे नहीं पता कि लाभ श्रम मूल्य का शोषण और कानूनी घालमेल का हास्यास्पद कौतुक है. इस मनुष्यता विरोधी कौतुक के द्वारा लाभ का ब्यक्तिगत हितों के लिए कानूनी रूप से रूपान्तरण किया जाता है इसें ही संपŸिा के अधिकार के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है, समझना यह है कि क्या इस संपŸिा के अधिकार ने कभी मानव सभ्यता का सर्वांगीण भला किया?सोनभद्र में आदमी की दो तरह की तस्वीर है एक है भूख और गरीबी से बिलबिलाते शोषित और उपेक्षित लोगों की तो दूसरी है भूख और गरीबी की पीठ पर लोककल्याण और जनहित लिखने वालों की. यहां का वन विभाग तो जाने कब से गरीबों की पीठ पर पर्यावरण बचाने की हमलावर गोष्ठियां कर रहा है. तो यह है हमारा सोनभद्र, इसी सोनभद्र में हम रहते हैं और हमें साफ दिखाई दे रहा है कि यह जो हमारा सोनभद्र है राजनीति के जघन्य करतबों का दुष्परिणाम है. यहां की माटी की पवित्रता, उसकी सोन्धी गंध से उपजी मानवीय समीपता तथा सहभागिता, एक हल की जोत वाली संस्कृति, एक दूसरे के प्रति भाई चारे की भावना सारा कुछ यहां की चिमनियों ने लील लिया है और पूरे सोनभद्र को रुपयों के बेहया मकड़जाल में जकड़ लिया है.आप चाहें तो सोनभद्र आ कर प्रस्तुत कविताओं की तरह तमाम तरह की कविताओं की खोज कर सकते हैं और महसूस कर सकते हैं कि जब डायनामाइट पहाड़ों को बारूदी करतबों से उड़ाते हैं तब जाने कितनी कवितायें और कहानियाॅ भी चोटिल तथा घायल होती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ घायल कवितायें इस आशा के साथ कि आप इन कविताओं पर अपनी बौद्धिकता का मलहम अवश्य ही लगाएंगे.जून 2013संपर्क: अक्षर घर, हर्ष नगरपूरब मोहाल, रावर्टसगंज सोनभद्र,उ.प्र. 231216मोबाइल नं. 07376900866, 09452584032आदमी खलिहान नहीं हो सकता
वे खलिहान थे और सूरज उगने से लेकर डूखलिहान बने रहते थेखलिहान से अलग वे गोशाला भी थेतथा रात भर खाट पर लेटे बैठे पगुराते रहते थे,उनका पगुराना उन लोगों की तरह था,जो दिन भर या रात भर देश बन कर,कभी कुछ तो कभी कुछ,
उपदेश दिया करते थे
हालाकि पगुराना; खामोशी से कियाजाने वाला कर्म है, जबकि उपदेश....यह तो विशेष किस्म के चिल्ल पों का उत्पाद हैंखास उत्पाद तो वे भी हैं जो देशी विदेशी याआर्य अनार्य की जांच करते हैंतथा धर्म कर्म कोभूगोल पर चिपका कर संस्कृति संवारना चाहते हैंबहरहाल वे खलिहान थे औरखलिहान बने रहना चाहते थेलेकिन जब गोशाला बनते थे और पगुराने लगते थेफिर तो भूल जाते थे किअमीन कुरकी के लिए धमकिया रहा थासाहूकार कर्ज वसूली में बैल हांक रहा थाबच्चों का स्कूल जाना छूट गया हैउनकी पत्नी तेतरी इस लिए मरी थी क्योंकिवे दवाई नहीं करा सके थे, तो क्या वेखलिहान और गोशाला के बीच की कोई चीज थेया दोनांे थे, या दोनों में सेकोई एक ही चीज थेगोशाला या खलिहानचलिए मान लेते हैं कि वे खलिहान थेगोशाला होते तो अपने बाबतभी न सोच पाते, खेती भी काहे करतेवे खलिहान थे तो थोडी़ सुविधा थीशुभ शुभ था वे खुली प्रतियोगिता में थेचाहे जितना अनाज पैदा करेंउसे खुले बाजार या काला बाजार में बेचेंसबसे बड़ी बात खेती करनाउनका अपना चुनाव थाऔर अपना चुनाव गलत हो संभव नहींवे खलिहान थेे या गोशाला इस बाबत आलोचकविरोध कर रहे थे, खास तौर से वे जो मठी थे,उनका मानना था किआदमी खलिहान नहीं हो सकतावह भी ऐसे समय में, जब पुल,सड़कें और चिमनियांस्तनों की तरह हिल रही हों,तथा घर में कुदाल रखनाअश्लीलता हो, ऐसा समय जब जाति की पीठ परचुनाव की मुहर लगाई जा रही होऔर खलिहान से जुडे लोगआत्म हत्या को देह मुक्ति काउपकरण समझ रहे होंफिर तो ऐसे समय में आदमीखलिहान नहीं हो सकता,पर भारत तो कृषि प्रधान देश हैआखिर इस सूत्र का क्या होगा?यह सूत्र तो हजारों साल से प्रमाणित हैफिर आलोचक क्या बोल रहा?तर्क दिया जा सकता है किआलोचक महज विश्वविद्यालय होता हैसो उसे विश्वविद्यालय के बारे में बोलना चाहिए,तथा अच्छे राजनीतिज्ञों कीमुकम्मल नकल करना चहिए,एक भी ऐसा उदाहरण नहीं कि किसी राजनीतिज्ञ नेकुर्सी छोड़ने के बाबत कभी गंू गा किया होवह जब भी बोलता है, उसमें संसद होती हैएक कुर्सी होती है, कुछ कानून होते हैं,प्रधान मंत्री बनने का गुणा भाग होता हैआखिर आलोचक होता भी कौन है?चाहे वह कोई नामवर ही क्यों न होकौन होता है खलिहान के बारे में सोचने वाला?उसे सोचना और बोलना है तोविश्वविद्यालय के बारे में बोलेजो बौद्धिकों के उत्पादन का कारखाना है,एक ऐसा उत्पादन जिसके लिए कहीं बाजार नहीं,जबकि खलिहान! खलिहान तो मुकम्म्लि बाजार हैखलिहान में ही अनाज, अनाज जैसा दिखता है,वहां उसकी सफाई की जाती है,दुल्हन की तरह सजाया जाता है उसेसाफ अनाज खुद बखुद दूसरे का हो जाता हैकिसका हो जाता है पूछने वाला जाने.....अनाज खेतों में पैदा होता है,खेत साहूकार या महजन का यासरकार का, बहुत हुआ तो जमीनदार का.पर खेती करने वालों का नहीं.इसके अलावा और क्या होता है बाजार मेंजिसका बाजा बजाया जा रहा हर तरफतो क्या, खलिहान के बाजार में, खलिहान का आदमीदुरूस्त बाजार होता है, जिसे कभी भी बिक जाना हैऔर वह बिकता है चुनाव में,बिकता है तहसील के हवालात में, या जेल मेंवह बिकता है थाने पर, जरा सोचिए!खलिहान और खलिहान का आदमीन हो तो क्या होगा?आपके घर के गुशलखाने की सफाई करने वालान हो तो क्या होगा? क्या होगा अगर आपके घर का?जब खाना बनाने वाली दाई न हो, और आपअपने पवित्र हाथ से वह सारा काम निपटाते होंजिसे नौकर निपटाते रहे हों.....क्या होगा उस देश का, उस संविधान काजिसके हर छोटे बड़े आदेश उसकी/ / 7/ /पीठ पर लिखे जाते हैंवैसे कहा जाता है कि संविधान भीउसकी पीठ पर ही लिखा गया थाऐसे में भूमंडलीकरण, उपभोक्ता संस्कृतिया खुला बाजार वगैरह ...कुछ जरूरी लिखना ही हो तो ,कहां लिखा जाएगा?क्या पीठ पर ?पीठ तो वैसे ही भरी हुई हैधर्म कानून परंपराओं आदि सेजाने क्या क्या लिखा हुआ है वहां ?हाॅ गोली के लिए जगहबनाई जा सकती है,जो छेद सकती है,तमाम लिखा हुआ.पेट पर भी लिखा जा सकताहै कुछपर...पेट तो खाली है,उस पर क्या लिखाएगा?सभी जानते हैं‘बुभुक्षितम किम न करोति पापम्’फिर यह भी तो हैखाली पेट की कोई भाषा नहीं होतीजबकि किसान मजूर गरीबशोषित, विस्थापित वगैरहये तो राष्ट्र भाषा हैं फिरराष्ट्र भाषा को पढ़ने गुनने की क्याजरूरत?अभी तो पचास साल ही गुजरे हैं भाई
