Wednesday, May 22, 2013

असुविधा मेरी कविताएं jan-jun 2013

 


 अपनी बात


असुविधा मेें खुद की कवितायें प्रकाशित करते हुए मुझे भला नहीं लग रहा, फिर भी एसा करना पड़ रहा है. असुविधा के पाठक जानते हैं कि असुविधा अपने जनपद सोनभद्र के रचनाकारों को प्रकाश में लाने की कोशिश कर रही है, प्रस्तुत अंक भी स्थानीय रचनाकारों के लिए प्रस्तावित था पर ऐसा संभव नहीं हो पाया. हमारे प्रिय रचनाकार हमें अपनी रचनायें उपलब्ध नहीं करा सके. फलस्वरूप इस अंक को मुझे अपनी ही कविताओं पर केन्द्रित करना पड़ा.
वैसे यह निश्चित है अगर किसी तरह की बाधा उपस्थित नहीं हुई तो असुविधा का अगला अंक भी पहले की तरह स्थानीय रचनाकार पर ही केन्द्रित होगा. इसके बाद हम असुविधा को सामान्य अंकों की तरह प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे.
इस अंक में प्रकाशित कवितायें मेरी हैं पर मैं इनका रचनाकार नहीं हूं इन्हें तो रचा है यहां की प्रकृति ने, यहां की माटी ने, यहां की सोन, बिजुल, कनहर, बेलन जैसी नदियों ने. प्रस्तुत कविताओं के एक एक शब्द यहां के आदिवासियों के आॅसुओं में नहाये हुए हैं, कविताओं की कला तथा उसका ब्याकरण सारा कुछ उनकी सूखी आॅतों ने गढ़ा है.
मुझे अपनी कविताओं के बारे में कुछ नहीं कहना. प्रस्तुत कवितायें मेरी आह तथा कराह की उपज हैं, उस आह तथा कराह की जिसके कारण मैं यहां के शोषितों वंचितों की नैतिक लड़ाई में शामिल नहीं हो सका और कागज पर उपन्यास, कहानियां तथा कवितायें आदि लिखता रहा. यह मान कर कि रचनाधर्मिता के द्वारा भी सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ी जा सकती है पर अब मानता हूं कि कागज पर कविताओं, कहानियों को उतारना एक बात है और वंचितों के साथ जमीन पर खड़े हो कर जनतंात्रिक लड़ाई लड़ते हुए इन्कलाब जिन्दावाद बोलना  और खुद कोई कविता या कहानी बन जाना अलग बात है.
प्रस्तुत कवितायें कैसी हैं, साहित्य के कौशल से लबालब हैं कि नहीं, इनमें आघात, प्रतिघात करने की क्षमता है कि नहीं, इनमें क्या है इसका मूल्यांकन तो आप सुधी पाठक ही करेंगे. प्रस्तुत कवितायें सोनभद्र के तनावपूर्ण एवं निराशापूर्ण परिस्थितियों की उपज हैं इतना कहने की अनुमति तो मुझे अवश्य ही मिलनी चाहिए. अब जरा सोचिए सोनभद्र के बारे में... यहां ऊंची ऊंची चिमनियां हैं, दुनिया के माने जाने कमाऊ कारखाने हैं जो लाभ कमाने के शिखर तापमान पर हैं, लाभ के बारे में किसे नहीं पता कि लाभ श्रम मूल्य का शोषण और कानूनी घालमेल का हास्यास्पद कौतुक है. इस मनुष्यता विरोधी कौतुक के द्वारा लाभ का ब्यक्तिगत हितों के लिए कानूनी रूप से रूपान्तरण किया जाता है इसें ही संपŸिा के अधिकार के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है, समझना यह है कि क्या इस संपŸिा के अधिकार ने कभी मानव सभ्यता का सर्वांगीण भला किया?
सोनभद्र में आदमी की दो तरह की तस्वीर है एक है भूख और गरीबी से बिलबिलाते शोषित और उपेक्षित लोगों की तो दूसरी है भूख और गरीबी की पीठ पर लोककल्याण और जनहित लिखने वालों की. यहां का वन विभाग तो जाने कब से गरीबों की पीठ पर पर्यावरण बचाने की हमलावर गोष्ठियां कर रहा है. तो यह है हमारा सोनभद्र, इसी सोनभद्र में हम रहते हैं और हमें साफ दिखाई दे रहा है कि यह जो हमारा सोनभद्र है राजनीति के जघन्य करतबों का दुष्परिणाम है. यहां की माटी की पवित्रता, उसकी सोन्धी गंध से उपजी मानवीय समीपता तथा सहभागिता, एक हल की जोत वाली संस्कृति, एक दूसरे के प्रति भाई चारे की भावना सारा कुछ यहां की चिमनियों ने लील लिया है और पूरे सोनभद्र को रुपयों के बेहया मकड़जाल में जकड़ लिया है.
आप चाहें तो सोनभद्र आ कर प्रस्तुत कविताओं की तरह तमाम तरह की कविताओं की खोज कर सकते हैं और महसूस कर सकते हैं कि जब डायनामाइट पहाड़ों को बारूदी करतबों से उड़ाते हैं तब जाने कितनी कवितायें और कहानियाॅ भी चोटिल तथा घायल होती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ घायल कवितायें इस आशा के साथ कि आप इन कविताओं पर अपनी बौद्धिकता का मलहम अवश्य ही लगाएंगे.

 
जून 2013

संपर्क:   अक्षर घर, हर्ष नगर
पूरब मोहाल, रावर्टसगंज सोनभद्र,
उ.प्र.  231216
मोबाइल नं.  07376900866, 09452584032
                     




                                                           

           

 आदमी खलिहान नहीं हो सकता


वे खलिहान थे और सूरज उगने से लेकर डूखलिहान बने रहते थे
खलिहान से अलग वे गोशाला भी थे                                          
तथा रात भर खाट पर लेटे बैठे पगुराते रहते थे,                      
 उनका पगुराना उन लोगों की तरह था,                                  
 जो दिन भर या रात भर देश बन कर,                              
कभी कुछ तो कभी कुछ,                                      
                                  उपदेश दिया करते थे                                                                          
 हालाकि पगुराना; खामोशी से किया
जाने वाला कर्म है, जबकि उपदेश....
यह तो विशेष किस्म के चिल्ल पों का उत्पाद है                                              
 ंखास उत्पाद तो वे भी हैं जो देशी विदेशी या
आर्य अनार्य की जांच करते हैं                                              
तथा धर्म कर्म को
भूगोल पर चिपका कर संस्कृति संवारना चाहते हैं
बहरहाल वे खलिहान थे और                                                          
 खलिहान बने रहना चाहते थे
लेकिन जब गोशाला बनते थे और पगुराने लगते थे
फिर तो भूल जाते थे कि                                                      
अमीन कुरकी के लिए धमकिया रहा था
साहूकार कर्ज वसूली में बैल हांक रहा था
बच्चों का स्कूल जाना छूट गया है
उनकी पत्नी तेतरी इस लिए मरी थी क्योंकि                        
वे दवाई नहीं करा सके थे, तो क्या वे                          
 खलिहान और गोशाला के बीच की कोई चीज थे
या दोनांे थे, या दोनों में से                                          
 कोई एक ही चीज थे
गोशाला या खलिहान
चलिए मान लेते हैं कि वे खलिहान थे                            
गोशाला होते तो अपने बाबत                                        
 भी न सोच पाते, खेती भी काहे करते
वे खलिहान थे तो थोडी़ सुविधा थी

शुभ शुभ था वे खुली प्रतियोगिता में थे                            
 चाहे जितना अनाज पैदा करें
उसे खुले बाजार या काला बाजार में बेचें                                  
 सबसे बड़ी बात खेती करना
उनका अपना चुनाव था                    
और अपना चुनाव गलत हो संभव नहीं
वे खलिहान थेे या गोशाला इस बाबत आलोचक      
विरोध कर रहे थे, खास तौर से वे जो मठी थे,
उनका मानना था कि
आदमी खलिहान नहीं हो सकता
वह भी ऐसे समय में, जब पुल,
सड़कें और चिमनियां
स्तनों की तरह हिल रही हों,
तथा घर में कुदाल रखना
अश्लीलता हो, ऐसा समय जब जाति की पीठ पर
चुनाव की मुहर लगाई जा रही हो
और खलिहान से जुडे लोग                                              
आत्म हत्या को देह मुक्ति का
उपकरण समझ रहे हों
फिर तो ऐसे समय में आदमी
खलिहान नहीं हो सकता,
पर भारत तो कृषि प्रधान देश है    
आखिर इस सूत्र का क्या होगा?
यह सूत्र तो हजारों साल से प्रमाणित है                    
फिर आलोचक क्या बोल रहा?
तर्क दिया जा सकता है कि
आलोचक महज विश्वविद्यालय होता है                                  
 सो उसे विश्वविद्यालय के बारे में बोलना चाहिए,
तथा अच्छे राजनीतिज्ञों की
मुकम्मल नकल करना चहिए,                                                      
 एक भी ऐसा उदाहरण नहीं कि किसी राजनीतिज्ञ ने
कुर्सी छोड़ने के बाबत कभी गंू गा किया हो                            
वह जब भी बोलता है, उसमें संसद होती है                                  
 एक कुर्सी होती है, कुछ कानून होते हैं,                    
प्रधान मंत्री बनने का गुणा भाग होता है
आखिर आलोचक होता भी कौन है?                                    
चाहे वह कोई नामवर ही क्यों न हो
कौन होता है खलिहान के बारे में सोचने वाला?
उसे सोचना और बोलना है तो                                    
 विश्वविद्यालय के बारे में बोले                                                        
जो बौद्धिकों के उत्पादन का कारखाना है,                              
 एक ऐसा उत्पादन जिसके लिए कहीं बाजार नहीं,                        
 जबकि खलिहान! खलिहान तो मुकम्म्लि बाजार है
खलिहान में ही अनाज, अनाज जैसा दिखता है,
वहां उसकी सफाई की जाती है,
दुल्हन की तरह सजाया जाता है उसे                                                
 साफ अनाज खुद बखुद दूसरे का हो जाता है                                
 किसका हो जाता है पूछने वाला जाने.....
अनाज खेतों में पैदा होता है,
खेत साहूकार या महजन का या
सरकार का, बहुत हुआ तो जमीनदार का.                                            
 पर खेती करने वालों का नहीं.
इसके अलावा और क्या होता है बाजार में                          
 जिसका बाजा बजाया जा रहा हर तरफ                                        
तो क्या, खलिहान के बाजार में, खलिहान का आदमी
दुरूस्त बाजार होता है, जिसे कभी भी बिक जाना है    
और वह बिकता है चुनाव में,
बिकता है तहसील के हवालात में, या जेल में
वह बिकता है थाने पर, जरा सोचिए!
खलिहान और खलिहान का आदमी                                        
न हो तो क्या होगा?
आपके घर के गुशलखाने की सफाई करने वाला
न हो तो क्या होगा? क्या होगा अगर आपके घर का?
जब खाना बनाने वाली दाई न हो, और आप
अपने पवित्र हाथ से वह सारा काम निपटाते हों
जिसे नौकर निपटाते रहे हों.....
क्या होगा उस देश का, उस संविधान का                                                            
जिसके हर छोटे बड़े आदेश उसकी
/ / 7/ /
पीठ पर लिखे जाते हैं  
वैसे कहा जाता है कि संविधान भी      
उसकी पीठ पर ही लिखा गया था      
ऐसे में भूमंडलीकरण, उपभोक्ता संस्कृति                                      
 या खुला बाजार वगैरह ...                                                                        
 कुछ जरूरी लिखना ही हो तो ,                                                    
 कहां लिखा जाएगा?
क्या पीठ पर ?                                                      
 पीठ तो वैसे ही भरी हुई है                                                            
धर्म कानून परंपराओं आदि से                                                              
 जाने क्या क्या लिखा हुआ है वहां ?
हाॅ गोली के लिए जगह
बनाई जा सकती है,                                      
जो छेद सकती है,
तमाम लिखा हुआ.
पेट पर भी लिखा जा सकता
है कुछ
पर...पेट तो खाली है,
उस पर क्या लिखाएगा?
सभी जानते हैं
‘बुभुक्षितम किम न करोति पापम्’
फिर यह भी तो है
खाली पेट की कोई भाषा नहीं होती
जबकि किसान मजूर गरीब
शोषित, विस्थापित वगैरह
ये तो राष्ट्र भाषा हैं फिर                                              
 राष्ट्र भाषा को पढ़ने गुनने की क्या
जरूरत?
               