अभी तो पचास साल ही गुजरे हैं भाईहजारों साल लग गये होंगेबन्दर से आदमी बनने में.अभी तो कलमबन्द भी नहीं की जा सकी हैंगुलामी के अपराधों की क्र्र्र्र्रूर गाथायेंअभी तो उस ओर भी जाना बाकी हैजहाॅ हवा की गंध में सूंघी जा सकती हैंअंग्रेजी राज की बदबूचलो छोड़ दो इसे तथा उन दूर दराजके इलाकों को भी उनके भाग्य परपर उनके बयान तो नोट कर ही लिए जॅायंेजिनका साबिका पड़ा करता हैलेखपाल, दरोगा अमीन या मास्टर सेउनसे इतना तो पूछ लिया जायेथाने पर गालियाॅ मिलती हैं या नहींस्कूल खुले रहते हों्रगे नऽअमीन ने घर कुर्क नहीं किया नऽऔर लेखपाल ने तुम्हारा रहवासदर्ज कर लिया होगाफिर तो कागज पर तुम्हारा घर चढ़ गया होगाइसके पहले कि इनके बयान नोट किए जांयेदेख लिया जाये संवैधानिक संशोधनों कोकि उनमें खेद व्यक्तकरने वाले शब्द हैं कि नहीं, जो बताते हैं परवशताअॅग्रेजी नश्लों के कानूनों को लागू करने कीअरे भाई!पचास साल की कच्ची उमर में ही खेलने लगेसंविधान सेसोचने लगे कि कुंआ ही समुन्द्र हैऔर फलंागने लगे मेढक की नाईकम से कम दूध के दांत तो टूट जाने देते औरस्वतंत्रता के चिकने गालों पर, बाल तो उगने देतेअभी तो नसीहतें सीखने का समय है भाई!खास तौर से उन लोगों से जिन्होने देेखा परखा हैगुलामी को आजादी में तब्दील होते हुएकिसी जादू माफिकवैसे दुनिया जादूगर नहीं होतीपर होते हैं जादूगरइसी दुनिया में,दुनिया देखती है उनका जादूजादू भी किसिम किसिम कापगार पाने वालों के हड़ताल का जादूदल बदलुओं के सरकार बदल का जादूफिर चुनाव दर चुनाव का जादूवैसे जादू तो और भी हैं भाई!तथा यह उनका ही असर है किलोकशाही में भी नौकरशाही भली लगती हैऔर कभी कभी तो तानाशाही की पालकीकहार की तरह ढोना भी भलालगने लगता हैअभी तो दहाइयां ही गुजरी हैं किगुजर गये पचास सालसंभव है गुजरें अभी और पचास सालऔर फिर भी न समझा जा सकेतख्ता पलट का जादूऔर हर साल मनाया जाता रहेपरतंत्रता का स्वतंत्रता दिवससच की आॅच
सच की आॅच या अधिकारों के उपलेजिस पर सेकी जा सकंे रोटियाॅकहाॅ हैं दोस्तों ?खेत की मेड़ों पर कब्जा जमाएकिसिम किसिम केझूठों को रौंदने की शक्तियदि सूरज से हासिल हो सकतीतो जमाना जाने कब काबन्द मुठ्ठियों का मतलब समझ चुका होतागोदामों में बंद भूखसंसद में सिसकती बेरोजगारीथाने पर घायल पड़ा मानवाधिकारआखिर ऐसा क्यों है?सारा कुछ बेपर्द हो चुका होताविचारों के खलिहान से गुजरते हुएमुझे लगता है किवहां से अनाज का एक दाना भीभीख में नही पाया जा सकता,कानूनों की नहर, उन्हीं खेतों को सींचती हैजिनके मालिकों की लाठियां,कानून की परिभाषायें गढ़ती हैं.तथा जो माहिर होते हैं, गोलियां दागने मेंइतिहास के पन्नों पर,कभी बुलेट से तो कभी बैलेट से.अभिमत के सच के लिएशाश्वत अत्याचार तथागूंगी आचार संहिता की पोथीविशेषाधिकारों केकिसी भी कुठिला में देखी जा सकती हैदोस्तों!भूखे बच्चों को खिलाने के लिएपत्नी की देह ढंकने के लिएक्या फोड़े जा सकते हैं कुठिले?परंपराओं की चटटान परछेनियों से भूख की इबारत लिखी जा सकती है?कि हम इन्सान हैंऔर निकाल सकते हैं कुठिला में बन्दआचार संहिता की पोथी.ढेंकी पर कूटने या जाॅत पर पीसने के लिएताकि बनाई जा सकें रोटियाॅ,सेंकी जा सके सच की आॅच परफिर खाया जा सके.अगर जीवन का मतलब जीना है औरजीते रहना है फिर तोजीने के लिए किए जाने वालेहस्तक्षेप भला कैसे हो सकते हैं?मनुष्यता के खिलाफ या गैर कानूनीकिसे नहीं मालूम किजीवन जीना सबसे बड़ा सच हैऔर जीवन को सच की आंच मेंसेकते रहना उससे भी बड़ा तथाजरूरी सच.सच की आॅच, सन्तुलन में हैसमझौते में है, सहनशीलता में है तोसच की आॅच अनुरोध के अलावाप्रतिरोध में भी तो है.और प्रतिरोध, उसके बारे में क्या कहना!पोलीथिन
संभव है बदल जाए दुनिया की तस्बीरऔर आदमी वस्तु के बदलेसमझा जाने लगे आदमीपहले की तरह.पहले की तरह ही अॅखुआए उसके भीतरआदमियत, संभव है,संभव है, पहाड़ तोड़क वनदी बांधने वाली दुनियाभहरा जाए अपने ही कारणों से,बन जाए प्रकृति का नैसर्गिक उपहार.लेकिन तब तक तोआग लग चुकी होगी हर तरफजल रहा होगा सारा कुछअभी तो नहीं जल रहा क्षितिजनही गरम हुआ है नदियों का पानीनही कहीं फूट रहा ज्वालामुखीनही आदमी ने सोना बन्द कर दियाकानून के नरम बिस्तरों पर.कानून की हमबिस्तरी आखिर किसेअच्छी नहीं लगेगी?खास तौर से ऐसे कानूनों कीजिनमें हों गुदगुदियां ही गुदगुदियां,दूसरों पर हंसने की मादक हंसियां.ऐसे समय में संस्कृतियां अगर मंुहछिपाएं, धर्म बहक जांए कहींभटक जंाए विज्ञान की किसी गुफा मेंगुफा से निकलते ही करंे घोषणा,‘सभै भूमि गोपाल की नहीं होती ’रूपया नहीं होता हांथ का मैलअभी तो नहीं जल रही दुनियानहीं फैली है आग हर तरफअभी बहुत कुछ है सहनीय.ऐटम बमों पर जमे विश्वासों से अधिकविश्वास है आदमी का आदमी परजबकि आदमी तोड़ा जा रहापहाड़ की तरहखोदा जा रहा खदान की नाईं.भरा जा रहा कार्टूनों मेंपोलथीनों में ठूंसा आदमीउधरा रहा बाजार में.दूकानदार समझा रहा खरीदार कोदिखा रहा पैकेटइस पैकेट में एक ईमानदारऔर मिहनती आदमी हैइसका दाम भी बहुत सस्ता हैऔर इसके साथएक पैकेट मुफ्त,इस पैकेट में भी आदमी ही हैलेकिन थोड़ा कम ईमानदार और मिहनतीक्या यही बाजार बदलेगादुनिया की तस्बीर?नहीं भाई नहीं ,बदलेगी दुनिया किसी न किसी दिनलेकिन बाजार से नहीं, धरती परपांव जमाने सेखेतों में संकल्प उगाने से.काल-चक्र
प्रकृति के उपहारों को चाहे जितनातोड़ लिया जाए, हासिल कर लिया जाएमहारथ, टुकड़े कर लिए जांए अणुओं के,खोज लिए जांए ऊर्जा के श्रोतऔर विज्ञान पीठ पर लाद कर घूमने लगे आदमीदेखो! यह कर लिया, वह कर लिया,लगे कहने, पर क्या बना पाएगा कोई पहाड़,एक नदी, एक पोखर, एक पेड़ या कोई झाड़ी ही.यह कैसा ज्ञान है भाई!जो नहीं खोज पा रहामन की वह गति जिसमें होती हैसहनशीलता की ऊर्जा,सपनों की शीतलता,होती हैं आकांक्षाएं,कुछ धुंधले उत्साह तथा जीवनबचाने की जिजीविषा.यह सारा कुछ पारलौकिक तो नहींफिर क्या है भाई ? इसके ज्ञान कोकिस प्रयोग शाला में,किस परख नली में परखना चाह रहाविज्ञान?इसके बारे में क्यों पसरी है चुप्पी?किसे नहीं पता कि धर्म या कानून कीमेंहदी नहीं बदल सकती हांथ का रंग वचेहरे की चमकआखिर किसे अच्छा लगता हैकरना कुछ और कहना कुछ,सिवाय अपने केविज्ञान क्यों नहीं मिटा पा रहा?कथनी और करनी का फर्कयह कैसी इहलौकिकता है?तलवा चाटू जी हुजूरी की/ / 15 / /क्या इस लिए कि अकेले ही पिया जा सकेरास रंग तथा अनुराग का पानीउड़ाया जा सके मन को हवा से भी तेजबनाया जा सके धरती के किसी टुकड़े कोकथित स्वर्ग वह भी सिर्फ अपने लिएआखिर विज्ञान को कब सूझेगा किबढ़ती जा रही हैं संपन्नता की जिदें,हद से बाहर, लांघ चुकी हैंमानवता की सारी सीमाएं.दुर्भिक्ष, भुखमरी तथा आत्म हत्यायेंये तो बहुत ही छोटे उदाहरण हैंअभी संभाला जा सकता है,कब्र-गाहों में बदलने से बचाई जासकती है दुनिया,बाद में जाने क्या हो अगरविपन्नता की भूख खाना शुरू कर दे बारूद,आंतें हजम करने लगें गोलियांफिर क्या होगा इस दुनिया का?जो पहले से ही बैठी हुई हैबारूद की ढेर परविज्ञान केवल तोड़ सकता है पहाड़, परनहीं तोड़ सकता आदमी का मन.मन जब गुनगुनाने लगते हैं गीतफिर वही बन जाते हंै जन-गीतसभी जानते हैं कि कितना हूहो सरकार गदराईनहीं झेल सकती जन-अंगड़ाईअगर विज्ञान, ज्ञान की हीप्रजाति है कोईफिर तो इसे जन कीअभ्यर्थना में लग जाना चाहिएकुछ ऐसा करना चाहिए कि आदमीहो सके तन कर खड़ाउतर सके मन की गहराई मेंबतिया सके स्वाभिमान के साथभले ही न बना सके वर्ग समूह.कम से कम पढ तो सकेलोक-सत्य का पाठजो लिखा जा रहा, वर्तमान के ब्लैकबोर्ड परअतीत की दुर्गम खोहों में भीहो सकती हैं सुगम राहेंजिस पर चला जा सकता है कुछ दूर तकभविष्य की गठरी उठाएतथा समझा जा सकता हैउत्थान पतन या जीत हार और यह भीकि पतन तथा हार नहीं लील सकतींसंघर्ष की मर्यादा.वैसे तो कोई भी वर्तमान होता है भूत हीपर जब वर्तमान के अन्धेरे हीहो जांए धवल वस्त्र धारीबनाने लगें आचार संहिताएं फिर उस क्षण काक्या होगा?जो ले कर आया है क्षण का पूरा साक्षात्कारवही साक्षात्कार जो प्रारंभ होता हैयातना शिविरों से, जली हुई बस्तियों से,गिरमिटियों के चेहरों से,अतीत के स्मारकों से,जहां तराशे गए हैं बन्दी भूगोलइतिहास प्यासा मरा है, पानी बिनानागरिकतायें मांग रही हैं रोटियां.आखिर कब बचाया जाएगा समय कोसामंती उद्योगों से?यह कैसा है काल-चक्र?जहां बिक रहीं अनुभूतियांबिक रहा एकान्तज्ञान का हो रहा पेटेन्ट.अरे! उस तकनीक को तो बचा लीजिए,न बेचिए बाजार मेंजिससे हरियाती है मन की जमीन.देख कर जिसे मोहितहो जाता है मौसम काकमीना पन.वैसे सभी जानते हैं किदिमागदार नहीं होते फलदारपौधों की तरह.उनके भीतर नहीं होतीबगीचों वाली शान्ति.फिर क्या कहा जा सकता हैकि ज्ञान, होता क्या है?क्या फर्क है ज्ञान और विज्ञान मेंकहीं प्रकृति का दोहन ही तो नहीं,आदमी तथा पहाड़ दोनोंदूहे जा सकते हैंगाय की तरहकभी भी और किसी समययही तो नहीं....काल का चक्र याचक्र का कालनिर्वस्त्र
विचारों के पौधेरोपना चाहता हूूं कियारियों में,पर उन्हंे सीचने के लिएकहां से पाऊंगा सुविधाओं का पानी?यकीन कर लिया जाय अगर किविपरीत परिस्थितियोें में भीमिल सकती हैं कियारियां,बदचलन मौसम की उदारतायेंकरा सकती हैं बरसातभर सकते हैं बन्धे,पिछले साल हो हल्ला मचा था,कि इस साल नहर की नालियांछोड़ देंगीं परधान को सलाम करनामान लेते हैं कि हमारी कियारियांनहीं रहेंगी पियासीखैर छोडि़ए इसे...आइए उस दफ्तर कोदेख लेंजो निर्बलों के लिए करते हैं इन्तजामरोटी, कपड़ा और मकान का.पिछले साल के बने स्थाई आवासभहरा कर अस्थाई हो गए इस साल.अगर उनके होते पक्के मकानलाल किला की तरह मजबूततो वे छत पर बैठ कर‘संतोष ही सबसे बड़ा धन है’का कथित नैतिक पाठ अपनेलड़के और बीबी को पढाते.....‘पक्के मकानों में अनाज रखने का मजाही कुछ और है’दीवार की चमक देखते हीचुधिया जाएंगीअमीन की आॅखंे.कर्ज वसूली में वह बांध नहीं पाएगा हाथ.वही हाथ जिससेचुनाव में लगाई जाती है मुहर.गोदामों की आशिकी छोड़खलिहान झूलेंगे उनकी बाहों में.सावन के अग्रिम गीत गुन गुनाते हुएपरधान ही बन जाएगा उनके लिए धानवे इतने ताकतवर हो जाएंगेतथा खुद पर यकीन करने लगेंगे किउठा लेंगे पैना बादलों की तरफफिल्मी हीरो से भी कड़क बोलेंगे.खबरदार!जो रिमझिम किएहमारे गरम मिजाज को नरम किएदेखते नहीं,पकी फसलों की दुल्हनबेताब है घर आने के लिएऔर तुमउसे करना चाहते होनिर्वस्त्र.खुदपाल
लोक तो वह जूता हैजिसे पहन कर चला जा सकता है पगडंडियों परजाया जा सकता हैपोलिंग बूथों की तरफ.संसद में जाते समय जरूरी है पहननालोक के जूते को.जिससे गांवों की माटी की सोन्हीं गंधचिपकाई जा सके उन कानूनों पर जोबनाए जा रहे होते है गांवों के लिए.लोग जानते हैं कि लोक है तो परलोक भी है,संभालना दोनों को पड़ता हैलोक को भी परलोक को भी.परलोक में सब कुछ ठीक ठाक रहेगातभी संभल सकता है लोक भी.ऐसी नसीहतें हैं किताबों कीजिनके एक अक्षर भीनहीं जाते पानी पीने किसी घाट पर.नहीं परोसते किसी को खानाभीख में कुछ देने का तो सवाल ही नहीं.पर उनमें लोक के बारे में होती हैंबलात्कारी चिन्ताएं,कोई भी किताब उठा लीजिएछल छलाए रहतें हैं उन पर आॅसूआॅसुओं से भीगी होती है पूरी किताब.किसे नहीं पता किजनेऊ के अलावा किसी दूसरी कंपनी के जूते पहन करपरलोक नहीं जाया जा सकता.जो अब उग रही है गांव गांव गली गली.सूचना तो यह भी है किपरलोक ठीक से नहीं चल रहा.बढ़ती सांप्रदायिकता से परेशान हैं परलोक वासीअपने यहां की तरह ही वहां भी हो रही हैं बहसें,बहसों में गरम है मामला भ्रष्टाचार काअभी परिभाषित नहीं हो पाया है किकौन है भ्रष्ट और भ्रष्टाचार है क्या आखिर?वहां की वुद्धिजीवी जनता देख रही है लोक की तरफकि लोक कैसे परिभाषित करता है भ्रष्टाचार कोअरे! आचार तो आचार है भाई! फिर यह भ्रष्टाचार क्या?परलोकवासी तो वैसे ही परेशान है लोक की हरकतों सेहो क्या रहा है वहां? क्या कर रहे है लोक वाले?उन्हें परलोक के बारे में नहीं पताजो तलाश रहे हंैअदालती फाइलों में याअखबारों में.थाने पर याद करते हैं परलोक कोसांप्रदायिक दंगों में,जली हुई बस्तियों में,अरे! उस आत्मा का क्या हुआजिसके बारे में कहा गया है किआत्म दर्शन ही ईश्वर दर्शन है.फिर किसे देख रहे होखुद को क्यों नहीं देखतेखुद ही तो तमाम खुदों से मिल करबन जाता है लोक.खुद को जांचने के लिए खुदपाल बनोक्या करेगा लोकपाल वह भी तो एक खुद हैऔर उसके पास भी हैं तमाम खुदरा बातें,अपने बारे में भी तथा लोक के बारे में भीभजन और स्वजन
मुझे नहीं मालूम कि बन्दूकें करा सकती हैं शान्ति यज्ञजोत सकती हैं खेत का कोई टुकड़ाजला सकती हैं चूल्हेलिख सकती हैं स्कूलों में पढ़ाई जा सकने वाली किताबेंया उन गीतों को भीजिसे गाया जाता है राष्ट्र के नाम पर.खैर उन भजनों को तो नहीं ही लिख सकतीं बन्दूकेंजिन्हें गाया जाता है मन्दिरों में किसी देवता के सामनेबन्दूकें तो यह भी नहीं कर सकतीं किविचारों को सुला दें आरामदेह बिस्तरों परऔर खुद परी की तरह थिरकने लगें.मन माफक चूमाचाटी करें औरहसीन सपनों को मादक बना देंमैं नहीं जानता कि बन्दूकें क्या क्या कर सकती हैं?मैं नहीं जानता बन्दूकों के काम के बारे में,तथा बन्दूक चलाने वालों के बारे में भी मैं नहीं जानता,केवल इतना ही जानता हूं किबन्दूक जब चलाई जाती हैचाहे कारण कुछ भी होमरता है कोई न कोईमिट जाता जाता है मृतक का अस्तित्वहर हाल में होती है हिंसा.बन्दूकें नहीं चलाई जातीं पहाड़ों को निशाना बना करनहीं छेदा जाता कोई पेड़,बन्दूकंे जिन्हें रखा जाता है बहुत सम्हाल करबताया जाता है कि यही बचाती हैं सभ्यताएं,यही बचाती हैं वह भूगोल या सीमांए,जिनके भीतर छटपटा रहे होते हैं करोड़ों लोगजिनके माथे पर लिखा होता हैभूख से मरे आदमी का बयान.वहीं लिखा होता है एक औरत का हलफनामा.वहीं चिपकी होती है काम क्रीड़ा की किताब.जिसे पढ़ रहा होता हैनैतिकता की खोल में दुबका आदमी.मैं नहीं जानता किबन्दूकों ने आज तक आदमी को आदमीसे जोड़ने का काम किया है.कैसे कह सकता है कोईकि बन्दूकों के करतबों को जानने के लिएजरूरी है जानना बन्दूकें चलानातभी शायद जाना जा सकता हैबन्दूकों के बारे मेंहिंसा और अहिंसा के बारे मेंपर मैं तो कुछ भी नहीं जानतासिवाय इसके कि मुझे हर हाल में खड़ा रहना हैलाश की मानिन्दकचहरी में, थाने पर, या कि संसद मेंलाश की मानिन्द ही खड़ा रहना है मन्दिरों में भीखुद को बचा लेने के बाबत भजन गाते हुएऔर मन को बेमन होने से बचाने के लिएलगातार गाते रहना है कोई वैदिक भजनभजन हैं तो जन हैं और स्व जन भीताज्जुब