  अभी तो पचास साल ही   गुजरे हैं भाई


अभी तो पचास साल ही गुजरे हैं भाई
हजारों साल लग गये होंगे
बन्दर से आदमी बनने में.
अभी तो कलमबन्द भी नहीं की जा सकी हैं
गुलामी के अपराधों की क्र्र्र्र्रूर गाथायें
अभी तो उस ओर भी जाना बाकी है
जहाॅ हवा की गंध में सूंघी जा सकती हैं
अंग्रेजी राज की बदबू
चलो छोड़ दो इसे तथा उन दूर दराज                                  
के इलाकों को भी उनके भाग्य पर
पर उनके बयान तो नोट कर ही लिए जॅायंे
जिनका साबिका पड़ा करता है
लेखपाल, दरोगा अमीन या मास्टर से
उनसे इतना तो पूछ लिया जाये
थाने पर गालियाॅ मिलती हैं या नहीं
स्कूल खुले रहते हों्रगे नऽ
अमीन ने घर कुर्क नहीं किया नऽ
और लेखपाल ने तुम्हारा रहवास
दर्ज कर लिया होगा
फिर तो कागज पर तुम्हारा घर चढ़ गया होगा
इसके पहले कि इनके बयान नोट किए जांये
देख लिया जाये संवैधानिक संशोधनों को
कि उनमें खेद व्यक्त
करने वाले शब्द हैं कि नहीं, जो बताते हैं परवशता
अॅग्रेजी नश्लों के कानूनों को लागू करने की
अरे भाई!
पचास साल की कच्ची उमर में ही खेलने लगे
संविधान से
सोचने लगे कि कुंआ ही समुन्द्र है
और फलंागने लगे मेढक की नाई
कम से कम दूध के दांत तो टूट जाने देते और
स्वतंत्रता के चिकने गालों पर, बाल तो उगने देते
अभी तो नसीहतें सीखने का समय है भाई!
खास तौर से उन लोगों से जिन्होने देेखा परखा है
गुलामी को आजादी में तब्दील होते हुए
किसी जादू माफिक
वैसे दुनिया जादूगर नहीं होती
पर होते हैं जादूगर
इसी दुनिया में,
दुनिया देखती है उनका जादू
जादू भी किसिम किसिम का
पगार पाने वालों के हड़ताल का जादू
दल बदलुओं के सरकार बदल का जादू
फिर चुनाव दर चुनाव का जादू
वैसे जादू तो और भी हैं भाई!
तथा यह उनका ही असर है कि
लोकशाही में भी नौकरशाही भली लगती है
और कभी कभी तो तानाशाही की पालकी
कहार की तरह ढोना भी भला
लगने लगता है
अभी तो दहाइयां ही गुजरी हैं कि
गुजर गये पचास साल
संभव है गुजरें अभी और पचास साल
और फिर भी न समझा जा सके
तख्ता पलट का जादू
और हर साल मनाया जाता रहे
परतंत्रता का स्वतंत्रता दिवस
       

   सच की आॅच


सच की आॅच या अधिकारों के उपले
जिस पर सेकी जा सकंे रोटियाॅ
कहाॅ हैं दोस्तों ?
खेत की मेड़ों पर कब्जा जमाए
किसिम किसिम के
झूठों को रौंदने की शक्ति
यदि सूरज से हासिल हो सकती
तो जमाना जाने कब का
बन्द मुठ्ठियों का मतलब समझ चुका होता
गोदामों में बंद भूख
संसद में सिसकती बेरोजगारी
थाने पर घायल पड़ा मानवाधिकार
आखिर ऐसा क्यों है?
सारा कुछ बेपर्द हो चुका होता
विचारों के खलिहान से गुजरते हुए
मुझे लगता है कि
वहां से अनाज का एक दाना भी                                              
भीख में नही पाया जा सकता,                        
कानूनों की नहर, उन्हीं खेतों को सींचती है
जिनके मालिकों की लाठियां,
कानून की परिभाषायें गढ़ती हैं.
तथा जो माहिर होते हैं, गोलियां दागने में
इतिहास के पन्नों पर,
कभी बुलेट से तो कभी बैलेट से.
अभिमत के सच के लिए
शाश्वत अत्याचार तथा
गूंगी आचार संहिता की पोथी
विशेषाधिकारों के
किसी भी कुठिला में देखी जा सकती है
दोस्तों!
भूखे बच्चों को खिलाने के लिए
पत्नी की देह ढंकने के लिए
क्या फोड़े जा सकते हैं कुठिले?
परंपराओं की चटटान पर
छेनियों से भूख की इबारत लिखी जा सकती है?
कि हम इन्सान हैं
और निकाल सकते हैं कुठिला में बन्द
आचार संहिता की पोथी.
ढेंकी पर कूटने या जाॅत पर पीसने के लिए
ताकि बनाई जा सकें रोटियाॅ,
सेंकी जा सके सच की आॅच पर
फिर खाया जा सके.
अगर जीवन का मतलब जीना है और
जीते रहना है फिर तो
जीने के लिए किए जाने वाले
हस्तक्षेप भला कैसे हो सकते हैं?
मनुष्यता के खिलाफ या गैर कानूनी
किसे नहीं मालूम कि
जीवन जीना सबसे बड़ा सच है
और जीवन को सच की आंच में
सेकते रहना उससे भी बड़ा तथा
जरूरी सच.
सच की आॅच, सन्तुलन में है
समझौते में है, सहनशीलता में है तो
सच की आॅच अनुरोध के अलावा
प्रतिरोध में भी तो है.
और प्रतिरोध, उसके बारे में क्या कहना!


        पोलीथिन


संभव है बदल जाए दुनिया की तस्बीर
और आदमी वस्तु के बदले
समझा जाने लगे आदमी
पहले की तरह.
पहले की तरह ही अॅखुआए उसके भीतर
आदमियत, संभव है,
संभव है, पहाड़ तोड़क व
नदी बांधने वाली दुनिया
भहरा जाए अपने ही कारणों से,
बन जाए प्रकृति का नैसर्गिक उपहार.
लेकिन तब तक तो
आग लग चुकी होगी हर तरफ
जल रहा होगा सारा कुछ
अभी तो नहीं जल रहा क्षितिज
नही गरम हुआ है नदियों का पानी
नही कहीं फूट रहा ज्वालामुखी
नही आदमी ने सोना बन्द कर दिया                                            
कानून के नरम बिस्तरों पर.
कानून की हमबिस्तरी आखिर किसे
अच्छी नहीं लगेगी?
खास तौर से ऐसे कानूनों की
जिनमें हों गुदगुदियां ही गुदगुदियां,
दूसरों पर हंसने की मादक हंसियां.
ऐसे समय में संस्कृतियां अगर मंुह
छिपाएं, धर्म बहक जांए कहीं
भटक जंाए विज्ञान की किसी गुफा में
गुफा से निकलते ही करंे घोषणा,
‘सभै भूमि गोपाल की नहीं होती ’
रूपया नहीं होता हांथ का मैल
अभी तो नहीं जल रही दुनिया
नहीं फैली है आग हर तरफ
अभी बहुत कुछ है सहनीय.
ऐटम बमों पर जमे विश्वासों से अधिक
विश्वास है आदमी का आदमी पर
जबकि आदमी तोड़ा जा रहा
पहाड़ की तरह
खोदा जा रहा खदान की नाईं.
भरा जा रहा कार्टूनों में
पोलथीनों में ठूंसा आदमी
उधरा रहा बाजार में.                                              
 दूकानदार समझा रहा खरीदार को
दिखा रहा पैकेट
इस पैकेट में एक ईमानदार
और मिहनती आदमी है
इसका दाम भी बहुत सस्ता है
और इसके साथ
एक पैकेट मुफ्त,
इस पैकेट में भी आदमी ही है
लेकिन थोड़ा कम ईमानदार और मिहनती
क्या यही बाजार बदलेगा
दुनिया की तस्बीर?                                                                      
नहीं भाई नहीं ,
बदलेगी दुनिया किसी न किसी दिन
लेकिन बाजार से नहीं, धरती पर
पांव जमाने से
खेतों में संकल्प उगाने से.