ताज्जुब है गढ़ी जाने लगी हैंउन्नतिशील प्रजातियां आदमी की.धान की प्रजातियों की तरहअनुशासित रखने के लिए लोगों को.इतिहास और भूगोल पर खड़ी हैंये प्रजातियां धोख की तरहबन्दूक की भाषा बोलते हुएबारूद का चन्दन लगाए हुए.क्या रखा है जुलूसों कीचिचियाती, मिमिययाती बोली में?उसे चुप कराने के जाने कितने तरीके हैं,उसे तितर बितर हो जाना हैलोगों को लौट जाना है अपने घरों की तरफ.खुद को गरियाते हुएकोई भी कांप जाएगा,पत्नी की भीगी आॅखें देखकरउसमें तैरती जात औैर औकात देख करसभी जानते हैं कि धोख से क्या डरना?ताज्जुब है!ताज्जुब है धोख की अपनी जात और जमातनहीं, अपनी विसात नहीं होतीफिर भी उनसे डरते हैंताज्जुब है.ताज्जुब है कि आदमीआदमी होते हुए भी आदमी सेडरता है, नहीं नहीं ऐसा नहींहम आदमी से नहींइतिहास की जन्माईप्रजातियों से डरते हैं.ताज्जुब है.गुस्सा
औरतें परेशान ही नहीं बहुत परेशान हैंअपने छितराये गुस्सों सेगुस्से बना लेते हैं आॅखों में जगहइसके पहले कि आॅखंे डबडबा जांये,और जलते आॅसू टपकने लगेंवे कर लेना चाहती हैं परतालनाबालिग सुबहों की,जो घर में घुस करकरती हैं पुलिसिया कार्यवाही.उनसे उन भूखी घटनाओं से क्या मतलब?जो चिल्लाती चीखती हैं, वर्जनाओं के बाबतजो दर्ज करती हैं भविष्य के घायल होने कीआवारा शिकायतें.वे फैला पायें अपने पैरचल पायें किसी सड़क पररातों को जी सकें रात भरकि जाने कहां भाग चुकी होती हंै ंआत्मकथा की किताबें.अपनी खुद की कहानियां भी नहीं होतीं साथ,विशाक्त धुंआ दबोच लेता है पूरा परिदृश्यऐन उस वक्त पढ़ी जाती हैं औरतेंताजी रपट की तरहऔर सभी जानते हैं रपट का मतलब.गवाही का मतलबकिताब का मतलबगवाही सेकिताबसेरपट सेबहुत परेशान हैं औरतेंउनके गुस्से हैं कि आॅखों में घुस करबनते जा रहे अंगारेऔरतें लिखना चाहती हैंआत्मकथासमय के करतबों के सारे किस्से.समय की पीठ परसमय की बोली मेंउस समय का,जब वे देह नहीं थीं,जब वे अश्लील नहीं थीं,जब वे गुडि़या थीं,खिलौना थीं और उनका समय तबतुतलाना भी नहीं जानता था.तब की बातें,तब की बीतने व सिसकने वाली रातें,पर क्या लिखें कैसा लिखें,जिन्हें चैखट का डर नहीं हो.जो जा सकें खिड़कियों के आर पारजो बन सकें फूलगुथ जांए जूडों में, ऐसा क्या है?जो शील तो हो, पर अश्लील नहींपरेशान हैं औरतें गीत बन करसंगीत बन कर,अपनी खुद की किताब बन करपरेशान हैं, बहुत परेशान हैं औरतें.झाड़ू
पहले वह छोटी थीझाड़ू बडी़ थी.जब वह बड़ी हुईझाड़ू छोटी हो गई.खिलौने की तरह.अब वह खेलती है उससेखेलती तो पहले भी थीपहले की बात दूसरी थी.अब वह समझने लगी हैझाड़ू में फंसे कचरों की भाषाखेलते खेलते बुदबुदाती है.‘इन्हंे सड़क पर ही फेंकना था’सड़क पर फेंकी जा सकती हैंसारी चीजें, मसलननेपकीन, कंडोम, माला, फूल, चिठ्ठियां,जूठन, राख, चुनावों के पम्फलेट आदिझाड़ू से ही बटोरी जाती हैं सड़कें,पर झाड़ू होती है अपवित्र औरउसे बटोरनी वाली?......कुछ कामों के लिए नहीं होती अपवित्र.जब कि हर घर में होती है झाड़ूऔर लगाने वाले या वालियां भी होती हैंहर घर में,लेकिन हर कोई नहीं कहलाता मेहतरन हर कोई साफ करता/ करती हैसड़क की सफाई,जब कि जरूरी है सफाई सड़क कीउसने अपनी उम्र से भी बड़ी करनासीख लिया है झाड़ूक्योंकि साफ करना हैसड़क को, नालियों कोनालियों के अलावा भी,बहुत सारी दूसरी जगहें हैंबजबजाती हुई जिन्हें भी.साफ करना होता है उसेजो बाहर से बहुत साफ दीखती हंै परभीतर से....बजबजाती रहती हैं.बजबजाने का कारण भी वह जानती है.वह उधर जरूर जाती हैकोई जाये न जाये वह जायेगी.वह समझती है,समझती है किनालियों से भी जरूरी हैसफाई दूसरी जगहों की.जहां पहली बार उसे मालूम हुआ थाकि वह हो गई है बड़ी तथा उसे और भीबनाया जा सकता है बड़ी.इसी लिए उसने बड़ी कर लिया है झाड़ू कोअपनी उम्र से भी बड़ीबहुत बड़ी.सावधान
सावधान हैं औरतेंजितनी असावधान थीं सीताअग्निपरीक्षा के समय.फिर भी पास की थीं परीक्षाआत्मबल की और राम!राम को जाने क्या हो गया था?प्रकृति और पुरूष के युद्ध मेंफंस गये थे शायद.अब कोई अग्नि परीक्षा नहीं हैविचारों के केन्द्र में औरतों के.वे जान चुकी हैं किकृष्ण केवल चीर बढ़ा सकते थेनहीं कर सकते थे युद्ध.कुटिल व्यवस्था मिटाने के लिएजिसके प्रतिनिधि दोनों थेपांडव और कौरव भी.वे घर में उफनती किंबदन्तियों कोलतिया कर, सपने बुनती हुईबहुत दूर तक, वीरानों से भी आगेजा चुकी हैं.मिथकों के हरम से बाहरवे तजबीजने लगी हैंचाॅद की शीतलता.सूरज के चारो ओर छितराईबेरोजगार ऊर्जा के बारे मेंवे आश्वस्त हैं कि यही ऊर्जाकिसी न किसी दिन जलाएगीलिंग भेदी सदाचारों की बस्तियांवे जानती हैं भविष्य क्या है?और कौन है जो रचता है भविष्य.कौन है जो तैयार करता हैआचारों का सिलेबस.किसकी गन्धाती है नाककौन है जो खिड़कियों कोकरता है दरवाजों से अलगऔर कान लगाए रहता है उनकीअंतरंग बतकहियों पर.बहुत कुछ हो रहा है, होता रहा हैवश में होता तो लोगछीन लेते पŸिायों का हरा पननदियों का लहरानाचाॅद की शीतलतापर नहीं छीना जा सकता कुछ भीजान चुकी हैं औरतें.कि वे औरत हैं, और रत नहींवे जानती हैं.माचिस की डिब्बियों में बन्दपरंपराओं की.पोथियां जल जायेंगीकिसी न किसी दिनखुद ब खुदइतनी सावधन हैं औरतेंग्लोब
चूल्हे अगोरने वाली औरतेंबैठने लगी हैं ग्लोब पर.हासिल करने लगी हैंभूगोल की अनिवार्य कुर्सियां.वे मंगा रही हैंअतीत के महायुद्धों की रिपार्टें.खास तौर से उन युद्धों कीजो रति आख्यान जन्माने के लिएलड़े गए थे जनता के पेट पर.जिन्हें बताया गया था औरबताया जा रहा है अब भी,कि लड़े गये थे वे युद्धजनता की लड़ाई, जनता के लिएजनता के द्वारा.वे पछोर रही हैं उन्हीं ऐतिहासिक आख्यानों को,पछोर कर अलगिया रही हैं उनमें सेजीवित दानों को.... परउसमें जीवित क्या; मृत दाने भी नहींदाने नहीं होते ठस्स तब भी,दाना मान कर उन्हें, वे रख लेतीं अलगकिसी धरोहर की तरहमान कर कि धरोहर होते हैं मनोहरपर वहां तो कचरे ही कचरे हैं,जो उधरा जाते हैंसूप से पछोरते हीउधराने वाली चीजें तो उधराएंगी ही.वे फेंक रही हैंजौहर जैसे कचरों कोहोगा क्या कचरों का?आखिर किस लिएनहाना चाहेगी?सौन्दर्य की नरम धूप मेंकोई औरत.आखिर औरतलाज का कोलाज क्यों बने?वही लाज जिसकी भुतहा बिमारी सेसंक्रमित है आधी आबादी.संक्रमित हैविवेक की ऊर्जा.फिर भी मस्त मस्त थी निर्लज्ज दुनियावही दुनिया जिसने नहीं देखा थाकुटिल वर्जनाओं कोचूल्हों में जलते हुएकिसे पता था किचूल्हों में जला कर वर्जनांओं कोपकाया जा सकता हैबच्चों के लिए स्वादिष्ट ब्यंजनवे देखी जा रही हैं दौड़ती हुईसंभावनाओं की पगडंडियों परजिधर हो रही होती है परेडसुरक्षित रखने के लिएपांवों के निशानग्लोब पर.पहाड़ों से