     काल-चक्र


प्रकृति के उपहारों को चाहे जितना
तोड़ लिया जाए, हासिल कर लिया जाए
महारथ, टुकड़े कर लिए जांए अणुओं के,
खोज लिए जांए ऊर्जा के श्रोत
और विज्ञान पीठ पर लाद कर घूमने लगे आदमी
देखो! यह कर लिया, वह कर लिया,
लगे कहने, पर क्या बना पाएगा कोई पहाड़,
एक नदी, एक पोखर, एक पेड़ या कोई झाड़ी ही.
यह कैसा ज्ञान है भाई!
जो नहीं खोज पा रहा
मन की वह गति जिसमें होती है
सहनशीलता की ऊर्जा,
सपनों की शीतलता,
होती हैं आकांक्षाएं,
कुछ धुंधले उत्साह तथा जीवन
बचाने की जिजीविषा.
यह सारा कुछ पारलौकिक तो नहीं
फिर क्या है भाई ? इसके ज्ञान को
किस प्रयोग शाला में,
किस परख नली में परखना चाह रहा
विज्ञान?
इसके बारे में क्यों पसरी है चुप्पी?
किसे नहीं पता कि धर्म या कानून की
मेंहदी नहीं बदल सकती हांथ का रंग व
चेहरे की चमक
आखिर किसे अच्छा लगता है
करना कुछ और कहना कुछ,
सिवाय अपने के
विज्ञान क्यों नहीं मिटा पा रहा?
कथनी और करनी का फर्क
यह कैसी इहलौकिकता है?
तलवा चाटू जी हुजूरी की
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क्या इस लिए कि अकेले ही पिया जा सके
रास रंग तथा अनुराग का पानी
उड़ाया जा सके मन को हवा से भी तेज
बनाया जा सके धरती के किसी टुकड़े को
कथित स्वर्ग वह भी सिर्फ अपने लिए
आखिर विज्ञान को कब सूझेगा कि
बढ़ती जा रही हैं संपन्नता की जिदें,
हद से बाहर, लांघ चुकी हैं                                                
मानवता की सारी सीमाएं.
दुर्भिक्ष, भुखमरी तथा आत्म हत्यायें
ये तो बहुत ही छोटे उदाहरण हैं
अभी संभाला जा सकता है,
कब्र-गाहों में बदलने से बचाई जा
सकती है दुनिया,
बाद में जाने क्या हो अगर
विपन्नता की भूख खाना शुरू कर दे बारूद,                          
 आंतें हजम करने लगें गोलियां
फिर क्या होगा इस दुनिया का?
जो पहले से ही बैठी हुई है
बारूद की ढेर पर
विज्ञान केवल तोड़ सकता है पहाड़, पर
नहीं तोड़ सकता आदमी का मन.
मन जब गुनगुनाने लगते हैं गीत
फिर वही बन जाते हंै जन-गीत
सभी जानते हैं कि कितना हू
हो सरकार गदराई
नहीं झेल सकती जन-अंगड़ाई
अगर विज्ञान, ज्ञान की ही
प्रजाति है कोई
फिर तो इसे जन की                                                              
अभ्यर्थना में लग जाना चाहिए
कुछ ऐसा करना चाहिए कि आदमी
हो सके तन कर खड़ा
उतर सके मन की गहराई में
बतिया सके स्वाभिमान के साथ
भले ही न बना सके वर्ग समूह.
कम से कम पढ तो सके
लोक-सत्य का पाठ
जो लिखा जा रहा, वर्तमान के ब्लैकबोर्ड पर
अतीत की दुर्गम खोहों में भी
हो सकती हैं सुगम राहें
जिस पर चला जा सकता है कुछ दूर तक
भविष्य की गठरी उठाए
तथा समझा जा सकता है
उत्थान पतन या जीत हार और यह भी
कि पतन तथा हार नहीं लील सकतीं
संघर्ष की मर्यादा.
वैसे तो कोई भी वर्तमान होता है भूत ही                                
पर जब वर्तमान के अन्धेरे ही
हो जांए धवल वस्त्र धारी
बनाने लगें आचार संहिताएं फिर उस क्षण का
क्या होगा?
जो ले कर आया है क्षण का पूरा साक्षात्कार
वही साक्षात्कार जो प्रारंभ होता है
यातना शिविरों से, जली हुई बस्तियों से,
गिरमिटियों के चेहरों से,
अतीत के स्मारकों से,
जहां तराशे गए हैं बन्दी भूगोल
इतिहास प्यासा मरा है, पानी बिना
नागरिकतायें मांग रही हैं रोटियां.
आखिर कब बचाया जाएगा समय को
                                                                                          सामंती उद्योगों से?                                                                                                                                                                                                
यह कैसा है काल-चक्र?
जहां बिक रहीं अनुभूतियां
बिक रहा एकान्त
ज्ञान का हो रहा पेटेन्ट.
अरे! उस तकनीक को तो बचा लीजिए,
न बेचिए बाजार में
जिससे हरियाती है मन की जमीन.
देख कर जिसे मोहित
हो जाता है मौसम का
कमीना पन.
वैसे सभी जानते हैं कि
दिमागदार नहीं होते फलदार
पौधों की तरह.
उनके भीतर नहीं होती
बगीचों वाली शान्ति.
फिर क्या कहा जा सकता है
कि ज्ञान, होता क्या है?
क्या फर्क है ज्ञान और विज्ञान में                                      
कहीं प्रकृति का दोहन ही तो नहीं,
आदमी तथा पहाड़ दोनों
दूहे जा सकते हैं
गाय की तरह
कभी भी और किसी समय
यही तो नहीं....
काल का चक्र या
चक्र का काल


     निर्वस्त्र

विचारों के पौधे
रोपना चाहता हूूं कियारियों में,
पर उन्हंे सीचने के लिए
कहां से पाऊंगा सुविधाओं का पानी?
यकीन कर लिया जाय अगर कि
विपरीत परिस्थितियोें में भी
मिल सकती हैं कियारियां,
बदचलन मौसम की उदारतायें
करा सकती हैं बरसात
भर सकते हैं बन्धे,
पिछले साल हो हल्ला मचा था,
कि इस साल नहर की नालियां
छोड़ देंगीं परधान को सलाम करना
मान लेते हैं कि हमारी कियारियां
नहीं रहेंगी पियासी
खैर छोडि़ए इसे...
आइए उस दफ्तर को
देख लें
जो निर्बलों के लिए करते हैं इन्तजाम
रोटी, कपड़ा और मकान का.
पिछले साल के बने स्थाई आवास
भहरा कर अस्थाई हो गए इस साल.
अगर उनके होते पक्के मकान
लाल किला की तरह मजबूत
तो वे छत पर बैठ कर
‘संतोष ही सबसे बड़ा धन है’
का कथित नैतिक पाठ अपने
लड़के और बीबी को पढाते.....
‘पक्के मकानों में अनाज रखने का मजा
ही कुछ और है’
दीवार की चमक देखते ही
चुधिया जाएंगी
अमीन की आॅखंे.
कर्ज वसूली में वह बांध नहीं पाएगा हाथ.
वही हाथ जिससे
चुनाव में लगाई जाती है मुहर.
गोदामों की आशिकी छोड़
खलिहान झूलेंगे उनकी बाहों में.
सावन के अग्रिम गीत गुन गुनाते हुए
परधान ही बन जाएगा उनके लिए धान
वे इतने ताकतवर हो जाएंगे
तथा खुद पर यकीन करने लगेंगे कि
उठा लेंगे पैना बादलों की तरफ
फिल्मी हीरो से भी कड़क बोलेंगे.
खबरदार!
जो रिमझिम किए
हमारे गरम मिजाज को नरम किए
देखते नहीं,
पकी फसलों की दुल्हन
बेताब है घर आने के लिए
और तुम
उसे करना चाहते हो
निर्वस्त्र.
 


       खुदपाल


लोक तो वह जूता है
जिसे पहन कर चला जा सकता है पगडंडियों पर
जाया जा सकता है
पोलिंग बूथों की तरफ.
संसद में जाते समय जरूरी है पहनना
लोक के जूते को.
जिससे गांवों की माटी की सोन्हीं गंध
चिपकाई जा सके उन कानूनों पर जो
बनाए जा रहे होते है गांवों के लिए.
लोग जानते हैं कि लोक है तो परलोक भी है,
संभालना दोनों को पड़ता है
लोक को भी परलोक को भी.
परलोक में सब कुछ ठीक ठाक रहेगा
तभी संभल सकता है लोक भी.
ऐसी नसीहतें हैं किताबों की
जिनके एक अक्षर भी
नहीं जाते पानी पीने किसी घाट पर.
नहीं परोसते किसी को खाना
भीख में कुछ देने का तो सवाल ही नहीं.
पर उनमें लोक के बारे में होती हैं
बलात्कारी चिन्ताएं,
कोई भी किताब उठा लीजिए
छल छलाए रहतें हैं उन पर आॅसू
आॅसुओं से भीगी होती है पूरी किताब.
किसे नहीं पता कि
जनेऊ के अलावा किसी दूसरी कंपनी के जूते पहन कर
परलोक नहीं जाया जा सकता.
जो अब उग रही है गांव गांव गली गली.
सूचना तो यह भी है कि
परलोक ठीक से नहीं चल रहा.
बढ़ती सांप्रदायिकता से परेशान हैं परलोक वासी
अपने यहां की तरह ही वहां भी हो रही हैं बहसें,
बहसों में गरम है मामला भ्रष्टाचार का
अभी परिभाषित नहीं हो पाया है कि
कौन है भ्रष्ट और भ्रष्टाचार है क्या आखिर?
वहां की वुद्धिजीवी जनता देख रही है लोक की तरफ
कि लोक कैसे परिभाषित करता है भ्रष्टाचार को
अरे! आचार तो आचार है भाई! फिर यह भ्रष्टाचार क्या?
परलोकवासी तो वैसे ही परेशान है लोक की हरकतों से
हो क्या रहा है वहां? क्या कर रहे है लोक वाले?
उन्हें परलोक के बारे में नहीं पता
जो तलाश रहे हंै
अदालती फाइलों में या
अखबारों में.
थाने पर याद करते हैं परलोक को
सांप्रदायिक दंगों में,
जली हुई बस्तियों में,
अरे! उस आत्मा का क्या हुआ
जिसके बारे में कहा गया है कि
आत्म दर्शन ही ईश्वर दर्शन है.
फिर किसे देख रहे हो
खुद को क्यों नहीं देखते
खुद ही तो तमाम खुदों से मिल कर
बन जाता है लोक.
खुद को जांचने के लिए खुदपाल बनो
क्या करेगा लोकपाल वह भी तो एक खुद है
और उसके पास भी हैं तमाम खुदरा बातें,
अपने बारे में भी तथा लोक के बारे में भी

      भजन और स्वजन

मुझे नहीं मालूम कि बन्दूकें करा सकती हैं शान्ति यज्ञ
जोत सकती हैं खेत का कोई टुकड़ा
जला सकती हैं चूल्हे
लिख सकती हैं स्कूलों में पढ़ाई जा सकने वाली किताबें
या उन गीतों को भी
जिसे गाया जाता है राष्ट्र के नाम पर.
खैर उन भजनों को तो नहीं ही लिख सकतीं बन्दूकें
जिन्हें गाया जाता है मन्दिरों में किसी देवता के सामने
बन्दूकें तो यह भी नहीं कर सकतीं कि
विचारों को सुला दें आरामदेह बिस्तरों पर
और खुद परी की तरह थिरकने लगें.
मन माफक चूमाचाटी करें और
हसीन सपनों को मादक बना दें
मैं नहीं जानता कि बन्दूकें क्या क्या कर सकती हैं?
मैं नहीं जानता बन्दूकों के काम के बारे में,
तथा बन्दूक चलाने वालों के बारे में भी मैं नहीं जानता,
केवल इतना ही जानता हूं कि
बन्दूक जब चलाई जाती है
चाहे कारण कुछ भी हो
मरता है कोई न कोई
मिट जाता जाता है मृतक का अस्तित्व
हर हाल में होती है हिंसा.
बन्दूकें नहीं चलाई जातीं पहाड़ों को निशाना बना कर
नहीं छेदा जाता कोई पेड़,
बन्दूकंे जिन्हें रखा जाता है बहुत सम्हाल कर
बताया जाता है कि यही बचाती हैं सभ्यताएं,
यही बचाती हैं वह भूगोल या सीमांए,
जिनके भीतर छटपटा रहे होते हैं करोड़ों लोग
जिनके माथे पर लिखा होता है
भूख से मरे आदमी का बयान.
वहीं लिखा होता है एक औरत का हलफनामा.
वहीं चिपकी होती है काम क्रीड़ा की किताब.
जिसे पढ़ रहा होता है
नैतिकता की खोल में दुबका आदमी.
मैं नहीं जानता कि
बन्दूकों ने आज तक आदमी को आदमी
से जोड़ने का काम किया है.
कैसे कह सकता है कोई
कि बन्दूकों के करतबों को जानने के लिए
जरूरी है जानना बन्दूकें चलाना
तभी शायद जाना जा सकता है
बन्दूकों के बारे में
हिंसा और अहिंसा के बारे में
पर मैं तो कुछ भी नहीं जानता
सिवाय इसके कि मुझे हर हाल में खड़ा रहना है
लाश की मानिन्द
कचहरी में, थाने पर, या कि संसद में
लाश की मानिन्द ही खड़ा रहना है मन्दिरों में भी
खुद को बचा लेने के बाबत भजन गाते हुए
और मन को बेमन होने से बचाने के लिए
लगातार गाते रहना है कोई वैदिक भजन
भजन हैं तो जन हैं और स्व जन भी


     ताज्जुब      

ताज्जुब है गढ़ी जाने लगी हैं
उन्नतिशील प्रजातियां आदमी की.
धान की प्रजातियों की तरह
अनुशासित रखने के लिए लोगों को.
इतिहास और भूगोल पर खड़ी हैं
ये प्रजातियां धोख की तरह
बन्दूक की भाषा बोलते हुए
बारूद का चन्दन लगाए हुए.
क्या रखा है जुलूसों की                                
 चिचियाती, मिमिययाती बोली में?
                                       उसे चुप कराने के जाने कितने तरीके हैं,                                          
 उसे तितर बितर हो जाना है
लोगों को लौट जाना है अपने घरों की तरफ.
खुद को गरियाते हुए
कोई भी कांप जाएगा,                                              
पत्नी की भीगी आॅखें देखकर
उसमें तैरती जात औैर औकात देख कर
सभी जानते हैं कि धोख से क्या डरना?
ताज्जुब है!
ताज्जुब है धोख की अपनी जात और जमात
नहीं, अपनी विसात नहीं होती
फिर भी उनसे डरते हैं
ताज्जुब है.
ताज्जुब है कि आदमी
आदमी होते हुए भी आदमी से
डरता है, नहीं नहीं ऐसा नहीं
हम आदमी से नहीं
इतिहास की जन्माई
प्रजातियों से डरते हैं.
ताज्जुब है.

   गुस्सा

औरतें परेशान ही नहीं बहुत परेशान हैं
अपने छितराये गुस्सों से
गुस्से बना लेते हैं आॅखों में जगह
इसके पहले कि आॅखंे डबडबा जांये,
और जलते आॅसू टपकने लगें
वे कर लेना चाहती हैं परताल
नाबालिग सुबहों की,
जो घर में घुस कर
करती हैं पुलिसिया कार्यवाही.
उनसे उन भूखी घटनाओं से क्या मतलब?
जो चिल्लाती चीखती हैं, वर्जनाओं के बाबत
जो दर्ज करती हैं भविष्य के घायल होने की
आवारा शिकायतें.
वे फैला पायें अपने पैर
चल पायें किसी सड़क पर
रातों को जी सकें रात भर
कि जाने कहां भाग चुकी होती हंै              ं
आत्मकथा की किताबें.
अपनी खुद की कहानियां भी नहीं होतीं साथ,
विशाक्त धुंआ दबोच लेता है पूरा परिदृश्य
ऐन उस वक्त पढ़ी जाती हैं औरतें
                                       ताजी रपट की तरह                                                                      
और सभी जानते हैं रपट का मतलब.
गवाही का मतलब
किताब का मतलब
गवाही से
किताबसे
रपट से
बहुत परेशान हैं औरतें
उनके गुस्से हैं कि आॅखों में घुस कर
बनते जा रहे अंगारे
औरतें लिखना चाहती हैं
आत्मकथा
समय के करतबों के सारे किस्से.
समय की पीठ पर
समय की बोली में
उस समय का,
जब वे देह नहीं थीं,
जब वे अश्लील नहीं थीं,
जब वे गुडि़या थीं,
खिलौना थीं और उनका समय तब
तुतलाना भी नहीं जानता था.
तब की बातें,
तब की बीतने व सिसकने वाली रातें,
पर क्या लिखें कैसा लिखें,
जिन्हें चैखट का डर नहीं हो.
जो जा सकें खिड़कियों के आर पार
जो बन सकें फूल
गुथ जांए जूडों में, ऐसा क्या है?
जो शील तो हो, पर अश्लील नहीं
परेशान हैं औरतें गीत बन कर
संगीत बन कर,
अपनी खुद की किताब बन कर
परेशान हैं, बहुत परेशान हैं औरतें.
 


   झाड़ू


पहले वह छोटी थी
झाड़ू बडी़ थी.
जब वह बड़ी हुई
झाड़ू छोटी हो गई.
खिलौने की तरह.
अब वह खेलती है उससे
खेलती तो पहले भी थी
पहले की बात दूसरी थी.
अब वह समझने लगी है
झाड़ू में फंसे कचरों की भाषा
खेलते खेलते बुदबुदाती है.
‘इन्हंे सड़क पर ही फेंकना था’
सड़क पर फेंकी जा सकती हैं
सारी चीजें, मसलन
नेपकीन, कंडोम, माला, फूल, चिठ्ठियां,
जूठन, राख, चुनावों के पम्फलेट आदि
झाड़ू से ही बटोरी जाती हैं सड़कें,
पर झाड़ू होती है अपवित्र और
उसे बटोरनी वाली?......
कुछ कामों के लिए नहीं होती अपवित्र.
जब कि हर घर में होती है झाड़ू
और लगाने वाले या वालियां भी होती हैं
हर घर में,
लेकिन हर कोई नहीं कहलाता मेहतर
न हर कोई साफ करता/ करती है
सड़क की सफाई,
जब कि जरूरी है सफाई सड़क की
उसने अपनी उम्र से भी बड़ी करना
सीख लिया है झाड़ू
क्योंकि साफ करना है
सड़क को, नालियों को
नालियों के अलावा भी,
बहुत सारी दूसरी जगहें हैं
बजबजाती हुई जिन्हें भी.
साफ करना होता है उसे
जो बाहर से बहुत साफ दीखती हंै पर
भीतर से....बजबजाती रहती हैं.
बजबजाने का कारण भी वह जानती है.
वह उधर जरूर जाती है
कोई जाये न जाये वह जायेगी.
वह समझती है,
समझती है कि                                                  
नालियों से भी जरूरी है
सफाई दूसरी जगहों की.
जहां पहली बार उसे मालूम हुआ था
कि वह हो गई है बड़ी तथा उसे और भी
बनाया जा सकता है बड़ी.
इसी लिए उसने बड़ी कर लिया है झाड़ू को
अपनी उम्र से भी बड़ी
बहुत बड़ी.
 

    सावधान

सावधान हैं औरतें
जितनी असावधान थीं सीता
अग्निपरीक्षा के समय.
फिर भी पास की थीं परीक्षा
आत्मबल की और राम!
राम को जाने क्या हो गया था?
                                                प्रकृति और पुरूष के युद्ध में                                            
फंस गये थे शायद.                                              
अब कोई अग्नि परीक्षा नहीं है
विचारों के केन्द्र में औरतों के.
वे जान चुकी हैं कि
कृष्ण केवल चीर बढ़ा सकते थे
नहीं कर सकते थे युद्ध.
कुटिल व्यवस्था मिटाने के लिए
जिसके प्रतिनिधि दोनों थे
पांडव और कौरव भी.
वे घर में उफनती किंबदन्तियों को
लतिया कर, सपने बुनती हुई
बहुत दूर तक, वीरानों से भी आगे
जा चुकी हैं.
मिथकों के हरम से बाहर
वे तजबीजने लगी हैं
चाॅद की शीतलता.
सूरज के चारो ओर छितराई
बेरोजगार ऊर्जा के बारे में
वे आश्वस्त हैं कि यही ऊर्जा
किसी न किसी दिन जलाएगी
लिंग भेदी सदाचारों की बस्तियां
वे जानती हैं भविष्य क्या है?
और कौन है जो रचता है भविष्य.
कौन है जो तैयार करता है
आचारों का सिलेबस.
किसकी गन्धाती है नाक
कौन है जो खिड़कियों को
करता है दरवाजों से अलग
और कान लगाए रहता है उनकी
अंतरंग बतकहियों पर.
बहुत कुछ हो रहा है, होता रहा है
वश में होता तो लोग
छीन लेते पŸिायों का हरा पन
नदियों का लहराना
चाॅद की शीतलता
पर नहीं छीना जा सकता कुछ भी
जान चुकी हैं औरतें.
कि वे औरत हैं, और रत नहीं
वे जानती हैं.
माचिस की डिब्बियों में बन्द
परंपराओं की.                          
पोथियां जल जायेंगी
किसी न किसी दिन
खुद ब खुद
इतनी सावधन हैं औरतें
     