पहाड़ों से नहीं डरता कोईडरता है उनकी चीखों से.डायना माइट घुसते ही आंतों मेंकांप जाते हैं पहाड़.निकलती हैं डरावनी चीखेंकांप जाती हैं बस्तियां.बिखर जाते हैं पहाड़.छितरा जाती हैं उनकी आंतें.हंसता है पहाड़ तोड़कपहाड़ सी हंसी....‘माल नहीं निकला’पहाड़वासी हो जाते हैं उदासकि नहीं मिल सकतापत्थर का एक टुकड़ा भीआसमान में उछालने के लिए भी.लगातार जारी हैंडायनामाइटों के विस्फोट.पहाड़ों का गिट्टियों में तब्दील होनाफिर बिकना या कि रूपया, डालरबन जानापहाड़ नहीं डराते अब.नहीं कपाते हाड़.बन चुके हैं फिक्स डिपाजिटवन बनाए जा रहे रंगीन मधुवनइनसे कौन ले अनबन?कौन जलाये तन?बिजली की कृपा से ,बनाई जा रही यहां आर्थिक मीनारें,बनाये जा रहे नयेसंस्कारों के पिरामिड,पहाड़ों से ही गढ़ी जाती रही हैंअबोल मूर्तियां,जो बोलती नहीं थीं आदमी की बोली.फिर भी बोलता था आदमी उनके सामनेकरता था प्रार्थनाएं.अब नहीं होती पहाड़ों पर प्रार्थनाएं.पहाड़ों पर अब मनाए जाते हैं,वेलेनटाइन डे,देहलीला के किसिम किसिम के उत्सव.ऐसे में कौन लिखेप्रताडि़त होने के बाद भीशोक गीत या विरह गीतविरचना क्यों मरा खदान मेंसुगिया कैसे भाग गई?पहाड़ सा कलेजा चाहिएपहाड़ के बारे में लिखने के लिए.हाड़ जब होंगे मजबूतफिर लिखी जाएंगीहाड़ से उपजी कवितायेंपहाड़ के बाबतवे समझते हैं
वे समझते हैं किगढ़ा जा सकता है आदमी.जो जाने सिर्फ हां हां करनासंभव हो जिन्हें रिमोट से चला लेना.जिनके लिए विवेक का मतलब होमालिक के जूते और अधिकार कामतलब हो, महलों के पीकदान मेंखखारे बलगम.या कि किताबों की छींकें.कानून की विकलांग धाराएं.पर लोग समझते हैं किजो मालिक बने बैठे हैं, वे मालिक नहींसिर्फ कचरा हैंरीति रिवाजों के, परंपराओं के.अतीत के झूले में झूलने वालाकर भी क्या सकता है?बीमार और अपाहिज बनाने के सिवावे लटकाते रहे हैं अतीत कोसूली पर.लोग समझते हैंसमझते हैं किउन्हें करना क्या है?बराबरी का रोलर चलाने के लिएउन्हें करना क्या होगा?धूप रौशनी, हवा, पानी,जल और जंगलतुम्हारा कैसे हो गयाउस चाल कोवे समझते हैं.संभावना है
किसी सड़क, किसी गली,किसी शहर से गुजरते हुए,संभवना हो सिर कलम होने कीफिर दोस्तों!उन फैसलों से क्या डरनाजो कानूनी तो हैं पर सामाजिक नहीं.जाति की लिपि और गोत्र की भाषापढ़ लेने के बाद जब संभावना होमनुष्य से इतर कुछ बन जाने कीफिर दोस्तों !उन किताबों को क्या पढ़नाजिनकी रसोई में भूगोल पका करता है.हथौड़ों से चोटिल हो जानेबस्तियां जल जानेभूखे सो जाने की जब संभावना होफिर दोस्तों!उन गीतों को क्या गानाजो स्वतंत्रता की जोश जगाते हैं.बोझ ढोते हुए,हल जोतते हुएकहा जा सकता हैसूरज को सूरजचाॅद को चाॅद, रात को रातअपने हिस्से का पानीरोका जा सकता है कियारियों मेंआसमान में लहराई जा सकती हैंमुठ्ठियांफिर तो पूरी संभावना है मेरे दोस्त!खड़ा हुआ जा सकता हैसमाज बदलने के लिए सीना तान कर.डरता हूॅ
पढ़ना चाहता हूं पवित्र पोथीपर डरता हूंकहीं उसके कमीने तर्कमेरे विचारों को अपाहिज न बना दें.फिर मैं खड़ा कर दिया जाऊंकतार मेंचरण बन्दना के लिएउपासना के गीत गाने के लिएहिफाजत करना चाहता हूं.काले गोरे सभी कानूनों कीपर डरता हूंपोलिंग बूथ मुझ पर हंसने न लगे.और मैं पहुचा दिया जाऊंकिसी पोस्टमार्टम घर.मिलना चाहता हूंसमय के कथित जननायकों से.पर डरता हूंउनके गनरों से,कहीं लिख न देमेरे जिस्म पर गोलियों के अर्थ.बारूद की कोई ऐटमी लिपि.लिखना चाहता हूं गीतउन महिलाओं परजो ढो रही हैं आवारा शुक्राणुओंके भार.पर डरता हूंउन जनाना मर्दों से,जो नहीं बताना चाहतेकि वे बाप बनने वाले हैंछिपा लेते हैं अपना नामडूबना चाहता हूंपाप धोने वाली नदी मेंपर डरता हूंकहीं मुझे लील न लेउन शिशुओं की तरहजो डुबो दिए गए उनमेंहमेशा हमेशा के लिए.फिर कैसे पढ़ूं?आचार विचार वाली पोथीकैसे याद करूं उसके तर्कडरता हूं.मैं डरता हूंउन कविताओं से भीजिनमें नहीं होती भूख,जिनमें नहीं होतीआदमी होने की तमीज,जिनमें नहीं होती विचारों की मुस्कान,जिनमें नहीं होतीआदमी की जिद,जो आदमी को आदमी बनाती है.मैं रोक देना चाहता हूंबस्तियों में आग फैलाने वाली सुबह.खास तौर से उस सुबह कोजो भूख के खिलाफ, लड़ने वालों कीशिनाख्त कराती है.चाहता तो हूं सुननाकिलों के प्राचीर से उडाये जाने वालेझूठे सुभाषितों में नहाए शब्दों को.थोड़ा डरता हूंकहीं करमा के धुनों औरबिरहा के रागों कोबेडि़यों में जकड़ न दिया जाये.चाहता तो हूं रखना उस कुदाल को घर मेंजा कोड़ सके विचारों की बंजर जमीनपर डरता हूंकुदाल चलाने की मेरी आदत कोआवारापन न मान लिया जाये.बन्द कर दिया जाये आबदस्त लेने कातरीका भी,सोचा जाने लगेमशीन के बारे मेंचाहता हूं चलनापवित्र आत्माओं के साथपर डरता हूं, अपनी परर्छाइं सेऔर उनके घातक प्रहारों से.तर्क की आॅखें फूट जाने के बादनहीं मिल सकती मुझे एक पतलीछड़ी भी.इनके प्रार्थना गृहों से घर तकलौटने के लिएफिर मैं क्या करूंगा ?सुबह दोपहर या रात.कोई तो नहीं साथ.कहीं नहीं कोई किताबजिससे सीखा जा सकेभूख से लड़ने का तरीका.समय
प्रतीक्षा करो किसुधारों की हवा आएगीखिड़की खोल करऔर सोख जाएगीतुम्हारे जिस्म परछलछलाया पसीना, प्रतीक्षा करो...प्रतीक्षा करो किसुबह होगी (जो होगी ही )भूख से बिल बिलाया तुम्हारा लड़कापीठ पर गुलामी की किताबें बांध करजाएगा स्कूल (यदि स्कूल खुला रहा)वह भी दूसरे बच्चों की तरहबैठ पाएगा टाट परउसे झाड़ू नहीं लगाना पडे़गावह सीख पाएगा‘स’ से समय‘स’ से संविधान‘स’ से सरकार और ‘स’ से सलामकरने का तरीका,प्रतीक्षा करो कि‘स’ से समझौते होंगे और रुक जाएगावह संग्राम जिसेशुरू किया जाना हैआदमी और आदमी के बीचफर्क मिटाने के बाबत.और समय तुम्हें बचा लेगाप्रतीक्षा करो.कि कोई पैगम्बर आएगाजो काट डालेगा तुम्हारी बेडि़याॅदुलारेगा तुम्हें.गोदामों को सिखा देगा सच बोलनाबैंकों को सिखा देगा अपरिग्रहकि कमाने वाला खाएगालूटने वाला जाएगा.प्रतीक्षा करो,प्रतीक्षा करोतुम्हारी यातनाओं का सचसाफ कर पाएगा उदारताओं की नालियांजिनमें सभ्यताओं का दूध बहता हैकि दूध में पानी मिलाने का चलनसमाप्त हो गया है.प्रतीक्षा करो कि तुम्हारेे आंसुओं से सानकरकानून के आंटे से बनाई जाएंगी रोटियांपेट भरने तक परोसी जाएंगी तुम्हें.प्रतीक्षा करो....राजनीति के कारखाने,हरिया देंगे, बंजर जमीनविकास की यूरिया छिड़कीजाएगी तुम्हारे खेतों मेंप्रतीक्षा नहीं मेरे दोस्त!चिन्ता करोचिन्ता करो आग पर बैठी दुनिया बचाने की.तटस्थता के अपराधियों को महसूस कराने की.कि बचाई जा सकती है दुनिया बदरंग होने सेधूप का इस्तेमाल किया जा सकता हैअमन से मन को लहराने के लिएवारिश का पानी रोका जा सकता है खेतों में,हल के फारों से भी लिखा जा सकता हैइतिहास.चिन्ता करो कि प्रतीक्षा के लिएतुम्हारे पास नहीं है समय.बोलती तस्बीरों में
कई वर्षों से, नहीं लिखी कवितानहीं चुना खेतों में छितराये शब्दों को.आज भी याद है अतीतअतीत भूलता भी नहीं,नहीं सहला पायाघायल अक्षरों को.कुछ जो कराह रहे थेऔर कुछ जो यंू ही मर गयेपोखरे पर पड़े भब्य शिवाले के पास.प्रार्थनाएं करते,शंख बजाते,आचार की पोथी बांचते.वरसात होते ही उग आते हैं खेतांे मेंकुकुरमुŸो की तरह.किसिम किसिम के अक्षर.सोचता हूं अक्षर भी पकेंगेफसलों की तरह याकिसी दूसरे पौधों की तरह.पकने पर तोड़ लूंगाफलियां, और अगले मौसम मेंकरूंगा वैज्ञानिक ढंग से उनकी खेती.सोेचता ही रहा हूं लगातारऐसा नहीं हुआ कभीजमीन जिस पर करनी थी खेतीक्या मालूम था?सदाचारों की तूफानी नदी लील लेगीमेरे हिस्से की जमीनमिट जाएगा सब कुछऔर हम तब्दील हो जाएंगेबोलती तस्बीरों में.बदल रही जनता
सभी जानते हैंसाफ और हवादार जगहों परबिछी रहती हैं जुल्मों की चारपाइयां.उसके नीचे ही बैठ सकते हैंदूसरे लोग उसके अगल बगल,चारपाइयां भी होती हैं कुर्सियों की तरहजिस पर नहीं बैठ सकता हर कोई.उस पर बैठते हैं वे लोगजिनकी होती है विशेष भाषा.पहनते हैं विशेष भूषा,जिनके होते हैं विशेष भवन,किसी न किसी तरहवे हासिल कर लेते हैं विशेषाधिकार भी.यानि की सिर्फ उन्हीं की है दुनिया.डर जाते हैं जमीन पर बैठने वालेवे तब और डर जाते हैं जबविशेष भवन, विशेष भूषा, विशेष भाषा वालेनिकलते हैं सज धज कर.कानूनी चादर ओढ़ कर.चलते हैं धरती पर फंूक फूंक करडरे हुए.कांपने लगते हैं तब....जमीन पर बैठने वालेबोल देते हैं हल्लाचिल्लाने लगते हैं ‘मारो अगर मार सकते हो’लेकिन हम मारेंगे नहीं और मानेंगे भी नहींफिर वे बोलने लगते हैंलोक भाषा....धीरे से भुन-भुनाते हैं अपने खास एकान्त मेंबदल रही है जनता.डा. लोहिया के विचारों पर आधारितपंाच साल
रोटियां जल जाया करती हैंअगर उलटी पलटी न जांयेधुआं जाती हैं रोटियां.सरकारें भी धुआं जाया करती हैंहुकूमती नशा चढ़ जाता है उन पर.करने लगती हैंपगलाई हरकतें.अगर उन्हें उलटा पलटा न जाये.पूरा घर बसा जाने तथालोक को त्रस्त होने औरत्राहि त्राहि करने के पहलेजरूरी है राटियों की तरहसरकार को भी उलटना पलटना.इस उलट पलट से हीरोटियां बनती हैं खाने लायक.सरकार भी बनती है जनता कीजनता के लिए, जनता के द्वारा.उलटी पलटी जाने वाली सरकारें हीतोड़ पाती हैं अपनी जड़तायें.उतार पाती हैं तिजोरियों की भूषा.नहीं गढ़ पाती तानाशाह का चेहरा.उलटने, पलटने से हीबन पाती हैं पारदर्शी और थोड़ासंवेदन शील भी.तभी समझ पाती हैं सरकारें.जनता क्यों हल्ला बोल रही?यह समझ ही कराती है उनसेजनता को सलाम.खड़े हो कर नंगे पांवजैसे खड़ी रहती है जनताधूप व बरसात मेंपूरे पांच साल.डा. लोहिया के विचारों पर आधारितपासंग
लोग समझते हैं तराजूऔर उसका मतलब.कितनी चीजें तौली जा सकती हैंतराजू से तथा यह भी किकितने किस्मों के होते हैं तराजू.पूछ रहे हैं लोग सवाल दर सवालउस विशेष तराजू के बारे मेंजिससे तोला जा रहा लोकहित.देखा जा रहा है पासंग.स्वजन हित और लोकहित मेंवही तराजू जिसकी डंडियांझुकाई जा सकती हैंकभी बाएं तो कभी दाएं.बहस के बटखरे बदले जाते रहे हैं.अब अधिकार, मूलाधिकार, विशेषाधिकारआरक्षण आदि से तोले जा रहे लोकहित.उसी से तोली जाने लगी हैंसावन की बदरियां, सूरज की धूप.आंगन का भूगोल तथा पुरखों केकारनामे भी.नई तोल तो होगी ही आखिरकैसे तोला गया था आदमी?छोटा बड़ा सवर्ण अवर्णकिसने चढाया था पासंग?किसने झुकाई थी डंडी?वह कला थी या छलप्रायोजित दिमाग तो पासंगही बढाएगा.बहसंे हो रही हैंकि बदलो तराजू.बदलो तोलने का तरीकाजिसमें पासंग वाली डंडियां न हों.मगर
किस तरह के आईनेपहुंच रहे हैं गावों की तरफ.खलिहानों की ओरदिखाने के लिएगालों की झुर्रियां.सिकुड़नें तथा खरोचें भी.उस आदमी को भीजो कभी था जीवित.जिसे भूख नेतब्दील किया था लाश में.तंत्र-कला का अदभुत नमूनाकि विश्वाश तब्दीलहो जाए लाश में.चुनाव खत्म, आईने खत्म.कहां चले गए आईने?क्या हुआ उन्हेंकहां गढ़े जाते हैं आईने?हर पांच साल बादकभी कभी बीच ही में.किसिम किसिम के आईनेखड़े हैं,हर चैराहे परहर गली में.आखिर क्या दिखता है उनमें?मक्कारी और धोखे के सिवा.उस आइने में नहीं दिखतीभूख, बेरोजगारी, गरीबी.तथा विस्थापित और प्रताडि़त दुनिया.कोई जिन्दा कौमआखिर कैसे देखेअपनी सूरत चुनावी आइनों मेंसाफ करने के लिए...चेहरे के दागों कोजिन्दा कौमें अपना हाथ भीनहीं देख सकतींजिससे उठाए जाते हैं मशाल.तानी जाती हैंआसमान की ओर मुठ्ठियां.कुछ भी तो नहीं देखा जा सकताचुनावी आईनों में,उसमें दिखता भी कुछ नही.ंकहीं ऐसा तो नहीं,आईने सिर्फ आइने हों.जिसमंे सिर्फ आईना ही दिखेकुछ दूसरा, तीसरा नहींवैसे भी चुनावी आईने में अधिक से अधिकसूरत ही देखी जा सकती है,नहीं देखी जा सकती सीरत.सीरत देखने के लिए नहीं होतेचुनावी आईने.जो खड़े हो जाते हैं चैराहों पर,गलियों के नुक्कड़ों पर,घोषणा पत्रों के ठेक परटिकाए गए आईने,वैसे ही हिलते, कांपते रहते हैं,तरंगों की तरह.फिर कैसे दिखेगा उसमें खलिहान?वह विहान भी जो उतरता है सिवान में.हां संसद को बना सकते हो आईनाअगर बनाने की ईच्छा शक्ति होफिर उसमें साफ साफ देखी जा सकती हैसूरत और सीरत भी....मगर....संसद में रसद कहां?पराजय
सोने की खान सेनिकले हुए नागों की फुफकारेंबढ़ रहीं हैं गांवों की तरफ.तथा उन नागों की भीजिनके बाप दादों ने पीठ परकस कर बांध लिया थाइहिास और भूगोल.नाग बढ़ रहे हैं गांवों की तरफढिबरियांे की रौशनी में देख रहे हैंगरीबी की शक्ल.जली हुई राटियों पर चिपका रहे हैंबाप दादों की आतताई सूरत.वे ढंूढ रहे हैं विजयी उन्मादांे कोगरीबों की ठिल्लियों में.वे जानते हैं कि मड़हा मेंगरीब की रोटी खा लेने मात्र से हीथर थराने लगेंगे बूथ फिर भीअगर नहीं थर थराए बूथ तो..वह फुफकारेगा ही नहीं,काटेगा भी हर किसी को.वह जब तक चाहेगा तभी तक रहेगा बूथ.वह नहीं तो बूथ नहीं, वैसे भीबूथ की जरूरत ही क्या है?जीत की चटटान पर चढ़ करउसके बाप दादे मुस्कराते थे फिरवह क्यों नहीं मुस्कराए?वह उन नसीहतों को फेंकवा चुका हैसहन शीलता के परनालों की तरफजो पराजय को भी जय बताती हैं.डीएनए.