    ग्लोब

चूल्हे अगोरने वाली औरतें
बैठने लगी हैं ग्लोब पर.
हासिल करने लगी हैं
भूगोल की अनिवार्य कुर्सियां.
वे मंगा रही हैं
अतीत के महायुद्धों की रिपार्टें.
खास तौर से उन युद्धों की
जो रति आख्यान जन्माने के लिए
लड़े गए थे जनता के पेट पर.
जिन्हें बताया गया था और
बताया जा रहा है अब भी,
कि लड़े गये थे वे युद्ध
जनता की लड़ाई, जनता के लिए
जनता के द्वारा.
वे पछोर रही हैं उन्हीं ऐतिहासिक आख्यानों को,
पछोर कर अलगिया रही हैं उनमें से
जीवित दानों को.... पर
उसमें जीवित क्या; मृत दाने भी नहीं
दाने नहीं होते ठस्स तब भी,
दाना मान कर उन्हें, वे रख लेतीं अलग
किसी धरोहर की तरह
मान कर कि धरोहर होते हैं मनोहर
पर वहां तो कचरे ही कचरे हैं,
जो उधरा जाते हैं
सूप से पछोरते ही
उधराने वाली चीजें तो उधराएंगी ही.
वे फेंक रही हैं                                                      
जौहर जैसे कचरों को
होगा क्या कचरों का?
आखिर किस लिए                                            
 नहाना चाहेगी?
सौन्दर्य की नरम धूप में
कोई औरत.
आखिर औरत
लाज का कोलाज क्यों बने?
वही लाज जिसकी भुतहा बिमारी से
संक्रमित है आधी आबादी.                                  
संक्रमित है                                                  
 विवेक की ऊर्जा.
फिर भी मस्त मस्त थी निर्लज्ज दुनिया
वही दुनिया जिसने नहीं देखा था
कुटिल वर्जनाओं को
चूल्हों में जलते हुए
किसे पता था कि
चूल्हों में जला कर वर्जनांओं को
पकाया जा सकता है
बच्चों के लिए स्वादिष्ट ब्यंजन
वे देखी जा रही हैं दौड़ती हुई
संभावनाओं की पगडंडियों पर
जिधर हो रही होती है परेड
सुरक्षित रखने के लिए                                                
 पांवों के निशान
ग्लोब पर.
   

   पहाड़ों से   

पहाड़ों से नहीं डरता कोई
डरता है उनकी चीखों से.
डायना माइट घुसते ही आंतों में
कांप जाते हैं पहाड़.
निकलती हैं डरावनी चीखें
कांप जाती हैं बस्तियां.
बिखर जाते हैं पहाड़.
छितरा जाती हैं उनकी आंतें.
हंसता है पहाड़ तोड़क
पहाड़ सी हंसी....
‘माल नहीं निकला’
पहाड़वासी हो जाते हैं उदास
कि नहीं मिल सकता
पत्थर का एक टुकड़ा भी
आसमान में उछालने के लिए भी.
लगातार जारी हैं
डायनामाइटों के विस्फोट.
पहाड़ों का गिट्टियों में तब्दील होना
फिर बिकना या कि रूपया, डालर
बन जाना
पहाड़ नहीं डराते अब.
नहीं कपाते हाड़.
बन चुके हैं फिक्स डिपाजिट
वन बनाए जा रहे रंगीन मधुवन
इनसे कौन ले अनबन?
कौन जलाये तन?
बिजली की कृपा से ,                                    
बनाई जा रही यहां आर्थिक मीनारें,
बनाये जा रहे नये
संस्कारों के पिरामिड,
पहाड़ों से ही गढ़ी जाती रही हैं
अबोल मूर्तियां,
जो बोलती नहीं थीं आदमी की बोली.
फिर भी बोलता था आदमी उनके सामने
करता था प्रार्थनाएं.
अब नहीं होती पहाड़ों पर प्रार्थनाएं.
पहाड़ों पर अब मनाए जाते हैं,
वेलेनटाइन डे,
देहलीला के किसिम किसिम के उत्सव.
ऐसे में कौन लिखे
प्रताडि़त होने के बाद भी
शोक गीत या विरह गीत
विरचना क्यों मरा खदान में
सुगिया कैसे भाग गई?
पहाड़ सा कलेजा चाहिए
पहाड़ के बारे में लिखने के लिए.
हाड़ जब होंगे मजबूत
फिर लिखी जाएंगी
हाड़ से उपजी कवितायें
पहाड़ के बाबत
 

   वे समझते हैं 

वे समझते हैं कि
गढ़ा जा सकता है आदमी.
जो जाने सिर्फ हां हां करना
संभव हो जिन्हें रिमोट से चला लेना.
जिनके लिए विवेक का मतलब हो
मालिक के जूते और अधिकार का
मतलब हो, महलों के पीकदान में
खखारे बलगम.
या कि किताबों की छींकें.
कानून की विकलांग धाराएं.
पर लोग समझते हैं कि
जो मालिक बने बैठे हैं, वे मालिक नहीं
सिर्फ कचरा हैं
रीति रिवाजों के, परंपराओं के.
अतीत के झूले में झूलने वाला
कर भी क्या सकता है?
बीमार और अपाहिज बनाने के सिवा
वे लटकाते रहे हैं अतीत को
सूली पर.
लोग समझते हैं
समझते हैं कि
उन्हें करना क्या है?                                              
बराबरी का रोलर चलाने के लिए
उन्हें करना क्या होगा?
धूप रौशनी, हवा, पानी,
जल और जंगल
तुम्हारा कैसे हो गया
उस चाल को
वे समझते हैं.

   संभावना है

किसी सड़क, किसी गली,
किसी शहर से गुजरते हुए,
संभवना हो सिर कलम होने की
फिर दोस्तों!
उन फैसलों से क्या डरना
जो कानूनी तो हैं पर सामाजिक नहीं.                                
जाति की लिपि और गोत्र की भाषा
पढ़ लेने के बाद जब संभावना हो
मनुष्य से इतर कुछ बन जाने की
फिर दोस्तों !
उन किताबों को क्या पढ़ना
जिनकी रसोई में भूगोल पका करता है.
हथौड़ों से चोटिल हो जाने
बस्तियां जल जाने
भूखे सो जाने की जब संभावना हो
फिर दोस्तों!
उन गीतों को क्या गाना
जो स्वतंत्रता की जोश जगाते  हैं.
बोझ ढोते हुए,
हल जोतते हुए
कहा जा सकता है
सूरज को सूरज
चाॅद को चाॅद, रात को रात
अपने हिस्से का पानी
रोका जा सकता है कियारियों में
आसमान में लहराई जा सकती हैं
मुठ्ठियां
फिर तो पूरी संभावना है मेरे दोस्त!
खड़ा हुआ जा सकता है
समाज बदलने के लिए सीना तान कर.

     

   डरता हूॅ


पढ़ना चाहता हूं पवित्र पोथी                                            
 पर डरता हूं
कहीं उसके कमीने तर्क
मेरे विचारों को अपाहिज न बना दें.
फिर मैं खड़ा कर दिया जाऊं
कतार में
चरण बन्दना के लिए
उपासना के गीत गाने के लिए
हिफाजत करना चाहता हूं.
काले गोरे सभी कानूनों की
पर डरता हूं
पोलिंग बूथ मुझ पर हंसने न लगे.
और मैं पहुचा दिया जाऊं                                                
किसी पोस्टमार्टम घर.
मिलना चाहता हूं
समय के कथित जननायकों से.
पर डरता हूं
उनके गनरों से,                                                
कहीं लिख न दे
मेरे जिस्म पर गोलियों के अर्थ.
बारूद की कोई ऐटमी लिपि.
लिखना चाहता हूं गीत
उन महिलाओं पर
जो ढो रही हैं आवारा शुक्राणुओं
के भार.
पर डरता हूं
उन जनाना मर्दों से,                                                  
जो नहीं बताना चाहते                                                
 कि वे बाप बनने वाले हैं
छिपा लेते हैं अपना नाम
डूबना चाहता हूं                                                        
पाप धोने वाली नदी में
पर डरता हूं
कहीं मुझे लील न ले
उन शिशुओं की तरह
जो डुबो दिए गए उनमें
हमेशा हमेशा के लिए.
फिर कैसे पढ़ूं?
आचार विचार वाली पोथी
कैसे याद करूं उसके तर्क      
डरता हूं.
मैं डरता हूं
उन कविताओं से भी
जिनमें नहीं होती भूख,
जिनमें नहीं होती
आदमी होने की तमीज,
जिनमें नहीं होती विचारों की मुस्कान,
जिनमें नहीं होती
आदमी की जिद,
जो आदमी को आदमी बनाती है.
मैं रोक देना चाहता हूं
बस्तियों में आग फैलाने वाली सुबह.
खास तौर से उस सुबह को
जो भूख के खिलाफ, लड़ने वालों की
शिनाख्त कराती है.
चाहता तो हूं सुनना
किलों के प्राचीर से उडाये जाने वाले
झूठे सुभाषितों में नहाए शब्दों को.
थोड़ा डरता हूं
कहीं करमा के धुनों और
बिरहा के रागों को
बेडि़यों में जकड़ न दिया जाये.
चाहता तो हूं रखना उस कुदाल को घर में
जा कोड़ सके विचारों की बंजर जमीन
पर डरता हूं
कुदाल चलाने की मेरी आदत को
आवारापन न मान लिया जाये.
बन्द कर दिया जाये आबदस्त लेने का
तरीका भी,                                                        
सोचा जाने लगे
मशीन के बारे में
चाहता हूं चलना                                                    
पवित्र आत्माओं के साथ
पर डरता हूं, अपनी परर्छाइं से
और उनके घातक प्रहारों से.
तर्क की आॅखें फूट जाने के बाद
नहीं मिल सकती मुझे एक पतली
छड़ी भी.
इनके प्रार्थना गृहों से घर तक
लौटने के लिए
फिर मैं क्या करूंगा ?
सुबह दोपहर या रात.
कोई तो नहीं साथ.
कहीं नहीं कोई किताब
जिससे सीखा जा सके
भूख से लड़ने का तरीका.  