भयभीत हैं लोग औरथरथरा रहे हैं.आविष्कारों से,कांप रहेे हैं.खड़े हो कर कृत्रिम गर्भाशय मेंहम जीत सकते हैं भूगोल.बना सकतेे हैं गढ़.खोज लिया है हमनेपराजित किए जा सकने वाले क्षेत्र,वह इतिहास भी,पुरुष तथा प्रकृति के संघर्षों का.यह मूर्खता है समझनाकि आदमी पहले सिर्फआदमी रहा होगा.नहीं रहा होगा वंश का कोई उत्पाद.वह नहीं था पहले बटा हुआ.पहले नहीं था वर्ण, न वर्ग,नहीं थी जातियांफिर काहे का चिल्ल पों?काहे के लिए हल्ला?जाति क्या है? वर्ण क्या है?जरूरी नहीं संतानोत्पŸिा के लिएनर-नारी संबधप्रयोग शालाएं तो बता ही देंगीगर्भ की शुचिता के बाबत.किसे नहीं पता? डी.एन.ए. भीकोई बात है,इसी लिए वे कांप रहे हैंकेवल वंश पर जाति परतथा उससे जुड़ी निर्मम मृत्यु पर.गुलामी
भले ही विकसित होंनदियों पर पुल बना लेने की कलांए.आसानी से पार होजांए सेनाएं.गुलामी की लुगदी फेंक दी जांए पर,भूगोल की बढि़याई नदी परकैसे बनाया जा सकता है कोई पुल?जिसे मानव सभ्यता जानती तक नहीं.जो अभी तक नहीं गढ़ पाईमानवीय समीपता के औजारदुनिया तो केवल संप्रभुता ही जानती है.ब्यक्ति की या जन कीसंप्रभुता भले ही हो इतिहास के लिएजरूरी कोई चीज परबिना मानवीय समीपता का पुल बनाएकैसे जा सकता है आर पार कोई भी.वह चाहे दूसरी संप्रभुता ही क्यों न होकिसी चैहद्दी में तड़पते भूगोल का.दुनिया में देखा जा सकता हैसंप्रभुता के विषाणुओं को.फैल रहे हैं हवा की तरह हर ओरभूगोलों के आर पार.आदमी चाहता है विषाणुओं से होना मुक्तभूगोल को गोल समझने वाला आदमीआखिर घूमे तो किस परिधि पर?बनाए तो कैसा बर्तन? उसे गढ़े किस चाक पर,गढ़े तो कैसा? आजादी में गुलामी वाला याआजादी में सिर्फ आजादी वाला.आदमी जब नहीं जा सकता भूगोल के पारफिर काहे का फर्क, कैसी स्वतंत्रता?फिर किसे कहेंगे गुलामी?अवज्ञा
वही सूरज, वही चाॅदवही हवा, वही बरसात.कुछ भी तो नहीं बदलान ही स्थगित हुआ कुछ.वही बीमारी, वही दुख,वही बेरोजगारी, वही भूख.सभी तो लड़ रहे अपनी तरह सेलड़ाई हो रही हर तरफशोर उठ रहे हैं, धुआं भी.खड़ा पेड़, खड़ा रहेगा कब तक?कूएं कहां दर्ज कराएं शिकायतें?उन्हें तो सूखना ही है.भूखा मरेगा भूख सेमरे किसे चिन्ता पड़ी है?बगल से गुजरती कारेंगुजरंेगी ही.सड़क पर चलने कीतमीज भी तो होती है कुछ.कुचला आदमीतमीज से हो जाता है मुक्त.छोड़ कर शान्ति की व्याख्यायेंकुचले आदमी के चेहरे सेनिकलती हैं सहनशीलतायें.यह अलग बात है किसत्याग्रहियों के नहींमोड़े जा सकते हांथ पैर.इसके पहले किउस आदमी की हो अन्तिम क्रियादेख लेना चाहिए पोस्ट मार्टम रिपार्टकि मृतक खड़ा नहीं हो सकता थासŸाा के खिलाफ.कि उसे यकीन नहीं थाअपनी चैड़ी छाती वगठीले बाजुओं पर.यह कि वह डरने वाला आदमी थाडरता था हथियारों से और कांपता था.यह कि वह नहीं जानता था किसंभव है अत्याचारों के खिलाफ अवज्ञा,संभव है इतिहास गढ़ना.जिसके लिए हथियार नहींचैड़ी छाती की जरूरत होती है.चैड़ी छाती तो थी उसकी,बाजू भी गठीले थे,केवल राजनीतिक अलकतरे से बनीसड़क पर चलने कीतमीज नहीं थी उसके पास.वह सिर्फ इतना जानता था किबांए चलना चाहिए औरबांए चलना तमीज है कि नहींउसे क्या पता?....और वह बांए ही चल रहा थाउसे क्या पता था किदांए से प्रभुता-संपन्न कारेंआएंगी हथियारों की तरहउसे रोंद देगी और वहपहुंचा दिया जाएगाकिसी पोस्टमार्टम घर.सभी जानते हैं कि हथियार के लिए अवज्ञा....कुचलने वाली चीज होती है.किताब
घर से निकलने के पहलेवह देख लेना चाहती हैमर्यादाआंें के प्रतीकों कोजिसे प्रकृति ने रच दिया हैउसकी देह पर.याद हैं उसे बीते दिनों कीसमीक्षाएंजिसे बन्द कर दिया गया हैअलबम में.वह तस्बीर भीजिसमंे वह अपनेमित्र के साथ थी उसी तरह जैसे किरहा जा सकता है मित्र के साथ.आश्वस्त और तनेन किवह चल सकेगीउसके साथ बहुत दूर तक.मित्र था कि हो जाना चाहता थाअदृश्य,डूब जाना चाहता था देह कीअतल गहराई में.मित्रता की पनडुब्बी के सहारे.उम्र की गहराई में उतर करवह डर गई थी.मर्दाना जिस्म में मित्र को बदलता देख.मित्रता के दौरान,जब हुई थी उससे मित्रतातब वह नर नहीं लगा था,केवल एक जिस्म थामनुष्यता की असीम ऊर्जा से संपन्न,प्रकृति का बेहतर उत्पाद.उसे नर में बदलता देखतनेन हो गई थी वह भर काबू,भीतर छटपटाती औरत के हक में,निकल आई थी मित्र की पकड़ से बाहरउसे फटकारते हुएकि वह सिर्फ औरत नहीं,बेतरतीबी से लिखे प्रेम पत्रों कीलिपि भी नहीं,वह कथित मर्यादा की किताब भी नहीं,या कि परंपराओं काकोई व्याकरण,छुई मुई नहीं है वह अबनिकल चुकी है घर से बाहरसुरक्षित कराने के लिए अपना हकउन किताबों में जो लिखी जा रहींऔरतों के बारे में.नर का नारा बना उसका मित्रदेखते देखते जाने कैसे बन गया बानरऔर खुद नोचने चोथने लगा अपना जिस्मउसे नहीं पता.औरत
किताबों के पन्नों पर,पत्रिकाओं के कालमों में,घर घर छितराई टीबियों पर,कहां नही ंदिखतींखजुराहो की मूर्तियां,योग से संभोग तक,योग से नियोग तकसभी जगहों पर दिख रहीऔरतें आखिर कहां जाएं,किस नदी में नहाएं जोउतार न पाए उनके देह का पानी.नदी बहा न ले जाए उन्हेंएक घाट से दूसरे घाट तककैसे करें श्रृंगार? किस शीशे में देखेंमन की शुचिता.किसके प्यार, दुलार का लगाएं काजल,किस अलाव पर जलाएं अपनी देह,किस पुरुषार्थ का लगाएं अपटन,जिससे साफ हो जाएं अश्लीलता केसारे प्रतीक चिन्ह.कोई हवन कुण्ड भी तो ऐसा नहींजहां से ले आएं करिश्माई भभूतपोत लें देह पर या पी जाएंजिससे श्लीलता की नई परत उगजाए देह पर.फिर न जनम पाएं बच्चेजो दूध पीते पीतेजाने कैसे सीख जाते हैंदेह चूसना.आग
क्या नहीं जल सकता आग में?सारी चीजें जल जाती हैं आग मेंशायद ऐसा नहीं हैअगर जल सकता आग में सारा कुछ तोजल चुका होता अतीत भीउसके दरवाजे, चैखट और खिड़कियांतो जल ही चुकी होतीं,अतीत के कौतुक और रहस्य भीआग लगते ही जल गए होते.जल गईं होतीं वे आदतेंवह मर्दानगी जोडरे हुए आदमी काकारनामा होता है.बस्तियों में उगाई जाती रही हैंआग, आखिर क्या कहेंगे इसे?लोग कहते हैं आग में क्या नहींजल सकता,जल सकता है सब कुछफिर क्यों नहीं जल रहीहमल व हमला की आदतें?विचार और व्यभिचार की दूरीक्यों नहीं जल रहाआदमी और आदमी का फर्क?उफ! ये चुप्पी ये उदासी,ये सोया हुआ समय,नशे में धुत संवाद,पराजित शब्द.किस लिए तलाशी जा रहींचिनगारियां यामाचिस की तीलियांआओ जाने कहीं आगसोई तो नहींहसीन बिस्तरों परछिनाल कविताओं के संग.भभूत लगाए हुएजब बुझे चूल्हे दिखते हैंरोते कलपते.छितराए होते हैं बर्तनउसके आस पास.लोर इकठ्ठा करने से क्या होगा?छितराई उंगलियां भीनहीं कर सकतीं कुछ.