   समय

प्रतीक्षा करो कि
सुधारों की हवा आएगी
खिड़की खोल कर
और सोख जाएगी
तुम्हारे जिस्म पर                                    
छलछलाया पसीना, प्रतीक्षा करो...
प्रतीक्षा करो कि
सुबह होगी (जो होगी ही )
भूख से बिल बिलाया तुम्हारा लड़का
पीठ पर गुलामी की किताबें बांध कर
जाएगा स्कूल (यदि स्कूल खुला रहा)
वह भी दूसरे बच्चों की तरह
बैठ पाएगा टाट पर
उसे झाड़ू नहीं लगाना पडे़गा
वह सीख पाएगा
‘स’ से समय
‘स’ से संविधान
‘स’ से सरकार और ‘स’ से सलाम
करने का तरीका,
प्रतीक्षा करो कि
‘स’ से समझौते होंगे और रुक जाएगा
वह संग्राम जिसे
शुरू किया जाना है
आदमी और आदमी के बीच
फर्क मिटाने के बाबत.
और समय तुम्हें बचा लेगा
प्रतीक्षा करो.
कि कोई पैगम्बर आएगा
जो काट डालेगा तुम्हारी बेडि़याॅ
दुलारेगा तुम्हें.
गोदामों को सिखा देगा सच बोलना
बैंकों को सिखा देगा अपरिग्रह
कि कमाने वाला खाएगा
लूटने वाला जाएगा.
प्रतीक्षा करो,
प्रतीक्षा करो
तुम्हारी यातनाओं का सच
साफ कर पाएगा उदारताओं की नालियां
जिनमें सभ्यताओं का दूध बहता है
कि दूध में पानी मिलाने का चलन
समाप्त हो गया है.
प्रतीक्षा करो कि तुम्हारेे आंसुओं से सानकर
कानून के आंटे से बनाई जाएंगी रोटियां
पेट भरने तक परोसी जाएंगी तुम्हें.
प्रतीक्षा करो....
राजनीति के कारखाने,
हरिया देंगे, बंजर जमीन
विकास की यूरिया छिड़की
जाएगी तुम्हारे खेतों में
प्रतीक्षा नहीं मेरे दोस्त!
चिन्ता करो
चिन्ता करो आग पर बैठी दुनिया बचाने की.
तटस्थता के अपराधियों को महसूस कराने की.
कि बचाई जा सकती है दुनिया बदरंग होने से
धूप का इस्तेमाल किया जा सकता है
अमन से मन को लहराने के लिए
वारिश का पानी रोका जा सकता है खेतों में,
हल के फारों से भी लिखा जा सकता है
इतिहास.
चिन्ता करो कि प्रतीक्षा के लिए
तुम्हारे पास नहीं है समय.

   बोलती  तस्बीरों में

कई वर्षों से, नहीं लिखी कविता
नहीं चुना खेतों में छितराये शब्दों को.
आज भी याद है अतीत
अतीत भूलता भी नहीं,
नहीं सहला पाया
घायल अक्षरों को.
कुछ जो कराह रहे थे
और कुछ जो यंू ही मर गये
पोखरे पर पड़े भब्य शिवाले के पास.
प्रार्थनाएं करते,
शंख बजाते,
आचार की पोथी बांचते.
वरसात होते ही उग आते हैं खेतांे में
कुकुरमुŸो की तरह.
किसिम किसिम के अक्षर.
सोचता हूं अक्षर भी पकेंगे
फसलों की तरह या
किसी दूसरे पौधों की तरह.
पकने पर तोड़ लूंगा
फलियां, और अगले मौसम में
करूंगा वैज्ञानिक ढंग से उनकी खेती.                                    
सोेचता ही रहा हूं लगातार
ऐसा नहीं हुआ कभी
जमीन जिस पर करनी थी खेती
क्या मालूम था?
सदाचारों की तूफानी नदी लील लेगी
मेरे हिस्से की जमीन
मिट जाएगा सब कुछ
और हम तब्दील हो जाएंगे  
बोलती तस्बीरों में.
   

 

  बदल रही जनता     

सभी जानते हैं
साफ और हवादार जगहों पर
बिछी रहती हैं जुल्मों की चारपाइयां.
उसके नीचे ही बैठ सकते हैं
दूसरे लोग उसके अगल बगल,
चारपाइयां भी होती हैं कुर्सियों की तरह
जिस पर नहीं बैठ सकता हर कोई.
उस पर बैठते हैं वे लोग
जिनकी होती है विशेष भाषा.
पहनते हैं विशेष भूषा,
जिनके होते हैं विशेष भवन,
किसी न किसी तरह
वे हासिल कर लेते हैं विशेषाधिकार भी.
यानि की सिर्फ उन्हीं की है दुनिया.                                        
 डर जाते हैं जमीन पर बैठने वाले
वे तब और डर जाते हैं जब
विशेष भवन, विशेष भूषा, विशेष भाषा वाले
निकलते हैं सज धज कर.
कानूनी चादर ओढ़ कर.
चलते हैं धरती पर फंूक फूंक कर
डरे हुए.
कांपने लगते हैं तब....
जमीन पर बैठने वाले
बोल देते हैं हल्ला
चिल्लाने लगते हैं ‘मारो अगर मार सकते हो’
लेकिन हम मारेंगे नहीं और मानेंगे भी नहीं
फिर वे बोलने लगते हैं
लोक भाषा....          
धीरे से भुन-भुनाते हैं अपने खास एकान्त में
बदल रही है जनता.
डा. लोहिया के विचारों पर आधारित



     पंाच साल


रोटियां जल जाया करती हैं
अगर उलटी पलटी न जांये
धुआं जाती हैं रोटियां.
सरकारें भी धुआं जाया करती हैं
हुकूमती नशा चढ़ जाता है उन पर.
करने लगती हैं
पगलाई हरकतें.
अगर उन्हें उलटा पलटा न जाये.
पूरा घर बसा जाने तथा
लोक को त्रस्त होने और
त्राहि त्राहि करने के पहले
जरूरी है राटियों की तरह
सरकार को भी उलटना पलटना.
इस उलट पलट से ही
रोटियां बनती हैं खाने लायक.
सरकार भी बनती है जनता की
जनता के लिए, जनता के द्वारा.
उलटी पलटी जाने वाली सरकारें ही
तोड़ पाती हैं अपनी जड़तायें.
उतार पाती हैं तिजोरियों की भूषा.
नहीं गढ़ पाती तानाशाह का चेहरा.
उलटने, पलटने से ही
बन पाती हैं पारदर्शी और थोड़ा
संवेदन शील भी.
तभी समझ पाती हैं सरकारें.
जनता क्यों हल्ला बोल रही?
यह समझ ही कराती है उनसे
जनता को सलाम.
खड़े हो कर नंगे पांव
जैसे खड़ी रहती है जनता
धूप व बरसात में
पूरे पांच साल.
डा. लोहिया  के विचारों पर आधारित

   पासंग

लोग समझते हैं तराजू
और उसका मतलब.
कितनी चीजें तौली जा सकती हैं
तराजू से तथा यह भी कि
कितने किस्मों के होते हैं तराजू.
पूछ रहे हैं लोग सवाल दर सवाल
उस विशेष तराजू के बारे में
जिससे तोला जा रहा लोकहित.
देखा जा रहा है पासंग.
स्वजन हित और लोकहित में
वही तराजू जिसकी डंडियां
झुकाई जा सकती हैं
कभी बाएं तो कभी दाएं.
बहस के बटखरे बदले जाते रहे हैं.
अब अधिकार, मूलाधिकार, विशेषाधिकार
आरक्षण आदि से तोले जा रहे लोकहित.                                                
उसी से तोली जाने लगी हैं
सावन की बदरियां, सूरज की धूप.
आंगन का भूगोल तथा पुरखों के
कारनामे भी.
नई तोल तो होगी ही आखिर
कैसे तोला गया था आदमी?
छोटा बड़ा सवर्ण अवर्ण
किसने चढाया था पासंग?
किसने झुकाई थी डंडी?
वह कला थी या छल
प्रायोजित दिमाग तो पासंग
ही बढाएगा.
बहसंे हो रही हैं
कि बदलो तराजू.
बदलो तोलने का तरीका
जिसमें पासंग वाली डंडियां न हों.

     मगर


किस तरह के आईने
पहुंच रहे हैं गावों की तरफ.
खलिहानों की ओर
दिखाने के लिए                                                    
गालों की झुर्रियां.                                                
सिकुड़नें तथा खरोचें भी.
उस आदमी को भी                                                  
जो कभी था जीवित.
जिसे भूख ने
तब्दील किया था लाश में.
तंत्र-कला का अदभुत नमूना
कि विश्वाश तब्दील                                              
 हो जाए लाश में.
चुनाव खत्म, आईने खत्म.
कहां चले गए आईने?
क्या हुआ उन्हें
कहां गढ़े जाते हैं आईने?
हर पांच साल बाद
कभी कभी बीच ही में.
किसिम किसिम के आईने
खड़े हैं,                                                  
 हर चैराहे पर
हर गली में.
आखिर क्या दिखता है उनमें?
मक्कारी और धोखे के सिवा.
उस आइने में नहीं दिखती
भूख, बेरोजगारी, गरीबी.
तथा विस्थापित और प्रताडि़त दुनिया.
कोई जिन्दा कौम                                                  
आखिर कैसे देखे
अपनी सूरत चुनावी आइनों में
साफ करने के लिए...                                                    
चेहरे के दागों को
जिन्दा कौमें अपना हाथ भी
नहीं देख सकतीं
जिससे उठाए जाते हैं मशाल.
तानी जाती हैं
आसमान की ओर मुठ्ठियां.
कुछ भी तो नहीं देखा जा सकता
चुनावी आईनों में,
उसमें दिखता भी कुछ नही.ं
                                                  कहीं ऐसा तो नहीं,                                                  
आईने सिर्फ आइने हों.
जिसमंे सिर्फ आईना ही दिखे
कुछ दूसरा, तीसरा नहीं
वैसे भी चुनावी आईने में अधिक से अधिक
सूरत ही देखी जा सकती है,
नहीं देखी जा सकती सीरत.
सीरत देखने के लिए नहीं होते
चुनावी आईने.
जो खड़े हो जाते हैं चैराहों पर,
गलियों के नुक्कड़ों पर,
घोषणा पत्रों के ठेक पर
टिकाए गए आईने,
वैसे ही हिलते, कांपते रहते हैं,
तरंगों की तरह.
फिर कैसे दिखेगा उसमें खलिहान?
वह विहान भी जो उतरता है सिवान में.
हां संसद को बना सकते हो आईना
अगर बनाने की ईच्छा शक्ति हो
फिर उसमें साफ साफ देखी जा सकती है
सूरत और सीरत भी....
मगर....संसद में रसद कहां?


    पराजय

सोने की खान से
निकले हुए नागों की फुफकारें
बढ़ रहीं हैं गांवों की तरफ.
तथा उन नागों की भी
जिनके बाप दादों ने पीठ पर
कस कर बांध लिया था
इहिास और भूगोल.
नाग बढ़ रहे हैं गांवों की तरफ
ढिबरियांे की रौशनी में देख रहे हैं
गरीबी की शक्ल.
जली हुई राटियों पर चिपका रहे हैं
बाप दादों की आतताई सूरत.
वे ढंूढ रहे हैं विजयी उन्मादांे को
गरीबों की ठिल्लियों में.
वे जानते हैं कि मड़हा में
गरीब की रोटी खा लेने मात्र से ही
थर थराने लगेंगे बूथ फिर भी
अगर नहीं थर थराए बूथ तो..
वह फुफकारेगा ही नहीं,
काटेगा भी हर किसी को.
वह जब तक चाहेगा तभी तक रहेगा बूथ.
वह नहीं तो बूथ नहीं, वैसे भी
बूथ की जरूरत ही क्या है?
जीत की चटटान पर चढ़ कर
उसके बाप दादे मुस्कराते थे फिर
वह क्यों नहीं मुस्कराए?
वह उन नसीहतों को फेंकवा चुका है
सहन शीलता के परनालों की तरफ
जो पराजय को भी जय बताती हैं.


     डीएनए.

भयभीत हैं लोग और
थरथरा रहे हैं.
आविष्कारों से,
कांप रहेे हैं.
खड़े हो कर कृत्रिम गर्भाशय में
हम जीत सकते हैं भूगोल.
बना सकतेे हैं गढ़.
खोज लिया है हमने
पराजित किए जा सकने वाले क्षेत्र,
वह इतिहास भी,
पुरुष तथा प्रकृति के संघर्षों का.
यह मूर्खता है समझना                                            
कि आदमी पहले सिर्फ
आदमी रहा होगा.
नहीं रहा होगा वंश का कोई उत्पाद.
वह नहीं था पहले बटा हुआ.
पहले नहीं था वर्ण, न वर्ग,
नहीं थी जातियां
फिर काहे का चिल्ल पों?
काहे के लिए हल्ला?                                            
जाति क्या है? वर्ण क्या है?                                            
जरूरी नहीं संतानोत्पŸिा के लिए
नर-नारी संबध
प्रयोग शालाएं तो बता ही देंगी
गर्भ की शुचिता के बाबत.
किसे नहीं पता? डी.एन.ए. भी
कोई बात है,                                                  
इसी लिए वे कांप रहे हैं
केवल वंश पर जाति पर
तथा उससे जुड़ी निर्मम मृत्यु पर.


    गुलामी


भले ही विकसित हों
नदियों पर पुल बना लेने की कलांए.
आसानी से पार होजांए सेनाएं.
गुलामी की लुगदी फेंक दी जांए पर,
भूगोल की बढि़याई नदी पर
कैसे बनाया जा सकता है कोई पुल?
जिसे मानव सभ्यता जानती तक नहीं.
जो अभी तक नहीं गढ़ पाई
मानवीय समीपता के औजार
दुनिया तो केवल संप्रभुता ही जानती है.
ब्यक्ति की या जन की                              
संप्रभुता भले ही हो इतिहास के लिए
जरूरी कोई चीज पर
बिना मानवीय समीपता का पुल बनाए                                              
कैसे जा सकता है आर पार कोई भी.
वह चाहे दूसरी संप्रभुता ही क्यों न हो
किसी चैहद्दी में तड़पते भूगोल का.
दुनिया में देखा जा सकता है                                    
संप्रभुता के विषाणुओं को.
फैल रहे हैं हवा की तरह हर ओर
भूगोलों के आर पार.
आदमी चाहता है विषाणुओं से होना मुक्त
भूगोल को गोल समझने वाला आदमी
आखिर घूमे तो किस परिधि पर?
बनाए तो कैसा बर्तन? उसे गढ़े किस चाक पर,
गढ़े तो कैसा? आजादी में गुलामी वाला या
आजादी में सिर्फ आजादी वाला.
आदमी जब नहीं जा सकता भूगोल के पार
फिर काहे का फर्क, कैसी स्वतंत्रता?
फिर किसे कहेंगे गुलामी?

     अवज्ञा

वही सूरज, वही चाॅद    
वही हवा, वही बरसात.
कुछ भी तो नहीं बदला        
न ही स्थगित हुआ कुछ.
वही बीमारी, वही दुख,
वही बेरोजगारी, वही भूख.
सभी तो लड़ रहे अपनी तरह से
लड़ाई हो रही हर तरफ
शोर उठ रहे हैं, धुआं भी.
खड़ा पेड़, खड़ा रहेगा कब तक?
कूएं कहां दर्ज कराएं शिकायतें?
उन्हें तो सूखना ही है.                                          
भूखा मरेगा भूख से
मरे किसे चिन्ता पड़ी है?
बगल से गुजरती कारें                                        
गुजरंेगी ही.
सड़क पर चलने की    
तमीज भी तो होती है कुछ.
कुचला आदमी                                                    
 तमीज से हो जाता है मुक्त.
छोड़ कर शान्ति की व्याख्यायें
कुचले आदमी के चेहरे से
निकलती हैं सहनशीलतायें.
यह अलग बात है कि                                      
सत्याग्रहियों के नहीं
मोड़े जा सकते हांथ पैर.
इसके पहले कि                                                
उस आदमी की हो अन्तिम क्रिया
देख लेना चाहिए पोस्ट मार्टम रिपार्ट
कि मृतक खड़ा नहीं हो सकता था
सŸाा के खिलाफ.
कि उसे यकीन नहीं था                                          
अपनी चैड़ी छाती व
गठीले बाजुओं पर.
यह कि वह डरने वाला आदमी था
डरता था हथियारों से और कांपता था.
यह कि वह नहीं जानता था कि                                    
संभव है अत्याचारों के खिलाफ अवज्ञा,                            
संभव है इतिहास गढ़ना.                                        
जिसके लिए हथियार नहीं
चैड़ी छाती की जरूरत होती है.
चैड़ी छाती तो थी उसकी,
बाजू भी गठीले थे,
केवल राजनीतिक अलकतरे से बनी
सड़क पर चलने की
तमीज नहीं थी उसके पास.
वह सिर्फ इतना जानता था कि
बांए चलना चाहिए और
बांए चलना तमीज है कि नहीं
उसे क्या पता?....
और वह बांए ही चल रहा था
उसे क्या पता था कि
दांए से प्रभुता-संपन्न कारें
आएंगी हथियारों की तरह
उसे रोंद देगी और वह
पहुंचा दिया जाएगा
किसी पोस्टमार्टम घर.
सभी जानते हैं कि हथियार के लिए अवज्ञा....
कुचलने वाली चीज होती है.

      किताब

घर से निकलने के पहले
वह देख लेना चाहती है
मर्यादाआंें के प्रतीकों को
जिसे प्रकृति ने रच दिया है
उसकी देह पर.
याद हैं उसे बीते दिनों की
समीक्षाएं
जिसे बन्द कर दिया गया है
अलबम में.
वह तस्बीर भी
जिसमंे वह अपने
मित्र के साथ थी उसी तरह जैसे कि
रहा जा सकता है मित्र के साथ.
आश्वस्त और तनेन कि
वह चल सकेगी
उसके साथ बहुत दूर तक.
मित्र था कि हो जाना चाहता था
अदृश्य,
डूब जाना चाहता था देह की
अतल गहराई में.
मित्रता की पनडुब्बी के सहारे.
उम्र की गहराई में उतर कर
वह डर गई थी.
मर्दाना जिस्म में मित्र को बदलता देख.
मित्रता के दौरान,
जब हुई थी उससे मित्रता
तब वह नर नहीं लगा था,
केवल एक जिस्म था
मनुष्यता की असीम ऊर्जा से संपन्न,
प्रकृति का बेहतर उत्पाद.
उसे नर में बदलता देख
तनेन हो गई थी वह भर काबू,
भीतर छटपटाती औरत के हक में,
निकल आई थी मित्र की पकड़ से बाहर
उसे फटकारते हुए
कि वह सिर्फ औरत नहीं,
बेतरतीबी से लिखे प्रेम पत्रों की
लिपि भी नहीं,
वह कथित मर्यादा की किताब भी नहीं,
या कि परंपराओं का
कोई व्याकरण,
छुई मुई नहीं है वह अब
निकल चुकी है घर से बाहर
सुरक्षित कराने के लिए अपना हक
उन किताबों में जो लिखी जा रहीं
औरतों के बारे में.
नर का नारा बना उसका मित्र
देखते देखते जाने कैसे बन गया बानर
और खुद नोचने चोथने लगा अपना जिस्म
उसे नहीं पता.
 

   औरत

किताबों के पन्नों पर,
पत्रिकाओं के कालमों में,
घर घर छितराई टीबियों पर,
कहां नही ंदिखतीं
खजुराहो की मूर्तियां,
योग से संभोग तक,
योग से नियोग तक
सभी जगहों पर दिख रही
औरतें आखिर कहां जाएं,
किस नदी में नहाएं जो
उतार न पाए उनके देह का पानी.
नदी बहा न ले जाए उन्हें
एक घाट से दूसरे घाट तक
कैसे करें श्रृंगार? किस शीशे में देखें
मन की शुचिता.
किसके प्यार, दुलार का लगाएं काजल,
किस अलाव पर जलाएं अपनी देह,
किस पुरुषार्थ का लगाएं अपटन,
जिससे साफ हो जाएं अश्लीलता के
सारे प्रतीक चिन्ह.
कोई हवन कुण्ड भी तो ऐसा नहीं                                  
जहां से ले आएं करिश्माई भभूत
पोत लें देह पर या पी जाएं
जिससे श्लीलता की नई परत उग
जाए देह पर.
फिर न जनम पाएं बच्चे
जो दूध पीते पीते
जाने कैसे सीख जाते हैं
देह चूसना.