उंगलिया जब बन जाती हैं मुठ्ठियां
ब पता चलता हैलोरों से नहीं जलाएजा सकते चूल्हे,फिर जाने क्या हो जाता हैकि लोरों के संग तैरने लगती हैंविस्फोट की चिनगारियां....धत्..... यह तो आग है,आॅखों में बन्दकिसी भूगोल की तरह.बड़े हो रहे
बड़े हो रहे हैं बच्चे और लिखरहे हैं कवितायें, कहानियां.समझने व गढ़ने लगे हैं कानून.अर्थ के लिए अर्थ शास्त्रविश्व के लिए विश्व बाजारविश्व बन्धुत्व के बारे में क्या जानना...वह तो सभी की पूंजी है.अतीत से ही.बड़े हो चुके लोगों की तरहबच्चे भी हो रहे हैं बड़ेबहुतों ने छोड़ दिया हैमाॅ का दूध पीनाउन्हें नहीं चाहिए अबमाॅ के आॅचल की छांव.दूध ही क्या वे छोड ़रहे हैंआंगन और सेहन की भाषा,और नेह की भूषा भी.जो तोपे रहता था पूरी देह.प्यार के अपटन के बारे मेंउन्हें अब कुछ भी नहीं पता...जिसे लगाया करती थी माॅ या दादी.अब वे बीते दिनों से उतना ही दूर हैंजितना कि नजदीक हैं आने वाले दिनों से.वे नहीं चाहतेसुनना माॅ की लोरियां,बाप का तुतलाना,और चूसना आंगन के भूगोल कोजिसे चूस कर हीबड़े हुए हैं, और भी बड़े हों शायद.रोटी
पकड़ ढीली पड़ती जा रहीलगातारआदमी होने केब्याकरण की.ब्याकरण है कि किताबें चूम रहा है.और कचहरी के सामने खड़े खड़ेमुस्करा रहा है.वह कई बार लतिया चुका हैनिष्ठुर सहनशीलताओं को.जो अक्सर ऊंघती रहती हैंकिसी आराधना केन्द्र में बैठ कर.लतियाने को तो वहउस राजनीति को भी लतिया चुका हैजिसे पता ही नहीं किविनम्रता भी कोई चीज होती है.अन्तश्चेतना भी होती हैआदमी के पास.जिसे नहीं पढ़ पा रहा आदमीऔर डूब जा रहा है समयके माया जाल में.कानून जिसे चूम रहा आदमीनहीं सिखा सकताकिसी को आदमी होने की तमीज.उसके पास नहीं होतींबराबर देखने वाली आॅखें.और लोग हैं किपोलिंग बूथ पर मचाए हुए हैंउछल कूदपकड़ने के लिएआसमान में टंगी रोटियां.डाक्टर लोहिया के प्रतिअन्धेरों में जब न दिख सके वह मूरतजो सत्य, अहिंसा व करुणा से गढ़ी गई होबनाई गई हो काट कर तटस्थता की चट्टान.आस्था और विश्वाश की छेनियों से.जला लेना जरुरी होता है ऐसे समय कोई दियाताकि साफ साफ देखी जा सके,मूरत के हृदय में बैठी दुनिया की तस्बीर.मूरत जो कभी बतिया नहीं सकतीनहीं जा सकती जनता के सभागारों मेंफिर कैसे पूछा जा सकता है उससे?बताओ तुम्हारे होते हुए कैसे उभर रहेजातियों के चकŸो?कैसे बह रहे सांप्रदायिकता के खून?सूरज जो टहलता टहलताचला जा रहा पश्चिम की तरफनहीं लौट रहा वापस, किस अदालत मेंतलब किया जा सकता है बुद्ध को?किससे पूछा जाय आखिरअचैर्य अपरिग्रह व अस्तेय कहां चले गए?महाबीर को भी तो नहीं बुलाया जा सकतावैसे भी दुनिया में कम नहीं हैं कायिक वेदनायेंजो बिखरी पड़ी हैं हर तरफ.गवाही के लिए, मतदान के लिए,खुद को निरपराध बताने के लिए,संभव है, अदालत ही उठ जायपड़ जाय कोई दूसरी तारीख.तलब कर लिया जाय राम को भी औरपूछा जाये सामाजिक असंतोषों के बारे में.या यह कि कृष्ण ने क्यों इनकार कर दिया थाअस्त्र धारण से?किन किन मुद्दों पर कराया जा सकता है मतदानआखिर कौन बता सकता है कि...‘धर्म दूर गामी राजनीति है और राजनीति अल्प कालीन धर्म’घंटों शंखों याकि अजानों ने तो अब तककभी नहीं बताया चीखों के बारे में,कफर््यू के बारे में,फिर क्या किया जाय, कैसे मुक्त कराया जायबन्दी सचों को, सभी चाहते हैं किसचों को न पहनाई जांय हथकडि़यांलेकिन वाह रे! इहलौकिकतातथा पारलौकिकता की घूंटीअद्भुत रसायन है उसमें मिला हुआजिसके सहारे लगातार बढ़ाया जा रहाआदमी और आदमी में फर्क.निर्वस्त्र हुई द्रोपदी या कि अंगूठा कटा एकलव्यये कैसे उदाहरण हैं अतीत के?कहां भटक रही वह ज्योति जोआदमी को बनाती है महामानवआखिर कहां है अब तक.अब भी समय है जनता के क्रन्दन परभागे चले आओआखिर कब तक चखता रहेगा भाग्यफल,इहलौकिक आदमी.कब तक भटकता रहेगा पारलौकिकता के स्वर्ग में?वैसे सपने छितराये तो रहते ही हैं आकाश मेंपर वहां बादल भी तो चुप बैठे नहीं रहते.बरसें तो नहाए कोई, नहा लेना भले हो आसानपर आसान नहीं होता कियारियों में पानी रोक लेना.कियारियां पानी क्या रोकेंगीवहां तो पहले से ही जमी हुई है अतीत कीनिर्लज्ज तटस्थताएं.गली गली बिखरी मूर्तियां भी तो चुप हैंजिन्हें गढ़ा है अतीत ने, वे कुछ नहीं कर रहींवे जानती हैं कि गढ़ेगी़ दुनिया हीसमय की कोई मूरतकविता के भीतर
इस छोर से उस छोर तक गोयाजहां से शुरू होते हैं छोर, सभीजगहों पर बिछी हुई हैं सुरंगे,उसके बिस्फोटों मेंहोती हैं किसिम किसिम की आवाजें,तथा वह आवाज भीजिससे कांप जाती है दुनिया.पर नहीं कांपती जिन्दा कविता.वह घुस जाती है राजमहलों मेंखड़ी हो जाती है विस्फोटों के खिलाफ.कविता कोशिश करती हैकि दुनिया तब्दीलन होने पाए नपुंसक जनतंत्र में.स्वतंत्रताएं हो जांए इतनी सहनशील किनिकल पड़ें अधिकारांे की भीख मांगने.फिर तो भूल ही जाना हैअपने प्राकृतिक औरनैसर्गिक अधिकारों का पक्ष.और घूम घूम कर मंागते रहना है,घर बनाने के लिएजमीन का छोटा टकड़ा भी.छाजन के लिए घांस फूसऔर भी बहुत सी जरूरीचीजें, मसलन रोटी,चमके जो चाॅद की तरह.कविता नहीं करती वकालत ऐसे कामों की.आदमी जब था कविता से बाहर तब थाअब नहीं है कविता से बाहर.वह घुस चुका है कविता के भीतर,साफ करने के लिए वहां पड़े तमाम कचरे.कविता की वह जमीन!जो कभी हुआ करती थी..राजमहलों के भीतर,जिस पर उगा करती थींहमल तथा हमलों की कहानियांतथा लाद दिया जाता था,कविता की पीठ परबहादुरी का कूड़ा,ऐश्वर्य के खर पतवार.वह समय और थाजब कविता करती थीसिंगार पटार, खड़ी होती थीआईने के सामने.सज धज कर बैठती थीखिड़की पर.नाचती थी महफिलों में,और बोलती थी किदीवार में होती है खिड़की.अब कवितायें तोड़ रही हैंविवशताओं के पहाड़,बांध रही है बर्बरता की पगलाई नदी.नहा कर निकली हैं अभी अभी,वर्जनाओं के घाट से.वे दौड़ रही हैं और दौड़ जाती हैंउस तरफ बेखौफपकड़ लेती हैंआतताइयों को, जो जलाने आते हैंअक्षरों की बस्ती.अब अक्षरों के घर में
उदास नहीं हैं कवितायें चाहे जिधर से देखो
इस छोर से या उस छोर से.
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