     आग 

क्या नहीं जल सकता आग में?
सारी चीजें जल जाती हैं आग में
शायद ऐसा नहीं है
अगर जल सकता आग में सारा कुछ तो
जल चुका होता अतीत भी
उसके दरवाजे, चैखट और खिड़कियां
तो जल ही चुकी होतीं,
अतीत के कौतुक और रहस्य भी
आग लगते ही जल गए होते.
जल गईं होतीं वे आदतें
वह मर्दानगी जो
डरे हुए आदमी का
कारनामा होता है.
बस्तियों में उगाई जाती रही हैं
आग, आखिर क्या कहेंगे इसे?
लोग कहते हैं आग में क्या नहीं
जल सकता,
जल सकता है सब कुछ
फिर क्यों नहीं जल रही
हमल व हमला की आदतें?
विचार और व्यभिचार की दूरी
क्यों नहीं जल रहा
आदमी और आदमी का फर्क?
उफ! ये चुप्पी ये उदासी,
ये सोया हुआ समय,
नशे में धुत संवाद,
पराजित शब्द.
किस लिए तलाशी जा रहीं
चिनगारियां या
माचिस की तीलियां
आओ जाने कहीं आग
सोई तो नहीं
हसीन बिस्तरों पर
छिनाल कविताओं के संग.
भभूत लगाए हुए
जब बुझे चूल्हे दिखते हैं
रोते कलपते.
छितराए होते हैं बर्तन
उसके आस पास.
लोर इकठ्ठा करने से क्या होगा?
छितराई उंगलियां भी
नहीं कर सकतीं कुछ.
                               उंगलिया जब बन जाती हैं मुठ्ठियां                                                   
ब पता चलता है
लोरों से नहीं जलाए
जा सकते चूल्हे,                                  
फिर जाने क्या हो जाता है
कि लोरों के संग तैरने लगती हैं
विस्फोट की चिनगारियां....
धत्..... यह तो आग है,                                              
 आॅखों में बन्द                                                          
किसी भूगोल की तरह.
       

     बड़े हो रहे


बड़े हो रहे हैं बच्चे और लिख
रहे हैं कवितायें, कहानियां.
समझने व गढ़ने लगे हैं कानून.
अर्थ के लिए अर्थ शास्त्र
विश्व के लिए विश्व बाजार
विश्व बन्धुत्व के बारे में क्या जानना...
वह तो सभी की पूंजी है.
अतीत से ही.
बड़े हो चुके लोगों की तरह
बच्चे भी हो रहे हैं बड़े
बहुतों ने छोड़ दिया है
माॅ का दूध पीना
उन्हें नहीं चाहिए अब
माॅ के आॅचल की छांव.
दूध ही क्या वे छोड ़रहे हैं
आंगन और सेहन की भाषा,
और नेह की भूषा भी.
जो तोपे रहता था पूरी देह.
प्यार के अपटन के बारे में
उन्हें अब कुछ भी नहीं पता...
जिसे लगाया करती थी माॅ या दादी.
अब वे बीते दिनों से उतना ही दूर हैं
जितना कि नजदीक हैं आने वाले दिनों से.
वे नहीं चाहते
सुनना माॅ की लोरियां,                                                          
बाप का तुतलाना,
और चूसना आंगन के भूगोल को
जिसे चूस कर ही
बड़े हुए हैं, और भी बड़े हों शायद.
   

     रोटी 

पकड़ ढीली पड़ती जा रही
लगातार
आदमी होने के
ब्याकरण की.
ब्याकरण है कि किताबें चूम रहा है.
और कचहरी के सामने खड़े खड़े
मुस्करा रहा है.
वह कई बार लतिया चुका है
निष्ठुर सहनशीलताओं को.
जो अक्सर ऊंघती रहती हैं
किसी आराधना केन्द्र में बैठ कर.
लतियाने को तो वह
उस राजनीति को भी लतिया चुका है
जिसे पता ही नहीं कि
विनम्रता भी कोई चीज होती है.
अन्तश्चेतना भी होती है
आदमी के पास.
जिसे नहीं पढ़ पा रहा आदमी
और डूब जा रहा है समय
के माया जाल में.
कानून जिसे चूम रहा आदमी
नहीं सिखा सकता
किसी को आदमी होने की तमीज.
उसके पास नहीं होतीं
                       बराबर देखने वाली आॅखें.                                             
और लोग हैं कि
पोलिंग बूथ पर मचाए हुए हैं
उछल कूद
पकड़ने के लिए
आसमान में टंगी रोटियां.
       
   

   डाक्टर लोहिया के प्रति

अन्धेरों में जब न दिख सके वह मूरत
जो सत्य, अहिंसा व करुणा से गढ़ी गई हो
बनाई गई हो काट कर तटस्थता की चट्टान.
आस्था और विश्वाश की छेनियों से.
जला लेना जरुरी होता है ऐसे समय कोई दिया
ताकि साफ साफ देखी जा सके,
मूरत के हृदय में बैठी दुनिया की तस्बीर.
मूरत जो कभी बतिया नहीं सकती
नहीं जा सकती जनता के सभागारों में
फिर कैसे पूछा जा सकता है उससे?
बताओ तुम्हारे होते हुए कैसे उभर रहे
जातियों के चकŸो?
कैसे बह रहे सांप्रदायिकता के खून?                                    
सूरज जो टहलता टहलता                                                
चला जा रहा पश्चिम की तरफ
नहीं लौट रहा वापस, किस अदालत में
तलब किया जा सकता है बुद्ध को?
किससे पूछा जाय आखिर
अचैर्य अपरिग्रह व अस्तेय कहां चले गए?
महाबीर को भी तो नहीं बुलाया जा सकता
वैसे भी दुनिया में कम नहीं हैं कायिक वेदनायें
जो बिखरी पड़ी हैं हर तरफ.
गवाही के लिए, मतदान के लिए,
खुद को निरपराध बताने के लिए,
संभव है, अदालत ही उठ जाय
पड़ जाय कोई दूसरी तारीख.
तलब कर लिया जाय राम को भी और
पूछा जाये सामाजिक असंतोषों के बारे में.
या यह कि कृष्ण ने क्यों इनकार कर दिया था
अस्त्र धारण से?
किन किन मुद्दों पर कराया जा सकता है मतदान
आखिर कौन बता सकता है कि...
‘धर्म दूर गामी राजनीति है और राजनीति अल्प कालीन धर्म’
घंटों शंखों याकि अजानों ने तो अब तक
कभी नहीं बताया चीखों के बारे में,
कफर््यू के बारे में,
फिर क्या किया जाय, कैसे मुक्त कराया जाय
बन्दी सचों को, सभी चाहते हैं कि
सचों को न पहनाई जांय हथकडि़यां
लेकिन वाह रे! इहलौकिकता
तथा पारलौकिकता की घूंटी
अद्भुत रसायन है उसमें मिला हुआ
जिसके सहारे लगातार बढ़ाया जा रहा
आदमी और आदमी में फर्क.
निर्वस्त्र हुई द्रोपदी या कि अंगूठा कटा एकलव्य
ये कैसे उदाहरण हैं अतीत के?
कहां भटक रही वह ज्योति जो
आदमी को बनाती है महामानव
आखिर कहां है अब तक.
अब भी समय है जनता के क्रन्दन पर
भागे चले आओ
आखिर कब तक चखता रहेगा भाग्यफल,
इहलौकिक आदमी.
कब तक भटकता रहेगा पारलौकिकता के स्वर्ग में?
वैसे सपने छितराये तो रहते ही हैं आकाश में
पर वहां बादल भी तो चुप बैठे नहीं रहते.
बरसें तो नहाए कोई, नहा लेना भले हो आसान
पर आसान नहीं होता कियारियों में पानी रोक लेना.
कियारियां पानी क्या रोकेंगी
वहां तो पहले से ही जमी हुई है अतीत की
निर्लज्ज तटस्थताएं.
गली गली बिखरी मूर्तियां भी तो चुप हैं
जिन्हें गढ़ा है अतीत ने, वे कुछ नहीं कर रहीं                                  
 वे जानती हैं कि गढ़ेगी़ दुनिया ही                                                              
 समय की कोई मूरत

  कविता के भीतर


इस छोर से उस छोर तक गोया
जहां से शुरू होते हैं छोर, सभी
जगहों पर बिछी हुई हैं सुरंगे,
उसके बिस्फोटों में
होती हैं किसिम किसिम की आवाजें,
तथा वह आवाज भी
जिससे कांप जाती है दुनिया.
पर नहीं कांपती जिन्दा कविता.
वह घुस जाती है राजमहलों में
खड़ी हो जाती है विस्फोटों के खिलाफ.
कविता कोशिश करती है
कि दुनिया तब्दील
न होने पाए नपुंसक जनतंत्र में.
स्वतंत्रताएं हो जांए इतनी सहनशील कि
निकल पड़ें अधिकारांे की भीख मांगने.
फिर तो भूल ही जाना है
अपने प्राकृतिक और
नैसर्गिक अधिकारों का पक्ष.
और घूम घूम कर मंागते रहना है,
घर बनाने के लिए
जमीन का छोटा टकड़ा भी.
छाजन के लिए घांस फूस
और भी बहुत सी जरूरी
चीजें, मसलन रोटी,
चमके जो चाॅद की तरह.
कविता नहीं करती वकालत ऐसे कामों की.
आदमी जब था कविता से बाहर तब था
अब नहीं है कविता से बाहर.
वह घुस चुका है कविता के भीतर,
साफ करने के लिए वहां पड़े तमाम कचरे.
कविता की वह जमीन!
जो कभी हुआ करती थी..
राजमहलों के भीतर,
जिस पर उगा करती थीं
हमल तथा हमलों की कहानियां
तथा लाद दिया जाता था,
कविता की पीठ पर
बहादुरी का कूड़ा,
ऐश्वर्य के खर पतवार.
वह समय और था
जब कविता करती थी
सिंगार पटार, खड़ी होती थी
आईने के सामने.
सज धज कर बैठती थी
खिड़की पर.
नाचती थी महफिलों में,
और बोलती थी कि
दीवार में होती है खिड़की.
अब कवितायें तोड़ रही हैं
विवशताओं के पहाड़,
बांध रही है बर्बरता की पगलाई नदी.
नहा कर निकली हैं अभी अभी,
वर्जनाओं के घाट से.
वे दौड़ रही हैं और दौड़ जाती हैं
उस तरफ बेखौफ
पकड़ लेती हैं
आतताइयों को, जो जलाने आते हैं
अक्षरों की बस्ती.
अब अक्षरों के घर में
                               उदास नहीं हैं कवितायें                                                                                                                                   चाहे जिधर से देखो                     
इस छोर से या उस छोर से.

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